|
|
|
ख़ून हमारी गलती से ही बह
रहा है-हिमांशु कुमार
संवाद
ख़ून हमारी गलती से ही बह
रहा है-हिमांशु कुमार
बस्तर के वनवासी चेतना आश्रम के हिमांशु कुमार पिछले 18 सालों से बस्तर में
आदिवासियों के बीच काम करते रहे हैं. उनका दावा है कि वे गांधीवादी तरीके से काम
काज करते रहे हैं. छत्तीसगढ़ सरकार के साथ मिल कर उन्होंने दंतेवाड़ा में कई
योजनाओं पर काम किया है. सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद जब हिमांशु कुमार ने उसका
विरोध किया तो वे पहली बार सरकार के निशाने पर आये. अब वे सरकारी दस्तावेजों में
नक्सली समर्थक हैं और जनवरी 2010 के बाद से दिल्ली में रहते हैं. भाजपा कार्यकर्ता
और छत्तीसगढ़ भाजपा की पत्रिका दीपकमल के संपादक पंकज झा भी इन दिनों दिल्ली में
रहते हैं. पंकज झा और हिमांशु कुमार के बीच यह बातचीत फेसबुक पर हुई. फेसबुक पर हुई इस 'चैटिंग' के संपादित अंश दोनों की सहमति से हम इस उम्मीद के साथ यहां सामने ला रहे हैं कि
इससे शायद किसी सार्थक बहस की शुरुआत हो.
पंकज झा- हाल के लिंगाराम एवं सोनी सोढी प्रकरण पर आपका क्या कहना है?
हिमांशु कुमार- मेरे विचार से मेरे द्वारा दिए गए ये तथ्य अधिक विश्वसनीय हैं.
ताड़मेटला, मोरपल्ली और तिम्मापुर आदि गावों को पुलिस, सी आर पी एफ और कोया कमांडो
द्वारा मार्च 2011 में जला दिया गया था. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सी बी आई को जांच
का आदेश दिया है. छत्तीसगढ़ सरकार ने 9 सितम्बर को लिंगा कोडोपी को जेल में डाल दिया
है ताकि वह देश के सामने सत्य न बता सके .
पंकज झा- ओह, ये विडियो कहाँ से जुटा लिया आपने ?
हिमांशु कुमार- (व्यंग्य के साथ) कल्पना के घोड़े दौड़ा कर.
पंकज झा- हा हा हा ...काफी कल्पनाशील हैं आप.
हिमांशु कुमार- जी शहर से ऐसा ही लगता है दूसरों का दुःख.
पंकज झा- जय जोहार आप ही का एनजीओ है न हिमांशु जी ?
हिमांशु कुमार- नहीं.
पंकज झा- क्या, दुनिया से अलग गांव बसा कर आज कहीं पहुंचना संभव है?
हिमांशु कुमार- कौन कहाँ पहुंचा है आज तक ? मैं चीज़ों को गहराई से देखने की कोशिश
करता हूं. इसी लिए दुनिया से अलग खड़ा दिखता हूं.
पंकज झा- चीज़ों को आपके कोण से समझने की कोशिश करें तो, कहाँ पहुंचना है/चाहिए आखिर
?
हिमांशु कुमार- कहीं पहुँचने की दौड़ में उम्र गुजर जाती है. फिर अंत में पड़ते हैं
ढोंगी गुरुओं के आश्रमों में कि शांति दे दे. ठहर कर चारों तरफ देखने का वक्त जो
निकालता है, उसे सब समझ में आने लगता है.
पंकज झा- अगर सरल शब्दों में आपसे पूछूं कि आखिर नक्सल समस्या का हल क्या है?
हिमांशु कुमार- बराबरी...... हैं हम तैयार ? जात की बराबरी. आमदनी की बराबरी. इज्ज़त
की बराबरी. ये मैं नहीं कह रहा हूं. मुझसे पहले के कई अक्लमंदो ने कहा. जैसे नानक,
जीसस, मुहम्मद, मार्क्स, गांधी, विनोबा, विवेकानंद, भगत सिंह......
