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कहानी| मांगुर माछ| राजेश कुमार मिश्र
कहानी
मांगुर-माछ
राजेश कुमार मिश्र
अबकी बरसात जो आएगी तो घर ढह जाएगा चच्चा. वैसहुं जब से चाची गईं, घर से लक्ष्मी
रूठि गई हैं. सो आपका आना बहुत जरूरी है.
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चित्रः डॉ. लाल रत्नाकर |
चिट्ठी में लिखी बाकी बातों को इस एक बात ने पहाड़-सा छोप लिया था... ननकी का गवना
हो गया, कर्जा नीक से चढ़ गया है, बाकी उसकी फिकर ना है. बाबू की देह ढलगने लगी है.
माई की धुंआई आंख से पानी काछते-काछते कुछौ नहीं न दिख रहा है. मटेहु में माई की
आंख देखाये रहे, डाक्टर साब ने कहा था कि मोतियाबिंद पक गया है, आपरेशन जरूरी है.
माई आपरेशन से डरा रही है कि आंख निगड़ी फूट जाई. हमहूं चुप हैं कि तीन-चार हजार के
कर्ज अउर चढ़ाए से का मतलब, माई त कुल जमाना देख ही ली है. घर ढह जाए पर कुल बितोतर
तो हो जाएंगे. कुल दुखवै टूट-टूट के बिखर जाएगा, फिर तो फिकर मेटाइये न जाएगा चच्चा.
राधाकिशन को गांव की जो पगडण्डियां याद थीं, उनको मिटे जमाना हो गया था. उनका भतीजा
सतेन्दर गांव को जब-तब अक्षर-अक्षर जोड़ कर अंतरदेशी में भर कर दूर इस शहर में भेज
देता था. पहिले तो नौकरी का जवाल उनको गांव और फिर घर को भुलाये रहा करता था. जब-जब
गांव से चिट्ठी आती, उनके मन में कचोट उठती थी, आखिर गांव-घर के लोग ही तो उनको
गांव से बहरियाए थे.
ठीक है कि हम मुराह ठहरे, गुस्सा गए तो सामने वाले का कपार फोरे बिना मन नहीं
ठण्डाता था, बाकी ऐसा कोई देश निकाला देता है क्या ? हम भी संकल्प उठाये कि जा ससुर,
अब ये दुआर ओ सीवान फिर गोड़ ना डालेंगे. फिर क्या ? माई गई सरग ना गए तो ना गए, तब
जिस मेहरारू का मुंह देखे थे, वोहू सिधार गई तब भी नहीं गए. एक तो संकल्प और फिर
नौकरी की मसरूफियत का बहाना, चुप मार गए तो चुप मार के बैठे रहे.
फिर कोलियरी का शहर झरिया, नेह से लेकर देह तक तो एवलेवल रहा, तब काहे को गांव और
गांव में छोड़ल मेहरारू खींचे उनको... उस दिन राधाकिशन बाबू ने अपनी पत्नी का चेहरा
याद करने की कोशिश जरूर की थी, जिस दिन गांव से चली चिट्ठी बीस दिनों बाद मिली थी.
चिट्ठी में लिखा था कि चच्चा को मालूम हो कि चाची अब नहीं रहीं. उसके बाद
पोस्टकार्ड पर थे- सतेन्दर के आंसू की कुछ बून्दों के सूखे हुए दाग.
ब्याह के मंडप में सुना नाम याद करने की कोशिश में राधकिशन के दिमाग की नस-नस तड़कने
लगी. फिर उन्होंने सोचा कि जब चेहरा ही याद नहीं आ पा रहा है, तो नाम जिसे कभी
पुकारा तक नहीं वो याद आये भी तो क्या फायदा ! जितना दिन साथ रहा, गाली देकर ही
बुलाया था. और दिन के अजोर में कब्बो देख नहीं पाये थे, रूप-रंग के नाम पर धुआं
छोड़ती ढिबरी के आलोक में पियरी में लिपटी, एक पियराई स्त्री-आकृति की छाया ही मन के
मचान लहरा रही थी. देहगंध के नाम हल्दी-मसाले और कड़ुआ तेल की गंध का भान भरा हुआ
था.
