बच्चों की मौत पर मंत्री का झूठ
मुद्दा
मध्यप्रदेश
बच्चों की मौत पर मंत्री का झूठ
प्रशांत
कुमार दुबे
भोपाल से
मध्यप्रदेश में इस बार कुपोषण का कहर सतना जिले के मझगवां ब्लॉक से महज 12 किमी की
दूरी पर स्थित ग्राम किल्हौरा और चितेहरा में टूटा है. किल्हौरा गांव में तालाब तीर
बस्ती है. इस बस्ती में मुख्यतः मवासी आदिवासी निवास करते हैं. यहां 1 से 9 सितम्बर
के बीच ही छह बच्चों की मौत हो चुकी है. इनमें मुकेशी पुत्र ददुआ मवासी उम्र पांच
साल, सुनील पुत्री अच्छेलाल मवासी उम्र 11 माह, शिवनरेश पुत्र गिरधारी मवासी उम्र 1
साल, नवजात बच्ची पुत्री सिद्ध गोपाल मवासी, व इसी गांव के झिरिया घाट टोले के
गोपीचन्द्र के पुत्र रामामवासी व उसी के एक साल के छोटे भाई की मृत्यु हो गई है. इन
दोनों भाई की मृत्यु चेचक (छोटी माता) मीजल्स के कारण होना बताया गया है. वहीं अच्छे
लाल के परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी. इन परिवारों के पास न तो जॉब कार्ड
है और न ही राशनकार्ड.
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मध्य-प्रदेश में कुपोषण |
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राष्ट्रीय
परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के तृतीय चक्र के अनुसार |
60% |
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गंभीर स्तर का कुपोषण |
12.06% |
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राष्ट्रीय
पोषण संस्थान,
हैदराबाद
द्वारा कराये गये नवीनतम सर्वेक्षण |
51.9% |
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उधर एक अन्य आदिवासी बाहुल्य गांव चितहरा में भी दो सगी बहनों कुमारी मीनू पुत्री
प्रभु कोल उम्र पांच साल, व कुमारी सीनू पुत्री प्रभु कोल उम्र तीन साल की मृत्यु
होना पाया गया है. इन दोनों बच्चियों को उनके परिजन पोषण पुनर्वास केन्द्र, मझगवां
में लेकर आए थे. परन्तु आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के पोषण पुर्नवास केंद्र न पहुँचने की
वजह से बच्चियों को भर्ती नहीं किया गया एवं उन्हें कहा गया कि पोषण पुर्नवास
केंद्र में बिस्तर खाली नही है.
सीनू और मीनू को खून की कमी थी और उनकी हालत ठीक न होने की वजह से उनके पिता ने उनका
इलाज प्राइवेट डॉक्टर के पास भी कराया, जिसके लिए उसे अपनी जमीन 5000 रुपये में
गिरवी रखनी पड़ी. साथ में उसे अपनी पत्नी के चांदी के गहने भी मझगवां के रमेश साहू
के पास गिरवी रखने पड़े. बाद में प्रभु कोल ने सीनू को शासकीय जिला चिकित्सालय में
13 जून से 26 जून तक एवं मीनू को 19 मई से 21 मई तक भर्ती रखकर इलाज भी करवाया,
लेकिन उनकी स्थिति में कोई सुधार नहीं हो सका.
जिला अस्पताल से सीनू को जबलपुर रैफर कर दिया गया पर उसके पिता यानि प्रभु कोल के
पास पैसे न होने की वजह से वो उसे जबलपुर न ले जा पाया. प्रभु ने उसके पास पैसे न
होने की बात भी अस्पताल प्रशासन को बताई पर उन्होंने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया.
इसलिये वो अपने बच्चों को वापस ले आए. 8 जुलाई को मीनू और 11 जुलाई को सीनू ने दम
तोड़ दिया.
