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चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

कॉरपोरेट राजनीति तैयार है

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थप्पड़ के नाम पर

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मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

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मैं आदमखोर नहीं था

समाज

 

मैं आदमखोर नहीं था

विनय कुमार शर्मा मनातू, झारखंड से


“ मैं आदमखोर कैसे बन गया, इसे ठीक-ठीक याद कर पाना तो मुश्किल है लेकिन यह तय है कि यह मीडिया की ही मेहरबानी थी. मैं तो मीडिया के प्रोपगेंडा का शिकार हो गया. यह प्रोपेगेंडा राजनीति से प्रेरित व प्रायोजित थी. तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के दो घरानों के बीच की राजनीति ने मुझे शिकार बना दिया. पलामू के एक बड़े कांग्रेसी नेता की पैठ दिल्ली तक थी और वे मुझे अपनी लॉबी में शामिल करना चाहते थे. इंकार करने का परिणाम यह हुआ कि दूर-दराज के पत्रकार हमसे मिलने आने लगे और मुझे खूब गालियां दी. तरह-तरह के आरोप लगाये. इतना ही नहीं मुझ पर अनेक मुकदमे किये गये. आरोप सबके सब मनगढ़ंत थे.

मौआर जगदीश्वरजीत सिंह


"पहली बार 'शानदार' नाम की मुजफ्फरपुर की एक पत्रिका ने ऐसी खबर छापी थी. फिर तो मीडिया के लिए मैं मसालेदार खबर बन गया. सतीश जैकब से लेकर अरुण रंजन तक... यह सब 80 के दशक की घटनायें है. जो भी पत्रकार बंधु आये, उनकी रिपोर्ट मुझे गाली दिये बिना पूरी नहीं हुई. जिन्हें मेरा नाम भी ठीक-ठीक लिखना नहीं आता, उन्होंने भी मेरे बारे में मनमानी बातें लिखीं.”

मनातू मौआर के नाम से मशहूर मौआर जगदीश्वरजीत सिंह अब बूढ़े हो गये हैं. लेकिन 82 साल की उमर में भी आवाज़ की खनक और ठसक वैसी ही पुरानी है, जैसा महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘भूख’ में वर्णित है. मनमोहन पाठक के उपन्यास ‘गगन घटा घहरानी’ को पढ़ते हुये मनातू मौआर को समझ पाना मुश्किल नहीं है.

पलामू जिला मुख्यालय डालटनगंज यानी आज के मेदनीनगर शहर के मुख्य डाकघर के ठीक बगल से कोयल नदी की ओर जाने वाली सड़क पर जैसे ही आप मुड़ेंगे, मौआर जगदीश्वरजीत सिंह के एक पुराने घर की चाहरदीवारी में एक पुरानी-सी कार नजर आ जाएगी. लेकिन मौआर जगदीश्वरजीत सिंह यहां कभी-कभार ही नज़र आते हैं, अगर उनसे मिलना हो तो आपको घने जंगल और नक्सलियों के गढ़ कहे जाने वाले मनातू स्थित उनके गांव में जाना पड़ेगा, जहां कभी उनका राज चलता था.

80 के दशक के बिहार में मौआर जगदीश्वरजीत सिंह को पहली बार लोगों ने ‘मैन ईटर ऑफ मनातू’ यानी मनातू का आदमखोर के नाम जाना. एक बार यह ‘उपाधि’ उनके साथ क्या चिपकी, इससे छुटकारा नहीं मिला. मौआर को लेकर जितने मुंह उतने किस्से...मौआर के पास तब 165 गांवों का अपना राज था. अपने महलनुमा घर में पालतू चीता था. बंधुआ मजदूरों की फौज थी. जिस भी मजदूर ने चूं-चां की, उसे पालतू चीते के सामने परोस दिया जाता था.