राधाकिशन का मन नीम के छाल की तरह कसैला हो गया था. हाथों में जिस पोस्टकार्ड को
उन्होंने रखा था, उसके टुकड़े कर कमरे में बिखरा दिया और बुदबुदाया कि छाया उनको
ढांप लेगी. कड़ु तेल में लिपटी हल्दी-मसाले की गंध उनके नथुनों में समा रही थी. न
केवल समा रही थी, बल्कि दम घोटती-सी लग रही थी. बरसों पहले जो गंध पीछे छूट गई थी
और पूरी तरह भूली जा चुकी थी, क्यों, आखिर क्यों मन को बेचैनी से भर रही थी.
उमस और गंध से मुक्ति का मार्ग स्नान था. राधाकिशन ने नहानी घर में देखा कि सोनाली
टब और बाल्टियों में पानी भर कर ही अपने डेरे गई है. रिफू बंगाली... इस औरत की याद
आते ही बरसों पहिले के उसके सलोने-सावंले रूप का ध्यान हो आया. उसको काम की दरकार
थी, राधाकिशन को घर की देख-रेख करने वाली, काम वाली की जरूरत थी. आवश्यकता और मांग
की बात दोनों के बीच अब तक बिना किसी रोक-टोक जारी है.
गंघ की कड़ुवाहट ने अब तक पूरी देह में एक चिनचिना-सा अहसास भर दिया था. पियरी में
लिपटी महरारू की चमकती आंखें, बड़ी-बड़ी आंखें राधाकिशन के जेहन में उतरने लगी. जब
देखा, तब डबडबाती डरी-डरी आंखों की नमी ही दिखी, जो अब तक उनकी स्मृति में टंगायी
हुई है, दीवार में अंगी तस्वीर की तरह. अब तो घर-जहान से चल दी, फिर काहे जिया
जरावे के बदे याद में आने की जिद कर रही है निगोड़ी. माथे को सहलाते-सहलाते राधाकिशन
ने अपने गालों पर हाथ फिराया. बढ़ी दाढ़ी का खरखराता स्पर्श होते ही उन्होंने सेविंग
का सामान तलाशना शुरु किया... ये हू ससुरी की आदत सी लग है- सोचते हुए राधाकिशन
कमरे में भटकने लगे.
आगे पढ़ें अंधेरा पूरी तरह से उतर गया था, कमरे में और कमरे के बाहर भी. राधाकिशन ने बिजली के
लट्टू का बटन दबाया और कमरे में रोशनी भर दी. नहाने के बाद भी पीले पोस्टकार्ड के
बिखरे टुकड़ों पर नजर पड़ते ही उनका मन कड़ुवा हो गया था. कंठ में कांटे के फंसने का
भान होते ही राधाकिशन ने बुदबुदाया कि ना, जो कब्बो न था, उसके नाम क्या रोना.
उन्होंने जल्दी से यूडीकोलोन की गंध अपनी देह के साथ-साथ कमरे में लभेर दी.
यूडीकोलोन की तेज गंध पाते ही उनके मन में एक किस्त का आनंद भरा आलस्य समाने
लगा.......
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चित्रः डॉ. लाल रत्नाकर |
झूलते कैनवास वाली आरामकुर्सी पर अपनी देह गिराए, राधाकिशन की आंखों में सोनाली का
वह रूप छा गया था, जिसमें वह डूबे तो डूबे ही रहे.
बरसात के मौसम में बारिश से पहले की उमस के चिपचिपेपन से वातावरण भरा हुआ और भारी
था. राधाकिशन को याद है कि सोनाली की देह से उठते पसीने से एक मादक और तीक्खर गंध
से उनका कमरा गमगमा रहा था. उनके कदमों की आहट मिलते ही सोनाली चीनी मिट्टी के
सुनहरे किनारों वाले कप-प्लेट में चाय भर कर ले आई थी.
राधाकिशन ने अपने सफेद कुर्ते के अन्दर रेंगते पसीने की लकीर का अहसास करने के बाद
सोनाली की ओर देखा. पहली बार भरपूर नजर डाली, उसके सांवले रंग के नासापुट पर अटकी
पसीने की बून्द सांझ की ललाई ली रोशनी में मूंगे कनी की तरह लग रही थी.
