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राजेंद्र यादवः चीनी कम, जिंदगी ज्यादा

संवाद

 

चीनी कम, ज़िंदगी ज़्यादा

राजेंद्र यादव से जयंती रंगनाथन की बातचीत

 

किताबघर से गीताश्री के संपादन व संयोजन में शीघ्र प्रकाश्य 'राजेंद्र यादव और छब्बीस लेखिकाएं' में यह साक्षात्कार शामिल है. इस किताब में राजेंद्र यादव से संबंधित आलेख, संस्मरण और साक्षात्कार हैं.

 

पहली बार कब पढ़ा था राजेंद्र यादव को.. ..? लगभग तीस साल पहले. उस समय की दूसरी किशोरियों की तरह साहित्य पढ़ने की शुरुआत में ही दो महत्वपूर्ण उपन्यास से रूबरू हुई धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ और राजेंद्र यादव का ‘सारा आकाश’.

मैंने हमेशा स्पष्ट कहा है कि स्त्री विमर्श पर बात करनी है तो मां, बेटी और बहन इन तीन संबंधों पर बात नहीं करूंगा.

 

‘गुनाहों का देवता’ ने मुझे उतना प्रभावित नहीं किया, जितना ‘सारा आकाश’ ने किया था. सुधा और चंदर खास कर सुधा का चरित्र जरूरत से ज्यादा कमजोर लगा. बीच में चंदर और नर्स का प्रसंग भी मुझे अरुचिकर लगा. लेकिन ‘सारा आकाश’ की नायिका के संघर्ष से मैं अपने को जोड़ पाई. भाषा, शैली, सब कुछ सहज और सरल.

इसके कुछ सालों बाद जब धर्मयुग से जुड़ी, तो सारा आकाश और राजेंद्र यादव के जिक्र पर एक सीनियर कलीग ने टिप्पणी की, “ उपन्यास अच्छा लगा, तो वहीं तक रखो. कभी लेखक से मिलने की इच्छा मत करना. यादव जी भारती जी नहीं हैं.”

भारती जी मेरे बॉस थे, संपादक थे. हालांकि जिस समय मैं धर्मयुग से जुड़ी (1985 में), वे दूसरों के हिसाब से काफी बदल चुके थे. हंसते भी थे और अपने स्टाफ को ब्रीदिंग स्पेस भी देते थे. लेकिन कभी मुझे उनके साथ यह नहीं लगा कि मैं सहज हो कर गपियाऊं या उनसे चर्चा करूं. दूरियां थीं, काफी थीं. (मैं कुछ ज्यादा अपरिपक्व थी और वे उम्र और पद के हिसाब से ज्यादा परिपक्व).

सालों बाद मुंबई से दिल्ली आना और बसना हुआ. राजेंद्र यादव के जिक्र पर कई लोगों से सुनने को मिला, “रसिया आदमी हैं. अगर आप अपने को बचा सकें, तो जरूर जाइए और मिलिए.”

हंस की गोष्ठियों में दूर से उन्हें देखा, हमेशा युवा स्त्रियों से घिरे, हंसते-ठहाके लगाते हुए यादव जी. कभी हिम्मत नहीं हुई पास जाने की, बात करने की.

इस बीच उनसे बिना मिले ही हंस में दो कहानियां छपीं. उसी दौरान धीरेंद्र अस्थाना और उनकी पत्नी ललिता भाभी के साथ पहली बार राजेंद्र यादव से मिलना हुआ. धीरेंद्र जी ने परिचय कराया, तो राजेंद्र जी ने सहजता से कहा, “तो तुम हो जयंती! ”

उस दिन एक दीवार टूट गई. मेरे सामने जो था वो एक पारदर्शी व्यक्ति था. सहज और सरल. मेरी कल्पना से परे. लगा कि एक्ट कर रहे हैं. लेकिन सबके साथ वे ऐसे ही थे.


फिर भी एक संकोच था. जो टूटा कुछ सालों बाद, जब मैं गीताश्री, अमृता, कमलेश और असीमा के साथ उनसे मिलने लगी, अकसर उनके घर पर हम सब धमाल मचाने पहुंचने लगे. राजेंद्र जी खुश होते थे, हंसते थे, तमाम विषयों पर खुल कर जिक्र करते थे. हमें वे कहते गुंडियां- बड़ी गुंडी, मंझली गुंडी और छोटी गुंडी. अपनी असुरक्षाओं का जिक्र करते, जिंदगी में अकेलेपन को लेकर अपना पक्ष बताते. लेकिन अधिकतर वे खुश रहते, ठहाके लगाते.

इन सबके बीच वो राजेंद्र यादव कहां है, जिनके बारे में सालों पहले मुझे सावधान किया गया था? ये तो एक ऐसा शख्स था, जिसके सामने हम अपनी तरह से रह सकते थे, वो कह सकते थे जो ना जाने कब से हमारे अंदर था और बाहर निकल नहीं पा रहा था.

क्या हम स्त्रियां ऐसे पुरुष को नहीं जानना चाहतीं, जो उनका चेहरा पढ़ ले, जिनके सामने वे अपना स्त्री होना भूल जाए और सिर्फ यह याद रखे कि वो एक जीती-जागती मनुष्य भी है आकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब.

