राजेंद्र यादवः चीनी कम, जिंदगी ज्यादा
संवाद
चीनी कम, ज़िंदगी
ज़्यादा
राजेंद्र यादव से
जयंती रंगनाथन की बातचीत
पहली बार कब पढ़ा था राजेंद्र यादव को.. ..? लगभग तीस साल पहले. उस समय की दूसरी
किशोरियों की तरह साहित्य पढ़ने की शुरुआत में ही दो महत्वपूर्ण उपन्यास से रूबरू
हुई धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ और राजेंद्र यादव का ‘सारा आकाश’.
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मैंने हमेशा
स्पष्ट कहा है कि स्त्री विमर्श पर बात करनी है तो मां, बेटी
और बहन इन तीन संबंधों पर बात नहीं करूंगा. |
‘गुनाहों का देवता’ ने मुझे उतना प्रभावित नहीं किया, जितना ‘सारा आकाश’ ने किया
था. सुधा और चंदर खास कर सुधा का चरित्र जरूरत से ज्यादा कमजोर लगा. बीच में चंदर
और नर्स का प्रसंग भी मुझे अरुचिकर लगा. लेकिन ‘सारा आकाश’ की नायिका के संघर्ष से
मैं अपने को जोड़ पाई. भाषा, शैली, सब कुछ सहज और सरल.
इसके कुछ सालों बाद जब धर्मयुग से जुड़ी, तो सारा आकाश और राजेंद्र यादव के जिक्र पर
एक सीनियर कलीग ने टिप्पणी की, “ उपन्यास अच्छा लगा, तो वहीं तक रखो. कभी लेखक से
मिलने की इच्छा मत करना. यादव जी भारती जी नहीं हैं.”
भारती जी मेरे बॉस थे, संपादक थे. हालांकि जिस समय मैं धर्मयुग से जुड़ी (1985
में), वे दूसरों के हिसाब से काफी बदल चुके थे. हंसते भी थे और अपने स्टाफ को
ब्रीदिंग स्पेस भी देते थे. लेकिन कभी मुझे उनके साथ यह नहीं लगा कि मैं सहज हो कर
गपियाऊं या उनसे चर्चा करूं. दूरियां थीं, काफी थीं. (मैं कुछ ज्यादा अपरिपक्व थी
और वे उम्र और पद के हिसाब से ज्यादा परिपक्व).
सालों बाद मुंबई से दिल्ली आना और बसना हुआ. राजेंद्र यादव के जिक्र पर कई लोगों से
सुनने को मिला, “रसिया आदमी हैं. अगर आप अपने को बचा सकें, तो जरूर जाइए और मिलिए.”
हंस की गोष्ठियों में दूर से उन्हें देखा, हमेशा युवा स्त्रियों से घिरे,
हंसते-ठहाके लगाते हुए यादव जी. कभी हिम्मत नहीं हुई पास जाने की, बात करने की.
इस बीच उनसे बिना मिले ही हंस में दो कहानियां छपीं. उसी दौरान धीरेंद्र अस्थाना और
उनकी पत्नी ललिता भाभी के साथ पहली बार राजेंद्र यादव से मिलना हुआ. धीरेंद्र जी ने
परिचय कराया, तो राजेंद्र जी ने सहजता से कहा, “तो तुम हो जयंती! ”
उस दिन एक दीवार टूट गई. मेरे सामने जो था वो एक पारदर्शी व्यक्ति था. सहज और सरल.
मेरी कल्पना से परे. लगा कि एक्ट कर रहे हैं. लेकिन सबके साथ वे ऐसे ही थे.
फिर भी एक संकोच था. जो टूटा कुछ सालों बाद, जब मैं गीताश्री, अमृता, कमलेश और
असीमा के साथ उनसे मिलने लगी, अकसर उनके घर पर हम सब धमाल मचाने पहुंचने लगे.
राजेंद्र जी खुश होते थे, हंसते थे, तमाम विषयों पर खुल कर जिक्र करते थे. हमें वे
कहते गुंडियां- बड़ी गुंडी, मंझली गुंडी और छोटी गुंडी. अपनी असुरक्षाओं का जिक्र
करते, जिंदगी में अकेलेपन को लेकर अपना पक्ष बताते. लेकिन अधिकतर वे खुश रहते,
ठहाके लगाते.
इन सबके बीच वो राजेंद्र यादव कहां है, जिनके बारे में सालों पहले मुझे सावधान किया
गया था? ये तो एक ऐसा शख्स था, जिसके सामने हम अपनी तरह से रह सकते थे, वो कह सकते
थे जो ना जाने कब से हमारे अंदर था और बाहर निकल नहीं पा रहा था.
क्या हम स्त्रियां ऐसे पुरुष को नहीं जानना चाहतीं, जो उनका चेहरा पढ़ ले, जिनके
सामने वे अपना स्त्री होना भूल जाए और सिर्फ यह याद रखे कि वो एक जीती-जागती मनुष्य
भी है आकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब.
हमारे गैंग के कुछ सदस्यों को राजेंद्र यादव के नॉनवेज जोक्स पर एतराज है. लेकिन
एंजाय सभी करते हैं. एसएमएस सभी शेअर करते हैं. हर साल राजेंद्र यादव के जन्मदिन की
पार्टी में कई दिलचस्प किरदारों से मुलाकातें, बहस, शेअरिंग, गैंग में शामिल होते
नए सदस्य-कड़ी से कड़ी जुड़ रही है.