अन्ना के आंदोलन से बेआबरु होकर निकले और बिग बॉग में जा घुसे आज के स्वामी अग्निवेश, लेखिका महाश्वेता देवी और पलामू के पत्रकार रामेश्वरम ने मिल कर उसी जमाने में पलामू में ही सबसे पहले बंधुवा मुक्ति मोर्चा की स्थापना की थी. मोर्चा ने मौआर के खिलाफ कई कार्यकम किये.

भारत में सबसे अधिक 96 बंधुवा मजदूरों को रखने के मुकदमे मौआर जगजीश्वर जीत सिंह के खिलाफ किये गये लेकिन भारत सरकार मुकदमा उनके खिलाफ चले सारे मुकदमे एक-एक कर हार गई.

राष्ट्रीय श्रम संस्थान की 80 के दशक की एक रिपोर्ट कहती है- पूरे भारत में फोर्स्ड बांडेड लेबर सिस्टम सिर्फ पलामू में है. उसी दौर के अखबारों में मनातू के इस जमींदार मौआर जगदीश्वरजीत सिंह के किस्से आम थे.

1980 की एक पुरानी रिपोर्ट कहती है- “जिस किसी भी जंगल में जब कोई खूंखार, नरभक्षी आ जाता है तो उसके आसपास का इलाका उससे थर्राया रहता है. जाने कब किसकी जान पर बन आये. कौन कब उसके खूनी आदमखोर का शिकार हो जाये, यह कोई नहीं जानता... ऐसा होने का कारण है. उक्त आदमखोर चौपाया नहीं, दो-पाया है. पलामू के उस दोपाये आदमखोर का नाम है मउआर जगदीश्वर जीत सिंह. अपने क्षेत्र में यही ‘सरकार’ हैं. इनकी इच्छा ही कानून है. कोई चूं नहीं कर सकता. मनातू प्रखंड की हजारों एकड़ ज़मीन के ये खुदसर राजा हैं...”

1978 में जगदीश्वरजीत सिंह पर फिल्म बनी-‘ मैन ईटर ऑफ मनातू’. फिल्म को तब जनता राज में रिलीज नहीं होने दिया गया था.

मौआर जगदीश्वरजीत सिंह कहते हैं- “अगर मैं आदमखोर होता तो आप क्या मेरे सामने जिंदा बैठ पाते ? यह तो आप मीडिया वालों की मेहरबानी थी.”

लेकिन मीडिया में जिन लोगों ने ऐसी रिपोर्ट लिखी, वो जानते थे कि मौआर जगदीश्वरजीत सिंह के बारे में जो कुछ लिखा जा रहा है, उसे साबित कर पाना मुश्किल है. कुछ सच लिखा गया और कुछ गढ़ा गया. कौन जाने, सच या झूठ !
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Deepmala [aju3850@gmail.com] Ranchi - 2011-12-12 15:57:51

 
  इस रिपोर्ट के माध्यम से हमें ये पता चला कि आदमखोर का मतलब कोई बाघ नहीं, आदमी था, जिसने किसी विशेष परिस्थिति में यह विशेषण पा लिया था. लेकिन उसके खौफ से इंकार नहीं किया जा सकता है. मुकम्मल रिपोर्ट के लिये रविवार को बहुत बधाई. 
   
 

RAHUL KUMAR [rkrahulprince@gmail.com] DELHI - 2011-12-09 12:21:01

 
  जो बातें लिखी गई हैं, वो दिल को छू लेने वाली हैं. आपकी रिपोर्ट बिल्कुल सही है. 
   
 

RAKESH RAUSHAN [rakeshraushan875@gmail.com] JAIPUR,RAJASTHAN - 2011-12-07 09:07:39

 
  कुछ लिखी गई बातें चौंकाने वाली है कि ऐसा भी कभी पलामू में था. ये मेरे लिये सब से अलग अहसास था. इसके बारे में मैंने दूसरों से सुना था पर वो कुछ और था पर इसमें तो सच्चाई है. विनय सर, इसके लिये आपको धन्यवाद. 
   