हमारे गैंग के कुछ सदस्यों को राजेंद्र यादव के नॉनवेज जोक्स पर एतराज है. लेकिन एंजाय सभी करते हैं. एसएमएस सभी शेअर करते हैं. हर साल राजेंद्र यादव के जन्मदिन की पार्टी में कई दिलचस्प किरदारों से मुलाकातें, बहस, शेअरिंग, गैंग में शामिल होते नए सदस्य-कड़ी से कड़ी जुड़ रही है.

मैं हर बार जान रही हूं राजेंद्र यादव के व्यक्तित्व के नए पहलुओं को. वाकई यह व्यक्ति औरों से अलग है. अपने ऊपर उम्र को हावी होने नहीं देता. कभी यह अहसास नहीं होने देता कि वह ‘ द राजेंद्र यादव’ है. हां, इसका नुकसान भी है. जब कोई नया व्यक्ति उनसे मिलता है और उनके आसपास एक खास किस्म के ‘ऑरा’ की अपेक्षा करता है, तो उसे निराश होना पड़ता है.

उनसे कई बार कई विषयों पर बात हुई. गंभीर और अगंभीर बातें. फिजूल की बहसें भी हुईं. उनकी टिप्पणियां हर बार आपको अच्छी लगें, यह भी जरूरी नहीं. लेकिन मित्रवत बातचीत के अलावा एक औपचारिक इंटरव्यू लेने की बात जब आई, तो तय हुआ कि हम साहित्य से इतर ही बात करेंगे. ऐसे राजेंद्र यादव के बारे में बात करेंगे, जो अभी भी कुछ स्त्रियों को ‘डराता’ है, एक बौध्दिक वर्ग को ‘छिछोरा’ लगता है और हंस के पाठकों और एक बड़े प्रशंसक वर्ग को ‘अभिभूत’ करता है.

 

आप कितने अ-साहित्यक व्यक्ति हैं?

 

जब मैं पढ़ता या लिखता हूं तो पूरी तरह एक साहित्यिक आदमी होता हूं, लेकिन इसके बाद मैं कोशिश करता हूं कि एक आम आदमी की तरह हंसू, बर्ताव करूं. आइ वांट टू बी लाइक ए कॉमन मैन. इसके लिए मुझे किसी तरह की कोशिश नहीं करनी पड़ती. मुझे यह नेचुरल लगता है. शाम को घर लौटने के बाद या तो दोस्तों से मिलना-जुलना होता है, अकेला होता हूं तो कोई फिल्म देख लेता हूं.

 

आपका मन नहीं होता कि अलग क्षेत्र के लोगों से मिले-जुलें?

 

मिलना चाहता हूं.. . दिक्कत क्या है कि हमारे सर्किल में ऐसे लोग नहीं हैं, सारे पढ़ने-लिखने वाले हैं. कभी-कभी इच्छा होती है कि ऐसे लोगों से मिला जाए जिनका साहित्य से कोई लेना देना नहीं है.

अगर सफर में ऐसे व्यक्ति का साथ मिल जाए, जो आपको नहीं जानता, तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है?

मैं अपनी तरफ से कभी नहीं बताता. अगर पूछे तो सिर्फ इतना बताता हूं कि लिखने-पढ़ने का काम करता हूं. ज्यादा पूछे तो कहता हूं कि मैगजीन निकालता हूं. मैं उनके और अपने बीच डिस्टंस पैदा नहीं करना चाहता.

मुझे यह भी अच्छा नहीं लगता कि कोई मेरे पैर छुए या मुझसे दूरी बना कर चले. हमेशा से यही लगता रहा कि मैं लोगों के करीब रहूं. पैर छुआना, ओरा बना कर चलना--यह सब ड्रामा लगता है. अच्छा लगता है जहां बेतकल्लुफ-सी बातचीत हो, दुराव-छिपाव ना हो, खुल कर हो, गंदी बातें भी कर सकें और अच्छी बातें भी.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

JANARDAN HYDERABAF UNIVERSITY,HYDERABAD

 
 यह एक अच्छा संस्मरण है. 
   
 

beef (repizetar@gmail.com) Jubail

 
 I think it is going to be some bring old article, but it really compensated for my time. I will posted the track back to the article on my blog. I am sure ours visitors will thought this very useful. 
   
 

taureAvArry (ilwilliams@hotmail.co.uk) greenpark

 
 great forum lots of lovely people just what i need.hopefully this is just what im looking for, looks like i have a lot to read. 
   
 

shyam nandan (snkumar_ara@rediffmail.com) kosiar, ara,bihar

 
 जयंति जी का इंटरव्यू अच्छा लगा. हम लोगों के लिये काफी ज्ञानपरक है.  
   
 

mithilesh () delhi

 
 यादव जी, आखिर आपने साठे को पाठे रहना पुनः साबित किया. 
   
