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आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मुद्दा

 

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

अनिल चमड़िया


आप सूचना का अधिकार कानून का इस्तेमाल करते हैं? क्या आपको मालूम है कि आप अपने पास के डाक घर से केन्द्रीय सरकार के दफ्तरों में सूचना अधिकारियों को बिना किसी डाक खर्च के अपना आवेदन, प्रथम अपील और दूसरी अपील कर सकते हैं?

आरटीआई


मेरा अपना आकलन है कि ये डाक घरों के जरिये मुफ्त में सूचनाएं मांगने का आवेदन पत्र भेज सकते हैं, यह जानकारी देश के 0.5 प्रतिशत लोगों को भी नहीं है. यह संसद जानती है. देश भर के 4707 डाकघर के लोग जानते हैं. लेकिन जिनके लिए सूचना का अधिकार कानून बनाया गया है, वे नहीं जानते.

लोकतंत्र में संचार व्यवस्था का अध्ययन करें तो आप मजे में यह तथ्य जान सकते हैं कि ढेर सारी और विकराल संचार व्यवस्था है लेकिन लोगों के पास जरूरी सूचनाएं नहीं भेजने के तरीके भी मौजूद है. संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश करते हुए सरकार ने अपनी उपलब्धियों का आदतन एक खाका पेश किया. उसमें यह भी दावा किया गया ‘संचार विभाग ने 4707 केंद्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी बनाए हैं, जिनमें से देश की प्रत्येक तहसील में कम से कम एक अवश्य है.

कम्प्यूटरीकृत ग्राहक सेवा केंद्र के प्रभावी अधिकारी को विभाग के लिए केंद्रीय सहायक लोक सूचना अधिकारी के रूप में कार्य करने के लिए तथा उन केंद्रीय विभागों, संस्थानों की ओर से आरटीआई अनुरोध तथा अपील प्राप्त करने के लिए पहचाना गया है; जिन्होंने आरटीआई अधिनियम की धारा 5 (2) तथा 19 के अनुसरण में डाकघरों में यह सुविधा प्राप्त करने की सहमति दी है.

डाकघर में बनाए गए केंद्रीय लोक सूचना अधिकारी आरटीआई अधिनियम की धारा 19 की उपधारा (1) के अंतर्गत केंद्रीय सरकार के विभागों व संस्थानों के केंद्रीय सूचना अधिकारी, वरिष्ठ अधिकारी अथवा केंद्रीय सूचना आयोग को भेजने के लिए आरटीआई अनुरोध और अपील प्राप्त करते हैं.

सूचना का अधिकार कानून के बनने के बाद समीक्षा यह की जानी चाहिए कि इस कानून की जानकारी देश के कितने प्रतिशत लोगों तक पहुंच पाई है और जिन लोगों तक नहीं पहुंच पाई है, उन तक इस कानून को कैसे पहुंचाया जाए. दूसरी बात कि मांगे जाने पर सूचनाएं देने में विभाग व अधिकारी किस-किस तरह की अड़चनें खड़ी करते हैं और उन अड़चनों को दूर करने की पहल सरकार को करनी चाहिए थी. इसके लिए सरकार महज एक विज्ञापन जारी करे और सूचनार्थी (सूचना मांगने वाला) से अड़चनों व बाधाओं के बारे में जानकारी मांगे तो उसे सूचना के अधिकार कानून के लागू होने का सच पता चल जाएगा.

तीसरी बात कि सरकार को यह कोशिश करनी चाहिए थी कि यह कानून और कैसे ज्यादा मजबूत हो. सरकार को इस कानून का इस्तेमाल करने वालों का दायरा बढ़ाने के लिए इस पहलू पर विचार करना चाहिए था कि देश का एक बड़ा हिस्सा जो अपनी गरीबी के कारण इस कानून का इस्तेमाल नहीं कर पाता है, वह कैसे इसका इस्तेमाल करे? देश में गरीबी रेखा के नीचे की पहचान और उसे कार्ड देने का सरकार का एक अपना फंडा है, सूचना का अधिकार कानून उस फंडे को लांघने की जरूरत जाहिर करता है.

सूचना के अधिकार कानून की कई ऐसी धाराएं हैं, जो अब तक लागू नहीं की जा सकी हैं. इनमें विभागों व संस्थानों द्वारा सूचना के अधिकार कानून की धारा 4(1) के तहत कानून लागू होने के 120 दिनों के अंदर अपनी ओर से विभाग से जुड़ी सूचनाएं लोगों को बताने के लिए कहा गया था. लेकिन आप केवल विभागों और संस्थानों की वेबसाइट देख लें, आपको यह अंदाजा लग जाएगा कि सरकारी विभाग व संस्थान किस हद तक आदतन सूचनाएं छुपाने की कोशिश करते आ रहे हैं.