उमस और गर्मी से तमतमाए चेहरे में उसके सूखे होंठ ने राधाकिशन के मन में अजीब सी
हलचल मचा दी थी. सोनाली उनकी नजरों की नरमाई ली चमक भांपते ही थरथराई हुई लालिमा
में घुल गई. सुकुवार लज्जा से थरथराती स्त्री को राधाकिशन ने पहली बार देखा तो उस
पर रीझ गए. बाहर से खिड़की के रास्ते घुसा ठण्डी हवा का झोंका दोनों के बीच से बहने
लगा था. आकाश की लालिमा को काले मेघों ने कब छाप लिया इसका उनको होश ही न रहा.
बारिश की रिमझिम फुहार झमझमाने लगी थी. ठण्डी अंधेरी रात में लालटेन की रोशनी की
पीली आभा में राधाकिशन पहली दफा अनबूझे से उच्छवासों में डूबे थे.
मेहरारू तो उन्होंने सोलहवें साल में ही अस्पर्श कर लिया था. गवना करा के बाबू
कनिया जो ले आए थे उनके लिए. संगतियों के मशविरों से लैस रात में ढिबरी की धुंआई लौ
में पियरी में बंधी कनिया पर राधाकिशन ने सीधी चढ़ाई कर दी थी, लड़ाई जो जीतना था.
लड़ाई में कोमल भावनाओं की जगह नहीं न होती है. और फिर लड़िकाई का जोश, थरथराहट तो
उनको वहां भी मिली थी, बाकी डरी हुई.
पहिली रात उसकी देह से हल्दी की भीनी-भीनी गंध उठ रही थी. माथे में सेन्दूर और
आंवरा तेल की खुशबू भरी हुई थी. पलंग को युद्व का मैदान मान लेने की वजह से कुल
साज-सिंगार-पटार राधाकिशन को अस्त्र-शस्त्र लगा था. उस रात से, जब तक गांव में रहे
तब तक, मेहरारू को चांप-जांत के रखा. दिन में तो कनिया की छाया छूना भी मयस्सर ना
था. रात के अंधियार में गोड़ दाब के कोठरी में जब भी पहुंचे, धुंआं छोड़ती ढिबरी की
रोशनी में हल्दी-रंगी मारकीन की पियरी में लिपटी मेहरारू देखा, तो जीत का जुनून ही
चढ़ के बोला. कब्बो ना... हां कब्बो ना उसके दरद या कराह या कलछ पर मन डोला.
झरिया में शुरूआती दिनों में रात-बिरात, उसकी पियरी में लिपटी दुबली काया जेहन पर
जरूर सवार होती रही थी. आखिर उस पर जीत का सुख जो नहीं भेंटाता था. जब-जब उसकी
दूब्बर देह याद आती, हल्दी-मसाले और कड़ु तेल की गंध राधाकिशन के नथुनों में भर जाती
थी. उमस भरी उस शाम जब राधाकिशन अपने क्वार्टर में सोनाली के सांवले रूप और तिक्खर
गंध पर रीझे थे, उसके बाद से गांव की पगडण्डियों की रेख रात की बारिश के साथ ही
धोवा-पोछा गई थी. हां, जब-तब सतेन्दर की चिट्ठी में अक्षर-अक्षर जोड़कर भेजा गांव
उनके मन में कचोट भरता रहता था.
आज तो दुब्बर देह को आगि में समाये बीस दिन हो गए, अब तक तो उसकी तेरही की पुड़ी की
गंध भी हवा में बिला गई होगी. फिर काहे, उसकी देह की हल्दी-मसाले और कड़ु तेल की गंध
आज राधाकिशन को याद आ रही है ? उसकी देह का कटाव-उठाव को भूले तो एक युग बीत गया
है. गंध न जाने क्यों पीछा नहीं छोड़ती थी. उसकी गंध की काट में ही तो उन्होंने
सोनाली की तीक्खर गंध, मांगुर माछ और भात की खोज की थी.
