पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

वन अधिकार कानून का जंगल राज

फिर से हिन्द स्वराज

मीडिया पर धन बरसाने वाली सरकार

रेत पर हंगामा है क्यूं बरपा

आदिवासी लड़कियों के साथ रोज एक शाइनी

मुंबई मेट्रो क्या करेगा ?

भूख का घर है भारत

आ से आजमगढ़, आ से आईपीएल

हबीब तनवीर होने का मतलब

फिर से हिन्द स्वराज

मीडिया पर धन बरसाने वाली सरकार

वन अधिकार कानून का जंगल राज

हिमालय की तबाही वाली परियोजनाएं

पढ़ने लगे बिरहोर

बिक गई और बन गई पारो

अथः प्रेम कथा

अभिलाषा का इंद्रधनुष

लाल्टू की कविताएं

अपना देश

 
 पहला पन्ना > मुद्दा > मध्य प्रदेशPrint | Send to Friend 

बच्चों को मौत की बीमारी

बच्चों को मौत की 'बीमारी' !

 

प्रशांत दुबे

सतना से
 

 

जिस समय सतना, भोपाल और दिल्ली में लगी लाउडस्पीकरों से “ ये देश है तुम्हारा, नेता तुम्हीं हो कल के ” जैसे तराने गूंज रहे होंगे, संभव है, उस समय सतना के हरदुआ, नकझीर या कानपुर में कोई आदिवासी बच्चा कुपोषण के कारण दम तोड़ रहा होगा.

 

इस कुपोषण को आप अपनी सुविधानुसार कोई भी नाम दे सकते हैं- भूख, बीमारी, अशिक्षा....!

प्रशासन की सारी ऊर्जा इस बात पर खर्च होती रही कि किस तरह कुपोषण के कारण बच्चों की मौत को नकारा जा सके.


मध्यप्रदेश के सतना जिले के उपेहरा और मझगवां विकासखंड़ में कुपोषण से होने वाली मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है. मई माह में उचहरा ब्लॉक के हरदुआ और नकझीर गांव में पांच बच्चों से होने वाली मौतों की संख्या 10 अगस्त को कानपुर गांव के 2 वर्षीय रामभवन की मौत के बाद 28 हो चुकी है.

प्रशासन यह मानने को तैयार नहीं है कि ये मौतें कुपोषण से हुई हैं और जब वह यह मानने को तैयार नहीं हैं तो फिर वह इन मौतों को रोकने के लिये तत्पर भी नहीं दिखाई देता है. नतीजतन कुपोषण ग्रसित इन नौनिहालों की आंखें असमय ही हमेशा के लिये मुंदती जा रही हैं. ज्ञात हो कि सतना जिले में कुपोषण से मरने वाले बच्चों में से 80 प्रतिशत आदिवासी हैं.

हरदुआ और नकझीर गांवों में कुपोषण की स्थिति ऐसे ही निर्मित नहीं हो गई है. वहां पर रोजगार गारंटी योजना के तीन वर्षों में गांव के लोगों को लगातार काम मांगने पर भी महज दो दिन का ही रोजगार मिला. पिछले चार महीने से राशन की दुकान से राशन का वितरण नहीं हुआ. सूखे की मार अलग और इसी समय नौनिहालों को एकमात्र पोषणाहार पाने के माध्यम आंगनवाड़ी में भी फरवरी माह से ही पोषणाहार नहीं था.

जाहिर है, जब जीवन बचे रहने के सारे स्रोत सूख गए तो तब तो ये होना ही था.

आंकड़ों के खेल

भोजन का अधिकार अभियान और मध्यप्रदेश लोक संघर्ष मोर्चा के संयुक्त तथ्यान्वेषण दल ने जब प्रभावित गांवों का दौरा किया तो पाया कि गांव के 30 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से कुपोषित हैं, जबकि प्रशासन ने आनन- फानन में प्रेस वार्ता कर यह कहा कि गांव के केवल 4 ही बच्चे कुपोषित हैं.