मैं हर बार जान रही हूं राजेंद्र यादव के व्यक्तित्व के नए पहलुओं को. वाकई यह
व्यक्ति औरों से अलग है. अपने ऊपर उम्र को हावी होने नहीं देता. कभी यह अहसास नहीं
होने देता कि वह ‘ द राजेंद्र यादव’ है. हां, इसका नुकसान भी है. जब कोई नया
व्यक्ति उनसे मिलता है और उनके आसपास एक खास किस्म के ‘ऑरा’ की अपेक्षा करता है, तो
उसे निराश होना पड़ता है.
उनसे कई बार कई विषयों पर बात हुई. गंभीर और अगंभीर बातें. फिजूल की बहसें भी हुईं.
उनकी टिप्पणियां हर बार आपको अच्छी लगें, यह भी जरूरी नहीं. लेकिन मित्रवत बातचीत
के अलावा एक औपचारिक इंटरव्यू लेने की बात जब आई, तो तय हुआ कि हम साहित्य से इतर
ही बात करेंगे. ऐसे राजेंद्र यादव के बारे में बात करेंगे, जो अभी भी कुछ स्त्रियों
को ‘डराता’ है, एक बौध्दिक वर्ग को ‘छिछोरा’ लगता है और हंस के पाठकों और एक बड़े
प्रशंसक वर्ग को ‘अभिभूत’ करता है.
•
आप कितने अ-साहित्यक व्यक्ति हैं?
जब मैं पढ़ता या लिखता हूं तो पूरी तरह एक साहित्यिक आदमी होता
हूं, लेकिन इसके बाद मैं कोशिश करता हूं कि एक आम आदमी की तरह हंसू, बर्ताव करूं.
आइ वांट टू बी लाइक ए कॉमन मैन. इसके लिए मुझे किसी तरह की कोशिश नहीं करनी पड़ती.
मुझे यह नेचुरल लगता है. शाम को घर लौटने के बाद या तो दोस्तों से मिलना-जुलना होता
है, अकेला होता हूं तो कोई फिल्म देख लेता हूं.
•
आपका मन नहीं होता कि अलग क्षेत्र के लोगों से मिले-जुलें?
मिलना चाहता हूं.. . दिक्कत क्या है कि
हमारे सर्किल में ऐसे लोग नहीं हैं, सारे पढ़ने-लिखने वाले हैं. कभी-कभी इच्छा होती
है कि ऐसे लोगों से मिला जाए जिनका साहित्य से कोई लेना देना नहीं है.
•
अगर सफर में ऐसे व्यक्ति का साथ मिल जाए, जो आपको नहीं
जानता, तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
मैं अपनी तरफ से कभी नहीं बताता. अगर पूछे
तो सिर्फ इतना बताता हूं कि लिखने-पढ़ने का काम करता हूं. ज्यादा पूछे तो कहता हूं
कि मैगजीन निकालता हूं. मैं उनके और अपने बीच डिस्टंस पैदा नहीं करना चाहता.
मुझे यह भी अच्छा नहीं लगता कि कोई मेरे पैर छुए या मुझसे दूरी बना कर चले. हमेशा
से यही लगता रहा कि मैं लोगों के करीब रहूं. पैर छुआना, ओरा बना कर चलना--यह सब
ड्रामा लगता है. अच्छा लगता है जहां बेतकल्लुफ-सी बातचीत हो, दुराव-छिपाव ना हो,
खुल कर हो, गंदी बातें भी कर सकें और अच्छी बातें भी.
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•
एक आम आदमी का जीवन कितना मिस करते हैं आप? उम्र के इस
मोड़ पर पहुंच कर आप एक एक्टिव जिंदगी जी रहे हैं, कभी लगता है कि कहीं प्रोफेसर होते
या कोई और काम किया होता?
कभी नहीं..
•
लेकिन यादव जी पैसा तो नहीं है ना इस फील्ड में .. ..
हां, लेकिन ना मुझे इसका अफसोस है ना कभी इच्छा रही. मेरी
इच्छाएं, खासकर अपने लिए बहुत कम हैं, शुरू से.
•
हाल ही में गीताश्री की पुस्तक के विमोचन समारोह में आप पर खूब फब्तियां कसी गईं,
आपने दो लाइन क्या लिखा करीना कपूर के बारे में कंट्रोवर्सी बन गई.. कहा गया कि
बुढ़ापे में जवां लड़कियों का ‘ शौक ’ हो जाता है, मनीषा ने भी यह बात कही और
मैत्रेयी ने भी.
अच्छा यह बताओ, क्या मुझे एक सुंदर लड़की देख कर एप्रीशिएट
कहने का हक नहीं? इस तरह के विवादों का मुझ पर कोई असर नहीं पड़ता. मैं समझता हूं कि
जो कह रहा है, वो बेवकूफ है. अगर इनमें से किसी को मैं इस निगाह से देखता तो शायद
उनको खुशी होती.
•
अब तो आपकी हर बात कंट्रोवर्सी बन जाती है. पहली कंट्रोवर्सी कौन सी बनी?
ठीक से याद नहीं. पर मेरे उपन्यास ‘सारा आकाश’ में एक शिरीष
नाम का किरदार था, जो धर्म-कर्म किसी पर यकीं नहीं करता था, इसको ले कर विवाद छिड़ा.
बाद में होता ही रहा.
उस समय मुझे लगा कि जो मैं कह रहा हूं, सही है और मन से कह रहा हूं और इसे ऐसा ही
होना चाहिए. मुझे याद है, बहुत पहले पैंसठ-सत्तर की बात है, मैंने एक लीड लिखा कुछ
शास्त्रीय निषेधों के बारे में-प्राध्यापकों के खिलाफ, जो जड़ होते हैं, जो अपनी
दुनिया से बाहर निकलना नहीं चाहते और यह समझते हैं कि साहित्य सिर्फ उतना ही है
जितना हम जानते हैं, आधुनिक साहित्य को आने ही नहीं देंगे. मैंने एक लंबा लेख लिखा
था, डॉ नरेंद्र और उन जैसे लोगों के खिलाफ बाकायदा खुल कर लिखा था. उसे ले कर बहुत
कंट्रोवर्सी हुई. उस समय वह अजंता में छपा था.
