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ईरोम शर्मिला का मानवाधिकार

बहस

 

ईरोम शर्मिला का मानवाधिकार

प्रशांत कुमार दुबे

ईरोम चानू शर्मिला


मैं ईरोम. ईरोम चानू शर्मिला. मैं कवयित्री थी, अब कार्यकर्ता हूं. पूर्वोत्तर की कई महिलाओं में से एक, जो मशालें लेकर चल रही हैं, अंधेरा जीतने के लिये. ज़रा बताईये तो हमारे प्रांत का राष्ट्रगीत में जिक्र नहीं, हमारे देश में हमारा कोई योगदान ही न समझा जाये, हमसे मिलने पर हमारे देश के लोग पूछें कि तुम जापान से हो या चीन से. ऐसे ही भारत के एक छोटे से प्रांत मणिपुर की धरती की बेटी हूं, मैं. हमारे प्रांत में हर वक़्त बंदूक की नोक पर रहना नाइंसाफी है. सेना जब चाहे तब मार सकती है, किसी को भी शक की बिना पर. वसूल लेती है किसी भी औरत से उसके औरत होने की पूरी कीमत.

‘‘मणिपुर और ईरोम के संघर्ष’’ को कुछ इस तरह से अपने नाटक ‘‘ले मशालें’’ में रखती हैं ओजस. पुणे की एक युवा रंगकर्मी. ओजस, देश भर में घूम-घूमकर बता रही हैं कहानी मणिपुर की, कहानी ईरोम की, कहानी लोकतंत्र की आत्मा के दरकने की, कहानी मानवाधिकार हनन की, कहानी सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून,1958 यानी एएफएसपीए की और ना जाने ऐसी कितनी ही अनसुनी कहानियों का निचोड़.

ईरोम को, मणिपुर के मालोम कस्बे में वर्ष 2000 में बस के इंतजार में खड़े 10 निहत्थे नागरिकों को केवल शक के कारण मार देने की घटना ने ऐसा झकझोरा कि वह इस एएफएसपीए का विरोध करने को उठ खड़ी हुईं. उन्होंने प्रण कर लिया कि अब वह अपने प्रदेश से एएफएसपीए के नहीं हटने तक अनशन करेंगी यानी यह आमरण अनशन था.

ईरोम अपने निर्णय पर असमंजस में थी, लेकिन उनका यह निर्णय सही निकला और सरकार ने ठीक दो दिन बाद ही उन्हें बलपूर्वक खाना खिलाना शुरु कर दिया. ईरोम को न्यायिक हिरासत में ले लिया गया. तब से लेकर अब तक यह उनके सत्याग्रह का 11 वां वर्ष है.

ईरोम का अनशन आज विश्व का सबसे लंबा चलने वाला अनशन है. सरकार ईरोम पर एक माह में लगभग 40,000 रुपये खर्च करती है. आज ईरोम का वजन 66 किलोग्राम से घटकर 34 किलो रह गया. वह इस बात से और उर्जा से लबरेज हो जाती हैं कि अब वह अकेली नहीं हैं, अब और लोग भी उनके समर्थन में आगे आ रहे हैं.

10 जुलाई 2004 को एक युवती थांगजाम मनोरमा को उनके घर से सेना द्वारा उठा कर ले जाने व उसका बलात्कार कर जान से मार देने पर उसकी मां खुमानलीला ने भी यह प्रण किया कि वह जब तक उसके दोषियों को सजा नहीं दिला लेती तब तक चैन से नहीं बैठेंगी.

इस घटना ने वहां की महिलाओं को भीतर तक हिला दिया. फलस्वरुप वहां की आम घरेलू मणिपुरी महिलाओं ने 15 जुलाई 2004 को असम राईफल्स के ईलाकाई मुख्यालय के सामने निर्वस्त्र होकर प्रदर्शन किया. उनका नारा था कि भारतीय सेना आओ और हमारा बलात्कार करो. यह आजाद भारत की सबसे शर्मनाक घटना थी, लेकिन इसके बाद भी सरकारों के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी.

ओजस अपने नाटक में इस घटना को लेकर या यूं कहें कि मणिपुरी की महिलाओं की स्थिति को लेकर एक संवाद में कहती हैं कि हम मांस के थरथराते झंडे हैं. देखो, बीच चौराहे पर हम लेकर खड़े हैं हमारी वही छातियां, जिन पर तिरंगे गाड़ देना चाहते थे तुम. अपने राष्ट्र से कहो कि वह घूरे हमें. अपनी राजनीति से कहो कि हमारा बलात्कार करे. अपनी सभ्यता से कहो कि वह हमारा सर काटकर फेंक दे हमें जंगल में. हमारी छोटी-छोटी उंगलियां काट कर लगा लो अपनी वर्दी पर लगा लो, स्टॉर्स की तरह.