 

अनूप आकाश वर्मा (anoopakashverma@gmail.com) दिल्ली

 
 जो लोग राजेन्दर यादव जी के खुले विचारों से असहमत नज़र आते हैं,सहि मायनों मे मैं उन्हे कुंठित व्यक्ति मनता हुं....सह मनिये वो लोग राजेन्दर यादव जी से नहीं उनके युवा मन से ढरते हैं....... 
   
 

Vipin Tyagi (tyagi.phalauda40@gmail.com) Muzaffar Nagar

 
 यादव जी से साक्षात्कार अच्छा लगा, उनकी बेबाकी से रोमांच होता है पर सेक्स पर जो उन्होंने लिखा है वो गंदी सच्चाई है. बस क्यों लिखते हैं ये ऐसा क्या सिर्फ एक सनसनी पैदा करने के लिए या कुछ और? यो पोर्नोग्राफी नहीं है तो और क्या है?

सारा आकाश पढ़ कर जो श्रद्धा यादव जी के लिए पैदा होता है वो हासिल या चालीस साल पढ़ कर एक लिज़लिज़ी घृणा में बदल जाती है और लक्ष्मण रेखा में जो इन्होंने माता सीता पर आरोप लगाया है उससे तो इनकी गंदी मानसिकता का पता लगता है. हालांकि मैं फिर कहूंगा कि राजेंद्र यादव में वो प्रतिभा है कि इनकी कहानी एक बार पढ़ना शुरु कर के अंत तक देखना पसंद करता हूं, लेकिन इतनी बेबाकी किस काम की ?
 
   
 

PremRam Tripathi (prt9999@gmail.com) Bhopal

 
 यादव जी, आपकी बेबाकी अच्छी लगी लेकिन मेरी आपसे ये गुजारिश है कि कृपा करके ऐसे मंचों का प्रयोग अपनी इस बेबाकी के लिए न करें क्योंकि भारतीय संस्कृति के अनुसार यह यथायोग्य नहीं है. ऐसा नहीं है कि मैं यादव जी का विरोधी हूं, मैं तो उनका सम्मान करता हूं. मेरी आपसे केवल इतनी गुजारिश है कि अपनी उम्र के जिस पड़ाव पर आप हैं, उसमें भारतीय संस्कृति का ध्यान रखते हुए ही अपने विचार प्रकट करें. आज युवाओं का एक बड़ा वर्ग आपको अपना आदर्श मानता है. 
   
 

Sanjay Grover (samvadoffbeat@yahoo.co.in) Delhi

 
 बधाई जयंतीजी, क्या खूब साक्षात्कार है. मज़ा आया और अकेलेपन का एहसा थोड़ा कम हुआ, 
   
 

Abhijeet Sen (abhijeet4288@rediffmail.com) Raigarh

 
 Nice interview with clearly depicted his personality. 
   
 

SHAILESH KUMAR (SHAILESH.KUMAR100@YAHOO.COM) NEW DELHI

 
 
राजेंद्र यादव जी को मैंने बहुत कम पढ़ा है लेकिन जितना पढ़ा है उससे हम पूर्ण सहमत हैं. हम मतलब मेरे फ्रेंड्स क्लब. मैं उन लोगों को बताना चाहूंगा जो उनके विरोधी हैं कि कम से कम उनके पास अपना एक खुला विचार तो है तुम लोगों की तरह बाहर से कुछ और अंदर से इतने छोटे हो कि किसी दूसरे आदमी की सोच सहन ही नहीं कर पाते. दुनिया में कोई वस्तु अच्छी है ना कोई बुरी ये हमारी सोच पर निर्भर करता है. ऐसा तुम लोग सोचोगे तो खुद से ईर्ष्या होने लगेगी और दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा. "हर एक आदमी में है एक सो ही आदमी" इस बात को 100 प्रतिशत सही साबित करने की कोशिश मत करो. राजेंद्र जी को और समझना हो तो इस नंबर पर संपर्क करों. शैलेष कुमार, दिल्ली - 9718007493
 
   
 

samandar (samandartal@gmail.com) dehradun

 
 हिंदी के संगठित, जले भुने, चूतिया और कुंठित चीलों और कव्वों से घिरा एक मस्त मलंग, जो चाहे तो इन चील कव्वों से अपने आकाश को अलग कर सकता है. लेकिन वक्त निकल गया. फिर भी Mystic Writer Snowa Borno को जगह देकर हिंदी को हिला दिया. साहित्य के किलों में बैठे कथा के ठेकेदार जान गए कि अब सीधे लेखन देखा जाएगा, संगठित मक्कारियों के दिन लद गए. 
   
 

Shashi Bhushan Purohit (purohit1983@gmail.com) Manali

 
 जीवन के उत्तरार्ध में भी ज़िंदगी को इस नज़रिये से देखने का जज्बा बहुत कम लोगों में होता होगा. यादवजी चर्चित व्यक्तित्व हैं... लेकिन उनके बारे में इतना कुछ पहली बार जान पाया हूं. जयंती जी के बेबाक सवाल और ये प्रत्युत्तर जीवन के कई अनपढ़े पन्ने उघाड़ते हैं, कुछ वो बातें भी, जो ना जाने हम जैसों के लिए क्यों अव्यक्त रह जाती हैं. 
   
