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लौहपथगामिनी वाली हिंदी !

भाषा

 

लौहपथगामिनी वाली हिंदी !

राहुल राजेश


प्राय: लोगों को यह आरोप लगाते सुना गया है कि सरकारी कामकाज की हिंदी को क्लिष्ट और जटिल बनाने में सरकारी हिंदी अनुवादकों और हिंदी अधिकारियों का हाथ है. यहां तक कि बुद्धिजीवी और ज्ञान-संपन्न तबके में भी यही मिथ्या धारणा है कि सरकारी अनुवादकों और हिंदी में तकनीकी शब्दावली बनाने वाले विद्वानों ने तकनीकी भाषा के सहज शब्दों को उनके मूल रूप में अपनाने की जगह, लौहपथगामिनी जैसा मजाक विज्ञान तथा तकनीकी के क्षेत्रों में खूब उड़वाया है. लेकिन जहां तक मेरी जानकारी है, ऐसे किसी भी सरकारी या गैर-सरकारी दस्तावेज (हिंदी) में रेल या रेलवे के लिए लौहपथगामिनी शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ है. हर जगह रेल, रेलवे, प्लेटफॉर्म, स्टेशन, जंक्शन आदि जैसे प्रचलित शब्द ही प्रयुक्त हुए हैं.

हिंदी शब्दार्थ

 
इसी तरह साइकिल के लिए भी लोग द्विचक्रवाहन शब्द का तथाकथित प्रयोग/अनुवाद बताते हैं. न जाने ऐसे कितने ही शब्दों, यथा क्रिकेट, फुटबॉल आदि के मनगढ़ंत अनुवाद इंटरनेट या एसएमएस के जरिए आप तक पहुँचाने वाले लोग मिल जाएंगे. लेकिन ये सारे संस्कृतनिष्ठ अनुवाद हिंदी के सरकारी अनुवादकों की देन नहीं हैं. ये सारे जुमले ठीक वैसे हैं जैसे कि लोगों की यह थोथी दलील कि दिल्ली–मुंबई के टैक्सी ड्राइवर या रिक्शाचालक सेक्रेटेरिएट की जगह सचिवालय कहने पर गंतव्य ही नहीं समझ पाते!

जहां तक तकनीकी शब्दों के अनुवाद और निर्माण की बात है तो इस महती कार्य की शुरूआत सन् 1961 ई. में भारत सरकार द्वारा वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग (Commission For Scientific And Technical Terminology) की स्थापना के साथ हो गई थी. उस वक्त यह शिक्षा विभाग के अधीन था और वर्तमान में यह मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन है. प्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता और शिक्षाविद डॉ. दौलतराम कोठारी इस आयोग के प्रथम अध्यक्ष थे. इससे पहले सन् 1950 ई. में वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली मंडल की स्थापना भारत सरकार द्वारा की जा चुकी थी.

सन् 1961 ई. में वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग का गठन ही इसलिए किया गया था ताकि मनमाने ढंग से शब्दावली बनाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाई जा सके और ठोस भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर शब्दावली के मानकीकरण की प्रक्रिया की शुरूआत की जा सके.

आयोग ने अपनी कार्य-प्रणाली में बहुत ही संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए सभी भारतीय भाषाओं एवं प्रमुख विषयों के विद्वानों, वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकीविदों, विशेषज्ञों तथा भाषाविदों से परामर्श कर सर्वसम्मति से सभी भारतीय भाषाओं में तकनीकी शब्दावली निर्माण और विकास के लिए कुल चौदह सिद्धांत प्रतिपादित किए. इन सिद्धांतों के पीछे निहित ध्येय यह था कि भारतीय भाषाओं में तकनीकी शब्दावली का ऐसा भंडार तैयार हो जो स्वरूप में यथासंभव अखिल भारतीय हो और प्रयोग में सुकर हो.