सतना जिला बच्चों की सेहत के मामले में बेहद संवेदनशील बना हुआ है और यहां वर्ष
2008 से अभी तक 156 बच्चों की मौत कुपोषण और कुपोषणजनित कारणों से हुई है.
लक्ष्य से कोसों दूर
सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्यों में से एक लक्ष्य शिशु मृत्यु दर को कम करना भी है.
लक्ष्य के अनुसार वर्ष 2015 तक शिशु मृत्युदर को 28 होना चाहिये लेकिन अभी भी
प्रदेश की शिशु मृत्यु दर 67 प्रति हजार है जिसे लक्ष्य से कोसों दूर कहा जा सकता
है.
हालांकि एसआरएस के नवीनतम आंकड़ा यानी 67 प्रति हजार भी सवालों के घेरे में है. क्या
प्रदेश में सचमुच शिशु मृत्यु दर कम हो गई है? यदि इसका जवाब हां है तो फिर यह एक
सुःखद संकेत है, लेकिन यदि इसका जवाब ‘ना’ में है तो फिर इसका विश्लेषण किया जाना
आवश्यक है. 8 मार्च 2010 को विधानसभा में महेन्द्र सिंह कालूखेड़ा के (सवाल क्र.
556) सवाल के जवाब में स्वास्थ्य मंत्री अनूप मिश्रा ने बताया कि विगत 4 वर्षों में
1,22,422 बच्चों की मौत हुई है. अपने आप में यह एक बड़ी संख्या है लेकिन क्या वास्तव
में इतने ही बच्चे मर रहे हैं, या यहां भी कुछ दाल में काला है. जी हां, यहां पर
केवल दाल में काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है.
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विश्लेषण की शुरूआत इस तकनीक के साथ करते हैं कि विधानसभा में जो बच्चों की मौत का
आंकड़ा मंत्री महोदय ने प्रस्तुत किया है, वह बच्चे नहीं अपितु शिशु हैं. तकनीकी भाषा
में शिशु यानी 1 वर्ष से कम उम्र और बच्चा यानी 1 वर्ष से लेकर 5 वर्ष तक. अतएव यहां
यह स्पष्ट हो जाता है कि शिशु मृत्यु के आकड़ों को बाल मृत्यु बताकर प्रस्तुत किया
जा रहा है.
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वर्ष |
कुल प्रसव |
शासन की
वेबसाईट पर
प्रदर्शित आंकडे़ |
शिशु मृत्यु दर
के अनुसार शिशुओं
की मौत |
वेबसाईट में दर्ज शिशु
मृत्यु संख्या के
अनुसार शिशु मृत्यु दर |
| 05-06 |
1716355 |
30563 |
120144 |
17 |
| 06-07 |
1776016 |
32188 |
96383 |
17 |
| 07-08 |
1824968 |
30397 |
122609 |
16 |
| 08-09 |
1751569 |
29274 |
127747 |
16 |
| 09-10 |
1639849 |
24751 |
113149 |
14 |
| 10-11 |
1592785 |
23610 |
106716 |
15 |
| अगस्त 2011 तक |
572570 |
8770 |
38362 |
15 |
| कुल |
10874106 |
179553 |
725110 |
16 |
|
तालिका क्र.-1 |
इससे आगे बढ़ते हैं और हम पाते हैं कि 06 से लेकर जनवरी 10 तक
111875 शिशु नहीं बल्कि 471060 शिशु खत्म हुये हैं. यह ऐसे संभव होता है, जबकि
प्रदेश की शिशु मृत्यु दर 70 प्रति एक हजार जीवित जन्म (एसआरएस 2008) है और प्रदेश
में हर वर्ष हुये प्रसव के आधार पर जब हम यह गणना करते हैं तो हमें चौंकाने वाले
आंकडे मिलते हैं.