ये और बात है कि सरकार द्वारा ही संचालित आंगनबाड़ी का रजिस्टर आठ बच्चों को गंभीर कुपोषित बता रहा है. मजेदार बात ये है कि जब कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र भेजने की बात आई तो महज 4 बच्चों को कुपोषित बताने वाले प्रशासन ने भी 5 बच्चों को पोषण पुर्नवास केन्द्र में भिजवाया.

भोजन का अधिकार अभियान और मध्यप्रदेश लोक संघर्ष मोर्चा ने बच्चों की मौतों के इस प्रकरण को उच्चतम न्यायालय के आयुक्त के सलाहकार डॉ. मिहिर शाह तक पहुंचाया और जब उच्चतम न्यायालय ने प्रशासन से रिपोर्ट मांगी तो प्रशासन ने ताबड़तोड़ शिविर लगवाने शुरू किये और कुपोषण हटाने की सारी कवायद इन शिविरों के माध्यम से ही करना शुरू किया.

इन शिविरों की भी हकीकत यही है कि ये शिविर भी प्रभावित गांवों से 5 किलोमीटर दूर लगाये गये तथा इन शिविरों से भी एक्सपायरी डेट की दवायें वितरित की गईं.

मज़दूरी की गारंटी नहीं

प्रशासन की सारी ऊर्जा इस बात पर खर्च होती रही कि किस तरह कुपोषण के कारण बच्चों की मौत को नकारा जा सके. कलेक्टर ने जब 15 जुलाई को हरदुआ गांव का दौरा किया तो आनन-फानन में घोषणा की कि प्रत्येक परिवार को 90 दिन का काम दिया जायेगा, प्रत्येक मृतक बच्चे के परिवार को 65-70 किलोग्राम अनाज उपलब्ध कराया जायेगा, साथ ही उन्होंने आंगनवाड़ी भवन की नींव भी रखी. लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात.... !

लोगों को काम तो मिला लेकिन वह सात दिन बाद बंद हो गया. हालत ये है कि मजदूरी की रकम 89,250.00 रुपये का भुगतान आज तक ग्रामीणों को नहीं किया गया. आंगनबाड़ी भवन में भी तीन क्विंटल दलिया पहुंचा कर चुप्पी साध ली गई. किसी ने यह जानने की भी कोशिश नहीं की कि बरसात के इस मौसम में तीन क्विंटल दलिया को पानी से बचाने के क्या इंतजाम हैं.

एक सामाजिक कार्यकर्ता सवाल पूछते हैं- “ जब प्रशासन यह मान ही नहीं रहा है कि मौतें कुपोषण से हुई हैं तो फिर प्रशासन ने अनाज क्यों भिजाया तथा किस मद से ? जब रोजगार गांरटी कानून के अनुसार प्रत्येक परिवार को 100 दिन का रोजगार पाने का अधिकार है तो फिर ऐसे में जिलाधीश 90 दिन की घोषणा कर कानून का उल्लंघन नहीं कर रहे है ? ”

मध्यप्रदेश में पिछले साल 13,8,700 बच्चे असमय काल के गाल में समा गये. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तृतीय चक्र के अनुसार मध्यप्रदेश में कुपोषण का प्रतिशत 54 से बढ़कर 60 हो गया है. जिसके बाद मध्य-प्रदेश देश में पहले नंबर पर आ गया है.

ऐसा नहीं कि कुपोषण के कारण सतना जिले में यह मौतें पहली दफा हो रही हैं. 2006-07 में 2060, 2007-08 में 1668 तथा वर्ष 2008-09 में अभी तक 346 बच्चों की मौतों के सरकारी आंकड़े उपलब्ध हैं. जाहिर है, बच्चों की मौत के मामले में सतना राज्य में अव्वल है.

बिस्तर खाली, बिस्तर भरा

बच्चों की मौतों के सवाल पर जिले के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आर. एस. पाण्डेय का कहना है कि यह दस्यु प्रभावित क्षेत्र है, इसलिये कठिनाई आती है. वहीं जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी एम.एल. मेहरा कहते हैं कि कुपोषण से कोई भी मौत नहीं हुई है.