 

ajey, (ajeyklg@gmail.com) Keylong, La-haul, H.P.

 
 यादव जी का कुछ पढ़े 10 बरस हो गए. जब से हंस पढ़ना छोड़ा, यादव जी को नहीं पढ़ा. (सिवाय इस सूप पीने वाले बूढ़े सामिष भोजी “ठरकी” के उस पत्र के जो मनाली की Mystic Snowa Barno को उन्होंने बड़े मन से लिखा है...) इंटरव्यू बेबाक है.
बड़ा रस आया. पाखंड का न होना इस वाहियात चर्चा को उदत्त बनाए दे रहा है. कुंठाएं धो डालती हुई बातचीत के लिए धन्यवाद.
 
   
 

Damayanti Chaube ()

 
 Apne se young larkiyon se dosti apko young rakhti hai, yeh vichar hai purush lekhak ke, jo stree vimarsh kar rahe hain. 70 saal ki umra men 13 saal ki ladki se shadee karne wale bhi yahi sochte the. Yadavji unse alag nahin hain. Mahatwakankshee aur pratibha heen lekhikayen unse lapak jhapak karti hain. yehi stree vimarsh hai.
Mahadevi Verma ke bare main tippani ashobhaneeya hai
 
   
 

Rakesh Gupta () Indor

 
 Lachar fun with frustrated women is the correct expression for this interview, which I have read today. Many frustrated women submit to this kind of preassure from powerful editors. Ramanika Gupta also spoke about launching couch in this field. This is not a good sign for healthy literature.
Jayanti and Geetashree can become bahucharchit but not sammanit by letting themselves Lapak Jhapak and kissed by an old frustrated editor well known for his decadence.
 
   
 

prof. r.n.sharma tiss,mumbai

 
 its really pleasant to learn that the magazine "haans" is still in limelight.i read 'saara aakash' decades back.it stirred my tender mind a lot.it may be somewhere in my book collections.in mumbai,hardly colleagues know about 'saarika' or 'haans'. i wish to get a recent issue of the later magazine.the TOI-group long back stopped publishing some good magazines.in any case,now the 'body language'is more relevant...the rest is offered by the internet sites.prithvi theatre is now terrorised by the new entrants to the t.v. industry..so better do academics in the office and get occasional such treat to old memory. r.n.sharma,tiss,mumbai.  
   
 

हरि जोश्‍ी मेरठ

 
 आज जयंती के दिलो दिमाग से राजेन्‍द्र जी को जाना। इससे पहले कुछ दूसरे साहित्‍यकार मित्रों की जुबानी सुनता रहा हूं। आगरे का हूं, इसलिए जो जैसा बता देता हूं सुन लेता हूं। पढ़ लेता हूं। मेरा दुर्भाग्‍य है कि कभी राजेन्‍द्र जी को देखा सुना नहीं। पढ़ा है और मेरा मानना है कि किसी व्‍यक्ति को देखने सुनने से बेहतर पढ्ना होता है भले ही वह न लिखने का झूठ हो।
जयंती को धन्‍यवाद। राजेन्‍द्र जी की किताब के कुछ पन्‍ने खोलने के लिए और कुछ छिपाने के लिए। हो सकता है वह हमें अगली बार पढ़ने को मिलें।
 
   
 

agrawasi (agrabrij@gmail.com) agra

 
 lagta hai jayanti ji yadav ji ko hindi ka khushwant singh bana kar hi manengi.
log kahte hain ki hans mein kuch chapane ke liye yadav ji ko khush karna hota hai. pata nahin is baat mein kitna dum hai. phir bhi yeh man na hi padega ki yaav ji mein kuch to attraction hai jabhi to mahilaon ke mamle mein itne dhani hain
sex bikta hai, jayanti ji ne ek baar phir sabit kar diya. sex aur mahilaon ki baat nikal den to kya bachega is interview mein, kis baat ke liye hum yaad rakhenge yadav ji ko
 
   
 

Sunita Goswami ()

 
 Rajendra Yadav ji
Bloggers dwara Tareefen prayojit karke sahitya nahin racha jata. Otherwise you could have become a great writer, which you are not. You are using your power as an editor having some kind of LACHAR fun with frustrated women.
 
   
 

राकेश (rakeshjee@gmail.com)

 
 सुरेशजी शुक्रिया. चाहे मेरी बेटी हो या बहन, यदि वह अपना भला-बुरा सोचने के काबिल हो चुकी होंगी या हैं और जब तक अपने साथ होने वाली सलुकियां उन्हें नहीं खलती-मुझे कोई दिक़्क़त न हुई है और न होगी. हम ही क्यों सब कुछ तय कर लेना चाहते हैं.
मुझे नहीं मालूम कि मन्नु के अलावा जिन औरतों के साथ राजेंद्रजी के संबंध रहे हैं, वो जबरदस्ती के ही रहे हैं या उनकी भी उसमें भूमिका रही है. सुरेशजी राजेन्द्र यादव केवल साहित्य ही रचते हैं, किसी राज्य के पुलिस महानिरीक्षक नहीं हैं. जब पुलिस के आला हाकिमों से कोई औरत नहीं डरती तो राजेन्द्रजी से डर जाएगी, तर्कसंगत नहीं लगता. और अगर ऐसा ही रहता तो कब के राजेंद्रजी और हंस की पैंकिंग हो गयी होती.

