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फेकू

कहानी

 

फेकू

डॉ. परिवेश मिश्र


फेकू अपने चोरी हो गए रिक्शे की रिपोर्ट लिखवाने सुबह से पुलिस थाने में खड़ा मुंशी जी का ध्यान आकृष्ट करने की चेष्टा में रत था. पिछले सालों में जब भी गांव से खाने-कमाने रायपुर आता तो रिक्शा किराए पर लेकर चलाया करता था. बार-बार गांव और शहर के बीच अपने वर्ष बांटते वह थक गया था.

फेकू


इस साल जीवन में कुछ स्थायित्व लाने की जुगत में वह गांव से उधार में ही सही पर एक पूंजी ले कर आया था. इस पूंजी से इस बार उसने यह सेकेन्ड हैंड रिक्शा खरीदा था. जो चोरी हो गया. बस स्टैंड शहर का भीड़-भाड़ वाला इलाका है. सवारी की प्रतीक्षा में खड़े फेकू को अचानक प्रकृति का बुलावा मिला और वह हैन्डब्रेक को एक सुतली में फंसा कर अपनी लघु या दीर्घ किसी शंका के निवारण के लिए पास के होटल के पिछवाड़े तक चला गया. लौट कर आया तब तक रिक्शा जा चुका था.

थाने के मुंशी जी के सामने अपनी परेशानियां थी. थाने में एक तो स्टाफ पूरा नहीं था, उपर से जो थे, उनमें से आधे से ज्यादा शाम के बाद काम के नहीं रह जाते थे. जब से नियम बना कि जिले के बाहर तबादले नहीं होंगे तब से सिपाहियों को कोई डर-भय रह ही नहीं गया था. थाने का सारा बोझ मुंशी जी अपने कंधे पर अकेले ढो रहे थे. अब एक आदमी भला कहां तक करे !

पर नए आए थानेदार साहब मुंशी जी की इस थ्योरी से इत्तफ़ाक नहीं रखते थे. उन्होंने मुंशी जी को हिदायत देते हुए एक समय सीमा तय कर दी, थाने के रिकॉर्ड्स दुरुस्त करने के साथ-साथ फील्ड के अपने सारे पेंडिंग काम समेटने की. तब से मुंशी जी के बोझ ढोते कंधों पर टेन्शन की चिड़िया भी आ कर बैठ गयी थी.

ऊपर से यह रिक्शावाला आ कर, सुबह से लम्बा मुंह ले कर खड़ा हो गया था. लंच के बाद थानेदार साहब के लौटने का समय होने लगा तो सुबह से खड़ी इस समस्या को निपटाना ही मुंशी जी को मुनासिब जान पड़ा. मुंशी जी ने उससे आने का कारण पूछने के लिए अब तक वक्त भले न निकाला हो पर सुबह से थाने में मौजूद, आते और जाते हर एक को फेकू ने अपनी कहानी इतनी बार सुनाई थी कि बिना पूछे मुंशी जी को याद हो गयी थी. फिर भी सरकारी काम था. नियम से तो चलना ही था.

मुंशी जी की ओर से पास आने का इशारा मिलते ही फेकू के चेहरे का तनाव कुछ कम हो गया. मुंशी जी ने आदेश दिया और फेकू बाहर जा कर पास की दुकान से एक दस्ता कागज और कार्बन खरीद लाया. मुंशी जी ने पूरे विस्तार से कहानी लिखी. कागज की कमी नहीं थी. ऊपर से थानेदार साहब की दी हुयी समय सीमा. सो लगे हाथों मौका मुआयना रिपोर्ट भी पूरी कर लेने का फैसला कर डाला. बस स्टैन्ड यूं भी जानी पहचानी जगह थी. मुआयना बैठे-बैठे टेबल पर कर भी लिया तो कोई गुनाह तो नहीं है. कागज पर बस स्टैन्ड का नक्शा बना कर फेकू से कड़क कर पूछा- कहां खड़ा था तू? और रिक्शा? कहां गया था तू? क्या करने गया था? साले रिक्शा को ताला लगाकर नहीं खड़ा कर सकता था?

रिपोर्ट लिख ली गयी और मौके का मुआयना भी पूरा हुआ. फेकू का काम पूरा हुआ. उस दिन का एक काम मुंशी जी का भी पूरा हुआ. काम का अध्याय एक. तफ्तीश का काम कुछ दम लेकर शुरू किया जा सकता था.

अगले दिन मुंशी जी थाने पंहुचे तो पाया, फेकू पहले से वहां खड़ा है. मुंशी जी का सारा दिन अपने आप को व्यस्त रखने की जुगाड़ में बीता. शाम हुयी और फेकू जैसे चुपचाप आया था, वैसे ही चला गया.

अगले दिन भी यही हुआ और उसके बाद के चार पांच दिन और यही चला. बीच में एकाध बार मुंशी जी की व्यस्त दिनचर्या में से मौका देखकर फेकू ने अपने रिक्शे के बारे में पूछताछ की. जवाब मिला - हां ढूंढेंगे, जरा यहां से समय तो मिले.

इसके बाद फेकू ने बीच-बीच में थाना आना बन्द कर दिया. पुलिस तो ढूंढ़ ही रही है, मदद कर रही है, कोशिश कर रही है, ठीक है पर उसे अपनी ओर से भी तो ढ़ूंढ़ने का प्रयास करना चाहिए, मुंशी जी की दी यह समझाईश फेकू को जंची थी.

एक दिन अचानक सुबह-सुबह फेकू ने थाने पंहुच कर मुंशी जी के सामने घोषणा की कि उसे रिक्शा का पता मिल गया है. केस से अब तक पूरी तरह वाकिफ़ थाने में मौजूद सिपाही ने एतराज जताया कि इतनी बड़ी खबर और फेकू बिना मिठाई लिए चला आया.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

विनोद रिंगानिया [] गुवाहाटी - 2011-12-26 13:04:22

 
  बहुत सुंदर कहानी है डा. परिवेश जी। 
   
 

Avinash Agrawal [] Sarangarh - 2011-11-11 03:16:35

 
  Nice story अच्छा लगा पढ़ कर. हकीकत में ऐसा ही होता है. अगर फेकू के साथ कोई और ऊंचा ओहदे वाला होता तो थानेदार या मुंशी कहता- आप पहले रिक्शा ले जाइए, हम बाकी काम बाद में कर लेंगे.  
   
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