इससे आगे सूचना के अधिकार कानून के लिए बने केंद्रीय सूचना आयोग लगातार कमजोर होता जा रहा है. जो उसके तेवर कानून बनने के कुछ दिनों के बाद तक दिखे, अब वह अनुभवी व वफादार नौकरशाहों का जमघट के रूप में दिखने लगा है. लगता है कि सरकार की मंशा यह है कि भारी-भरकम मशीनरी का एक ढांचा खड़ा भी दिखे और वह काम भी न करे. सूचना आयोग ने अपनी स्थिति यह बना ली है कि मांगी गई सूचनाएं न देने का फैसला करने वाले अधिकारियों व संस्थानों को साल-साल भर का मौका सूचनाएं न देने के लिए मिल जाता है.

सूचना आयोग में दूसरी अपील पर सुनवाई अदालतों की तरह कई-कई महीने बाद होने लगी है. छोटी-मोटी तकनीकी खामियों के आधार पर अपीलों को खारिज किया जाने लगा है. सूचना आयोग सूचना न देने वाले संस्थानों व अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई करने से या तो बचता है या फिर कार्रवाई नहीं कर पाता है. केंद्रीय सूचना आयोग के कुल निर्धारित पदों की संख्या में लगभग 50 प्रतिशत सूचना आयुक्तों के पद खाली हैं.

दरअसल, सूचना का अधिकार कानून को सरकार विज्ञापन की तरह इस्तेमाल करना चाहती है. वह केवल ‘शाइिनंग इंडिया’ की तरह दिखना चाहती है. इसीलिए वह अपनी उपलिब्धयों में इस कानून की तो गिनती करती है लेकिन इसकी जमीनी हकीकत से मुंह चुराती है. अभी तक इस कानून की पहुंच समाज के उस हिस्से तक ही हो पाई है, जो कानून का अपने हितों में इस्तेमाल करना जानता है. यह हिस्सा एक छोटे से मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग का है जो सत्तारूढ़ राजनीति व सरकारी दफ्तरों के इर्द गिर्द अपना व अपने जैसों का हित-अहित प्रभावित होते देखता है.

जाहिर सी बात है कि ऐसी स्थिति में जिस तरह की सूचनाएं मांगी जाएंगी, उससे सत्ताधारी पार्टी या पार्टयिां प्रभावित हो सकती हैं. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस कानून को बाधा के रूप में पेश कर उन लोगों की इच्छाओं का सम्मान किया है जो इस कानून की वजह से अपना घाटा महसूस करते रहे हैं. प्रधानमंत्री जब कोई बात कहते हैं तो वह एक नीतिगत बात की तरह समाज में संप्रेषित होता है. लेकिन समाज में लोकतंत्र की चेतना अभी जिस स्तर पर पहुंच चुकी है, वहां सूचना के अधिकार जैसे कानून को कमजोर करने की कोई भी कोशिश राजनीतिक नुकसान के रूप में सामने आ सकती है.

इस तरह के कानून जब बनते हैं तो वह कई बार खुद को जख्म दे सकते हैं लेकिन लोकतंत्र में किसी कानून के सफल होने का मानदंड यह बनना चाहिए कि उसकी वजह से लोकतंत्र की चेतना का कितना विस्तार हुआ है. सूचना के अधिकार कानून को ज्यादा से ज्यादा उपयोगी बनाने की कोशिश, उसमें लोगों की ज्यादा भागीदारी से ही पूरी की जा सकती है.

केंद्रीय सूचना आयोग के लिए एक सूचना कार्यकर्ता सलाहकार समिति का भी गठन किया जाना चाहिए, जो सूत्रबद्ध तरीके से आयोग व सरकार को इस कानून के पूरी तरह लागू नहीं होने के छोटे-बड़े सभी अड़चनों की जानकारी दे सके.

23.10.2011, 12.33 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ram bhagat gupta [guptaram1008@gmail.com] delhi - 2012-02-08 20:17:16

 
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Dinesh [] Noida - 2012-02-06 11:37:18

 
  आपने ये लेख बहुत ही अच्छा लिखा है. मैं आपकी बात से 100 प्रतिशत सहमत हूं. सच मानें आपको इस तरह के लेख time to time लिखने चाहिए. धन्यवाद. 
   
 

Rajendra Mutha [muthaji@gmail.com] Mumbai - 2012-01-28 03:25:43

 
  I liked this article very informative. I need email ID of Mr. Anil Chamriaji because I want to learn much more about RTI and use this tool for social purpose and to provide service who really need without any obligation. 
   
 

neeraj [nkvbs@yahoo.co.in] roorkee, haridwar - 2012-01-18 21:37:00

 
  but post offices do not accept this 
   
 

pankaj pathak [] ranchi jharkhand - 2012-01-11 16:47:49

 
  its a very useful for all of us. thank you very much for the information 
   
 

nagendra kumar [mr.nagendravarma@rediffmail.com] sikandra rao - 2012-01-09 07:18:08

 
  आपने बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है. 
   