जहां तक चाटुकारिता की बात है तो बस बताना भर चाहूंगा बंधु कि अपने को छपास का रोग अभी तक तो नहीं लगा है. छिटपुट कविता, कहानी, संस्‍मरण लिखता रहा हूं; मित्रों के बीच बांटता रहा हूं या मित्रों को चाटता रहा हूं, पर आज तक हंस क्या, किसी टूटपूंजिया मैग्जिन के पास भी नहीं गया लेकर. अखबारों में लेख छपते रहे हैं पर किसी से इसके लिए मिन्नत नहीं की कभी. मर्जी हो मेरा लिखा कुछ पढ़ने का तो http://haftawar.blogspot.com पर आ जाइए कभी घुमते-फिरते.
एक बार फिर से जयंतीजी को मुबारकबाद कि इतना बढिया साक्षात्कार लिया राजेन्द्र यादव का. मेरा ये प्रस्ताव है कि शुरुआती 5-6 सवाल हर साठ पार के साहित्कार से पूछा जाए. पता चल जाएगा कि कौन कितने पानी में है.
 
   
 

राजेंद्र तिवारी (rajendra@tewarimail.com) पोंटा साहिब ( हिमाचल प्रदेश )

 
 धन्यवाद जयंती जी आप ने राजेंद्र जी के व्यक्तित्व और विचारों से लोंगों कों रूबरू कराया - जो साहित्यिक लोग राजेंद्र जी कों भली भांति जानते हैं उनके लिए शायद ये बात कोई मायने ना रखे लेकिन आम पाठक जो हंस से जुडा है और उनके साहित्यिक सोच कों जानता है इससे जरूर प्रभावित होगा - प्रतिक्रिया व्यक्त करने वालों की अपनी सोच होती है जरूरी नहीं है की राजेंद्र या जयंती जी से सहमत हो - जहाँ तक राजेंद्र जी के वैचारिक खूलेपन का सवाल है वोह उनके जीवन का एक पहलू है - राजेंद्र जी के साहित्यिक जीवन कों इतने संकीर्ण विचार से ना देखा जाये - उनके प्रबल वैचारिक विरोधी वही लोग हैं जो उनके जीवन कों अच्छी तरह से जानते हैं -राजेंद्र जी जैसे लोग कहाँ बार बार जन्म लेते हैं - राजेंद्र तिवारी  
   
 

Ptritam Dongre Patna

 
 Bahoot acchi baatchit. Rajendra yadav ko jaan kar accha laga. 
   
 

Ranak Jain Patna

 
 10 out of 10 for exposing Yadav vansh ke krishna kanhaiya ko  
   
 

vaijayanti () balgalore

 
 Jayanti has been writing novels about promescuous people involved in sex without love. Now she in interviewing real man, involved in semi sexual activity like lapak jhapakwith four women, without love. Both are made for each other. Good for them. 
   
 

Ramlal Tyagi () Meerut

 
 Dear Manoj, tell us what has this interview given to Hindi literature. Discussion about sex life of an editor is literature and striyon ke liye yeh vyaktigat mamla hai. Good Vimarsh .
For Rakesh Yadav ji may be Adarsh and Imandar shakhs but for us he is a self possessed editor, whose days are over
 
   
 

Suresh Sharma () Kanpur

 
 Talk about sex always attracts attention. There fore their are many reactions.Rakesh wishes Rajendra Yadav thousand years of life and says he has cheated his wife and harmed no one else. We wish to know what the society and literature is gaining by knowing how many women has he slept with and how he enjoys Lapak Jhapak Chhuna Chhana kiss karna to four women at the same time. Is this bebaki, and Imandari. Manyata ki dhajji urana does not mean taking advantage of your position as Hasband and cheat your wife and taking advantage of your posion as editor and kiss prospective women writers.
Mr Rakesh ,think before you write. Kissed one could be your daughter.
 
   
 

Shalmali Bose () Lucknow

 
 Yadav has a group of admirers whom he obliges as an editor. Ther exploit and cheat their wives, and drool over other women in the name of vimarsh.
When men are not father brother sons or husbands and women are not mothers sisters daughters and wives they are ony NAR and MADA who can only reproduce and are not capable of any relationship.
There will be no need for VIMARSH on NAR and MADA. Yadavji is reducing men and women to that.
 
   
 

govardhan Gabbi () A Punjabi writer from MOhali(Chandigarh)

 
 I am a regular reader of hansjust for reading the editorial of yaadav jee and there after i read the counter effect of readers in the next issue...i always admired to read yadav jee and today after reading his interview his image has gron a lot in my mind...a cristal clear views on each question...I wish her a lot of love from young ladies...with who he can have good intellcutual understanding and intimacy too... 
   
