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आम आदमी की पीड़ा ही भूपेन दा के गीत थे

स्मरण

 

आम आदमी की पीड़ा ही भूपेन दा के गीत थे

रविशंकर रवि गुवाहाटी से


ठहर-सा गया है ब्रह्मपुत्र का प्रवाह/लोहित का किनारा निस्तब्ध है/ सदिया से चला यायावर/खामोश हो गया मुंबई के सागर किनारे/ रो रहा है बूढ़ा लुइत/कौन देगा उसके विस्तार को धिक्कार/ जो नैतिकता को ध्वस्त होता देखकर भी/ प्रवाहमान है/ खाद्यविहीन, वस्त्रहीन खेतिहर/ की हालत से विकल/ मानवता के पक्ष मनुष्य मनुष्य के लिए का संदेश देने वाला यायावर/ थक सकता है/ रुक नहीं सकता/ वे गुजरे नहीं, विश्राम कर रहे हैं/ अगली यात्रा के लिए/ उसे जी भर सो लेने दे/ कई दशकों से सोया नहीं था यायावर/ जब उठ उठेगा तो जन सरोकार के गीत गाएगा, मानवता की बांसुरी बजाएगा/ बीहू के गीतों पर सबको झुमाएगा/यह सच है कि/ अब दिल हुम-हुम नहीं करता/ दिल रोता है उसकी याद में/ लेकिन वह फिर आएगा/नए अवतार में/ वह इतिहास है/ वह वर्तमान है/ वह भविष्य है/ वह आएगा/ नई पहचान लिए...

भूपेन हजारिका


प्रख्यात गायक और संगीतकार डा. भूपेन हजारिका एक युगपुरुष थे. उनका नाम ही उनका सबसे बड़ा परिचय है. यह अलग बात है कि हर कोई उन्हें उनके अलग-अलग गुणों के रूप में जानता है. उनका रचना संसार महाबाहु ब्रह्मपुत्र की तरह विशाल और व्यापक है. उन्होंने कई कालजयी गीत और कविता समाज को दिये हैं. लेकिन उनका सबसे ज्यादा दिखने वाला पक्ष उनकी आवाज है.

उनके गाए गीत पूर्वोत्तर के लिए धरोहर हैं, क्योंकि उनमें पूर्वोत्तर की भावना, आवेग, संकट, समय और संवेदना की अभिव्यक्ति है. उनके गीतों का कथ्य समाज को झकझोरता और पुचकारता रहा है. सामाजिक यथार्थ को उकेरते उनके गीत लोगों को उद्वेलित करते रहे हैं. इसलिए तो कम से कम तीन पीढ़ी के लोग उनके गीतों के साथ जीते रहे हैं और यही वजह है कि गत पांच नवंबर को उनके निधन के बाद उनके अंतिम दर्शन के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा. क्योंकि उनके गीतों के संदेश और उसमें छिपी भावना हर किसी को स्पंदित करता रहा है.

उनके गीतों में पूर्वोत्तर का समाज जुड़ा हुआ महसूस करता है. हर वर्ग और हर समुदाय के लिए उनके गीत हैं. गरीबी का मार्मिक चित्रण है तो असमिया जाति की व्यापकता का वर्णन भी. उनके गीतों में आम आदमी की पीड़ा या भावना परिलक्षित होती रही है. इसलिए उनके गीत हर किसी को अपने गीत लगते हैं. इसलिए जब उनका निधन हुआ तो हर किसी को लगा कि उनका कोई अपना चल बसा. और उसके अंतिम दर्शन के लिए लोग उमड़ पड़े.

जो नहीं आ पाए, वे चैनलों से चिपके रहे, आंसू बहाते रहे. लाखों लोगों की उमड़ी भीड़ इस बात का गवाह है कि उनके चाहने वाले का संसार कितना विशाल है. इतनी भीड़ शायद ही किसी कलाकार की मौत पर जुटी होगी. यह असमिया समाज का सबसे सुखद पक्ष है कि वे अपने वैसे कलाकार को किस हद तक चाहते हैं, जो उनके लिए गीत लिखता है. इसमें तो दो राय है ही नहीं कि वे सरोकार से जुड़े कलाकार थे. आम आदमी के प्रति उनका सरोकार उनके गीतों के अलावा उनकी रचनाओं में भी दिखता है.

उन्होंने हिन्दी फिल्म जगत को काफी कुछ दिया और लता जी जैसी महान गायिका से असमिया गीत गवा लिया. वे अपनी धुन में काम करते रहे. उनका एक सफल गीत उनकी शख्सियत को मुकम्मल तौर पर बयां करता रहा "आमि एक जाजाबोर...' मैं एक यायावर हूं. और उनकी यायावरी उनके संगीत को जीनत अता करती रही, और यह सब संगीत को लेकर उनके दीवानेपन की वजह से ही संभव हुआ.

एक भेंट में उन्होंने कहा था- "संगीत मेरे लिए सिर्फ मनोरंजन की चीज नहीं रही, गीत सामाजिक बदलाव का कारगर हथियार हो सकते हैं. मैंने जब इप्टा ज्वाइन किया था, तब यही बात दिमाग में थी. वह दौर अंग्रेज़ हुकूमत की मुखालफत का दौर था. रित्विक घटक और मृणाल सेन, सिनेमा के माध्यम से अपनी बात कह रहे थे, उत्पल दत्त रंगमंच के जरिए लोगों तक पहुंच रहे थे और कैफी आजमी कलम का सहारा ले रहे थे. लिहाजा मैंने संगीत को चुना. दरअसल मेरा मानना है कि तीन मिनट का एक गीत भी क्रांति कर सकता है” और वाकई भूपेन दा ने इसे सच कर दिखाया. अपनी जमीन के उपेक्षित जनजातियों की आवाज को उन्होंने बुलंद किया. आज सिर्फ भूपेन दा की वजह से ही पूर्वोत्तर जनजातियों के वजूद को शिनाख्त हासिल हो सकी है. निस्संदेह दादा साहेब फालके सम्मान इसी शिनाख्त को प्रमाणिक बना गया.

