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लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

मुद्दा

 

लुप्त होने के कगार पर हैं असुर

सुनील शर्मा जशपुर से लौटकर


सादरी और कुड़ुख के लोकगीतों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि महाभारत के युद्ध के लिये हथियारों का निर्माण असुरों ने किया था. रामायण में तो असुरों को बजाप्ता युद्ध करने वाला बताया जाता है लेकिन किस्से कहानियों और धर्मग्रंथों से अलग आज की तारीख में असुर अपनी ज़िंदगी की लड़ाई हार रहे हैं. पिछले कुछ सालों में उनकी आबादी लगातार कम होती जा रही है. जाहिर है, जिस रफ्तार के साथ असुरों की आबादी सिमट रही है, उसमें अब ये सवाल खड़ा होने लगा है कि क्या असुरों का अस्तित्व खत्म हो जाएगा ?

असुर


आज की तारीख में छत्तीसगढ़ में असुरों की कुल आबादी केवल 305 है. आदिवासी बहुल जशपुर के मनोरा तहसील के दोनापाट, बुरजूपाट, जरहापाट, हाड़ीकोना और घुईपाट नामक पांच गांवों में सिमटी हुई इस जनजाति का हाल यह है कि सरकार इस जनजाति को उन संरक्षित जनजातियों की श्रेणी में शामिल नहीं करना चाहती, जिन्हें विशेष संरक्षण और सुविधाएं प्राप्त हैं. सैकड़ों सालों से जशपुर के इस इलाके में रहने वाले असुरों को झारखंड में विशेष संरक्षित जनजाति की श्रेणी में रखा गया है. लेकिन छत्तीसगढ़ में ये उपेक्षित हैं. 1872 में जब देश में पहली जनगणना हुई थी, तब जिन 18 जनजातियों को मूल आदिवासी श्रेणी में रखा गया था, उसमें असुर आदिवासी पहले नंबर पर थे, लेकिन इन डेढ़ सौ सालों में जैसे इस आदिवासी समुदाय को भुला दिया गया.

छत्तीसगढ़ में अबुझमाड़िया, बैगा, बिरहोर, पहाड़ी कोरवा और कमार यानी कुल पांच संरक्षित जनजातियां है. 67 हजार से भी कहीं अधिक आबादी वाले बैगा तो संरक्षित जनजातियों में शामिल हैं लेकिन महज 305 लोगों की असुर जनजाति को गोंड, मारिया, दोरला, मुरिया, हिल माड़िया, बायसन हार्न माड़िया के साथ श्रेणीबद्ध कर दिया गया है. जाहिर है, असुविधाओं की मार झेलने वाले असुर लगातार कम होते जा रहे हैं. कुल 305 असुरों में से अब पुरानी पीढ़ी के कुछ ही लोग हैं, जो असुर बोली बोलते हैं. कुड़ूख या उरांव से भिन्न कुड़ुख बोली के अस्तित्व पर भी अब प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है.

वैसे दोनापाट के एक बुजुर्ग असुर आदिवासी इस सवाल का अपने ही तरीके से जवाब देते हैं- “हम असुर ही नहीं बचेंगे तो इस बोली की जरुरत किसे होगी ? हमारी बोली का बचना अब मुश्किल है.”

लेकिन हमारे जैसे शहरों में रहने वालों के लिये तो दोनापाट पहुंचना ही सबसे मुश्किल काम लगता है. इन गांवों में पहुंचना इतना सरल भी तो नहीं है. पाट पर बसे इन गांवों में जाने के लिए पहाड़ के बेहद खराब रास्ते को चुनना ही एकमात्र विकल्प है और उसमें भी इस बात की कतई गारंटी नहीं कि वहां तक सही सलामत पहुंचा ही जा सकता है. अगर हाथी से भेंट हो गई तो...?

मनोरा तहसील मुख्यालय से बेहद खराब रास्ते से गुजरते हुए असुरों का सबसे पहला गांव पड़ता है दोनापाट. यह एक छोटा सा गांव है जहां महज सात घर असुरों के हैं. घर क्या मिट्टी और घास-फूस की झोपड़ियां है.