पंकज झा- ये बराबरी या समानता जैसी बातें तो बिलकुल अमूर्त जैसी हुईं. ज़मीनी स्तर
पर करना क्या चाहिए ?
हिमांशु कुमार- समाज का दो ही आधार है 1- बराबरी, 2- न्याय. अगर समाज के हर सदस्य
को ये दोनों नहीं मिलेगा तो वो शांति होने ही नहीं देगा. और उसे ये दोनों चीज़ें ना
मिलने तक शांत बैठना भी नहीं चाहिए.
पंकज झा- लेकिन बराबरी का मतलब क्या कभी ये हो सकता है कि हाथ की पाँचों अँगुलियों
को काट कर बराबर कर दो ?
हिमांशु कुमार- नहीं. लेकिन हमारे द्वारा पैदा की गयी गैर बराबरी पर तो बात करें.
पंकज झा- जैसे ?
हिमांशु कुमार- प्रकृति की देन ज़मीन, हवा, पानी आदि प्राकृतिक संसाधन का कौन कितने
का मालिक है ? उसका क्या आधार होना चाहिए? जाति? स्थान? चमड़ी का रंग ? जेब में
कितना पैसा है ? ये कौन-सी चीज़ तय करेगी कि मैं कितनी प्रकृति का मालिक हूं? यही
मालिकाना स्थिति समाज में हमारी राजनैतिक ताकत तय करने का आधार बन जाती है. फिर इसी
ताकत से हम और अधिक गैर बराबरी बढाते हैं. दुनिया भर में मेहनत करने वाले नर्क जैसी
ज़िंदगी जी रहे हैं और हम बिना मेहनत के मज़े कर रहे हैं. ऐसी शांति नैतिक है क्या ?
पंकज झा- तो आखिर आपको कोई वैकल्पिक व्यवस्था का मॉडल भी तो सामने रखना होगा.
दुनिया में ऐसी कोई जगह तो होगी, जहां पर आपके विचारों को साकार रूप दिया गया हो.
या यह बिलकुल एक नई दुनिया बनाने की कोशिश या महज़ एक यूटोपिया मात्र है. और अगर
यूटोपिया है तो फिर भी सही. लेकिन क्या इसके लिए ख़ून बहाना बर्दाश्त किया जा सकता
है?
हिमांशु कुमार- विकल्प या तो हमारी समझदारी से आता है या ज़बरदस्ती से. तो पहला कदम
तो यही होना चाहिए कि हम सब समझने को तैयार तो हों. ख़ून तो हमारी गलती से ही बह
रहा है.
आगे पढ़ें पंकज झा- आपने कहा कि कोई समझने को तैयार तो हो. तो जहां दुनिया भर में हर नया
विचार फल-फूल रहा है, वहां आखिर क्या कमी है आपमें कि आपकी बात कोई समझने तक को
तैयार नहीं है. आप खुद के साथ नक्सलियों के संबंध को कैसे परिभाषित करते हैं?
हिमांशु कुमार- हर युग में प्रचलित मान्यताओं और शासन के बारे में नई दृष्टि रखने
वालों पर हमले हुए हैं. वैसे मेरी बातें सुनने वालों की संख्या भी काफी है. जिन
लोगों पर हमले हुए हैं, इतिहास में उनको मानने वाले भी काफी थे. पर बहुसंख्य में
नहीं थे. इसलिए उनके मरने के बाद उनको हम चिन्तक, विचारक या मसीहा कहने लगते हैं,
हालांकि सब बेचारे सामान्य इंसान ही थे. मैं उनका (नक्सलियों का) पक्ष समझने को
तैयार हूं. सही बातें मानने का भी आग्रह करूँगा समाज से.
पंकज झा- मरने के बाद ही क्यूं? आज जीते जी अन्ना हजारे देश के रोल मॉडल हो गए.
गांधी को जीते जी ही तमाम मान्यता मिल गयी थी. नेल्सन मंडेला भी जीते जी ही ‘गांधी’
हो गए.