उदाहरणार्थ वर्ष 08-09 में 1751569 प्रसव हुये और इसमें 70 प्रति 1000 जीवित जन्म
के हिसाब से तुलना करते हैं तो हमें यह चौंकाने वाले आंकड़े मिलते हैं. इस प्रकार
गणना करने पर वर्ष 2006 से लेकर 2010 (जनवरी) तक प्रदेश में 471060 शिशु खत्म हुये
हैं ना कि 1 लाख के आसपास जो संख्या मंत्री महोदय द्वारा बताई गई. यह इसलिए होता है
कि प्रदेश में लगभग 70 फीसदी शिशु मृत्यु दर्ज ही नहीं हो पायी है. अब जरा सोचिये
कि यदि बच्चों की मृत्यु की बात की जायेगी तो यह आंकड़ा कितना भयावह होगा क्योंकि
प्रदेश की बाल मृत्यु दर 130 है.
इस विश्लेषण का दूसरा सिरा पकड़ते हैं तो हम पाते हैं कि वर्तमान में शिशु मृत्यु दर
67 (एसआरएस 2009) हो गई है यानी कम हो गई है और इसके हिसाब से वर्ष 2010-11 और
अगस्त 2011 तक के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो हम पाते हैं कि 1,45,078 शिशुओं की
मौत हुई है. यानी महज़ साढे छः साल या यूं कहें कि मामा शिवराज के कार्यकाल में ही
सवा सात लाख शिशुओं ने दम तोड़ दिया है !! यह वह मौतें हैं जिन्हें रोका जा सकता
है, लेकिन दुर्भागय यही कि बच्चे सरकारों की प्राथमिकता में कभी नहीं रहे हैं और
शायद अभी हैं भी नहीं.
|
कहां
गये साढे़ पांच लाख शिशु !!
तालिका 2
को देखने से पता चलता है कि साढे छः साल में 7,25,110
शिशुओं की मौत हुई है जबकि सरकार की आधिकारिक वेबसाईट कहती है कि यह
संख्या 1,79,553
है. यदि सरकार कहती है कि प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 67
प्रति हजार है तो मौतों की संख्या तो सवा सात लाख ही होती है तो लाख
टके का सवाल यह है कि कहां गये साढे़ पांच लाख शिशु !!!! यह सवाल जवाब
के रुप में देखें तो आंकड़ों की बाजीगरी में फाईलों में दबकर रह गई
साढ़े पांच लाख शिशुओं की मौत. |
यदि मंत्री महोदय द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत की गई संख्या को ही आधार मान कर
गणना करें तो फिर शिशु मृत्यु दर 70 और 67 नहीं बल्कि 16 होगी. और यदि शिशु मृत्यु
दर 16 है तो फिर इफ्प्री (इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीटृयूट) की रिपोर्ट गलत
साबित हो जायेगी, जिसमें वह कहती है कि मध्यप्रदेश भूख के मुहाने पर खड़ा है और यहां
पर बच्चों की स्थिति गंभीर है.
कौन सही, कौन ग़लत
दरअसल सरकारों के खेल यही चलते रहे हैं कि आंकड़ों को कम करके दिखाओ और बहुत ही
उजली तस्वीर जनता के समक्ष रखो. लेकिन आंकड़ों की इसी बाजीगरी में बच्चे अपनी जान
से हाथ धो बैठते हैं और सरकारें फिर मर्सिया पढ़ने के अलावा और कुछ ज्यादा नहीं करती
हैं.
यह बात हम यहां इसलिये कह रहे हैं कि मंत्री महोदय ने विधानसभा में जो आंकडे़
प्रस्तुत किये, स्वास्थ्य विभाग की आधिकारिक वेबसाईट उससे इतर आंकडे़ प्रस्तुत कर
रही हैं. आईये देखें इसकी एक बानगी. मंत्री महोदय ने कहा कि वर्ष 2008-09 में 29274
शिशुओं की मौत हुई लेकिन आज विभाग की वेबसाईट उसी समयावधि में 12267 मौतों का होना
बता रही है. तो सवाल वही कि आखिर कौन सही है, मंत्री महोदय या विभाग.