•
आपकी कितनी उम्र रही होगी उस समय
?
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जिसे मैंने प्यार किया था वो घर में सबसे
छोटी थी. मुझे हमेशा लगता था कि इसे मैं प्यार तो बहुत करता हूं, मैं
जहां कहूं और अच्छी जगहों पर हम मिलें, हम मिलते भी थे, पर शादी के लिहाज से उसकी
पर्सनालिटी बहुत स्ट्राँग थी. |
मैं तीस के ऊपर का था. शुरू से ही मैं जो एस्टाब्लिश- स्थापित
और स्वीकृत है, उनको विकर्षक्रित करना चाहता हूं. मुझे लगता है कि चीजों को जैसे का
तैसा स्वीकार करना गलत है.
•
स्त्री को जान पाने की पहल सबसे पहले कब हुई?
बड़ा मुश्किल है कहना. जाइंट परिवार था. 18 बहनें थीं, कुछ बड़ी
कुछ छोटी. किसी के प्रति ज्यादा अटैचमैंट था. कहना चाहिए कि इमोशनल टाइज वहीं से
शुरू हुए. धीरे-धीरे लगा कि हम जिस स्त्री को जानना चाहते हैं वह कम से कम मेरी बहन
नहीं है, बेटी नहीं है, मां नहीं है.
बेटी, मां,बहन आपका चॉइस नहीं, आपको दे दी गई हैं. हमारी चाइस वो स्त्री है जिसे
हमने चुना, हम उस स्त्री की बात कर रहे हैं. मां, बहन, बेटी के बारे में बात करनी
भी नहीं चाहिए. ये महिलाएं किसी और के लिए औरत होंगी, हमारे लिए नहीं हैं.
मैंने हमेशा स्पष्ट कहा है कि स्त्री विमर्श पर बात करनी है तो मां, बेटी और बहन इन
तीन संबंधों पर बात नहीं करूंगा. घर के अंदर भी स्त्री को जितनी आजादी चाहिए,
बहन-बेटी को जो फ्रीडम चाहिए, एजुकेशन चाहिए, मैंने दी है. बेटी को जिंदगी में एक
बार थप्पड़ मारा, आज तक उसका अफसोस है. बाद में जिंदगी के सारे निर्णय उसने खुद ही
लिए. यह फ्रीडम तो देनी ही पड़ेगी.
•
‘ अपनी दुनिया की स्त्री’ से आपका साबका कब हुआ?
मेरे फादर डॉक्टर थे. छोटे कस्बों में उनका ट्रांसफर होता था.
जहां कंपाउंडर, नौकर, कुक, चौकीदार और उनका परिवार होता था. कंपाउंडर की बेटियों से
हमारी दोस्ती थी. उनसे छेड़छाड़ चलता रहता था. स्त्री को वहीं से जानना शुरू किया,
उनके शरीर को भी. समझते थे कि हम प्यार कर रहे हैं. वह लस्ट था, आकर्षण था. उस समय
बहुत आगे जाने के बारे में मालूम नहीं था.
सच में जिसके साथ अटैचमेंट हुआ वो उन्नीस-बीस साल में हुआ, जो
आज तक चला आ रहा है.
सेक्स बहुत बाद में आया. शुरू में यह मानना भी मुश्किल था कि वी लव इच अदर. हमारे
बीच प्लेटोनिक लव था. चिट्टियां लिख रहे हैं. दक्षिण भारत गए घूमने, रामविलास
शर्मा, मैं अमृतलाल नागर वगैरह, वहां से चिट्ठियां लिख रहे है कि तुम भी होती तो
कितना अच्छा था, वगैरह वगैरह. तब तक हमने आपस में आइ लव यू नहीं कहा था. यह बात हम
लोगों ने पांच साल बाद मानी.
जब शादी की बात आई, तो वह कलकत्ते आई, बाकायदा मेरे पास तीन-चार दिन रही. शादी की
बात पर उसने कहा- मैं प्यार कर सकती हूं, शादी की योजना मेरे दिमाग में नहीं है.
•
उस लिबरेटेड वूमन को आप पचा पाए? सम्मान के साथ उसे जाने दिया कि मन में खलिश रह
गई?
जिसे मैंने प्यार किया था वो घर में सबसे छोटी थी. उसकी
जिम्मेदारियां थीं. फादर उसके बीमार रहते थे या संत हो गए थे. जैन लोग थे. सारे घर
का इंतजाम, भाइयों के बच्चों को पढ़ाने-लिखाने का काम वही करती थी. बाद में
फॉरच्युनेटली या अनफॉरच्युनेटली उसने डबल एम ए किया, पीएचडी किया और प्रोफेसर हो
गई. अधिकार की जो चेतना शुरू में थी, वो बाद में बाकायदा एक ऑफिसर की या प्रिंसेस
जैसी हो गई.
मुझे हमेशा लगता था कि इसे मैं प्यार तो बहुत करता हूं, मैं
जहां कहूं और अच्छी जगहों पर हम मिलें, हम मिलते भी थे, पर शादी के लिहाज से उसकी
पर्सनालिटी बहुत स्ट्राँग थी.
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•
क्या आप उसके साथ एक नार्मल जिंदगी जी पाते?
आज उसे शिकायत है कि तुमने मुझे एक बच्चा भी नहीं दिया.