 

सुनील (bsunil1@gmail.com) दिल्ली

 
 राजेंद्र यादवजी की बेबाकी और विचार अच्छे लगे.. इस बेबाक बातचीत का दूसरा सिरा जयंतीजी ने जिस तरह संभाला वो भी काबिले तारीफ है. 
   
 

मनोज () मुरैना

 
 धन्यवाद जयंती जी. राजेंद्र यादव के जीवन को इस इंटरव्यू के माध्यम से आपने खुली किताब बना दिया. यादव जी की बेबाकी वाकई काबिल-ए-तारीफ है. रही बात स्त्रियों की, तो यह उनका नितांत व्यक्तिगत मामला है. हमें तो यह देखना चाहिए कि उन्होंने हिंदी साहित्य को दिया क्या? 
   
 

राकेश (rakeshjee@gmail.com)

 
 इस साक्षात्कार के एक-एक तथ्‍य से आदर्श इंसान राजेन्द्र यादव की इमानदारी झलकती है. किसी भी शख़्स को इतना ही इमानदार होना चाहिए. राजेन्द्र यादव ने तथाकथित सामाजिक मान्यताओं की धज्जियां उड़ाते हुए जिंदगी जी है, कोई कह सकता है कि उनकी वजह से किसी का किसी भी तरह का नुक्शान हुआ है. जीवन में हर वैसी चीज/काम/विचार/व्यवहार की आजादी होनी चाहिए जिससे किसी की किसी भी तरह की आजादी का हनन न होता हो. प्रतिक्रिया देने वालों से में से कोई इस तथ्‍य को उजागर कर सकता है कि उन्होंने किसी की आजादी का हरण किया हो. हां, एक अपवाद जिसकी चर्चा राजेन्द्र यादव खुद कर चुके हैं-एक पत्नी का आदर्श पति न बन पाना. यहां तो तमाम प्रतिक्रिया लेखक अगर खुद के अंदर झांक कर देखें तो कई-कई चोर नज़र आएंगे. और ऐसा नहीं है कि चोर दिखता नहीं है, पर सवाल है चोर तो वो बिल्ली है जिसके गले में घंटी कोई एक ही बांध पाता है. और वो है राजेंद्र यादव. ऐसे राजेंद्र यादव के लिए हज़ार वर्ष की उम्र भी कम होगी. 
   
 

manorama Vyas () Lucknow

 
 Yashodhara Das is right, Yadav is misusing his editorial power and middle aged women are exploiting his weekness for sex talk. Notice TALK ONLY.
Mr. Pankaj Tripathi , people are reactink not because they are interested. If you pass by the road fully clad no body reacts, but when you try to roam around necked people scold and adice you to dressup. Irrisponsible sex talk does not look nice from the mouth of an 80 years old holding power position. It is really a pity.
 
   
 

पंकज (pkvbihar@yahoo.com) कोलकाता

 
 यह सच है कि हर व्यक्ति काम-सुख चाहता है पर जैसा कि किसी ने ठीक ही कहा कोई संस्कृति या सभ्यता हजारों वर्षों के बाद अस्तित्व में आती है और किसी व्यक्ति को उसे नष्ट करना नहीं चाहिए. भारतीय संस्कृति स्थापित और गौरवशाली संस्कृति है. कोई भी कुलीन व्यक्ति ऐसे विषय पर अमर्यादित ढंग से नंगी चर्चा नहीं करना चाहेगा. खुशवंत सिंह और राजेन्द्र यादव जैसे लेखकों का अपना पाठकवर्ग है और उनरा स्तर क्या है, हमें पता है.  
   
 

Yashodhara Das () Kolkata

 
 It is a pity that some people deriving pleasure in this pornographic talk. Neither in America nor in India or middle east, making love in public is considered decent. Do not get angry. Indecent people have also right to live. it is a pity that they feel good even in criticism as they are at least talked about. Yadav is not a great writer. He is powerful because of his editorship. This is pure misuse of power.
He needs to be ignored.
 
   
 

संजना सिंह नई दिल्ली

 
 रणवीर सिंह जी, आप लगता है राजेंद्र यादव जी की अश्लीलता में ही सुख तलाश रहे हैं. आपको समाज कभी माफ नहीं करेगा. हिंदूस्तानी समाज और संस्कृति में इस तरह की अश्लीलता की कोई जगह नहीं है. जो लोग भारतीय सभ्यता को नष्ट करने पर तुले हुए हैं, उन्हें अमरीका में बस जाना चाहिए. ऐसे लोगों को भारत में रहने का कोई हक नहीं है. 
   
 

Ranveer Singh Chahal (ranveer.chahal@gmail.com) Prague

 
 मुझे राजेंद्र यादव के साक्षात्कार के साथ साथ प्रतिक्रियाएं भी दिलचस्प लग रही हैं. हिंदी का ढोंगी, पाखंडी समाज कमरे में बंद होकर तो सबकुछ कर गुजरना चाहता है यहां तक कि वह राजेंद्र यादव के लपक-झपक से भी कहीं आगे है. लेकिन उसे यह गवारा नहीं कि अपने समय का एक बड़ा लेखक इस सच को स्वीकार करे. आपमें दम नहीं है, कलेजा नहीं है और सच को कहने का साहस नहीं है तो कोई जबरदस्ती नहीं है लेकिन राजेंद्र यादव अगर कुछ कह रहे हैं तो मंदोदरी विलाप मत कीजिए. राजेंद्र यादव के बारे में झूठी सच्ची धारणा बना कर चटखारे लेने से तो अच्छा है कि सच को सब्र के साथ सुना जाए. 
   
