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युवाओं के लिये गांधी का उपहार

विचार

 

युवाओं के लिये गांधी का उपहार

राजकिशोर


अगर महात्मा गांधी युवाओं के लिए नहीं हैं तो उनका जीवन दर्शन किसी काम का नहीं है. गांधी जी कोई आध्यात्मिक गुरु नहीं थे कि जो आत्मिक शांति चाहते हैं या अपना परलोक सुधारना चाहते हैं, वे उनसे कुछ जान-सीख सकें. उन्होंने कई बार कहा था कि मैं दोबारा जन्म लेना नहीं चाहता-मुझे तो मोक्ष चाहिए लेकिन उनका मोक्ष किसी आध्यात्मिक साधना में नहीं था. दरअसल, वे जिसे आध्यात्मिक कहा करते थे, वह पूरी तरह से इहलौकिक था. गांधी जी को इस संसार की चिंताएं ही सताती थीं. उनका पूरा जीवन इन चिंताओं से लड़ते हुए ही बीता.


उन्होंने राम-राम जपते हुए मौत को गले नहीं लगाया बल्कि जब साम्प्रदायिकता के गेहूंअन सांप ने उन्हें डंस लिया, तब राम का नाम उनकी जुबान पर आया. यह राम उनके लिए रामराज्य के प्रणेता का नाम था.

महात्मा गांधी युवाओं के लिए नहीं है, यह खयाल उनकी सर्व प्रचलित तस्वीर को देख कर मन में आता है. यह तस्वीर एक बूढ़े से आदमी की होती है, जिसका सिर घुटा हुआ है, जिसका मुंह पोपला है और जिसके हाथ में लाठी है. ऐसे आदमी से कोई नौजवान किस चीज की उम्मीद कर सकता है भला. लेकिन जरा याद कीजिए, क्या भारत का स्वतंत्रता संघर्ष सिर्फ अधेड़ और बूढ़े आदमियों द्वारा लड़ा गया था. अगर ऐसा होता तो क्या वह सफल हो सकता था.

इतिहास के खास-खास मोड़ पर हो सकता है, कोई अधेड़ या बूढ़े नेता क्रांति का नेतृत्व कर रहा हो लेकिन क्रांति तो युवा ही करते हैं. अभी-अभी हम देख चुके हैं कि अन्ना हजारे की मुहिम ने नौजवानों ने कितने उत्साह के साथ हिस्सा लिया. गांधी युग का कोई अनुभव तो हमारे पास नहीं है पर हम कल्पना कर सकते हैं कि उनका आह्वान सुननेवाले ज्यादातर युवक और युवतियां ही रहे होंगे. तभी बूढ़े भारत में भी आई फिर से नई जवानी थी. स्वतंत्रता संघर्ष के दूसरे बड़े नेता जवाहरलाल नेहरू न केवल स्वयं युवा कहते थे, बल्कि उन्हें युवा हृदय सम्राट कहा जाता था.

गांधी का जीवन: संयुक्त परिवार
बहुत-से लोग कहना चाहेंगे, वे आजादी की लड़ाई के दिन थे और परतंत्रता की आह हरेक दिल से उठा करती थी. इसलिए लाखों युवाओं ने खादी को अपनाया, गांधी टोपी पहनी और सत्याग्रह के लिए निकल पड़े. इससे ज्यादा एकांगी बात कुछ और नहीं हो सकती. गांधी इसलिए जन नेता नहीं बने कि वे भारत की आजादी के लिए लड़ रहे थे. इसके लिए तो उनसे छोटे कद के नेता भी काफी थे. गांधी का असली आकषर्ण था उनका बहुरंगी व्यक्तित्व, जिसमें विचार की सादगी थी, सत्य और अहिंसा पर जोर था, सैद्धांतिक दृढ़ता थी और हर आदमी-औरत की फिक्र थी. वे सभी के लिए प्रेम से लबालब भरे हुए थे और जिन्हें प्यार करते थे, उन्हें बेहतर इनसान बनाने के लिए प्रत्येक संभव कोशिश करते थे.

उनके जीवन में कुछ भी व्यक्तिगत नहीं था. वास्तव में, उनका पूरा जीवन एक संयुक्त परिवार था. मजे की बात यह है कि इस परिवार में उनके लिए भी जगह थी जो उनसे घोर असहमत थे. इससे आगे बढ़ें तो दावा किया जा सकता है कि महात्मा गांधी के लिए पूरा भारत ही नहीं, पूरा वि ही उनका परिवार था. इसीलिए भारत में विदेशी कपों की होली जलाने के लिए प्रेरित करनेवाला महात्मा जब गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए ब्रिटेन गया, तो मौका मिलते ही वह लंकाशायर के कपड़े कारखानों के मजदूरों के बीच जा पहुंचा जो स्वदेशी आंदोलन के कारण बेकार हो रहे थे.

