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आत्महत्या की फसल

मुद्दा

 

आत्महत्या की फसल

बाबा मायाराम होशंगाबाद से


दशहरे-दीपावली का समय उत्साह और उमंग का होता है. नई फसल आने से किसानों के घर रौनक होती है. खुशियां मनाई जाती हैं. लेकिन मध्यप्रदेश में होशंगाबाद जिले के किसानों के घर गहरा दुख, नैराश्य और मातम छाया हुआ है. हाल ही में जिले में चार दिन में तीन किसानों ने आत्महत्या कर ली. वे सोयाबीन की फसल नष्ट होने से परेशान थे. इस साल के शुरूआत में भी दो किसान मर चुके हैं.

किसान आत्महत्या


कृषि के क्षेत्र में होशंगाबाद जिला बहुत समृद्व और खुशहाल माना जाता है. तवा परियोजना से सिंचित इस क्षेत्र को पंजाब-हरियाणा कहा जाता है. होशंगाबाद जिले में ही सबसे पहले सोयाबीन की खेती की शुरूआत हुई थी. इससे किसानों में समृद्वि भी दिखाई दी. लेकिन अब हालात बदल गए है. जैसे पंजाब-हरियाणा में खेती का संकट गहरा रहा है और वहां किसान आत्महत्या कर रहे हैं, वैसे ही होशंगाबाद जिले में अन्नदाता किसान मौत को गले लगा रहे है. यह नर्मदांचल अब विदर्भ और आंध्रप्रदेश बनने की ओर बढ़ रहा है, जहां बड़े पैमाने पर किसान मर रहे हैं.

होशंगाबाद जिले की डोलरिया तहसील के नानपा गांव के युवा किसान 32 साल के कमल गौर अब नहीं रहे. उन्होंने 11 अक्टूबर को सल्फास की गोली खाई और अगले दिन सुबह तक दम तोड़ दिया. उनकी 17 एकड़ जमीन में मात्र 15 क्विंटल सोयाबीन की पैदावार हुई. यानी प्रति एकड़ एक क्विंटल से भी कम. इस परिवार पर 3 लाख 10 हजार का सरकारी कर्ज था. इसमें 2 लाख 45 हजार रूपए का कर्ज भारतीय स्टेट बैंक की होशंगाबाद शाखा से किसान क्रेडिट कार्ड पर और 65 हजार रूपए का कर्ज नानपा ग्रामीण साख सहकारी संस्था से लिया गया था.

इसी तहसील के रतवाड़ा गांव के बुजुर्ग किसान रामसिंह राजपूत, 62 वर्ष ने 12 अक्टूबर को अपने शरीर पर मिट्टी तेल डालकर आग लगा ली. अगले दिन रामसिंह की मौत हो गई. रामसिंह की 3 एकड़ जमीन में मात्र 1 क्विंटल सोयाबीन ही पैदा हुआ. हालांकि उस पर बैंक का सरकारी कर्ज नहीं था. लेकिन मित्रों व रिश्तेदारों की उधारी थी. प्रशासन ने इस बुजुर्ग किसान की दर्दनाक मौत को हत्का करने के लिए उसे मानसिक रोगी बताया. जिसे परिजनों व पड़ोसियों ने सिरे से खारिज कर दिया.

इसी तहसील से लगी सिवनी मालवा तहसील के चापड़ाग्रहण गांव के 54 साल के मिश्रीलाल बेड़ा ने भी सल्फास की गोली खाकर 14 अक्टूबर को अपने अपने प्राण त्याग दिए. उनकी 3 एकड़ जमीन में मात्र 2 क्विंटल सोयाबीन पैदा हुआ. उनके 4 भाईयों के संयुक्त परिवार पर सतपुड़ा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की शाखा शिवपुर से किसान क्रेडिट कार्ड पर 2 लाख 45 हजार का कर्ज था. उनके हिस्से में करीब 50 हजार का कर्ज आता था. उनके पास इतना भी पैसा भी नहीं था कि वह फसल कटाई की मजदूरी का भुगतान कर सके. उन्होंने इसके लिए गांव के लोगों से सहायता मांगी लेकिन वे भी उनकी मदद न कर सके. ग्रामीणों ने बताया कि कुछ दिनों से चिड़चिड़े हो गए थे. अंततः कम पैदावार होने से उन्होंने आत्महत्या कर ली.

इस अंचल के ये तीनों किसान छोटे और मझौले थे. तीनों तवा परियोजना के कमांड क्षेत्र से थे और संपन्न मानी जाने वाली कृषक जातियों से हैं. तीनों ने सोयाबीन की फसल अपने खेतों में बोई थी लेकिन अधिक बारिश होने से, पीला मोजेक और तंबाकू इल्ली के प्रकोप से फसल को नुकसान हुआ. जिससे फसल नष्ट हो गई. इस कारण उन्होंने ये अतिवादी कदम उठाया. इस जिले में पहले भी 4 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. ये मौंतें जिले के पूर्वी हिस्से बनखेड़ी, पिपरिया और सोहागपुर तहसील में हुई हैं.

पिछले कुछ वर्षो से सोयाबीन की फसल में बार-बार नुकसान हो रहा है और इस जिले में प्रति एकड़ पैदावार कम होती जा रही है. सोयाबीन की जो 9305 किस्म इस बार फेल हुई है, उसकी अपेक्षा एक अन्य किस्म 9560 का उत्पादन ज्यादा है. लेकिन वह भी औसत से बहुत ही कम है. इस बार औसत पैदावार 29 किलोग्राम से लेकर 2 क्विंटल प्रति एकड़ रही है. वर्ष 1994 में प्रदेश में सोयाबीन की उपज 18 क्विंटल प्रति हैक्टेयर थी, जो वर्ष 2008-09 में घटकर 10.91 प्रति हैक्टेयर हो गई. राष्ट्रीय स्तर पर सोयाबीन की उपज 12.35 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है. किसानों के मुताबिक एक किस्म तीन-चार साल से ज्यादा नहीं चलती. उसकी अंकुरण क्षमता खो जाती है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ashok shukla [] silwani m.p. - 2012-01-14 15:17:13

 
  सोयाबीन की कहानी पता चली. किसानों को कैसे कंगाल बनाया जा रहा है और कंपनिया लाभ ले रही हैं. 
   
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