हिमांशु कुमार- और गोली भी खाई. मार्टिन लूथर किंग, लिंकन, जीसस, कबीर, भगत सिंह,
गेलीलियो, मुहम्मद. सब सामान्य थे. अकेले सलीब ढो रहा था जीसस. मरने के पचास साल
बाद पता चला कि वो कोई नई बातें कहता था.
पंकज झा- तो आप बिना गोली मारे या खाए, अपने जीते जी विचारों को स्वीकार्य बना सकें
ऐसा कुछ क्यूं नहीं सोचते ? यहां 'आप' का मतलब उस विचार से है जिस पर हम अभी चर्चा
कर रहे हैं. या आप भी सौ-दो सौ साल बाद स्वीकार्यता मिल जाये, इसीलिए काम कर रहे
हैं?
हिमांशु कुमार- नहीं, मेरी सोच का केन्द्र स्वीकार्यता नहीं शुद्ध सत्य को खुद
जानना है. जिसे जानने का अपना मज़ा है. और फिर जितना संभव हो, उस पर दूसरों के साथ
जब कोई जानना चाहे, चर्चा करो.
पंकज झा- तो केवल स्वान्तः सुखाय ?
हिमांशु कुमार- नहीं, मैं तो सक्रिय हूं.
पंकज झा- यहां तो विशुद्ध रूप से आपके समक्ष यह चुनौती है कि आप कोई वैकल्पिक मॉडल
दें. और फिर कहूँगा कि अगर दुनिया में कहीं भी उस मॉडल पर सफलता से काम चल रहा है
तो उसे केस स्टडी के रूप में प्रस्तुत करें.
हिमांशु कुमार- दुनिया मेरी अकेले की थोड़ी है, सबकी है. सब चाहेंगे तब होगा. नहीं
तो मैं ज्यादा महत्वाकांक्षी हो गया, दुनिया को बदलने को, तो मारपीट करने लगूंगा.
यही तो समस्या है, दुनिया को बदलने का दावा करने वाले क्रांतिकारियों की. वो जोर
ज़बरदस्ती से बदलने की कोशिश करते हैं. मेरा काम सत्य को समझना और उस पर काम करना
है.
पंकज झा- तो बस्तर के पांच हज़ार एसपीओ, शिविर में रहे हजारों लोग, वोट देकर वर्तमान
लोकतंत्र में आस्था जताने वाले लाखों आदिवासी अगर इसी व्यवस्था में खुश रहना चाहें,
लोकतंत्र में ही भविष्य तलाशने की इच्छा रखें तो आप उन्हें ‘मार-पीट कर समझाने’
वालों का समर्थन करेंगे ? जोर ज़बरदस्ती से मनाने की कोशिश करने वाले ये नक्सल समूह
ही तो हैं न ?
हिमांशु कुमार- सरकार भी जोर ज़बरदस्ती करती है. दोनों का भरोसा बन्दूक पर है.
पंकज झा- लेकिन कभी आपने एर्राबोर, रानीबोदली, मदनवाडा या ताड़मेटला पर तो आवाज़ नहीं
उठाई?
हिमांशु कुमार- वो कैसे? आपको कैसे पता?
पंकज झा- अरुंधती को लेकर कभी प्रेस क्लब नहीं आये कि चिंतलनार में 76 जवानों का
कत्ल कर दिया गया है. वे आ कर नक्सलियों पर कड़ी कारवाई की मांग करे.
हिमांशु कुमार- जिसके सामने उठानी चाहिए, उनके सामने उठाई. आप की गलती के लिए आप से
ही बात करूँगा ना? इसके अलावा हमने सार्वजानिक तौर पर भी नक्सलियों की अनेकों बार
आलोचना की है.
पंकज झा- ओह.... सरकार की 'गलती' के लिए सारी दुनिया से बातें और उनकी गलती के लिए
केवल उनसे?
हिमांशु कुमार- मैं सरकार का हिस्सा हूं. मेरे भी पैसे से पुलिस की तनख्वाह जाती
है. वो बलात्कार करेगा, मैं चुप रहूँ?