सरहुल को छोड़ दें तो इनके जीवन में साल भर कोई उत्सव नहीं होता. बाकी दिन तो ये अपनी समस्याओं से ही घिरे रहते है. सरहुल के मांदर की थाप थमने के साथ ही मुश्किलें अपने तरीके से हमला बोलने लग जाती हैं. बारिश शुरू होते ही ये मलेरिया, हैजा जैसी बीमारियों से लड़ने लगते हैं और अपनी जान खोने लगते हैं. बीमार पड़ने पर परडीकांदा और करौंदाजरी खा कर ही इलाज करना इनकी नियती है. बच गये तो ठीक वरना तो... !

वैसे दोनापाट के परशु असुर इस मामले में भाग्यशाली हैं. परशु असुर को हर साल मलेरिया अपनी चपेट में ले लेता है लेकिन वह बजरंगबली की ही कृपा मानते हैं कि अब तक जिंदा हैं. वे कहते हैं- “हमें इंसान नहीं समझा जाता साहब. क्या करें ? कई बार मरते-मरते बचा हूं. डाक्टर इलाज में आनाकानी करते हैं और कई बार तो भगा भी देते हैं. बच्चों को पालने की जिम्मेदारी नहीं होती तो मौत को गले लगा लेता.”

परशु अकेले नहीं हैं, जिन्हें बीमारी हर साल जकड़ लेती है. इन असुरों के परिवार में कोई न कोई सदस्य हमेशा बीमार रहता है. बीमारी से जानें भी जाती रहती हैं.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

SHASHIKANT [] Raipur - 2011-12-07 10:49:14

 
  इस जनजाति को बचाने के लिए प्रशासन के द्वारा इनके पूरे समूह को गोद लेकर उनकी देखरेख और बुनियादी सुविधाओं का ध्यान रखा जाना चाहिए. 
   
 

umesh soni [uk.soni@rediffmail.com] Bilaspur cg - 2011-11-10 15:53:16

 
  भाई जी, आपने उन असुरो के दर्द को ब्यान किया है जिनके कभी स्वर्णिम दिन रहे होगें और अब तो यह पीढी शायद ही अपने पर गर्व कर पायगी. और अब इनकी दशा सभ्य समाज के लिये शर्म की बात है. आदिवासियो के साथ इस तरह का व्यवहार कब तक किया जायगा यह बता पाना शायद किसी के वश की बात नही, लेकिन एक बात जरूर है जो उनके लिय इस तरह कुछ करना चाहेगा वह अब नक्सलियों के भय से उधर नजर भी नही डालेगा. 
   
 

Vinod [] Raipur - 2011-11-09 11:51:23

 
  Very deeply and excellent Report...congrats... 
   
 

manoj singh [manojbaghel71@gmail.com] raipur - 2011-11-09 08:17:32

 
  दरअसल आदिवासी विकास के नाम पर अरबों रुपया खर्च करने वाली सरकार हमेशा बहाने बनाती है कि आदिम संस्कृति विकास की मुख्यधारा को अपनाने में संकोच करती है. इस बहाने को कुछ नृविज्ञानी और पुष्ट कर देते हैं और लूटने वालों को और बेशर्मी से लूटने का अवसर मिल जाता है. इस तथ्यपरक रिपोर्ट के लिये आपको बधाई. 
   
 

radha [radhavin2006@gmail.com] delhi - 2011-11-08 05:39:12

 
  क्या कहूं पता नहीं. समझ में नहीं आता. सुनते हैं कि देश का विकास हो रहा है. पर ये सब पढ़ कर, जान कर समझ में नहीं आता कि किसका विकास हो रहा है. 
   
 

vikas tripathi [tripavik78@yahoo.com] panipat - 2011-11-06 15:13:22

 
  लेख ने सरकार के उन सभी दावों को खोखला कर दिया है जिनके बूते दिल्ली में बड़े बड़े नेता वाहवाही लूटते हैं. अच्छे लेख के लिए लेखक को बधाई. 
   
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