 

Madhuri Rastogi () Lucknow

 
 I feel interviewer has deleberately asked questions of sexual nature from a person who is obsessed with sex talk. As a women and as a journalist she has doe disservice to her lot. This is not funny. This is not literature. Priti is right. People should condemn and then ignore this crap. 
   
 

Pankaj Tripathi () Almorah

 
 राजेंद्र यादव जो कुछ कहा है, उस पर कई हिप्पोक्रेट लोगों के पेट में दर्द हो रहा है. सेक्स के नाम से चिढ़ने वाले इन ठेकेदारों को इस बात से क्यों आपत्ति हो रही है कि राजेंद्र यादव खुल कर बोल रहे हैं. मैं रविवार में ही सच्चिदानंद सिन्हा और प्रीतीश नंदी के इंटरव्यू और लेख देख रहा था. शर्म आती है कि इन दोनों लोगों की रचना पर एक भई प्रतिक्रिया नहीं है. चटखारे लेकर गाली बकने वाले समाज के ठेकेदार, कभी सच्चिदानंद या प्रीतीश बाबू की भी टिप्पणी पढ़ें.उन पर भी एफनी राय दें. 
   
 

पंकज (pkvbihar@yahoo.com) कोलकाता

 
 शाबाश, प्रीति। 
   
 

Frank Huzur (frankhuzur@gmail.com) New Delhi-London

 
 Rajendraspeak! Amazing level of sincerity and self-deprecation in Mr Yadav's comments! Like a true wordsmith, he has been successful in cultivation of ability to laugh at himself. Let's be fair in our collective confession. Sex in Indians' life is a dangerous, flashpoint territory, we just don't want to spill the beans over our secret gardens. Hypocrisy colours our reality bites. Here Mr Rajendra Yadav steals a march over others! Moder Indian language literature is richer by his unabashed, free and clear perceptions of man-woman mystical conundrum. If he was not a one-woman man, he has had the audacity of hope and reason to admit that. How many of us do it?
Kudos to him and all power to his pen!
Frank Huzur
 
   
 

rajendra yadav (info@hansmonthly.com) delhi

 
  I have gone through the reactions and enjoed.some of them are stupid and other are intelligent.i am happy to see that people r still in literature.read and respond.  
   
 

पंकज (pkvbihar@yahoo.com) कोलकाता

 
 संदीप पांडेय जी के विचार से मैं पूरी तरह सहमत हूँ। 
   
 

Preeti () Varanasi

 
 The man who wrote a novel 40 years back is celebrated for his adulterous and letcherous behaviour is most disgusting. This can not be pardoned. Hindi literature will be ashamed of this muck.
Why dont writers standup and say this.
They are too gready for publishing their writings in Hans.
Shame on them, Shame on Jayanti and shame on shameless Yadav who wants to become M F Husain without his talent
 
   
 

virendra jain bhopal

 
 Since long I am fan of editor Rajendra yadav and as a journalist I learned a lot from his logics. I love his "love of freedom" and feel some time jealous with him. Those who hate him have a right to do so and I love their freedom too.But these people should tell every thing as crystal clear as rajendraji do.If he can make everybody nearer to him as he likes with other women it should be welcome because morality differs from place to place and age to age. 
   
 

shambhavee () kanpur

 
 only sexual frustrations can not be considerd literature. Interviewer and interviewee both are doing harm to Hindi and trying to remain in news for wrong reasosons. Deplorable. An old man criticizind his divorced wife is most disgusting and inhuman. 
   
 

shyamli bhopal

 
 rajendra yadav se ek prashna aur jo jayanti ko ant main puchna chahiye tha, "kahin rajendra yadav ka yah interview rakhi sawant aur m.f. hussain ki tarah publicity stunt to nahi?"
rajendra ji yah mat bhuliye rakhi sawant jaisi hai waisa hi bolti hai, hussian ke pass painting hai, par aapne to pichle 30 saal se kahani aur upanyas ke naam par ek bade shunya ke alawa kuch nahi likha hai.
 
   
 

sumit (longing4freedom@hotmail.com) indore

 
 jab hum bhartiya sahitya ka zikra karte hain to premchand, nirala ya tagore ki chavi hamare samne aa jaati hai. rajendra yadav ka yah sakhatkar vartaman sahitya main chupe andhkar ko aur adhik gahara kar raha hai. rachanakar rajendra yadav jo hans ke sampadak bhi hain jinhe yuva sahityakar bhi dekh raha hai vve itne khali ho chuke hain ki unke pas srijan ke naam par keval stree deh hi rah gayi hai. 
   
 

Padma Kaushik (garima.bhatia@gmail.com) Hyderabad

 
 Lekhak Mahodaya , Aur bhi gham hain zamaane me auraton ke siwa !! 
   
