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राजेंद्र यादवः चीनी कम, जिंदगी ज्यादा

संवाद

 

चीनी कम, ज़िंदगी ज़्यादा

राजेंद्र यादव से जयंती रंगनाथन की बातचीत

 

किताबघर से गीताश्री के संपादन व संयोजन में शीघ्र प्रकाश्य 'राजेंद्र यादव और छब्बीस लेखिकाएं' में यह साक्षात्कार शामिल है. इस किताब में राजेंद्र यादव से संबंधित आलेख, संस्मरण और साक्षात्कार हैं.

 

पहली बार कब पढ़ा था राजेंद्र यादव को.. ..? लगभग तीस साल पहले. उस समय की दूसरी किशोरियों की तरह साहित्य पढ़ने की शुरुआत में ही दो महत्वपूर्ण उपन्यास से रूबरू हुई धर्मवीर भारती का ‘गुनाहों का देवता’ और राजेंद्र यादव का ‘सारा आकाश’.

मैंने हमेशा स्पष्ट कहा है कि स्त्री विमर्श पर बात करनी है तो मां, बेटी और बहन इन तीन संबंधों पर बात नहीं करूंगा.

 

‘गुनाहों का देवता’ ने मुझे उतना प्रभावित नहीं किया, जितना ‘सारा आकाश’ ने किया था. सुधा और चंदर खास कर सुधा का चरित्र जरूरत से ज्यादा कमजोर लगा. बीच में चंदर और नर्स का प्रसंग भी मुझे अरुचिकर लगा. लेकिन ‘सारा आकाश’ की नायिका के संघर्ष से मैं अपने को जोड़ पाई. भाषा, शैली, सब कुछ सहज और सरल.

इसके कुछ सालों बाद जब धर्मयुग से जुड़ी, तो सारा आकाश और राजेंद्र यादव के जिक्र पर एक सीनियर कलीग ने टिप्पणी की, “ उपन्यास अच्छा लगा, तो वहीं तक रखो. कभी लेखक से मिलने की इच्छा मत करना. यादव जी भारती जी नहीं हैं.”

भारती जी मेरे बॉस थे, संपादक थे. हालांकि जिस समय मैं धर्मयुग से जुड़ी (1985 में), वे दूसरों के हिसाब से काफी बदल चुके थे. हंसते भी थे और अपने स्टाफ को ब्रीदिंग स्पेस भी देते थे. लेकिन कभी मुझे उनके साथ यह नहीं लगा कि मैं सहज हो कर गपियाऊं या उनसे चर्चा करूं. दूरियां थीं, काफी थीं. (मैं कुछ ज्यादा अपरिपक्व थी और वे उम्र और पद के हिसाब से ज्यादा परिपक्व).

सालों बाद मुंबई से दिल्ली आना और बसना हुआ. राजेंद्र यादव के जिक्र पर कई लोगों से सुनने को मिला, “रसिया आदमी हैं. अगर आप अपने को बचा सकें, तो जरूर जाइए और मिलिए.”

हंस की गोष्ठियों में दूर से उन्हें देखा, हमेशा युवा स्त्रियों से घिरे, हंसते-ठहाके लगाते हुए यादव जी. कभी हिम्मत नहीं हुई पास जाने की, बात करने की.

इस बीच उनसे बिना मिले ही हंस में दो कहानियां छपीं. उसी दौरान धीरेंद्र अस्थाना और उनकी पत्नी ललिता भाभी के साथ पहली बार राजेंद्र यादव से मिलना हुआ. धीरेंद्र जी ने परिचय कराया, तो राजेंद्र जी ने सहजता से कहा, “तो तुम हो जयंती! ”

उस दिन एक दीवार टूट गई. मेरे सामने जो था वो एक पारदर्शी व्यक्ति था. सहज और सरल. मेरी कल्पना से परे. लगा कि एक्ट कर रहे हैं. लेकिन सबके साथ वे ऐसे ही थे.


