खेती को खत्म करने का यह पाप
बहस
खेती को खत्म करने का यह पाप
देविंदर शर्मा
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रत्यक्ष विदेश निवेश को कृषि क्षेत्र के लिए वरदान
समझकर थोप रहे हैं. अगर इसे वास्तविकता की कसौटी पर पर परखें तो दुर्भाग्यवश यह खेती
के ताबूत में आखिरी कील साबित होगा. यह भारतीय किसानों के अंत का प्रारंभ होगा.
ऐसा अमरीका में हुआ है. चूंकि अमरीकी बाजारों में वॉल मार्ट जैसे बहु ब्रांड खुदरा
व्यापारियों का प्रभुत्व कायम हो चुका है, किसान गायब हो गये हैं और गरीबी बढ़ गई
है. इसी तरह भुखमरी भी बढ़ी है. आज अमरीका में सात लाख से ज्यादा किसान नहीं रह गए
हैं. वहां गरीबी बढ़ी है और भुखमरी ने 14 साल के रिकार्ड को ध्वस्त कर दिया है.
यूरोप में भी, जहां खुदरा क्षेत्र में बड़े घरानों का दखल है, हरेक मिनट पर एक
किसान खेती से तौबा कर रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस में किसानों की आय
2009 में 39 फीसद घट चुकी है, जबकि 2008 में यह 20 फीसद थी. अभी हाल में स्कॉटलैंड
में सुपर बाजारों की कम कीमतों ने दुग्ध उत्पादकों का भट्ठा बैठा दिया. इससे
क्षुब्ध किसानों को अपने उत्पाद के एवज में वाजिब दाम पाने के लिए ‘फेयर डील फूड’
नाम से एक गठबंधन बनाना पड़ा. एक अध्ययन यह भी बताता है कि टेस्को अपने उत्पादकों
को बाजार के औसत दामों से चार फीसद कम देता है.
इन तथ्यों के आलोक में यह उम्मीद फिजूल है कि सुपर बाजार भारतीय किसानों का
मुक्तिदाता होने जा रहा है. सुपर बाजारों द्वारा वैश्विक स्तर पर खेती-बाड़ी को
चौपट करने के बावजूद वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय मल्टी ब्रांड वाले खुदरा क्षेत्र
में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के गुणों को लेकर उत्साहित है.
इसका सीधा मतलब वॉल मॉर्ट और टेस्को जैसे बड़े खिलाड़ियों को भारतीय बाजारों पर छा
जाने देना है. औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग की विचार-विमर्श के लिए तैयार
रिपोर्ट में कहा गया है ‘संवृद्धि, रोजगार और ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक
सम्पन्नता के लिए कृषि क्षेत्र को बेहतर तरीके से काम करने वाले बाजार की आवश्यकता
है.’ यह समूची परिकल्पना जानबूझकर गलत आधारों पर रची गई है. क्या सुपर बाजार वास्तव
में लाभदायक हैं?
भारत 2006 से ही अपने खुदरा क्षेत्र को आंशिक रूप से इसके लिए खोल चुका है. क्या
इसकी इकाइयों ने भारतीय किसानों और अपने उपभोक्ताओं को फायदा पहुंचाया है? इसका
जवाब है-नहीं. यह तर्क कि सुपर बाजारों की श्रृंखला बिचौलिये को बाहर कर देगा, जिससे
किसानों को उनके उत्पादों के ऊंचे दाम मिलेंगे और इसी प्रकार, यह खेती शीतगृहों के
आधारभूत ढांचे के विकास में बड़ी मात्रा में निवेश करेगा.
यह सारे दावे गलत हैं क्योंकि वैश्विक अनुभव बताते हैं कि बड़े खुदरा व्यापारियों
ने किसानों को कहीं ऐसी मदद नहीं दी है. यहां तक कि ब्राजील, अजेंटिना, उरुग्वे और
कोलम्बिया समेत लैटिन अमरीकी देशों में; जहां सुपर बाजार दिग्गज बहुराष्ट्रीय
कम्पनियों द्वारा संचालित होते हैं और जिनका वहां के 65 से 95 प्रतिशत बाजारों पर
कब्जा है, वहां के किसान खेती छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं.
अगर सुपर बाजार अपने आप में इतना ही पूर्ण और गतिशीलता को बढ़ावा देने वाला होता तो
फिर अमरीका खेती के लिए भारी-भरकम सब्सिडी क्यों दे रहा है? आखिरकार वॉल मॉर्ट
अमरीकी कंपनी है, उसे अमरीकी किसानों को आर्थिक रूप से सम्पन्न करने में सहायता देनी
चाहिए थी. पर ऐसा हुआ नहीं.
अमरीकी किसानों को बचाने के लिए सरकार को 1995 से 2009 तक 12.50 लाख करोड़ का पैकेज
देना पड़ रहा है और इसमें प्रत्यक्ष आय सहायता शामिल है. अमरीकी सरकार द्वारा दी जा
रही यह सबसे बड़ी सब्सिडी है. अगर इस सब्सिडी को, जो विश्व व्यापार संगठन के आकलन
में ग्रीन बॉक्स के तहत आती है, रोक दी जाए, जैसी कि यूएनसीटीएडी-इंडिया ने चर्चा
की है, तो अमरीकी कृषि व्यवस्था ध्वस्त हो जाएगी.
दुनिया के 30 सम्पन्न देशों की संस्था, आर्थिक सहयोग और विकास संगठन यानी ओईसीडी की
2010 की ताजा रिपोर्ट में कृषि क्षेत्र को दी जाने वाली सहायता 2008 के 21 फीसद के
मुकाबले 2009 में 22 फीसद हो गई है. केवल 2009 में ही इन औद्योगिक सम्पन्न देशों को
12.60 करोड़ रुपये की मदद कृषि क्षेत्र को देनी पड़ी है. यही वजह है कि वहां के कृषि
क्षेत्र से होने वाली आमदनी ललचा रही है. बड़े खुदरा घराने की बात जाने दें तो अब
तक यूरोप के किसान अपना बोरिया-बिस्तर गोल कर गए होते.
इसके विपरीत भारत में बाजारों का वजूद किसानों और उनके उत्पादों की वजह से है, उन्हें
दी जाने वाली सब्सिडी के चलते नहीं. इसी संदर्भ में कहा जा सकता है कि हम अमरीका से
एक विफल मॉडल का आयात कर रहे हैं. जहां तक खेती से होने वाली आय की बात है तो 1950
तक अमरीकी किसान खाद्यान्न पर होने वाले प्रति डॉलर खर्च का 70 फीसद प्राप्त करता
था. 2005 तक यह घट कर तीन-चार प्रतिशत से ज्यादा नहीं रह गया.
आगे पढ़ें