इनमें से कुछ प्रमुख सिद्धांतों के सार इस प्रकार हैं:

(1). अंतर्राष्ट्रीय शब्दों को यथासंभव उनके प्रचलित अंग्रेजी रूपों में ही अपनाना चाहिए और हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं की प्रकृति के अनुसार ही उनका लिप्यंतरण करना चाहिए. अंतर्राष्ट्रीय शब्दावली के अंतर्गत निम्नलिखित उदाहरण दिए जा सकते हैं: (क) तत्वों और यौगिकों के नाम जैसे, हाइड्रोजन, कार्बन डाइ-ऑक्साइड आदि; (ख) तौल और माप की इकाइयाँ और भौतिक परिमाण की इकाइयाँ जैसे, डाइन, कैलोरी, एम्पियर आदि; (ग) ऐसे शब्द जो व्यक्तियों के नाम पर बनाए गए हैं जैसे, मार्क्सवाद (कार्ल मार्क्स), ब्रेल (ब्रेल), बॉयकाट (कैप्टन बॉयकाट), फारेनहाइट (मि. फारेनहाइट) आदि; (घ) वनस्पतिविज्ञान, प्राणीविज्ञान, भूविज्ञान आदि की द्विपदी पदावली; (ड.) ऐसे अनेक शब्द जिनका आम तौर पर सारे संसार में व्यवहार हो रहा है जैसे, रेडियो, पेट्रोल, इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन, न्यूट्रॉन आदि; (च) गणित और विज्ञान की अन्य शाखाओं के संख्यांक, प्रतीक, चिन्ह और सूत्र जैसे, साइन, कोसाइन, लॉग आदि .

(2). प्रतीक, रोमन लिपि में अंतर्राष्ट्रीय रूप में ही रखे जाएँगे. यथा- cm., m., kg. आदि.

(3). ज्यामितीय आकृतियों में भारतीय लिपियों के अक्षर प्रयुक्त किए जा सकते हैं, यथा- क, ख, ग, अ, ब, स इत्यादि. परंतु त्रिकोणमितीय संबंधों में केवल रोमन अथवा ग्रीक अक्षर ही प्रयुक्त करने चाहिए, यथा- साइन A, कॉस B आदि.

(4). संकल्पनाओं को व्यक्त करने वाले शब्दों का सामान्यत: अनुवाद किया जाना चाहिए.

(5). हिंदी पर्यायों का चुनाव करते समय सरलता, अर्थ की परिशुद्धता और सुबोधता का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए. सुधार-विरोधी प्रवृत्तियों से बचना चाहिए.

(6). सभी भारतीय भाषाओं के शब्दों में यथासंभव अधिकाधिक एकरूपता लाना ही इसका उद्देश्य होना चाहिए और इसके लिए ऐसे शब्दों को अपनाना चाहिए जो (क) अधिक से अधिक प्रादेशिक भाषाओं में प्रयुक्त होते हों और (ख) संस्कृत धातुओं पर आधारित हों.

(7). ऐसे देशी शब्द जो सामान्य प्रयोग के पारिभाषिक शब्दों के स्थान पर, हमारी भाषाओं में प्रचलित हो गए हैं, जैसे- telegraph/telegram के लिए तार, continent के लिए महाद्वीप, post के लिए डाक आदि, इसी रूप में व्यवहार में लाए जाने चाहिए.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

SAURABH ARYA [arya_translator@yahoo.co.in] New Delhi - 2012-01-02 07:24:14

 
  बेहद प्रभावी लेख. कुछ मुद्दों को सही रेखांकित किया गया है. पर अभी भी हिन्‍दी की इस दुर्दशा के कुछ पहलू छूट गए हैं. हिन्‍दी कर्मियों को हिन्‍दी के प्रयोग और खासतौर पर कम्‍प्‍यूटर पर प्रयोग के मामले में एकरूपता लाने को प्रयास करना चाहिए.  
   