 

ashok kumar vishwakrma [ashok8029@gmail.com] daltonganj - 2011-12-06 06:55:21

 
  रिपोर्ट अच्छी है विनय जी. बधाई. 
   
 

dr.pramodkumar [pramod99gupta@gmail.com] delhi - 2011-12-05 15:11:54

 
  “द मैन ईटर ऑफ मनातू” इस पर काफी कुछ लिखा गया है लेकिन इस लेख की खास बात यह रही कि इसमें मौआरजी को भी कहने सुनने का अवसर दिया गया. विनयजी और रविवार.कॉम को कोटि कोटि साधुवाद. लेकिन लेखक को साहित्यलेखन और पत्रकारिता का फर्क बनाए रखना चाहिए था. 
   
 

dr.pramodkumar [kitkat2010@rediffmail.com] delhi - 2011-12-05 12:23:01

 
  मनातू मऊआर की आदमखोर छवि बहुत पुरानी है पर न उन्होंने कभी स्वीकार किया न कोई सिद्ध कर सका फिर भी ये छवि उनसे चिपकी रही. हां इसके लिए विनय जी को बहुत बहुत बधाई कि उन्होंने मुन्नी और शीला के यग में एक रोचक और दशकों पुराने एक गंभीर मुद्दे पर सूखी स्याही को गीला करने का साहस किया और उसमें सफल भी हुए. पढ़ते हुए पहली से अंतिम लाइन कब आई पता नहीं चला. प्रकाशन हेतु रविवार.कॉम को भी बहुत बहुत साधुवाद. इस लेख से पहले मनातू टाइगर के पर मात्र आरोप अर्पित करने वाले एकाध ही लेख पढ़ने को मिले, किंतु इस लेख में सबसे सुखद ये रहा कि मनातू टाइगर का साक्षात्कार कर के उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया. पत्रकारिता ये ही है कि सत्य और मिथिक दोनों को पाठक के सामने लाना है. दोनों में क्या ठीक है ये पाठक निर्णय कर लेगा.  
   
 

ramanuj [ramanuj.bsagar@gmail.com] hyderabad - 2011-12-05 00:08:04

 
  शानदार मुजफ्फरपुर से नहीं, बिहार के मुंगेर जिले से निकलता था. 
   
 

umesh kumar [umesh.palamu@gmail.com] palamu - 2011-12-02 05:38:50

 
  मैं मानता हूं कि मनातू मौआर की कहानी पत्रकारों में भय और डर बना कर लिखा गया. अखबारों में वही छपा, जो जैसा छापना चाहता था. मैं पूरे प्रदेश की कहानी नहीं जानता लेकिन पलामू के जमींदारों की कहानियां इससे भी कहीं भयावह और विभत्स है. मनातू मौआर के बारे में लोग जानते हैं कि जो लोग इनकी बात नहीं मानते थे, उन्हें अपने पालतू चीते के सामने डाल देते थे. जैसे उदाहरण के लिये हैदरनगर का जमींदार अपने गुलामों के शरीर पर गुड़ लपेट कर उसे लहचुट्टी के सामने डाल दिया करता था. अब इसको क्या कहेंगे? पलामू में जमींदारों की कहानी एक से एक बढ़ कर है जो बहुत ही सत्य है. इन सब पर गहन अध्ययन की जरुरत है. वैसे विनय जी ने जो रिपोर्ट लिखी है, वह तारीफ के काबिल है. यह एक ऐसी संग्रहणीय रिपोर्ट है, जो आज की नयी पीढ़ी के किसी भी रिपोर्टर के लिये मायने रखती है. 
   