•
उसकी शिकायत को जेनुइन मानते हैं आप?
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मुझे अपनी इंडीपेंडेंस के लिए दो रास्तों
में एक को चुनना था. या तो विवाह को चुनना था या अपनी आजादी को. |
नहीं, वह गजब की इगोइस्ट थी. जब पहली बार सेक्स संबंध बने, हम
दोनों 10-12 दिन पहाड़ पर रहे थे, उसकी तबीयत खराब हो गयी. महीने भर तक. मुझे शक है
कि उसने एबार्ट करवाया. हालांकि उसने बताया नहीं.
•
इतनी इगोइस्ट महिला से आपको प्यार कैसे हो गया?
हो गया, क्या करें? बल्कि आज भी लड़ती है मुझसे, सत्तर साल की
हो गई है, बल्कि अबव सेवंटी, कहीं एक अख़बार में कुछ आ गया होगा उसके बारे में,
कहती है कि मैं बिलकुल नहीं चाहती कि कहीं मेरा नाम आए. शी इज पर्सन ऑफ ए स्ट्रांग
कैरेक्टर.
•
क्या वो आपको मिल जाती तो आप दोनों के बीच प्यार रहता? औरत का यह तेज रूप बर्दाश्त
कर पाते आप?
मेरे ख्याल से नहीं कर पाता.
नई कहानी का सारा दर्द यही है. खास कर मोहन राकेश का-अंधेरे
बंद कमरे, आषाढ़ का एक दिन सबकी थीम यही है. हमने स्त्री को पर्सनालिटी दी,
आत्मनिर्भरता दी, स्वतंत्रता दी, लेकिन हमारी मानसिकता उसे बर्दाश्त नहीं कर पायी.
हमारे संस्कारों में है कि हम रात कहें तो वो रात कहे, दिन कहें तो दिन. ये
स्त्रियां अलग थीं. शायद इसलिए हमारी जनरेशन के पुरुष स्ट्रांग स्त्री के साथ निबाह
नहीं कर पाए.
•
आप आज भी अपने भूले बिसरे प्यार को इसीलिए तो याद नहीं कर रहे कि बहुत सारी बातें
अनकही रह गईं?
शायद.
•
क्या आज भी आप अपने आपको रोमांटिक महसूस करते हैं?
आज से दस साल पहले करता था. अब तो खाली एक
नोस्टालजिया है. पिछले दिनों मेरी मुलाकात हुई थी उससे, दो-तीन घंटे साथ थे-पर अब
नया कुछ नहीं बन सकता.
•
आप सत्तर प्लस के जॉनर को बिलांग नहीं करते. क्या कहीं यह तो नहीं लगता है कि वो तो
बुढ़ा गई है, लेकिन मैं अभी भी यंग हूं.
हां, लगता है. कम्युनिकेशन का लेवल बदल गया
है. चूंकि उसे लगता है कि हमने उसे संरक्षण या साथ नहीं दिया, इसलिए उसे अपने
परिवार में अपने भाभियों के साथ ही रहना है. कहती है कि जब मुझे सुविधा होगी, तो
आऊंगी. नहीं आई तो बुरा मानने की जरूरत नहीं है.
•
आज जबकि आप दोनों अकेले हैं, वो आपके साथ रहने का निर्णय क्यों नहीं ले पातीं?
उस पर बुढ़ापा आ गया है, असुरक्षा महसूस
करती है, कि मुझे वहीं रहना है, अपने भाई-भाभी के बच्चों के बीच. वो ही बुढ़ापे में
मेरी देखरेख करेंगे.
•
वाज शी ब्यूटिफुल?
करीना कपूर नहीं थी, हां प्रंजेटेबल तो
थी. कहीं कमरे में जाती थी, तो लोग मुड़ कर देखते थे, एक पर्सनालिटी थी. एक तो
कॉन्फिडेंस और दूसरे आधिकारिक लेवल पर काम करने से जो बात आ जाती है, वो. ये था कि
मुझे उसे साथ ले जाने में शर्म नहीं आती थी.
•
जिन लोगों के साथ आपके नाम जुड़े, मन्नू भंडारी, मैत्रेयी पुष्पा इनमें असाधारण क्या
नजर आया ? क्या ये सब टिपिकल औरतें नहीं थीं?
इनकी जो मानसिक बनावट है, जो गुण हैं, उनसे
मैं प्रभावित हुआ. प्रभा खेतान मेरी बहुत इंटीमेट फ्रेंड रही हैं.
•
मन्नू को आप प्रेमिका क्यों नहीं बना पाए?
बाद में हमने डिस्कवर किया कि जिंदगी
सिर्फ लेखन नहीं है. मन्नू का पालन पोषण जिन लोगों के साथ हुआ, वे बहुत भले लोग थे.
सुबह नौ बजे दफ्तर जाना, शाम समय पर घर लौट कर बच्चों के साथ समय बिताना. सब उतने
ही आत्मीय थे. हमारी लाइफ स्टाइल बिलकुल अलग थी. वो पांच बजे घर आ जाएं और चार बजे
हमारे निकलने का टाइम था. ऐसा नहीं है, कई बार वे मेरे साथ आईं, कोलकता में जब तक
रहे उसने मेरा साथ दिया. काफी हाउस में देर तक रहना, दोस्तों से मिलना आदि. दिक्कत
थी एक पति की जिम्मेदारियां-जो मैं नहीं निभा पाया.
साथ रहना और पति-पत्नी बन कर रहना दो अलग बातें हैं. बीस साल एक आदमी-औरत साथ रहे.