गांधी जी ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि हमें तो आपसे प्रेम ही है, पर हम नहीं चाहते कि इंग्लैंड की मिलों में बननेवाला कपड़े भारत के लाखों जुलाहों को बेरोजगार कर दे और हमारी आर्थिक आत्मिनर्भरता को नष्ट करने का औजार बने.

दूसरों को सुखी बनाओ
ऐसे महात्मा से आज का युवा क्या सीख सकता है बीटेक, एमटेक, एमबीए, बीसीए, एमसीए, सीए आदि के इम्तहान पास कर हर महीने लाखों रु पए कमानेवाले युवा और कुछ नहीं तो यह तो सीख ही सकते हैं कि जब तक उनके मन में सत्य की आग प्रतिक्षण नहीं जलती और उनका प्रत्येक जीवन व्यवहार अहिंसा अर्थात दूसरों के प्रति नि:स्वार्थ प्रेम से पूरित नहीं होता, तब तक उन्हें मानसिक शांति नहीं मिल सकती. झूठ, छल और चकाचौंध की दुनिया में कोई वास्तविक सुख नहीं है. इंद्रियों की अराजकता अंतत: बीमारी, दुख और विषाद का कारण बनती है.

लेकिन यह गांधी जी का मुख्य उपहार नहीं है. इतनी-सी बात तो कोई रविशंकर या आसाराम बापू भी सिखा सकता है. गांधी जी की मुख्य शिक्षा यह है कि तुम तब तक सुखी नहीं हो सकते, जब तक तुम्हारा समाज सुखी नहीं हो जाता. यह वही शात ज्ञान है जो युग-युगों से महात्माओं, विचारकों और दाशर्निकों की वाणी और लेखनी से प्रवाहित होता आया है.

सादगी में सुख की व्यापकता
इस परम्परा में महात्मा का खास योगदान यह है कि उन्होंने सुख की परिभाषा को व्यापक बना दिया और उसे एक ऐसी जीवन शैली से जोड़ दिया जो सभी के लिए काम्य और संभव है. इसकी बुनियादी पहचान यह है कि किसी भी ऐसी चीज का इस्तेमाल करना अनैतिक है जो जनसाधारण को सुलभ नहीं कराई जा सकती. यह एक तर्क ही वर्तमान उपभोक्ता समाज की बन रही इमारत को ध्वस्त कर देता है. बाकी दुनिया की बाकी दुनिया जाने, हम भारत के लोगों के लिए जो जीवन शैली राष्ट्रीय आदर्श बनती जा रही है, उसे हासिल कर पाना ज्यादा से ज्यादा पचीस-तीस प्रतिशत आबादी के लिए ही संभव है. और यह भी कि जब तक इस लकदक जीवन के लिए मार-काट मची रहेगी, हमारे देश का उद्धार नहीं हो सकता.

देश भर की खुशहाली तो इसी पर निर्भर है कि सबके लिए सादगी भरी जिंदगी के बारे में सोचा जाए. यह न केवल वांछित है, बल्कि यही संभव भी है. दूसरा कोई भी रास्ता देश की बरबादी की ओर ले जाएगा. ऐसी जीवन व्यवस्था में ही सत्य टिक सकता है, अहिंसा का निर्वाह हो सकता है और एक-दूसरे के बीच भाईचारा स्थापित हो सकता है. यह बात जिस दिन आज की युवा पीढ़ी के दिल में समा जाएगी, वह परिवर्तन के लिए उठ खड़ा होगा.

आज वह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए लड़ रहा है, कल वह भोग-विलास की जीवन व्यवस्था के विरुद्ध और गांव-शहर के बीच की खाई को मिटाने के लिए संघर्ष करेगा. वह अंग्रेजी की गुलामी को मिटाएगा और देशी भाषाओं को उनकी प्रतिष्ठा लौटाने का उद्यम करेगा. वह सरकार की सीमाएं बांधेगा और व्यक्ति तथा समाज को जगाने की कोशिश करेगा. यही गांधी का रास्ता है. मुझे पूरा यकीन है, जब यह पूरी व्यवस्था संकट में पड़ेगी, जिसके लक्षण अभी से सामने आने लगे हैं, तब इस देश का युवा गांधी को ही याद करेगा. वह समय महज गांधीगीरी से बहुत आगे का समय होगा. तब हर शहर और हर गांव में एक नहीं, कई-कई वास्तविक गांधी दिखाई देंगे.

02.10.2011, 01.02 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

durgashanker Saraf [dsarafa@gmail.com] kamthi - 2011-10-17 08:50:44

 
  गांधीजी आध्यात्मिक गुरु नही थे वे उच्च कोटी के दार्शनिक थे. भारत में रामराज्य की कल्पना करने की उनकी सोच के पीछे एक प्रतिप्रश्न खड़ा हो जाता है कि वो भारत में कौन सा राज्य नहीं लाना चाहते थे? 
   
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