पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
  पहला पन्ना >मुद्दा >गुजरात Print | Share This  

सच, झूठ और पंचमहाल

मुद्दा

 

सच, झूठ और पंचमहाल

आशीष कुमार ‘अंशु’ पंचमहाल, गुजरात से लौटकर


पावागढ़, लूणावाला, संतरामपुर, जामूगोड़ा, देवगढ़ बारी ये नाम कभी पहले सुना है आपने ? इन्हीं पांच महलों को मिलाकर गुजरात के एक जिले को नाम दिया गया है पंचमहाल. यह बता पाना भी मुश्किल है कि गुजरात के इस जिले का नाम कितने लोगों ने सुना होगा? लेकिन इस जिले के जिला मुख्यालय का नाम आते ही सुनने वाले के चेहरे पर कई रंग आते जाते हैं. मैं गोधरा की बात कर रहा हूं.

गोधरा


जिले के सलाट, मदारी, बंजारा, काकसिया, बागड़ी, लोहाड़िया समाज के लोगों के बीच, उनकी सामाजिक आर्थिक स्थिति को समझने की कोशिश में पंचमहाल के लूणावाला जाना हुआ था. इन सभी समाज के लोग गुजरात जैसे विकास का मॉडल बने राज्य में भी बदहाली में जीने के लिए अभिशप्त हैं. बहरहाल यहां बात गोधरा की करते हैं, जिसे पिछले नौ सालों में देश ही नहीं, दुनिया भर में जनसंहार के तौर पर इतनी पहचान मिली कि उसकी दूसरी सारी पहचान मिट गई है.

“गुजरात के बाहर लोगों को जैसे पता चलता है कि हम गोधरा से हैं, सामने वाले की शक्ल इतनी दयनीय हो जाती है, जैसे उसके घर से ही किसी की मय्यत उठनी हो! अच्छा नहीं लगता, जब लोग हमें दया का पात्र समझते हैं. हमें किसी से दया की भीख नहीं चाहिए.”

यह एक इक्कीस वर्षीय युवक नवाब अली की टिप्पणी थी. वैसे गोधरा की उस चाय की दूकान पर एक अनजान आदमी से कोई बात करने को तैयार नहीं था. ना जाने कौन है? कहां से आया है और क्या चाहता है? उनलोगों को आगंतुक पर विश्वास करते हुए थोड़ा वक्त लगा. एक व्यक्ति ने पूछ ही लिया आखिर- “आप पत्रकार हैं या एनजीओ वाले, या हमारी सरकारी आदमी है?” इस सवाल के मानी स्पष्ट थे, उनके बीच आम तौर पर यही तीन तरह के लोग पिछले नौ सालों से लगातार आ-जा रहे हैं.

उन लोगों की एक पत्रकार से बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी. वे तैयार हुए दिल्ली से आए एक शोधार्थी से बात करने के लिए, जो लूणावाला के एक कॉलेज के प्राचार्य कांजी भाई पटेल से मिलने के लिए गोधरा आया है. गोधरा से उसे फिर लूणावाला जाना था. जब वे लोग इस शोधार्थी की बातों से पूरी तरह आश्वस्त हुए, उसके बाद वे धीरे-धीरे अनौपचारिक होने लगे लेकिन उनसे अचानक मिले इस अपनापे से मेरी जिम्मेवारी थोड़ी बढ़ गई थी.

चूंकि शोधार्थी वाले परिचय के बाद, जो भी बातें उन्होंने की, कायदे से वह सारी बातें ‘ऑफ दि रिकॉर्ड’ हैं. लेकिन वह गोधरा के एक ऐसे पहलू को सामने लाती हैं, जिस पर कई-कई कारणों से और अकारण भी कोई बात नहीं करना चाहता. जाहिर है, ऐसे में बात बताना ज़रुरी लगता है और कायदे की बात करें तो उन तमाम लोगों की पहचान छुपाना भी. नवाब का नाम इस लिए यहां बताने में कोई हर्ज नजर नहीं आता क्योंकि उनसे पहले मेरी बात हो रही थी, उनसे बातचीत के दौरान ही एक-एक करके दूसरे लोग हमारी बातचीत में शामिल हुए.