 

शहरोज़ Shahroz [shahroz_wr@yahoo.com] Ranchi - 2011-11-24 08:51:05

 
  मऊआर के बारे में मुझे लगता है सबसे सुलझी हुई रपट है.ऐसा इसलिए उस मुलाक़ात का मैं गवाह रहा हूँ.विनय भाई ने चीज़ों को वैसा ही तस दिया है.मैंने इसे पोस्ट के दिन ही पढ़ लिया था. विलम्ब से कमेन्ट देने के लिए माफ़ करेंगे.  
   
 

Himanshu [patrakar.himanshu@gmail.com] Noida - 2011-11-23 02:35:24

 
  अरुण जी, लगता है थूक लो और भाग जाओ की तर्ज पर आप अपनी किसी कुंठा के साथ थूक कर भाग गये हैं. इतनी शानदार रिपोर्ट को आप बिना शोध के लिखा बता रहे हैं. मउआर पर आज तक जितनी भी रिपोर्ट छपी है, उसमें यह सर्वोत्तम है. 
   
 

अरुण पाण्डेय [arun.pandeya@gmail.com] नैशविल, टेनेसी - 2011-11-22 16:47:35

 
  आपकी पत्रकारिता का स्तर बहुत नीचा है| यदि आप कुछ लिखते है तो पहले कुछ शोध कीजिये| वैसे यदि आपका उद्देश्य सिर्फ जगदीश्वरजीत सिंह की सफाई छापना था तो आप अवश्य सफल हुए हैं, यह बात दूसरी है कि बिना कुछ तथ्यों के, इस सफाई पर विश्वास करना असंभव है| 
   
 

Mahtab Ali [mahtab.ali.2000@gmail.com] Jimmy’s Killer Prawns, Mushrif Mall, Al Aman, Abu Dhabi - 2011-11-20 18:29:45

 
  आपने बहुत अच्छी रिपोर्ट लिखी है. आम तौर पर लोग किसी न किसी के पक्ष में खड़े हो कर रिपोर्ट लिखते हैं. आपने बहुत सारे तथ्यों के साथ, बहुत मेहनत से यह रिपोर्ट लिखी है और इश रिपोर्ट से यह बात बहुत साफ तौर पर जाहिर होती है कि आपने एक पत्रकार की तरह निष्पक्ष हो कर लिखा है. अल्लाह ताला आपकी लेखनी को और इज्जत बख्शे. 
   
 

prem prakash [prem.prakashdtj@gmail.com] ranchi - 2011-11-18 12:54:32

 
  मौआर साहेब की आदमखोर की छवि तो चर्चा में थी. आपकी रिपोर्ट ने उनके दूसरे पक्ष को उजागर किया है लेकिन जनमत पहले पक्ष के साथ रहा है. कुल मिलाकर दोनों पक्ष को बहुत सुंदरता से आपने लिखा है. आपका शुक्रिया. 
   
 

saikat chaterjee [saikat.chaterjee@gmail.com] daltanganj - 2011-11-14 09:24:24

 
  बहुत अच्छी रिपोर्ट है विनय जी. बधाई. 
   
 

मिसिर अरुण [misirkatya55@gmail.com] सीतापुर (नैमिष क्षेत्र),उत्तर प्रदेश ! - 2011-11-14 02:28:53

 
  प्रचार तंत्र पर राजनीतिज्ञों व अन्य धनाढ्य प्रभावशाली वर्ग का प्रभुत्व रहा है !ये जिसे चाहें आसमान पर चढ़े, जिसे चाहे गर्त में धकेल दें ! व्यक्तित्व की हत्याएँ कैसे की जाती हैं, इसकी एक मिसाल पलामू के आदमखोर का यह किस्सा भी है !  
   