एक दिन उनके मन में आया कि क्यों ना हम शादी कर लें. अगले दिन पुरुष ने कहा, सुबह
उठ कर कि तुम चाय बनाओ. पत्नी ने जवाब दिया, मैं क्यों बनाऊं, तुम बनाओ जैसा पहले
बनाते थे. बात यह है कि शादी दो चीजें मांगता है स्वतंत्रता, नैतिक और दैहिक आचरण.
उससे बाहर जाते ही खटखट होनी शुरू हो गई.
बाहर आप खुदा होंगे, घर में आप औरत और आदमी हैं. मन्नू को ऐसा पति चाहिए था, जो उसकी
शिकायतें सुनता. उसने अपनी शिकायतें एक्साजिरेट करना शुरू कर दिया. हमारे बाहर भी
संबंध थे. शारीरिक नहीं, पर हां अच्छे संबंध तो थे ही. जैसे मृदुला गर्ग से. उसकी
पहली कहानी ‘हंस’ में रीराइट करके छापा. उसकी पहली कहानी ‘केअर ऑफ’ अक्षर प्रकाशन
छपी थी. उसके उपन्यास को भी रीराइट करना, ठीक करना-हमने ही करवाया. मृदुला के साथ
बहुत अच्छे संबंध थे. मन्नू को यह बात पसंद नहीं थी कि बाहर लड़कियों से संबंध रखूं,
मिलूं, फोन पर बात करूं.
•
पीछे मुड़ कर देखते हैं तो क्या अफसोस होता है कि आप टिपिकल हसबैंड नहीं बन पाए?
मुझे शिकायत नहीं. पर मन्नू की तरफ से
सोचता हूं तो लगता है कि मैं असमर्थ था. मुझे अपनी इंडीपेंडेंस के लिए दो रास्तों
में एक को चुनना था. या तो विवाह को चुनना था या अपनी आजादी को.
•
विवाहित जीवन में सुविधाएं भी तो थीं? फिर अलग होने की क्या सोची?
हां.. जब खटखट बढ़ी तो सोचा कि अलग रह कर
देखा जाए. महीनों बाहर रहा. कई दिनों तक गाजियाबाद मित्र के घर रहा, कि दोनों एक
दूसरे की कमी महसूस कर सकें. छह महीने मैं आईआईटी कानपुर में रहा, युनिवरसिटी का
गेस्ट बन कर. मन्नू दो साल के लिए चली गई. हमने ये प्रयोग किये कि डे टू डे की
क्लेश खत्म हो.
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•
क्या आप विवाह संस्था में यकीन करते हैं?
मैं नहीं करता, लेकिन मन्नू करती है. शादी
एक बंधन हो, वहां तक तो ठीक है. लेकिन उसके साथ एक आचरण की जो आचार संहिता है, उसमें
मेरा दम घुटता है, मैं वहां एडजस्ट नहीं कर पाता.
•
मन्नू से अलग होने के बाद में कभी सेटल होने का मन नहीं आया?
नहीं. लेकिन मेरा परिचय कई खूबसूरत महिलाओं
से रहा. एक थी शोभना भुटानी, एनएसडी से थी, एक्टर थी. मेरे बहुत क्लोज थी. एक
संयुक्ता थी, बहुत खूबसूरत. उन दिनों ‘सारा आकाश’ पर फिल्म बन रही थी आगरा में. मेरे
बुलाने पर वह मेरे साथ आगरा आई. स्टेशन पर जैसे ही वह उतरी, सबने कहा कि हीरोइन आ
गई. बाद में उसके मन्नू से बहुत अच्छे संबंध बन गए. पता नहीं वो मन्नू को घुमाने
कहां-कहां ले गई. लेह-लद्दाख. पहले तो बहुत ईष्या थी मन्नू को उससे लेकिन बाद में
वह मन्नू की आलमोस्ट बेटी बन गई.
•
क्या देख कर आप स्त्री की तरफ आकर्षित होते हैं?
पहले तो रंग रूप आता है. उसके बाद एक कॉमन
कैमिस्ट्री बनती है. मुझे ऐसी महिलाएं पसंद आती हैं जिनसे संवाद बना सकूं, बाकायदा
बात कर सकूं, किसी भी विषय पर. हमारे कुछ मित्र रहे हैं, स्त्री के नाम पर जो मिले
झाडू लगाने वाली हो या चौका बरतन करने वाली हो, मौका मिला तो दबोच लिया. दिस, आई
कांट डू. जिस स्त्री के साथ मैं मन से एक इंटीमेट संबंध ना बना सकूं, उनसे मेरा
रिश्ता नहीं बन सकता.
•
ऐसी कोई महिला आई है, जिसके साथ आपके अच्छे संबंध रहे हों, आपने उनसे संबंध बनाना
चाहा हो, लेकिन उन्होंने मना कर दिया.
हां. एक्चुअली सेक्स के स्तर पर मेरा
रिश्ता तीन ही महिलाओं के साथ रहा है. मन्नू, दूसरी जिस प्रेमिका का मैंने जिक्र
किया और एक और के साथ. बाकि स्त्रियों के साथ सेक्स नहीं हुआ. ऐसा नहीं है कि मैं
सेक्सुअली कमजोर हूं, पर उस स्टेज तक आई नहीं बात. आने भी नहीं दिया. हरेक से सेक्स
नहीं कर सकता.
•
लेकिन आप जो ‘ऑरा’ बना कर चलते हैं, उससे तो यही बात सामने आती है कि आपके कई
स्त्रियों के साथ दैहिक संबंध रहे हैं. पिछले दिनों अजय नावरिया आपके ही सामने
जिक्र करे थे सोनी का, जिसे दीवाली की सुबह उसने आपके घर में नाइट सूट में देखा था.
इससे बाहर यही संदेश जाता है कि वो रात को सोई हैं.