 

www.ashishanshu.blogspot.com (ashishkumaranshu@gmail.com) DELHI

 
 Is lekh ko padhane ke baad Mujhe lagata hai ek aur Rajendra Yadav kaa janm ho chuka hai. jisakee umra yahee koi 21-22 Saal hogi... 
   
 

निर्मल (sahuanp@gmail.com) रायपुर

 
 बहुत अच्छा लगा, बहुत दिनों बाद किसी साहित्यकार के बारे में पढ़ा. शहरोज को अफसोस नहीं करना चाहिए कि राजेंद्र यादव ने उनसे बात क्यों नहीं की. शहरोज को चाहिए कि अब वो मन्नू भंडारी से साक्षात्कार कर लें. 
   
 

Sulabha Kore () sulabhakore@unionbankofindia.com

 
 Bebak interview,Khuli batei,khuli soch aur use utanihi babak aur khule tarike se likha gaya hai.Vyaktigat tarike se yadi ese liya jay to ek naya najariya samane aata hai jo umra ke lihaj se bhi kahi aage nikal chuka hai.Kalakar ki umra nahi hoti aur kalakar jamane se aage ki dekhata hai,sochata hai phir bhi kalakar esi samaj ka hissa hai aur es samaj me sabhi tarah ke log rahate hai.Kya sabhi intimate auraton ka jikra karana jaruri tha?Kul milakar nice interview. 
   
 

sandeep Pandey New delhi

 
 राजेंद्र यादव ब्लैक एंड व्हाइट के जमाने में पैदा हुए लेकिन रंगीन नजर लेकर. अफसोस इस बात को लेकर होता है कि इस कथित जनवादी और प्रगतिशील कथाकार के पूरे इंटरव्यू में जीवन के संघर्ष कहीं नहीं है. समाज की चिंता कहीं शामिल नहीं है. समाज को लेकर व्यक्तिगत जीवन में कोई अफसोस नहीं है. भूख, गरीबी, आम जन की परेशानी इनके व्यक्तिगत जीवन को निरपेक्ष रखते हैं. सार्वजनिक जीवन में तो आटा-दाल की बात और व्यक्तिगत जीवन में चीनी की बोरी में सर घुसा कर रखने वाले राजेंद्र जी, आप केवल दया के पात्र लगते हैं. 80 साल के एक बूढ़े पर दया के सिवा किया क्या जा सकता है.
 
   
 

Subhash ghosh Kolkata

 
 आपने हंस को पहले ही बगुला बना दिया अब कम से कम रवि्वार जैसे मंच का तो ख्याल किया होता. बहुत खुले हुए हैं आप, यह देख कर अच्छा लगता है लेकिन इतना भी मत खुलिए राजेंद्र यादव जी की आपकी सारी कुंठाएं बलबला कर बाहर आ जाएं.आत्मस्वीकृतियों के सहारे आप अगर सोच रहे होंगे कि आपके इस खुलेपन को लोग बहादुरी की श्रेणी में रखेंगे तो यह आपका भ्रम है.
 
   
 

swatantra mishra () delhi

 
 bahut hi khoobsoorat interview hai.maaja aa gaaya. rajendra ji abhi bhi yuva hain.unke tauhghts abhi bhi fresh hain. 
   
 

शहरोज़ (shahroz.syed@gmail.com) दिल्ली

 
 राजेन्द्र जी से बात-चीत आखिर रविवार में आ गयी.
वर्ष-भर पहले ये ज़िम्मेदारी भाई पुतुल ने मेरे जिम्मे की थी लेकिन तीन घंटे के धरने के बाद भी राजेन्द्र जी बात करने को तैयार नहीं हुए थे.ऐसा नहीं कि तीन घंटे वे ख़ामोश रहे हों.हमने बहुत बात-चीत की .उस शाम अक्षर में संजीवजी,मैत्रीय जी,वीरेंद्र यादव आदि भी गपिया रहे थे.
साक्षात्कार के लिए वे राज़ी नहीं हुए.
उनका स्त्रियों के प्रति अतिरिक्त लगाव ही ये संवाद स्पष्ट करता है कि जयंती से उन्हों ने बात कर ली.मुझे उनकी किसी बात पर एतराज़ नहीं है.कुछ लोग खुल कर कहते हैं.तो कुछ लोग घर में काम करने वाली को भी दबोचने से परहेज़ नहीं करते और ऐसे लोगों की ही स्त्रियों से मित्रता नहीं हो पाती .और ये कुंठित लोग कुढ़ते रहते हैं.मेरे मित्र भी मुझ से इर्ष्या इसीलिए रखते हैं .मुझे भी कहने से संकोच नहीं कि स्त्रियों से बात करना मुझे अच्छा लगता है और उनसे मुझे ऊर्जा मिलती है.
राजेंद्रजी खुलकर बोले.जयंती का भी कमाल नहीं कि उनहोंने बेबाक बात-चीत की है.
 
   
 

Rakesh Srivastava (srivastava_rakesh@rediffmail.com) Lucknow

 
 Nice Interview. Can you permited me to our News paper THE SUNDAY POST Weekly news paper? 
   

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