फिर भी एक संकोच था. जो टूटा कुछ सालों बाद, जब मैं गीताश्री, अमृता, कमलेश और असीमा के साथ उनसे मिलने लगी, अकसर उनके घर पर हम सब धमाल मचाने पहुंचने लगे. राजेंद्र जी खुश होते थे, हंसते थे, तमाम विषयों पर खुल कर जिक्र करते थे. हमें वे कहते गुंडियां- बड़ी गुंडी, मंझली गुंडी और छोटी गुंडी. अपनी असुरक्षाओं का जिक्र करते, जिंदगी में अकेलेपन को लेकर अपना पक्ष बताते. लेकिन अधिकतर वे खुश रहते, ठहाके लगाते.

इन सबके बीच वो राजेंद्र यादव कहां है, जिनके बारे में सालों पहले मुझे सावधान किया गया था? ये तो एक ऐसा शख्स था, जिसके सामने हम अपनी तरह से रह सकते थे, वो कह सकते थे जो ना जाने कब से हमारे अंदर था और बाहर निकल नहीं पा रहा था.

क्या हम स्त्रियां ऐसे पुरुष को नहीं जानना चाहतीं, जो उनका चेहरा पढ़ ले, जिनके सामने वे अपना स्त्री होना भूल जाए और सिर्फ यह याद रखे कि वो एक जीती-जागती मनुष्य भी है आकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब.

हमारे गैंग के कुछ सदस्यों को राजेंद्र यादव के नॉनवेज जोक्स पर एतराज है. लेकिन एंजाय सभी करते हैं. एसएमएस सभी शेअर करते हैं. हर साल राजेंद्र यादव के जन्मदिन की पार्टी में कई दिलचस्प किरदारों से मुलाकातें, बहस, शेअरिंग, गैंग में शामिल होते नए सदस्य-कड़ी से कड़ी जुड़ रही है.

मैं हर बार जान रही हूं राजेंद्र यादव के व्यक्तित्व के नए पहलुओं को. वाकई यह व्यक्ति औरों से अलग है. अपने ऊपर उम्र को हावी होने नहीं देता. कभी यह अहसास नहीं होने देता कि वह ‘ द राजेंद्र यादव’ है. हां, इसका नुकसान भी है. जब कोई नया व्यक्ति उनसे मिलता है और उनके आसपास एक खास किस्म के ‘ऑरा’ की अपेक्षा करता है, तो उसे निराश होना पड़ता है.

उनसे कई बार कई विषयों पर बात हुई. गंभीर और अगंभीर बातें. फिजूल की बहसें भी हुईं. उनकी टिप्पणियां हर बार आपको अच्छी लगें, यह भी जरूरी नहीं. लेकिन मित्रवत बातचीत के अलावा एक औपचारिक इंटरव्यू लेने की बात जब आई, तो तय हुआ कि हम साहित्य से इतर ही बात करेंगे. ऐसे राजेंद्र यादव के बारे में बात करेंगे, जो अभी भी कुछ स्त्रियों को ‘डराता’ है, एक बौध्दिक वर्ग को ‘छिछोरा’ लगता है और हंस के पाठकों और एक बड़े प्रशंसक वर्ग को ‘अभिभूत’ करता है.

 

आप कितने अ-साहित्यक व्यक्ति हैं?

 

जब मैं पढ़ता या लिखता हूं तो पूरी तरह एक साहित्यिक आदमी होता हूं, लेकिन इसके बाद मैं कोशिश करता हूं कि एक आम आदमी की तरह हंसू, बर्ताव करूं. आइ वांट टू बी लाइक ए कॉमन मैन. इसके लिए मुझे किसी तरह की कोशिश नहीं करनी पड़ती. मुझे यह नेचुरल लगता है. शाम को घर लौटने के बाद या तो दोस्तों से मिलना-जुलना होता है, अकेला होता हूं तो कोई फिल्म देख लेता हूं.

 

आपका मन नहीं होता कि अलग क्षेत्र के लोगों से मिले-जुलें?

 

मिलना चाहता हूं.. . दिक्कत क्या है कि हमारे सर्किल में ऐसे लोग नहीं हैं, सारे पढ़ने-लिखने वाले हैं. कभी-कभी इच्छा होती है कि ऐसे लोगों से मिला जाए जिनका साहित्य से कोई लेना देना नहीं है.
 

अगर सफर में ऐसे व्यक्ति का साथ मिल जाए, जो आपको नहीं जानता, तब आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है?
 