नहीं. मेरे उससे इंटीमेट संबंध हैं. मैं
चाहता हूं कि मेरे पास जो भी रहे, वो फ्रीली अपना घर समझ कर रहे. मैं यहां आदमी-औरत
की बात नहीं करता. अगर वो यहां रहती है, तो उसे पूरी स्वतंत्रता के साथ रहना चाहिए.
सोनी जब मुझसे पहली बार मिली थी, तो इक्कीस या बाईस साल की थी. और दूसरे साल ही मेरी
जान को लग गई कि मैं आपका इंटरव्यू करूंगी और आपसे सेक्स संबंधों के बारे में सवाल
करूंगी. इक्कीस साल की लड़की मेरे सामने खुल कर पूछ रही है मेरे संबंधों के बारे
में. बिंदास. मुझे ऐसी लड़कियां पसंद हैं.
|
सेक्स की जरूरत महसूस
होती है. लेकिन मैं अपने को जब्त करता
हूं. मैं नहीं चाहता कि जो स्त्रियां मुझसे मिलने आती हैं, जो मुझे ऊर्जा देती हैं,
वो मुझसे मिलना छोड़ दें. अब तो तसवीरों में करीना कपूर को देख कर संतुष्ट हो जाता
हूं. |
•
जितनी भी महिलाएं आती हैं, आपसे मिलने, उन सबके साथ आपका नाम जुड़ता है. माना जाता
है कि आपके साथ सोती हैं ?
सोनी जब मुझसे आई तो काफी समय बात उसने
मुझे बताया कि उसे कहा गया था यादव जी के यहां मत जाओ, खतरनाक आदमी हैं, उनके चंगुल
से बच नहीं पाओगी. जो भी है.. .. साल भर हो गया, आपने तो ऐसा कुछ नहीं किया. मैंने
हंस कर पूछा कि क्या तुम चाहती हो कि मैं ऐसा कुछ करूं? छूना-छाना, लपक-झपक मौका
मिले तो किस करना यह सब तो चलता है, इससे किसी को आपत्ति भी नहीं होती. मुझे कई
स्त्रियों ने बताया है कि उन्हें यह बता कर भेजा जाता था कि यादव जी से मिलने जा रही
हो तो पर्स में एक छुरा रखना मत भूलना.
•
सेक्स की जरूरत महसूस नहीं होती आपको?
होती है. . लेकिन मैं अपने को जब्त करता
हूं. मैं नहीं चाहता कि जो स्त्रियां मुझसे मिलने आती हैं, जो मुझे ऊर्जा देती हैं,
वो मुझसे मिलना छोड़ दें. अब तो तस्वीरों में करीना कपूर को देख कर संतुष्ट हो जाता
हूं.
•
करीना का कौन सा रूप आकर्षित कर गया आपको? ‘टशन’ में स्विम सूट वाला या..?
‘जब वी मेट’ में मुझे वो अच्छी लगी, हम
ब्यूटी के साथ एक इनोसेंस, एक डिविनिटी लगा कर देखते हैं. इसलिए ‘टशन’ देखने का मेरा
मन नहीं है. एक जमाने में मुझे स्मिता पाटिल बहुत अच्छी लगती थी, बहुत सेक्सी. रमोला
भी.
•
कुछ समय पहले जब मैंने आपसे कहा था कि मैं मुंबई जा रही हूं लेस्बियंस पर एक स्टोरी
करने तो आपने हँस कर यह कह कर बात उड़ा दी कि दो औरतें कैसे करती हैं सेक्स? आप गे
रिश्तों के बारे में क्या सोचते हैं?
हालांकि सन साठ में मैंने ‘प्रतीक्षा’ नाम
से कहानी लिखी थी गे सबंधों के बारे में. पता नहीं कितने ट्रांसलेशन हुए, एक अमरीकी
आदमी ने अंग्रेजी में ट्रांसलेट किया और इंप्रिंट मैगजीन में छपा. लेस्बियन महिलाओं
की बात तो दूर, मुझे सोडोमी एस्थेटिकली नहीं जंचता. संस्कार कहिए या जो भी, मैं इन
रिश्तों को समर्थ नहीं देता.
मुझे चालीस साल नॉन वेज खाते हो गए. पिछले पांच-छह सालों से शोरबा खा पाता हूं, पीस
नहीं. अब इसे चाहे जो कहो. मुझे एस्थेटिकली ये संबंध गंदे लगते हैं.
•
लेकिन आंकड़े तो कहते हैं कि हर दस में से एक पुरुष गे संबंधों के प्रति आकृष्ट होता
है.
अधिकांश लड़के बचपन में शिकार बनते हैं. इन
बॉर्न का नहीं पता. जब हम स्कूल में थे, तो हमसे बड़ी उम्र का एक लड़का स्साला हमें
बैठा देता था कि मास्टरबेशन करो. इस तरह के संबंध होते हैं. टीचर लोग पढ़ाने के लिए
बच्चों को बुलाते हैं और फिर करवाते हैं. हां.. मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ, लेकिन मैंने
देखा है.
आगे पढ़ें
•
औरतों की एक जमात जो आपको सठिया और बुढ़ऊ कहती है, आप कैसे रिएक्ट करते हैं.
मुझे सच में महसूस नहीं होता कि मैं बूढ़ा
हूं. यह बात भीतर से ही नहीं आती कि मैं उम्र दराज हो गया हूं.
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मैं मानता हूं अपने से यंग छोटी उम्र की स्त्रियों के साथ दोस्तियां बनी रहे, यह
आपको युवा रखता है. |
•
क्या आप सेवंटी में पहुंची महिला से इसी तरह बेतकल्लुफी से बात कर पाते हैं?