खद्दर का झक्क सफेद कुर्ता और खद्दर की ही चौड़े नीले या काले किनारों वाली धोती
राधाकिशन का पसंदीदा पहिरावा रहा है. आराम कुर्सी छोड़कर उन्होंने बरामदे में खड़ी
चैबीस इन्ची फिलीप्स की चमचमाती सायकल पर दृष्टि डाली. बारह बरिस से ये साइकिलियो
नई नीयर लगती है, सोनाली की तरह ये भी जस की तस बनी हुई है, उनकी जिन्दगी में.
राधाकिशन ने अपनी सायकल बरामदे से उतारी और बाजार की ओर चल दिये. यूडिकोलोन की महक
को महसूस करने के लिए उन्होंने गहरी सांस ली. ये क्या ? हल्दी-मसाले की कड़ु तेल में
लिथड़ी कड़वी गंध कैसे भर गई हवा में ? इस गंवारी गंध को हराना जरूरी हो गया है. इस
लड़ाई में सोनाली का साथ भी तो बहुत ही जरूरी है. राधाकिशन ने सायकल का रूख उस बस्ती
की ओर कर दिया, जिसमें सोनाली रहती है.
आगे पढ़ें जब भी कभी गांव की सर्पीली पगडण्डियों का जहर राधाकिशन के जेहन पर चढ़ता था, सोनाली
को सायकल पर बैठा कर डेरे से अपने क्वार्टर ले आया करते थे. सोनाली की संगत उस
जहरीले असर को उतारने में कामयाब होती थी. धीरे-धीरे सोनाली को भी राधाकिशन में
अपने सपनों अंकुर फूटते और फैलते और फिर फूलते से दिखने लगे थे.
राधाकिशन की पछाही बोली और उसकी आंखों में बसने वाली नरम भावनाओं में सोनाली को
बुड़ना भाता था. उसको भी राधाकिशन का साथ बरसात की रात की लालटेन की रोशनी की तरह
पिघलाता था. जब भी दोनों करीब होते तो सोनाली की देह थरथराने लगती थी. राधाकिशन के
स्पर्श से सोनाली की थरथराहट मादक संगीत में बदल जाती थी. महेन्दर मिसिर का गीत,
“हमनी क रहब जानी दुनो परानी, सुना हो दिलवर जानी” -सोनाली गुनगुनाने लगती थी.
सोनाली के सांवले रूप में खोये राधाकिशन को, उसकी बांग्ला शैली में भोजपुरी गीत
गाने की कोशिश की याद मन में उठते ही मुस्कुराहट होठों पर खेल गई थी.
“सोनाली राधा बाबू आया हाय”- उसकी मां की बूढ़ी कंपकंपाती आवाज सुनकर राधाकिशन एक
झटके से अपनी यादों से बाहर निकले. साइकिल को दीवार से टिकाकर उन्होंने सोनाली की
मां को नमस्कार किया. सोनाली आंचल सम्हालते मां के पीछे खड़ी उनको सवालिया निगाहों
से देखने लगी. राधाकिशन ने कहा कि मन अच्छा नई लग रहा था. सो इधर ही आ गया. सोनाली
की मां दोनों को छोड़कर आंगन की तरफ चली गई.
‘बोलो बाबू’ सोनाली की आंखों से उठते प्रश्न के उत्तर में राधाकिशन ने थोड़ी सी झिझक
के साथ कहा- “सच्ची में आज मन बहुत खराब है सोना. आज मन कहीं ठहर ही नहीं रहा है.
अकेले घर में घबराहट लग रही थी. बजारो में मन नहीं रम रहा था. शायद तुम्हारा साथ
दवा सा असर करे. चलो सिनेमा देखने चलें… बोलो चल रही हो ना.”
सोनाली ने मुस्कुराकर कर उनकी बात पर राजीनामे की मुहर लगाई और मां को बुलाने चली
गई.
सायकल के कैरियर पर सोनाली को बैठाकर राधाकिशन कालोनी में सिनेमा का शो खत्म होने
के बाद पंहुचे तब तक समूची कालोनी में सुत्ता पड़ गया था. सांझ से दुआर पर जलता
लट्टू ही अपनी रोशनी की उजास में उनका इंतजार कर रहा था. बरामदे में सायकल चढ़ाकर
उन्होंने जब तक ताला लगाया, सोनाली दरवाजा खोलकर क्वार्टर में प्रवेश कर चुकी थी.