मैं अपनी तरफ से कभी नहीं बताता. अगर पूछे तो सिर्फ इतना बताता हूं कि लिखने-पढ़ने का काम करता हूं. ज्यादा पूछे तो कहता हूं कि मैगजीन निकालता हूं. मैं उनके और अपने बीच डिस्टंस पैदा नहीं करना चाहता.

मुझे यह भी अच्छा नहीं लगता कि कोई मेरे पैर छुए या मुझसे दूरी बना कर चले. हमेशा से यही लगता रहा कि मैं लोगों के करीब रहूं. पैर छुआना, ओरा बना कर चलना--यह सब ड्रामा लगता है. अच्छा लगता है जहां बेतकल्लुफ-सी बातचीत हो, दुराव-छिपाव ना हो, खुल कर हो, गंदी बातें भी कर सकें और अच्छी बातें भी.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

ajey, (ajeyklg@gmail.com)

 
 यादव जी का कुछ पढ़े 10 बरस हो गए. जब से हंस पढ़ना छोड़ा, यादव जी को नहीं पढ़ा. (सिवाय इस सूप पीने वाले बूढ़े सामिष भोजी “ठरकी” के उस पत्र के जो मनाली की Mystic Snowa Barno को उन्होंने बड़े मन से लिखा है...) इंटरव्यू बेबाक है.
बड़ा रस आया. पाखंड का न होना इस वाहियात चर्चा को उदत्त बनाए दे रहा है. कुंठाएं धो डालती हुई बातचीत के लिए धन्यवाद.
 
   
 

Damayanti Chaube()

 
 Apne se young larkiyon se dosti apko young rakhti hai, yeh vichar hai purush lekhak ke, jo stree vimarsh kar rahe hain. 70 saal ki umra men 13 saal ki ladki se shadee karne wale bhi yahi sochte the. Yadavji unse alag nahin hain. Mahatwakankshee aur pratibha heen lekhikayen unse lapak jhapak karti hain. yehi stree vimarsh hai.
Mahadevi Verma ke bare main tippani ashobhaneeya hai
 
   
 

Rakesh Gupta()

 
 Lachar fun with frustrated women is the correct expression for this interview, which I have read today. Many frustrated women submit to this kind of preassure from powerful editors. Ramanika Gupta also spoke about launching couch in this field. This is not a good sign for healthy literature.
Jayanti and Geetashree can become bahucharchit but not sammanit by letting themselves Lapak Jhapak and kissed by an old frustrated editor well known for his decadence.
 
   
 

prof. r.n.sharma

 
 its really pleasant to learn that the magazine "haans" is still in limelight.i read 'saara aakash' decades back.it stirred my tender mind a lot.it may be somewhere in my book collections.in mumbai,hardly colleagues know about 'saarika' or 'haans'. i wish to get a recent issue of the later magazine.the TOI-group long back stopped publishing some good magazines.in any case,now the 'body language'is more relevant...the rest is offered by the internet sites.prithvi theatre is now terrorised by the new entrants to the t.v. industry..so better do academics in the office and get occasional such treat to old memory. r.n.sharma,tiss,mumbai.  
   
 

हरि जोश्‍ी

 
 आज जयंती के दिलो दिमाग से राजेन्‍द्र जी को जाना। इससे पहले कुछ दूसरे साहित्‍यकार मित्रों की जुबानी सुनता रहा हूं। आगरे का हूं, इसलिए जो जैसा बता देता हूं सुन लेता हूं। पढ़ लेता हूं। मेरा दुर्भाग्‍य है कि कभी राजेन्‍द्र जी को देखा सुना नहीं। पढ़ा है और मेरा मानना है कि किसी व्‍यक्ति को देखने सुनने से बेहतर पढ्ना होता है भले ही वह न लिखने का झूठ हो।
जयंती को धन्‍यवाद। राजेन्‍द्र जी की किताब के कुछ पन्‍ने खोलने के लिए और कुछ छिपाने के लिए। हो सकता है वह हमें अगली बार पढ़ने को मिलें।
 
   
 

agrawasi(agrabrij@gmail.com)

 
 lagta hai jayant