जहां बीच में संस्कार, सीमाएं वगैरह हों,
वहां बराबरी की दोस्ती नहीं बन सकती. मैं चाहता हूं जिन स्त्रियों से मेरी दोस्ती
हो एक पुरुष की तरह दोस्ती हो. उतनी ही बेतकल्लुफ, संकोचहीन.
ये जो महिलाएं आपके साथ चली आती हैं,
दोस्ती करती हैं यह बात सिर्फ वहीं तक नहीं रहती. उन्हें अपने परिवार को जवाब देना
पड़ता है.
मान लीजिए मैं किसी लड़की से प्यार करता हूं, उसका नाम ले कर लिख देता हूं. आज वो कहीं
किसी की मां है, पत्नी है, वो क्या जवाब देगी? मेरे प्यार का तकाजा यह है कि मैं उसे
ऐसी स्थिति में ना डालूं, जहां वो अपने आपको छोटा महसूस कर सके.
•
अगर कोई महिला ऑटोबायोग्राफी लिखे, आपका जिक्र करे तो आपको फर्क पड़ेगा कि नहीं?
नहीं.. .. मेरे बारे में बहुत कुछ लिखा
जाता है. औरतें लिखती रही हैं. एक आई थी, मुझे याद भी नहीं कि वह मुझसे मिली था या
नहीं, लेकिन उसने जो मेरे बारे में लिखा वो कोरी बातें थीं, बिलकुल काल्पनिक कि
उन्होंने ऐसे देखा जैसे मुझे खा जाएंगे.. वगैरह वगैरह.
मेरे और मेरे लेखन के ऊपर एक बहुत बड़ा
सेंसर है वीना का. वीना मेरे क्लोज है, मुझसे बहुत फ्री है. लेकिन वह कहती रहती है
कि ‘हंस’ में यह छपेगा और यह नहीं छपेगा. जब मैंने ‘हासिल’ नाम की कहानी लिखी, तो
उसने कहा- नहीं छापेंगे, मैं अड़ गया. मोस्ट मशहूर लेख ‘होना सोना’ पर अड़ गई कि नहीं
छापेंगे, ‘हंस’ के लायक नहीं, उससे लड़ कर मुझे अपना लेख छापना पड़ा.
•
जो स्त्रियां नारी मुक्ति का झंडा उठा कर चलती हैं, जो गाहे बगाहे आपके खिलाफ बोलती
हैं, उनके बारे में कुछ सुनहरे शब्द हो जाएं?
वे महिलाएं मानसिकता से या उम्र से साठ के
ऊपर की हैं, जो नारी मुक्ति को नहीं मानती. जो गोलमोल वक्तव्य में विश्वास रखती हैं
कि मनुष्य तो सब एक ही है. अच्छा, जो पुरुष की मानसिकता से लिखा गया है और जो स्त्री
की मानसिकता से लिखा गया है, बेसिक अंतर है. दो अलग अप्रोच हैं. उस चीज को तो हमें
मानना होगा. क्योंकि उनकी शिक्षा-दीक्षा जिन परंपराओं में हुई, वहां तो लेखक पुरुष
ही थे, जो लिखते थे, एकाध थीं, महादेवी वगैरह, जो गोल-गोल बातें लिखती थीं
मधुर-मधुर मेरे दीपक जल, उसमें किसको आपत्ति हो सकती थी?
फिर महिलाओं ने जो लिखना शुरू किया, इतनी वेरायटी के साथ आईं, निर्मला जैन, मृदुला,
मृणाल- वे फेमिनिस्ट विरोधी हैं.
झंडा बुलंद करके चलने वाली स्त्रियां हमें गालियां देती हैं कि हमने उन लेखिकाओं को
बिगाड़ दिया.
यहां मैं कोट करना चाहूंगा, पिछले साल किसी भी चैनल या न्यूज पेपर ने उत्तर प्रदेश
चुनाव से पहले मायावती के आने की घोषणा नहीं की. वे बस गोल-गोल घूमते रहे. लेकिन जब
रिजल्ट आए तो सब चौंक गए. मायावती जीत गईं. कोई तो सचाई थी, जो उसके साथ थी, जिससे
बिना शोर मचाए, बिना कहे लोग उसके साथ जुड़े हुए थे.
तो स्त्री विमर्श और दलित विमर्श में कोई तो बात, चीज थी कि आज कोई संवाद, कोई बहस
इसके बिना पूरी नहीं होती. यूनिवरसिटी में दलितों का अलग सेक्शन है. यह जो उनके
अनचाहे बढ़ रही है, यह बौखलाहट है उनके मन में (झंडा उठा कर चलने वालों के).
इनमें सिर्फ मैत्रेयी है, जो मानती है कि वो स्त्री वादी है. प्रभा तो बकायदा इतनी
पढ़ी लिखी है कि अपने तर्कों से वह सबका मुंह बंद कर देती है. यह श्रेय तो हमें मिलना
चाहिए कि पिछले बीस सालों में हमने इसे साहित्य का एक सेंटर और करेंट बना दिया.
•
आप पर जो अश्लीलता का आरोप लगता है, कितना जेनुइन है, कैसी प्रतिक्रिया करते हैं?
बहुत पहले हम शक्ति नगर में रहते थे, तो
बस से आते-जाते थे. बस में एक औरत सफर किया करती थी, मेरा ख्याल है वही तीस-पैंतीस
की होगी. जब कभी वो किसी पुरुष की बगल में बैठती, तो झगड़ा मोल लेती कि मुझे क्यों
छेड़ रहा है? लड़ती हुई जाती थी. सब हंसते हुए जाते थे. यह एक किस्म की कुंठा है कि
सब मुझे छेड़ते हैं.