बन्द दरवाजे के खुलते ही न जाने क्यों फिर से उनके नथुनों में कड़ुवे तेल की गंध
हल्दी मसाले सहित टकरा गई.
राधाकिशन हड़बड़ाकर अन्दर घुसे और दरवाजे को तेजी से बंद करके बाहर जलते लट्टू को
बुझा दिया.
सोनाली मच्छीकरी और भात थाली में परोसकर राधाकिशन के आसन के सामने लगाने लगी.
सोनाली की देह की तिक्खर गंध की कल्पना में डूबे राधाकिशन ने भात और मच्छीकरी सान
कर मांगुर की गंध दिल-दिमाग में भरने के लिए गहरी सांस खींची. उनके जेहन में पियरी
लहरा गई. कड़ु गंध से उनका मन खिन्न हो गया. राधाकिशन ने थाली टार दी और आसन से उठकर
नहानी में हाथ धोने चल दिया. सोनाली ने ये सब देखा तो समझ गई कि गांव से कोई
अंतरदेशी या कार्ड आया होगा. बाबू के मन पर छाए गांव में कुछ ज्यादा ही अनकसायापन
है. तभी तो मांगुर माच्छ और भात छोड़कर उठा है. वो मांगुर माच्छ, जो वो जी-जान से
खाता है. उसको छोड़ा तो कुछ तो गहरा बात होगा उ चिट्ठी में.
“क्या बाबू जी अच्छा नई है क्या ? माथे में जबाकुसुम का तेल डाल दूं क्या ?” कहकर
सोनाली तेल की शीशी लेकर बिस्तर पर जा पहुंची. राधाकिशन ने सोनाली को अपनी तरफ खींच
लिया और गहरी सांस ली. नहीं...नहीं...... ये क्या ! सोनाली की देह से उनको मस्त
करने वाली वह तिक्खर गंध उठती सी महसूस नहीं हो रही थी. उनकी सांस के साथ कड़ुवे तेल
के साथ हल्दी वाली गंध का तेज भभका उनके चित्त पर सवार हो गया. इस गंध से जीत का
जुनून उनके ऊपर चढ़ता जा रहा था. वो सोनाली के साथ पहली बार युद्ध की मुद्रा में थे,
जीतने की मंशा लेकर.
सोनाली भौंचक-सी चीख पड़ी, “बाबू तोम ए कि कोरता है. इससे पहले तो एइसा नई कोरता था.
इ बाबा तुमि को कि होय गैलो. बोलो क्या हो गिया बाबू बोलो तो.”
राधाकिशन चुपचाप बिस्तर से नीचे उतरे और कमरे में बिखरे पोस्टकार्ड के टुकड़ों को
इकट्ठा करके सोनाली के हाथों में रखा. भर्राई हुई आवाज में उन्होंने कहा “इसमें
गांववाली की मउवत की खबर आयी है.”
सोनाली ने उन टुकड़ों को अपनी मुट्ठी में कसकर दबा लिया था.
राधाकिशन फफक-फफक कर रो रहे थे.
रात की लम्बाई घटती जा रही थी.
28.09.2011, 10.11 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Ankur [ankur.abhivyakti@gmail.com] Raipur - 2011-10-24 12:36:21 | | | |
Really a Heart touching story... | | | | | | | | dilip [] raipur - 2011-10-19 12:45:41 | | | |
दिल को छू गई आपकी रिपोर्ट. | | | | | | | | hemant kumar deshmukh [hemantkd4u@gmail.com] Sambalpur - 2011-10-05 19:07:14 | | | |
very nice and touching.... | | | | | | | | Himanshu [patrakar.himanshu@gmainlcom] Noida - 2011-10-03 05:55:49 | | | |
राधाकिशन के पास तो मुक्ति का मार्ग था लेकिन गांव की उस स्त्री के हिस्से तो कुछ भी नहीं था.... आपने बहुत सुगढ़ता से कहानी को रचा है. इन दिनों जब सब तरफ केवल शहरी और सतही मुद्दे हावी हैं, आपने धरातल की कहानी लिखी है. | | | | | | | | Sanjeev [] Delhi - 2011-10-03 05:53:49 | | | |
आपने रेणु जी की याद दिला दी. | | | | | | |
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