पंकज झा- और सरकार आपको उनका हिस्सा समझ रही है. तो क्यूं न अपनी पॉलिटिक्स को साफ़
कर दें कि आप नक्सलियों के पार्टनर नहीं हैं. बिलकुल आपके पैसे से पुलिस को तनख्वाह
जाती है..लेकिन नक्सलियों को लेवी भी तो आप ही के पैसे से जाती है.
हिमांशु कुमार- बिलकुल सही है. हम कंपनियों का माल खरीदते हैं तो हमारा पैसा ही है
उनके पास. जेबकतरा जेब काटे वो अपराध है पर पुलिस वाला काटेगा तो?
पंकज झा- इसका उलटा सवाल मेरा है. नक्सलियों का मानवाधिकार लेकिन पुलिस या आम
आदिवासियों का ?
हिमांशु कुमार- हम नक्सलियों के लिए कभी नहीं बोलते .
पंकज झा- तो सरकार को हम टैक्स देते हैं तो उसका तो दस हिसाब है....दर्ज़नों चेक है
उस पर. कैग, विपक्ष, मीडिया, न्यायालय, मानवाधिकार संगठन, चुनाव आयोग, स्वैच्छिक
संगठन, जनता आदि-आदि. लेकिन नक्सलियों तक जो हमारा पैसा पहुंच रहा है उसका हिसाब?
हिमांशु कुमार- मत दो ना नक्सलियों को पैसा.
रात बहुत हो गयी है. चलो, अब बाकी की चर्चा बाद में.
पंकज झा- जी जी ज़रूर. धन्यवाद.
19.10.2011, 12.33 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | keshav sharma [kaish.142@rediffmail.com] raipur - 2011-10-24 07:49:44 | | | |
असल में सरकार की नष्ट होती संवेदनशीलता और प्रशासन की खत्म होती जवाबदेही से एक खतरनाक अवस्था पैदा होती चली जा रही है. राजनीतिक विचारों की गुलामी और बड़े नेताओं की मूढ़ता और अहंकार ने युवाओ में हिंसात्मक निराशा पैदा कर दी है. यही नक्सलवाद जैसी चीजें पैदा कर रही है. एक अजीब-सी नाजायज असमानता समाज में पैदा हो रही है, जिसका परिणाम खतरनाक होगा. | | | | | | | | tilak [yugdarpan@gmail.com] Delhi - 2011-10-23 10:25:58 | | | |
I fully endorse Jeet Bhargava on मायावती से लेकर पासवान, मुलायम और लालू सहित कम्युनिस्ट आदि शक्तियां कथित दलितो/आदिवासियो की मसीहाई के बहाने सिर्फ कथित सवर्णों को गाली देकर और जातिगत वैमनस्य फैलाकर ही इतिश्री कर लेते हैं।
हाल ही मे एक सम्मेलन मे जनवादी लेखक नामवर सिंह ने कहा था कि ब्राह्मणवाद की बजाय पुरोहित वाद की आलोचना होनी चाहिए। क्योंकि ब्राह्मणवाद से जातिगत गाली की बू आती है। मजे की बात है कि इस पर प्रगतीशील/जनवादी लोगो ने बहुत बड़ा बवाल खड़ा कर दिया।
इससे भी बड़ी खौफनाक सचाई ये है कि सेकुलरिज़्म/मार्क्सवाद के नाम पर जो लोग धार्मिक एकता का राग अलापते हैं (तुष्टीकरण की हद तक) वही लोग हिंदू जनता मे जातिगत वैमनस्य फैलाने में सबसे आगे है!! ऐसा दोगलापन क्यो??
हिमांशुजी पहले ये तय कीजिये कि जातिगत बराबरी के नाम पे सिर्फ धंधेबाजी करनी है या वाकई इस खाई को पाटना है? एक तरफ आप खुद को गाँधीवादी कहते हैं, दूसरी तरफ हथियारो से लैस बेरहम हिंसक नक्सलियो से हमदर्दी?? जाहिर है इस देश मे गांधी सरनेम और गाँधीवादी आवरण से ही कोई गाँधीवादी और सर्वमान्य हो जाने की कोशिश करता है! हिमांशुजी क्या यह कोई मार्केटिंग गिमिक नही लगता!!