यही नहीं तालिका 2 को देखने से पता चलेगा कि मंत्री महोदय ने विधानसभा में प्रस्तुत
किया कि वर्ष 2006-07 में धार में 250, छिंदवाड़ा में 150, सीधी में 1070 शिशुओं की
मौत दर्ज हुई है जबकि इन्हीं तीन जिलों में विभाग की वेबसाईट अधिकारित रूप से इन
तीनों जिलों में एक भी मृत्यु प्रदर्शित नहीं करती. (देखें-
http://www.health.mp.gov.in/bulletin.htm)
|
वर्ष |
जिला |
मंत्री द्वारा विधान
सभा में पेश आंकड़े |
स्वास्थ्य विभाग
की वेबसाईट के आंकड़े |
|
2006
-07 |
धार |
350 |
0 |
|
छिंदवाड़ा |
150 |
0 |
|
सीधी |
1070 |
0 |
|
नीमच |
217 |
7 |
|
2007
-08 |
धार |
550 |
0 |
|
छिंदवाड़ा |
140 |
0 |
|
2008
-09 |
छिंदवाड़ा |
221 |
21 |
|
तालिका क्र.-2 |
इसी प्रकार इसी वर्ष में नीमच में 217 शिशुओं की मृत्यु मंत्री महोदय ने बताई है,
जबकि वेबसाईट में केवल यह संख्या केवल 7 है. तालिका देखेंगे तो हमें समझ में आयेगा
कि कमोबेश यही स्थिति प्रत्येक वर्ष में है. सवाल जस का तस कि सही कौन बोल रहा है?
विभाग या मंत्री ! और यदि मंत्री महोदय सही बोल रहे हैं तो क्या उन्होंने कभी विभाग
की वेबसाईट के दर्शन नहीं किये ?
हालांकि एसआरएस 2009 के अनुसार प्रदेश की शिशु मृत्युदर 67 हो गई है लेकिन हाल ही में जारी किये गये वार्षिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2010-11 के आंकडे़ कहते हैं कि प्रदेश के आधे से अधिक जिलों में शिशु मृत्यु दर 70 से अधिक हो गई है जो कि चिंताजनक है. पन्ना और सतना जैसे जिले तो ऐसे है कि जिनमें शिशु मृत्यु दर 90 के पार है. लेकिन सरकार इन आंकड़ों को स्वीकार कर इससे मुक्ति का उपाय तलाशने के बजाये आंकड़ों पर ही परदा डाल कर मुक्त होने की कोशिश में लगी हुई है.
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हर बच्चे का ‘मामा’ कहलाना पसंद करने वाले शिवराज सिंह चौहान अपने भांजे- भांजियों
की मौतों की इस आंकड़ों की बाजीगरी में हस्तक्षेप क्यों नहीं करते. और शायद विपक्ष
को भी यह नहीं मालूम कि बाल मृत्यु क्या है और शिशु मृत्यु क्या है? तभी तो वह भी
मंत्री महोदय द्वारा दिये जा रहे आंकड़ों को सहर्ष स्वीकार कर रहा है. यहां पर
मीडिया की भूमिका भी उतनी ही संदेहास्पद है क्योंकि वह भी विश्लेषणात्मक और
आलोचनात्मक भूमिका में नजर नहीं आती और आंकड़ों की इस बाजीगरी को जस का तस स्वीकार
करती है.
यहां फिर वही सवाल हमारे समक्ष है कि यह मंशा का कुपोषण है ना कि आंकड़ों का
कुपोषण. ज्ञात हो कि इसी सतना में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने फरवरी 2010
में कुपोषण से होने वाली मौतों के संबंध में एक जनसुनवाई का आयोजन भी किया था. इस
जनसुनवाई के बाद आयोग ने जमीनी स्थितियों के मद्देनजर अपनी ओर से कुछ अनुशंसाएं भी
की थीं. इस जनसुनवाई और आयोग की पहल के बाद उम्मीद यह की जा रही थी कि सतना जिले
में बाल स्वास्थ्य की दिशा में कुछ बेहतर काम हो सकेगा और बच्चों की मौत का सिलसिला
रूकेगा, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है.