उनकी जिद थी कि खुद भी आंचलिक शब्दों को गुनेंगे-बुनेंगे और गीतकारों से भी बुनवाएंगे. रूदाली के गीतों ने भूपेन दा को एकबार फिर बालीवुड में शीर्ष पर पहुंचा दिया. भूपेन दा ने असम की धुनों को उसमें प्रयुक्त कर पूरे हिंदुस्तानियों के दिलों पर राज कर लिया.

"दिल हूम.... हूम करे ऽऽ' गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं. "रूदाली' फिल्म को लेकर जहां भी समालोचकों ने चर्चा की, वहां संगीत और गीत पक्ष पर ही सबसे ज्यादा मूल्यांकन हुआ. कहने का तात्पर्य यह है कि कथ्य पक्ष पर संगीत पक्ष हावी रहा. ‘रूदाली' फिल्म के परिवेश को गौर से देखें तो आप स्पष्ट अनुभव करेंगे कि राजस्थान की तपती रेत में भी भूपेन हजारिका ने असम को लाने की भरपूर कोशिश की. यह दखलंदाजी रेतीले प्यासी संस्कृति को कैसे भा गई, यह तो आज भी आश्चर्य का विषय बना हुआ है.

मेरे ख्याल से गीतकार गुलजार के वे भावुक शब्द शक्ति हैं, जो अपनी ध्वनि से राजस्थान की संस्कृति को बड़ी बहन मान गले लगा जाती है. नि:संदेह बिंब प्रधान गुलजार के गीतों के शब्द पंखुड़ी में ताजगी का एहसास मन में कौतुहल उत्पन्न करनेवाला है.

इस वक्त की सबसे बड़ी जरूरत उनकी रचनाओं को एकत्रित करके संकलित करने की है. उनकी कविताओं, पत्रों और अन्य कृतियों का संकलन करना जरूरी है. भूपेन दा हमेशा यायावर की तरह जीते रहे. इसलिए उनकी रचनाएं बिखरी हुई हैं. उन्हें एक जगह समेटकर उसका प्रकाशन होना चाहिए. लेकिन प्रकाशन सर्वसुलभ और सस्ती होना चाहिए, ताकि हर कोई खरीद सके. इस दिशा में असम साहित्य सभा विशेष भूमिका का निर्वाह कर सकता है और उसे करना भी चाहिए.

भूपेन दा के गाए या लिखे गीत भी बिखरे हुए हैं. उन्हें भी सीडी के माध्यम से हर किसी के लिए उपलब्ध किया जाना चाहिए. इसके लिए भूपेन हजारिका स्मारक ट्रस्ट को पहल करनी चाहिए. ताकि वे सीडी हर किसी को आसानी से उपलब्ध हो सके.

मतलब साफ है कि भूपेन हजारिका से जुड़ी सामग्रियां सहज उपलब्ध हो सकें. भूपेन दा की विशाल समाधि बने, सड़कों और भवनों का नामकरण उनके नाम हो, लेकिन इसके साथ ही उनके रचना संसार को आम आदमी के लिए उपलब्ध कराना भी जरूरी है.

डा. भूपेन हजारिका का अपना जीवन दर्शन था. समाज को देखने का उनका अपना नजरिया था. वे हर किसी को आगे बढ़ना देखना चाहते थे. इस पर केंद्रीत एक प्रमाणिक पुस्तक की जरूरत भी महसूस की जा रही है. यह सब आने वाली पीढ़ी तक भूपेन दा को पहुंचाने के लिए जरूरी है.

भूपेन दा के साथ बढ़ी और चली पीढ़ी कुछ वर्षों के बाद इतिहास हो जाएगी. इसलिए अगली पीढ़ी तक उनकी विरासत को पहुंचाना आज समय की सबसे बड़ी जरूरत है. जब आने वाली पीढ़ी उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को समझेगी और जानेगी तभी वे उस पीढ़ी के साथ भी आगे की यात्रा कर सकेंगे. तभी उनके समाधि स्थल का अर्थ और महत्व भी सार्थक हो जाएगा.

इसलिए अब इस दिशा में गंभीर पहल की जरूरत है. भूपेन दा की विरासत को अगली पीढ़ी तक ले जाना हम सबों की जिम्मेदारी है और यदि हम उन्हें चाहते हैं तो इस जिम्मेदारी को पूरा करना होगा, वर्ना समय हमें कभी माफ नहीं करेगा. यह उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि होगी.

* 15 नवंबर 2011 को भूपेन हजारिका के श्राद्ध पर लिखा गया आलेख.
14.11.2011, 20.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

हरिराम [] ढसूक - 2011-11-26 10:11:50

 
  अगर कोई सज्जन मुझे भूपेन जी के गीत- गंगा बहती है क्यों के लिए वेबसाईट बता दे तो तहेदिल से दुआएँ दूँ. 
   
 

omprakash pal [pal.omprakash1@gmail.com] delhi - 2011-11-20 18:05:33

 
  भूपेंन दा को हार्दिक श्रद्धांजली. 
   
 

kanchan [kanchanguwahati@gmail.com] guwahati - 2011-11-15 03:21:53

 
  भूपेन हजारिका के तमाम गीत आम आदमी से जुड़े थे, इसलिये उनके अंतिम दर्शन को जन सैलाब उमड़ पड़ा. 
   
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