भारतीय संस्कृति रूपी सीता का अपहरण करने रावण ने शर्मनिरपेक्षता का छद्म रूप बनाया है. | | | | | | | | kaushalendra [] jagdalpur - 2011-10-23 08:13:18 | | | |
नक्सली सिद्धांत के जनक सान्याल. एक लम्बा संघर्ष. फिर आपसी असहमति. और फिर वृद्धावस्था में हताशा की स्थिति में आत्मह्त्या, अर्थात सिद्धांत से समस्या तक का एक अधूरा सफ़र.
तीमापुर आदि गावों को जला दिया गया, वनोपज के लिए विख्यात गाँव बासागुडा को उजाड़ दिया गया. यह सब एक दृष्टि में अत्याचार, उत्पीडन जैसा लगता है. पुलिस के अपने तर्क हैं. किसी भी एक पक्ष में कुछ कहना विवेकपूर्ण नहीं है पर चुप भी रहना उचित नहीं. एक बात में सभी की सामान्य स्वीकारोक्ति है...और वह यह कि समस्या सत्ताजन्य है. तो समाधान भी सूत्रधार को ही करना होगा. किन्तु सूत्रधार को इस खेल में आनंद आ रहा है. शायद बचपन ये लोग तालाब में ढेले फेककर मेढकों को मारते रहने के अभ्यस्त रहे होंगे. बड़े हो गए पर वृत्ति नहीं बदली.
मैं सिद्धांत से समस्या तक के सफ़र की बात कर रहा था. मुझे लगता है कि नक्सली सिद्धांतों में हुए विचलन के कारण उनका आन्दोलन \\\'आतंक\\\' बन गया है और उनका सिद्धांत \\\'समस्या\\\'. बेशक, इसे पोषित भी किया गया है ..किसने किया है पोषित ? यह रहस्य नहीं है. कुछ महीने पहले रायपुर से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र ने एक आंकड़ा प्रस्तुत किया था .......नक्सलियों को कौन कितना चन्दा/ टैक्स देता है . इस लम्बी सूची में व्यापारियों से लेकर औद्योगिक घराने और सरकारी सेक्टर तक सभी शामिल थे. इसी सूची में यह भी विवरण था कि किस नक्सली नेता के पास कितने करोड़ की संपत्ति है. तब किसी ने अखबार की खबर पर कोई ध्यान नहीं दिया था. आज एस्सार पर गाज गिर गयी ....पर सच इतना ही नहीं है ...हमाम में अभी बहुत से नंगे और भी हैं जो बड़ी खुशी से नहा रहे हैं. हाँ ! अब वे थोड़ा सचेत अवश्य हो गए हैं. हमाम का ही एक नंगा अदालत लगाकर बैठ गया है.
नक्सल समस्या के पल्लवित होने के कारणों में एक बात और भी समझ में आ रही है .....आदिवासियों में नेतृत्त्व का अभाव. बस्तर का आदिवासी सारी समस्यायों से अकेले ही जूझ रहा है.....सोनी सोढ़ी का परिवार नक्सलवाद की गिरफ्त में है और खुद सोनी पुलिस की. इस समीकरण पर ध्यान देने की फुरसत लोगों के पास शायद नहीं है.
ध्यान इधर भी देने की फुरसत किसी के पास नहीं है कि जंगलवार कॉलेज के लोग आत्महत्या क्यों कर रहे हैं? नक्सली उन्मूलन में उनमें कोई रूचि क्यों नहीं है ? क्यों वे ज़ल्दी से ज़ल्दी अपनी ट्रेनिंग ख़त्म कर घर भाग जाना चाहते हैं ? प्रश्न इतने ही नहीं हैं ........पर उनको उठाने से क्या लाभ क्योंकि अभी तक कोई भी ऐसा नज़र नहीं आया जो समस्या उन्मूलन के प्रति वास्तव में गंभीर हो. | | | | | | | | Jeet [] Bhargava - 2011-10-20 19:08:03 | | | |
हिमांशु जी ने बार-बार बराबरी का जिक्र किया है। मसलन जातिगत बराबरी। यह बराबरी होनी भी चाहिए। लेकिन मेरा उनसे एक ही सवाल है कि अब तक जातिगत बराबरी के जीतने भी प्रयास हुये हैं। उन्हे नाकाम करने मे तथाकथित प्रगतीशील, जनवादी, एनजीओवादी और सेकुलर्स समेत दलितवादी लोग अड़ंगा क्यो लगाते हैं??