 

Sushil Krishna Gore [sushil.krishna24@gmail.com] Mumbai - 2011-12-24 11:12:50

 
  राहुल ... कमजोर पर आरोप लगाना बड़ा आसान होता है। लेकिन बाहुबली दोषसिद्ध होने के कगार पर भी पहुँचकर संदेह का लाभ पाकर जेलों से बाहर निकल जाते हैं या कह लो कि उनके पक्ष में झुकी यह बेईमान व्यवस्था उन्हें बाइज्जत जेलमुक्त कर देती है। हिंदी का भाग्य भी एक कमजोर का भाग्य है। अपनी भद्दी अंग्रेजी के दम पर राज और रंगबाजी करने वाले मुट्ठी-भर सामंत दिल्ली में बैठकर हिंदी भाषा की सरलता-दुरुहता पर फैसले ले रहे हैं। यह अपने आपमें एक चिंताजनक हालत की खबर है। ज्यादा क्या कहूँ....  
   
 

dr radhey shyam arya [aryadrradheyshyam@yahoo.com] bikaner - 2011-12-12 00:16:52

 
  भ्रमोच्छेदन के लिये धन्यवाद. हमारे विद्यार्थियों तथा हम सभी को इस विषय में प्रसंज्ञान लेना ही चाहिये. 
   
 

kamal [kmldixit@gmail.com] bhopal - 2011-12-05 07:47:20

 
  धन्यवाद. अपने सही कहा कि हिंदी शब्दों के संबंध में मनगढ़ंत जुमले प्रचारित किये गए. मीडिया के लोगो का भी इसमें हाथ रहा है और वह अब भी जारी है. जाने यह कैसे अनुमान लगा लिया गया कि लोग अंग्रेजी शब्दों को आसानी से समझ लेते हैं. हिंगलिश को प्रचारित और स्वीकार करने में लोगो से ज्यादा तो मीडिया है. वाह को वाब मीडिया ने ही तो किया है. इस पर लगातार बात होनी चाहिए. आपको बहुत धन्यवाद.  
   
 

दुर्वेश [vichar2000@gmail.com] भोपाल - 2011-12-03 09:57:05

 
  राहुल जी, जानकारी के लिये बधाई. अच्छा होता अगर सारे देश में कम से कम लिखने की एक लिपी होती. अभी तो गुजरात में गुजराती, केरल में मलियाली, तामिलनाडु में तमिल, कर्नाटक में क्न्न्ड़, आंध्रा में तेलुगु और बंगाल में बंगला में लिखा जा रहा है. एक राज्य का पढा-लिखा व्यक्ति दूसरे राज्य में अनपढ-सा हो जाता है. बसों पर लिखे जगहों के नाम तक दूसरों से पूछने पड़ते हैं. इस दुविधा को हमारे जैसा घुम्मकड ही समझ सकता है. यह देश हर साल सैकड़ों कानून बनाता है ...काश एक देश, एक लिपी पर एक कानून सर्वसम्मति से बना कर लागू कर लिया होता. इसके लिये हिंदी को मूल लिपि मानते हुये उसमें दूसरी भाषा की उन ध्वनि वाले अक्षर सम्मिलित किये जा सकते हैं, जो इसमें नहीं हैं. ...आप सब का क्या विचार है? 
   
 

चण्डीदत्त शुक्ल [chandiduttshukla@gmail.com] जयपुर - 2011-12-03 07:43:32

 
  अच्छी जानकारी। कई भ्रम छांटती हुई। हालांकि कुछ जगह अपनी ही बात का खंडन भी है। जैसे, एक जगह लिखा गया है... कंप्यूटर के लिए अभिकलित्र/संगणक...जैसे पर्याय सुझाए गए हैं तो इन पर हरगिज आपत्ति नहीं जतायी जानी चाहिए. और आगे ही लिखा जा रहा है कि कंप्यूटराइजेशन...आदि शब्दों के लिए कंप्यूटरीकरण...जैसे पर्याय असमर्थ पर्याय नहीं हैं।
ख़ैर, इस विरोधाभास के बावज़ूद लेखक का मूल पर्याय और भाव सराहनीय है और यह संदेश भी स्पष्ट होता है कि भाषा की सहजता बनी रहनी चाहिए और सबसे अहम वही है।
 
   
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