 

श्‍यामबि‍हारी श्‍यामल [shyambiharishymal1965@hotmail.com] सी; 27/ 156, जगतगंज, वाराणसी - 2011-11-14 00:25:26

 
  लम्‍बे अंतराल के बाद मनातू मउवार के बारे मे कोई रि‍पोर्ट पढ़ने को मि‍ली। करीब तीन दशक पहले का दौर आंखों के सामने तैरने लगा है। उस दौरान यह नाम खूब छपा और दहशत के पर्याय के रूप मे चि‍त्रि‍त हुआ। जगदीश्‍वरजीत सि‍ह उर्फ मनातू मउवार की हमारे जि‍ले पलामू ( झारखंड ) में दोनों छवि‍ तैरती रही है। एक तो बहुप्रचारि‍त \\\'आदमखोर\\\'वाली जि‍सके बारे में इस रि‍पोर्ट में उन्‍होंने कहा है कि‍ यह तत्‍कालीन मीडि‍या की देन है और दूसरी वह जो मेदि‍नीनगर ( डाल्‍टनगंज ) के नावाटोली मुहल्‍ले मे डाकखाने के आसपास के लोगों के मन में बसी है। यह दूसरी छवि‍ नि‍श्‍चय ही पहली से वि‍परीत है। रचनाकार-पत्रकार और संस्‍कृति‍कर्मी वि‍नय कुमार शर्मा ने संक्षि‍प्‍त ही कि‍न्‍तु यह सर्वथा सम्‍पूर्ण पोस्‍ट लि‍खी है। मुझे लगता है मउवार पर यह पहली रि‍पोर्ट है जि‍समें दोनों पक्ष की बात है। उपलब्‍ध कराने के लि‍ए रवि‍वार का आभार...  
   
 

girijeshwar [girijeshwarpd@gmail.com] maithan,dhanbad - 2011-11-13 12:43:51

 
  आदमखोर के बारे में पहली बार रविवार में ही पढ़ रहा हूं. वो आदमखोर तो था ही, वरना सभी बड़े और वरिष्ठ पत्र-पत्रिकाओं की रिपोर्ट गलत नहीं हो सकती. कौन नहीं जानता कि जमींदारों ने आम जनता पर कैसे-कैसे जुल्म किये हैं. आदमखोर अब सफाई दे रहा है. हमारे देश में ताकतवर के खिलाफ सच को साबित करना लगभग असंभव है. 
   
 

Aman Chakra [chakra.aman@gmail.com] New Delhi - 2011-11-13 09:13:42

 
  मेरी राय में बिना आग के धुखां नहीं होता. मौआर के बारे में दो दशक पहले माया पत्रिका में एक रिपोर्ट आई थी. वैसे भी जब आप किसी से मिलते हैं, तभी उसके बारे में सही-सही राय कायम कर पाते हैं. मौआर के जीवन पर एक उपन्यास भी लिखा गया था- VANTARI... जिसके लेखक थे सुरेश चंद सिन्हा, जो उस इलाके में ही सीओ थे और उन्हें मौआर को पास से जानने का आवसर मिला था. वैसे अब तो ये शेर बुढ़ा हो गया है. मनातू मौआर को मैं एक अनुभवी भविष्यवक्ता के तौर पर भी जानता हूं. बाकि तो समय है. आज वो सफाई दे रहे हैं, जिस समय वो इस तरह की हरकत कर रहे थे, तब उनकी सफाई सामने नहीं आती थी. 
   
 

ravi shanker [ravi.ipta@gmail.com] daltonganj - 2011-11-13 04:37:47

 
  मनातू मौआर के बारे में विनय जी की रिपोर्ट बिल्कुल सही है. इनके बारे में कही गई कथा अब पुरानी हो चुकी है लेकिन पलामू ही नहीं, देश के लिये यह चौंकाने वाला है-द मैन ईटर ऑफ मनातू... 
   
 

prabhat ranjan [prabhatranja@gmail.com] delhi - 2011-11-11 15:31:41

 
  मैंने अपने बचपन में माया पत्रिका में मऊआर पर शायद विकास कुमार झा की रिपोर्ट पढ़ी थी. पढकर, तस्वीर देखकर लगता था, सचमुच कोई आदमखोर रहा हो. वे दिन याद आ गए. बहुत अच्छा लिखा है. 
   
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