चाय की दूकान पर हुई बातचीत से ही पता चला कि दंगों के दौरान गोधरा से बीस किलोमीटर दूर सेहरा नाम का एक कस्बा है, जहां मुस्लिम और सिन्धी आबादी रहती है. जब पूरा गुजरात दंगों की आग में झुलस रहा था, उस दौरान इस कस्बे में एक पत्ता तक नहीं खड़का. वास्तव में इस हिन्दू-मुस्लिम आबादी वाले कस्बे ने एक मिसाल कायम की. जो लोग मोदी को पूरे गुजरात का गुनाहगार मानते हैं, उनके लिये सेहरा गहरे चिंतन और मनन का विषय हो सकता है.

यह बात गोधरा के किसी मुस्लिम व्यक्ति के मुंह से सुनकर किसी भी दिल्ली, मुम्बई वाले को परेशानी हो सकती है. लेकिन जब वे बुजुर्ग व्यक्ति बोल रहे थे, उनके साथ के किसी व्यक्ति की आंखें चौड़ी नहीं हुई. “भाई साहब, मोदीजी से हमें कोई शिकायत नहीं है. वे सियासी आदमी हैं और जो लोग मोदी के खिलाफ नारे लगा रहे हैं, उनके खिलाफ काम कर रहे हैं, वे भी हम मुसलमानों के नाम पर सिर्फ अपना भला कर रहे हैं. वे भी राजनीति कर रहे हैं. उनसे भी हमें कोई उम्मीद नहीं है.”

उन बुजुर्ग व्यक्ति की बात खत्म होने के साथ-साथ, एक-एक करके कई लोग इस बातचीत में शमिल हो गए. कुछ लोग अब भी मुझे संदेह भरी नजरों से देख रहे थे. ना जाने कौन है?

“2002 में बहुत कुछ खोया हमने. धीरे धीरे जख्म भरते हैं और मीडिया और एनजीओ वाले आकर फिर से मिर्च डालकर हमें तड़पता छोड़कर चले जाते हैं. बहुत इंटरव्यू हुए, क्या मिला हमें. अब कोई बात नहीं करनी हमें किसी से. हमारे नाम पर गुजरात की कई एनजीओ की खाल मोटी हो गई है. मोटा पैसा कमाया उन्होंने, हम मुसलमानों के नाम पर. हमें क्या मिला, पूछिए उन मोटी खाल वालों से. हम कल भी सड़क पर थे और आज भी सड़क पर हैं. हमारे जख्म मत कुरेदिए आप...”

“गुजरात में कितने मुसलमान मोदी के खिलाफ आवाज उठाने वाले हैं. आप देख लीजिए, जो भी बोलने वाले लोग हैं, सबके अपने पॉलिटिकल और इकॉनॉमिक हित जुड़े हैं, मोदी के खिलाफ बोलने में. गुजरात के मुलसमानों से किसी को मोहब्बत है, इसलिए हमारे पक्ष में कोई बोल रहा है, मैं तो इस गलतफहमी में नहीं जी रहा.”
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sanjay bengani [sanjaybengani@gmail.com] ahmedabad - 2012-03-01 06:49:55

 
  विश्वास करना मुश्किल है कि इस तरह का लेख भी आएगा. काश, दो-तीन दिन पहले आता.  
   
 

Arihant Jain [info@arihanttourist.in] Delhi - 2012-02-29 16:30:36

 
  बहुत खूब व्याख्यान किया गोधरा के बारे में, एक ऐसी बात आपने बताई की सोचने को जरुर मजबूर हूँ कि अभी तक गोधरा के बारे में जो सुना था वो सच है या ये... बेशक इस लेख पर कोई शक नहीं किया जा सकता पर जो पहले सुना वो भी तो पूरी तरह से नहीं झुटलाया जा सकता.... फिर भी आपने काफी कुछ खुलासा किया जो अपने आप में बड़ी बात है...बहुत खूब अंशु जी  
   
 

subodh rai [raisubodh@gmail.com] Ghaziabad - 2012-02-29 14:04:43

 
  गोधरा ऐसा जख्म है जो मोदी के लिए बजी हर ताली से हरा हो जाता है। मोदी इंसानियत के जितने गुनहगार हैं उतने ही वो लोग भी जिन्होनें जख्मों को कुरेदकर अब तक वोट की सियासत की है। आशीष भाई अच्छा है। आपको बधाई।  
   
 

devesh tiwari [deveshtiwaricg@gmail.com] raipur - 2011-12-08 15:40:20

 
  हमने भी गोधरा के बारे में जो कुछ सुन रखा था, वो झूठ सा नजर आया, इस रिपोर्ट को पढ़ कर. बहुत अच्छी प्रस्तुति. 
   