तीस पैंतीस साल की स्त्री मैच्योर होती हैं. उनसे बात करने में यह भी होता है कि आप
कोई नई चीज जान लें. वो उनके अंतरमन में झांकने का एक मौका देती हैं.
•
क्या आपको अफसोस होता है कि आपको तीन चार जनरेशन बाद पैदा होना था? इस जनरेशन के
पास जो है पहले नहीं था, इतनी आजादी, विचारों में इतना खुलापन..
ठीक है, हां यह तो सही है कि आज के जनरेशन
के पास आजादी है. पर जो है सो है. अब होता है कि बेकार में अपनी जिंदगी खराब
की. रोंमाटिसिस्म में और इन सबमें कई खूबसूरत चीजें अनदेखी कर दी. अफसोस तो होता
है.
•
किसी चीज की शिकायत रह गई? पावर, पैसा या और कुछ?
उस मामले में जो मैंने चाहा मुझे मिला. इस
तरह की कोई शिकायत नहीं है. हां, अकेलापन कभी-कभी खलता है.
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जो भी औरत आपके पास, आपसे मिलने आती है, आपसे क्या चाहती है?
शुरू में जो भी आती है एक दूरी बना कर आती
है. जब इंटीमेट हो जाती है तो फिर आदमी-औरत वाली बात नहीं रहती. उससे ऐसा रिश्ता बन
जाता है जिसमें वो लड़ भी सकती है गाली भी दे सकती है.
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ऐसे संबंध आपको ज्यादा प्रिय हैं?
बिलकुल. इंटीमेट, बेतकल्लुफी भरे संबंध
मुझे अच्छे लगते हैं.
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आप अपनी फेंटेसीज किसके साथ शेअर करते हैं?
किसी से नहीं. कभी डायरी में लिख दिया, तो
लिख दिया. हां मिस तो करता हूं कि किसी से कह नहीं पाता.
यहां मैं चीनी कम फिल्म का जिक्र करूंगा.
यह फिल्म मुझे बहुत अच्छी लगी. उसमें नायक-नायिका (अमिताभ बच्चन-तब्बू) के बीच जो
एज डिफरेंस और अंडरस्टैडिंग है, बहुत सही है.
मैं मानता हूं अपने से यंग छोटी उम्र की स्त्रियों के साथ दोस्तियां बनी रहे, यह
आपको युवा रखता है.
26.08.2008,
02.30 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | |
| | ajey, (ajeyklg@gmail.com) | |
| | यादव जी का कुछ पढ़े 10 बरस हो गए. जब से हंस पढ़ना छोड़ा, यादव जी को नहीं पढ़ा. (सिवाय इस सूप पीने वाले बूढ़े सामिष भोजी “ठरकी” के उस पत्र के जो मनाली की Mystic Snowa Barno को उन्होंने बड़े मन से लिखा है...) इंटरव्यू बेबाक है. बड़ा रस आया. पाखंड का न होना इस वाहियात चर्चा को उदत्त बनाए दे रहा है. कुंठाएं धो डालती हुई बातचीत के लिए धन्यवाद. | |
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| | Damayanti Chaube() | |
| | Apne se young larkiyon se dosti apko young rakhti hai, yeh vichar hai purush lekhak ke, jo stree vimarsh kar rahe hain. 70 saal ki umra men 13 saal ki ladki se shadee karne wale bhi yahi sochte the. Yadavji unse alag nahin hain. Mahatwakankshee aur pratibha heen lekhikayen unse lapak jhapak karti hain. yehi stree vimarsh hai. Mahadevi Verma ke bare main tippani ashobhaneeya hai | |
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| | Rakesh Gupta() | |
| | Lachar fun with frustrated women is the correct expression for this interview, which I have read today. Many frustrated women submit to this kind of preassure from powerful editors. Ramanika Gupta also spoke about launching couch in this field. This is not a good sign for healthy literature. Jayanti and Geetashree can become bahucharchit but not sammanit by letting themselves Lapak Jhapak and kissed by an old frustrated editor well known for his decadence. | |
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| | prof. r.n.sharma | |
| | its really pleasant to learn that the magazine "haans" is still in limelight.i read 'saara aakash' decades back.it stirred my tender mind a lot.it may be somewhere in my book collections.in mumbai,hardly colleagues know about 'saarika' or 'haans'. i wish to get a recent issue of the later magazine.the TOI-group long back stopped publishing some good magazines.in any case,now the 'body language'is more relevant...the rest is offered by the internet sites.prithvi theatre is now terrorised by the new entrants to the t.v. industry..so better do academics in the office and get occasional such treat to old memory. r.n.sharma,tiss,mumbai. | |
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| | हरि जोश्ी | |
| | आज जयंती के दिलो दिमाग से राजेन्द्र जी को जाना। इससे पहले कुछ दूसरे साहित्यकार मित्रों की जुबानी सुनता रहा हूं। आगरे का हूं, इसलिए जो जैसा बता देता हूं सुन लेता हूं। पढ़ लेता हूं। मेरा दुर्भाग्य है कि कभी राजेन्द्र जी को देखा सुना नहीं। पढ़ा है और मेरा मानना है कि किसी व्यक्ति को देखने सुनने से बेहतर पढ्ना होता है भले ही वह न लिखने का झूठ हो। जयंती को धन्यवाद। राजेन्द्र जी की किताब के कुछ पन्ने खोलने के लिए और कुछ छिपाने के लिए। हो सकता है वह हमें अगली बार पढ़ने को मिलें। | |
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| | agrawasi(agrabrij@gmail.com) | |
| | lagta hai jayant |