आयोग की तमाम अनुशंसाओं के बाद भी विगत वर्ष सतना जिला मुख्यालय पर शासकीय
चिकित्सालय के सिक न्यू बॉर्न केयर यूनिट में ही में ही केवल 4 माह में 118 नवजातों
की मौत हो गई, जो कि अपने आप में तंत्र की विफलता और घोर संवेदनहीनता का द्योतक है.
इसके अलावा सतना जिले में स्वास्थ्य संस्थाओ में चिकित्सक की कमी भी प्रशासन की गैर
जवाबदेहिता को दर्शाता है. इसका सबसे बडा उदाहरण सतना जिले के मझगवां विकास खंड के
किरहाईपोखरी गाँव का है, जहाँ वर्ष 2008 से बच्चो की मौतों का सिलसिला जारी है.
गाँव में एक भी आंगनवाड़ी नहीं थी. यहाँ पर वर्ष 2010 में राष्ट्रीय बाल अधिकार
संरक्षण आयोग ने बच्चों की मौत के तुरंत बाद तत्काल एक पूर्ण आंगनवाड़ी खोलने के
निर्देश दिए थे परन्तु प्रशासन द्वारा कोई कदम नहीं उठाया गया.
हालांकि सरकार ने दिसंबर 2010 में अटल बाल आरोग्य मिशन की शुरुआत की थी लेकिन
कुपोषण से लगातार होती मौतों ने एक बार फिर से ना केवल सरकार के इस मिशन पर बल्कि
सरकार के नजरिये पर भी सवालिया निशान लगा दिया है. यह नजरिये का कुपोषण है.
मृत्युदर संबंधी भारत के महापंजीयक की रिपोर्ट के अनुसार 2006 में मध्यप्रदेश में प्रति हजार जीवित शिशु मृत्युदर 74 थी, जो अगले वर्ष 2007 में घटकर 72 और फिर अगले वर्ष 2008 में घटकर 70 हो गई. मध्यप्रदेश के बाद शिशु मृत्युदर के मामले में उत्तरप्रदेश दूसरे नंबर पर है. 2008 के आंकडो के अनुसार वहां 70, 2007 के अनुसार 69 व 2006 के अनुसार 71 मृत्युदर थी.
ज्यादा मृत्युदर वाले राज्यों में उडीसा, असम, बिहार, छत्तीसगढ ज़ैसे राज्य भी शामिल हैं. वहीं गोवा में शिशु मृत्युदर न्यूनतम है. वहां प्रति हजार मात्र दस बच्चों की मौत होती है. जाहिर है, ऐसे में मन में कई बार यह सवाल खड़ा होता है कि क्या कभी हम तमात तरह की सरकारी-गैर सरकारी योजनाओं के बाद भी कभी गोवा की बराबरी कर पाएंगे ?
राज्य के मुख्यमंत्री यानी मामा शिवराज सिंह हाल ही में वर्ल्ड इकॉनामिक फोरम के
न्यौते पर चीन में थे और उनके प्रदेश में उनके भांजें-भांजी कुपोषण के कारण दम तोड़
रहे हैं. वे प्रदेश में आर्थिक विकास को तवज्जो देने के लिये निवेशकों को न्यौतने
गये थे. लेकिन भला मुख्यमंत्री यह तो बतायें कि वे आज तो निवेश करा लेंगें लेकिन जब
इस भार को ढोने के लिये प्रदेश में मजबूत कांधे ही नहीं होगें तो फिर यह निवेश कैसा
और किस काम का ? सरकार को चाहिये कि वह बच्चों को बचाने में निवेश करे ताकि प्रदेश
के बच्चों का आज और कल दोनों ही बेहतर हो सके.
30.09.2011, 10.19 (GMT+05:30) पर प्रकाशित