 

ashish prakash [] tata institute of social science, mumbai - 2011-12-23 10:34:39

 
  i read ur article. nice one.... RTI may be the tool or weapon for the -aam aadmi-to snacth their right. i m student in tata inst. willing to make RTI as weapon for jagran of the india. which is not shining....
i liked the way u criticized the failure in its implementation but hoping n requesting u to make it the national issue sir. we will always with u.
 
   
 

kunwar surendra bahadur [ksbahadurvns@gmail.com] allahabad - 2011-12-22 10:58:15

 
  मैं आपकी बातों से सहमत हूं. 
   
 

MITHILESH KUMAR [kmithilesh_jaj@yahoo.com] RANCHI - 2011-12-14 03:19:20

 
  If the 1st information given under RTI is wrong, what I should to do? New India Assurance co. Kolkata has given me the wrong information. 
   
 

prashant dubey [dubey.prashant128@yahoo.com] raipur - 2011-12-04 10:09:28

 
  बहुत सुंदर. आपकी जानकारी काम की है. 
   
 

VISHNU [VISHNU@GMAIL.COM] YAMUNANAGAR - 2011-12-02 06:53:03

 
  I M AGREE ON THIS EMAIL THAT GOVT IS TRY TO HIDE EVERY THING AND SHOW BUT ACTUALLY NOT INTERESTED 
   
 

suman [loksangharsha@gmail.com] barabanki - 2011-10-31 02:34:39

 
  nice. 
   
 

prathmesh [prathmeshmishra@indiatimes.com] bilaspur, chattisgarh - 2011-10-28 19:05:49

 
  आरटीआई पर प्रधानमंत्री का रुख बहुत निराश करने वाला है. चमड़िया जी, बस इसी तरह हम सब जहां हैं, वहीं से कुछ न कुछ करते रहें. एक बात तो बहुतों को नहीं पता कि आरटीआई में क्रुति जो कि पहला शब्द है, उसका अर्थ है- कार्यों के निरिक्षण का अधिकार यानी right to supervision of work. 
   
 

Dr. Vishnu Rajggadia [vranchi@gmail.com] Ranchi - 2011-10-24 16:36:05

 
  भाई अनिल चमडि़या का आलेख पसंद आया। उनकी यह सलाह भी महत्वपूर्ण है कि सूचना कानून को लागू करने में आने वाली अड़चनों को दूर करने के लिए नागरिकों की सलाहकार समिति बने। लेकिन जिस वक्त प्रधानमंत्री सहित पूरी कांग्रेसी ब्रिगेड सिर धुन रही हो कि ये सूचना कानून बनाकर क्या गल्ती कर डाली, उस वक्त भाई चमडि़या की यह सलाह कांग्रेस के लिए अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मारने के समान है। इसके लिए हमारे यहां एक कहावत है- घुर मुड़ला बेल तर? यानी सिर के बाल छिलाने वाला आदमी दुबारा बेल के पेड़ के नीचे नहीं बैठना चाहेगा क्योंकि उसके खुले सिर पर पहले ही बेल गिर चुका होगा।
दूसरी जो बात आरटीआइ कानून के बारे में आम लोगों को समुचित जानकारी नहीं होने की है, तो ऐसे सूचना-दरिद्रों के प्रति ज्यादा सहानुभूति की जरूरत नहीं। कुछ दिनों पहले एक समाचार चैनल पर दिल्ली के पढ़े-लिखे लोगों की बाइट आ रही थी, जो गर्व और ताव के साथ बता रहे थे कि उन्हें सूचना कानून नहीं मालूम। मुझे घिन आ रही थी उन लोगों के इस गर्व और ताव पर। ऐसे लोगों से पूछ लीजिये तो उन्हें मोबाइल के हरेक नये सेट के सारे फीचर्स मालूम हैं और हर मोबाइल सर्विस वाले के टैरिफ प्लान की भी भरपूर जानकारी है। उन्हें क्रिकेटरों और एक्टरों के बारे में पल-पल की खबर है और घूस लेने या देने की नवीनतम तकनीकों और अवसरों से भी पूरी तरह अवगत हैं। इन सारी चीजों का प्रशिक्षण उन्हें कौन देता है? आप सरकार से अपने पांव पर खुद कुल्हाड़ी मारने के कदमों की उम्मीद करने की बजाय ऐसे सूचना-दरिद्र नागरिकों की चेतना को चमकाने की कोशिश करें तो बेहतर होगा, इनसे किसी सहानुभूति की आवश्यकता नहीं।
 
   
 

sudhanshu [sudhanshushekhar50@yahoo.com] bhagalpur - 2011-10-23 17:22:51

 
  बहुत उपयोगी आलेख. बधाई. 
   
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