 

शहरोज़ Shahroz [shahroz_wr@yahoo.com] Ranchi - 2011-12-01 07:20:43

 
  अंशु भाई पर शक नहीं किया जा सकता है! 
   
 

Ravi Jain [ravijain9634@gmail.com] Raya (Mathura) - 2011-11-29 08:46:03

 
  वाह कमाल का लिखा है आपने ! 
   
 

Praveen [praveen.raipur@yahoo.com] Raipur - 2011-11-25 10:41:30

 
  भाई इतना राजनीतिज्ञ तो मैं नहीं हूं पर इस आर्टिकल को पढ़ कर ये कह सकता हू की गर्म तवे पर तो सभी रोटियां सकना चाहते है और तवे को ठंडा भी कोई नहीं रखना चाहते.
ये तो जग जाहिर है कि घर का मुखिया कमजोर हो और ढील दे तो घर की लड़किया और औरत आवारा हो जाती है! और ये भी कि अगर मैं जब तक इजाजत ना दूंस तब तक कोई मुझे बे भी नहीं बोल सकता. रही बात गुजरात को और गोधरा को बदनाम करने और वहां के लोगों की भावनाओं से खेलने और जख्मो को कुरेदने की तो यहाँ पर भी उपरोक्त बातें लागु होती हैं कि घर का मुखिया कमजोर था तभी तो इतनी बड़ी बात हो गयी और अभी भी नहीं सुधरे हैं तभी वहाँ के लोगो के जख्म नहीं भर पा रहे हैं.
 
   
 

आशीष कुमार 'अंशु' [] Delhi - 2011-11-25 08:17:04

 
  @शहरोज भाई:-
\'\'बेजुबान मुस्लिमों के मुंह से वो कहलवाना क्या चाहते हैं..\'\'
शहरोज भाई सब लोगों को संतोष दे पाना किसके बस में है? इसलिए जो देखा - जो सुना - जितना समझा लिख दिया. बिना इस बात की परवाह किए की, किसकी प्रतिक्रिया क्या होगी? वैसे यह सब लिखना आसान नहीं था, गुजरात में कई मुस्लिम समाज के लोग \'ऑफ द रिकोर्ड\' बहुत सी बात कही लेकिन जैसे मैंने उन्हें कोट करने की बात कही, उन्होंने एक स्वर में कहा- कहाँ इस पचड़े में डाल रहे हो? उम्मीद है, समानुभूति रखने और दुखों की तिजारत करने के बीच का फर्क आप समझते होंगे..शहरोज भाई आप आरोप लगने की जगह यदि अपनी शंका सामने रखते तो मुझे जवाब देते हुए हार्दिक ख़ुशी होती. और यदि कुछ कमी रही है तो उसे स्वीकार करते हुए भी. लेकिन आपने फैसला सुनाकार वह गुंजाइश कम कर दी. बहरहाल लौटते मेल से अब भी आपके सुझाव, शिकायत और सवालों का स्वागत है...

@पंकज झा:- शुक्रिया पंकज भाई ...
 
   
 

शहरोज़ Shahroz [shahroz_wr@yahoo.com] Ranchi - 2011-11-24 08:56:49

 
  अंशु भाई पर शक नहीं किया जा सकता है! लेकिन मुझे ज़रूर लग रहा है कि क्या यह रपट मोदी गान तो नहीं है.पुतुल भाई! ऐसा इसलिए कि उन बेजुबान मुस्लिमों के मुंह से वो कहलवाना क्या चाहते हैं.जो चाहते हैं वैसा है नहीं.भाई उन्हें वहीँ रहना है.मगर से बैर मुश्किल होता है.कस्बाई पत्रकार भले प्रधानमंत्री को गलिया ले मोहल्ले के गुंडे और दरोगा पर बोलते बगले झांकता है. 
   
 

पंकज झा. [jay7feb@gmail.com] नयी दिल्ली. - 2011-11-22 18:53:02

 
  वाह वाह वाह ...शाबास आशीष जी. आपने तो गिद्धों को आइना दिखा दिया. वास्तव में गुजरातियों की लाश पर जिस तरह से तीस्तायें चील बन मंडराती रही हैं उन्हें बेनकाब करने का काम इस रिपोर्ट ने किया है...पुनः बधाई. 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in