इस सवाल पर कि कुपोषित बच्चों को पोषण पुनर्वास केन्द्र क्यों नही लाया जाता है तो वे कहते हैं कि सतना जिले में एक ही पोषण पुनर्वास केन्द्र हैं और इस पोषण पुनर्वास केन्द्र में 20 बिस्तर हैं. इन 20 बिस्तरों पर ही पूरे जिले का दारोमदार है. हर समय बिस्तर भरे रहते हैं.

महिला एवं बाल विकास विभाग कहता है कि ये मौतें कुपोषण से नहीं हुई हैं बल्कि बीमारी से हुई हैं, वहीं स्वास्थ्य विभाग इसे अपनी जिम्मेदारी नहीं मानता है, ऐसे में सवाल यह है कि बच्चे किस विभाग की जिम्मेदारी हैं ?


ये और बात है कि जांच दल ने जब मई, जून और जुलाई में पुनर्वास केंद्र का दौरा किया तो हर बार बिस्तर खाली मिले. गांवों में एक ओर तो बच्चे मर रहे हैं दूसरी ओर उन्हें पोषण पुनर्वास केन्द्र भी नहीं भेजा जाता है. यानी अब मरते बच्चे पोषण पुनर्वास केन्द्र में अपनी बारी का इंतजार करें और बारी न आ पाये तो मर जायें ?

जिला प्रशासन की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि उच्चतम न्यायालय के आयुक्त के सलाहकार डॉ. मिहिर शाह द्वारा इन बच्चों की मौत को लेकर जो रिपोर्ट 15 जुलाई तक तलब की गई थी, वह आज तक नहीं भेजी गई है. कलेक्टर विजय आनंद कुरील का कहना है कि वे दूसरे कामों में व्यस्त थे, इसलिये उन्होंने रिपोर्ट नहीं पहुंचाई है.

भोजन का अधिकार अभियान के कार्यकर्ता सचिन जैन कहते हैं- “ ये राज्य प्रायोजित मौतें हैं क्योंकि राज्य को बार-बार चेताने के बाद भी ये मौतें लगातार होती जा रही हैं, प्रशासन अपनी सारी ऊर्जा मौतों को रोकने में नहीं बल्कि कुपोषण को नकारने में खर्च कर रहा है.”

मध्यप्रदेश लोक संघर्ष साझा मंच के आनंद मानते हैं कि राज्य में इन मौतों की जिम्मेवारी तय होनी चाहिए. आनंद पूछते हैं- “ महिला एवं बाल विकास विभाग कहता है कि ये मौतें कुपोषण से नहीं हुई हैं बल्कि बीमारी से हुई हैं, वहीं स्वास्थ्य विभाग इसे अपनी जिम्मेदारी नहीं मानता है, ऐसे में सवाल यह है कि बच्चे किस विभाग की जिम्मेदारी हैं ?”

जाहिर है, राज्य सरकार और उसके नुमाइंदे फिलहाल आज़ादी की वर्षगांठ मनाने में व्यस्त हैं और कम से कम अभी तो मरते बच्चों की जिम्मेवारी तय करने की फुर्सत किसी को नहीं है.
 

14.08.2008, 01.17 (GMT+05:30) पर प्रकाशि

सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

saroja

 
 bahut dukhad hai.padh kar mn dravit ho gaya. 
   
 

shahroz(shahroz.syed@gmail.com)

 
 kal rat ilahabad ke patrkaar ne aisi hi ik aur dardnaak soochna di ki sonbhadra ke ilaqon kai aadivasi bachche akal mot ke graas ban gaye.
hai!hai!hai
 
   
 

Mahtab Alam(mdmahtabalam@gmail.com)

 
 ajeeb Vidambana hai...koi khate-khate marta hai...aur koi khane tak ke liye marta hai ! Akhir hamar mulk kidhar ja raha hai...kahan hain GDP ka 9% growth rate...??? koi sun raha hai...! 
   

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल (केवल English में लिखें)
  ई-मेल अन्य विजिटर्स को भी दिखाई दे ।
  ई-मेल अन्य विजिटर्स को ना दिखाई दे ।
  नाम (English अथवा हिन्दी)
  स्थान
  प्रतिक्रिया
   

 

  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2008 Vikalp, INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in