मायावती से लेकर पासवान, मुलायम और लालू सहित कम्युनिस्ट आदि शक्तियां कथित दलितो/आदिवासियो की मसीहाई के बहाने सिर्फ कथित सवर्णों को गाली देकर और जातिगत वैमनस्य फैलाकर ही इतिश्री कर लेते हैं। वह जाती व्यवस्था को तोड़ने के लिए कोई सकारात्मक प्रयास क्यो करते हैं।
हाल ही मे एक सम्मेलन मे जनवादी लेखक नामवर सिंह ने कहा था कि ब्राह्मणवाद की बजाय पुरोहित वाद की आलोचना होनी चाहिए। क्योंकि ब्राह्मणवाद से जातिगत गाली की बू आती है। मजे की बात है कि इस पर प्रगतीशील/जनवादी लोगो ने बहुत बड़ा बवाल खड़ा कर दिया।
इससे भी बड़ी खौफनाक सचाई ये है कि सेकुलरिज़्म/मार्क्सवाद के नाम पर जो लोग धार्मिक एकता का राग अलापते हैं (तुष्टीकरण की हद तक) वही लोग हिंदू जनता मे जातिगत वैमनस्य फैलाने में सबसे आगे है!! ऐसा दोगलापन क्यो??
हिमांशुजी पहले ये तय कीजिये कि जातिगत बराबरी के नाम पे सिर्फ धंधेबाजी करनी है या वाकई इस खाई को पाटना है?
दूसरी ऊहा-पोह एक तरफ आप खुद को गाँधीवादी कहते हैं, दूसरी तरफ हथियारो से लैस बेरहम हिंसक नक्सलियो से हमदर्दी!! ये क्या माजरा है?? जाहिर है इस देश मे गांधी सरनेम और गाँधीवादी आवरण से ही कोई गाँधीवादी और सर्वमान्य हो जाने की कोशिश करता है! हिमांशुजी क्या यह कोई मार्केटिंग गिमिक नही लगता!! | | | | | | | | अतुल श्रीवास्तव [aattuullss@gmail.com/ atulshrivastavaa.blogspot.com] राजनांदगांव,, छत्तीसगढ - 2011-10-20 18:06:13 | | | |
याज्ञवलक्य ने सही कहा। बात अधूरी रह गई रात के बहाने। न जाने इस रात की सुबह कब होगी.....???? | | | | | | | | Himanshu [patrakarhimanshu@gmail.com] Noida - 2011-10-20 17:32:41 | | | |
संभवतः हिंदी में फेसबुक से किया गये इस पहले साक्षात्कार में सवाल और जवाब देने वाले दोनों में इस बात की होड़ नजर आती है कि भाई, सत्य को केवल हम जानते हैं. दोनों में से कोई भी अगर सत्य जानता है तो आखिर समस्या का समाधान क्यों नहीं हो रहा है ? | | | | | | | | yagnyawalky mishra [yagnyawalky@gmail.com] ambikapur surguja - 2011-10-20 08:14:21 | | | |
कई बार होता यह है कि केवल पांच सेंकड का एडिट किया हुआ फुटेज किसी भी तर्क तथ्य को नए स्वरूप में पेश कर देता है ..तो उस हिसाब से अगर देखा जाए तो भी पंकज की बातें और पंकज के प्रश्न का जवाब यदि इस रूप में मिले कि रात बहुत हो चुकी, चलो सो जाएं तो फिर फायदा क्या ..हिमांशु जी से आग्रह है कि, सुबह हो चुकी है अब जरा अनुत्तरित प्रश्न पर जवाब दें दें. | | | | | | |
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें |
|
|