यह एक पीड़ा है, जो अभिव्यक्त होती र्है नाटक में. लेकिन जो नाटक कह रहा है, वह सच्चाई भुगत रहे हैं यहां के बाशिंदे. मणिपुर के एक भूतपूर्व छात्र नेता अर्जुन मैती कहते हैं- “आप यहां सामान्य जीवन जीने की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं, केवल 5 किलोमीटर की यात्रा में आपकी 4 बार जांच होगी. आप इसकी पीड़ा तभी समझ पायेंगे, जबकि आप मणिपुर के हों.”

वो कहते हैं कि मणिपुर की खबर नेशनल मीडिया में नहीं आती है- “आप लोग तो जान ही नहीं पाते हैं कि हम किस नरक में जी रहे हैं. यह कानून, सेना को आम आदमी को मारने के लिये दिया गया किलिंग लाईसेंस है. यह भी रोचक ही है कि आज कोरिया में प्रतिदिन 600 लोग ईरोम के समर्थन में होने वाला नाटक देखने आ रहे हैं, लेकिन आज देश का नेशनल मीडिया अनभिज्ञता से कहता है- कौन हैं ईरोम !! ईरोम के प्रति मीडिया का यह नाकारापन अपने आप में अचंभित कर देने वाला है.”
इस कानून पर विचार करने के लिये सरकार ने वर्ष 2005 में न्यायमूर्ति जीवनरेड्डी कमेटी बनाई. इस कमेटी ने पुरजोर तरीके से कानून को जनपक्षीय बनाने पर जोर दिया और समीक्षा करने की बात कही. यह रिपोर्ट ही ठंडे बस्ते में डाल दी गई.

स्वयं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का कहना है कि यह कानून अमानवीय है. यह आश्चर्यजनक ही है कि जब सभी एक सुर में कह रहे हैं कि कानून अमानवीय है तो फिर इसे हटाने की पहल क्यों नहीं की जाती है !! समीक्षा यह भी हो कि स्वायत्तता की मांग कर रहे भूमिगत समूहों की राज्य सत्ता को उखाड़ फेंकने का यह संघर्ष दबने के बजाये और व्यापक हुआ है. कई नये भूमिगत समूह खड़े हो गये हैं. तो फिर जिस मूल काम के लिये यह कानून लाया गया, वह तो खत्म नहीं हुआ.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

डा. आर. अचल [achal.wac@gmail.com] देवरिया उ.प्र. - 2012-01-23 16:38:33

 
  दिल्ली इण्डिया मे है ईरोम भारत मे रहती हैं । दिल्ळी के लोगो कोइन्क्रेडेबल इण्डिया दिखता है दुर्दशा भोगने के लिए भारत अभिशप्त है।  
   
 

DEV NARESH [] BANGALORE - 2011-12-15 11:07:06

 
  टीम अन्ना से गुजारिश है कि ईरोम शर्मिला के लिये भी सरकार से बात करें और उनको इंसाफ दिलायें. अन्ना हजारे से अनुरोध है कि वे कम से कम वहां जा कर देखें तो सही कि सरकार ने उनकी क्या हालत बना कर रखी है. अन्यथा हमारे जैसे लोग भी यह सोचने के लिये बाध्य हो जाएंगे कि आप भी राजनीति ही कर रहे हैं. 
   
 

यूसुफ़ बेग [yousufbeg@gmail.com] पत्थर खदान मजदूर संघ पन्ना मध्य प्रदेश - 2011-12-11 04:28:03

 
  इरोम के इस संघर्ष को हम व्यर्थ ना जाने दें. हम सब को मिलकर इरोम का साथ देते हुए मणिपुर में लागू इस अंधे कानून में बदलाव लाने के लिए सरकार पर दबाव डालना पड़ेगा. इसके लिए देश भर के समाजसेवियों को आगे आना होगा और इस मुद्दे पर अगर विकास संवाद पहल करता है तो निश्चित रूप से इरोम के आन्दोलन को बल मिलेगा और सफलता कदम चूमेगी.
यूसुफ़ बेग
पत्थर खदान मजदूर संघ
पन्ना, मध्यप्रदेश
 
   
 

Ram Pandey [] Bhpal - 2011-12-10 18:10:15

 
  i m with her & you.
and aainst this UPA gov....come on india come on...!!!!
 
   
 

niyati sauriyal [sauriyalniyati@gmail.com] bhopal - 2011-12-10 17:46:53

 
  very nicely presented article.pure and truth depicting with little criticism.in true sense it depicts the reality,were all that glitters is not gold.several changes are meant to be done.the path is not that easy,but it is not impossible even. 
   
 

anil [aniaryan84@gmail.com] bilaspur - 2011-12-10 12:17:00

 
  भारत में भारतीयों के लिये मानवाधिकार की बात बिलकुल बेमानी है. भारत में तो केवल आतंकवादी बलात्कारी, कातिलों के लिये ही मानवाधिकार है, जिनको मानवता के तहत आरामदायक जेल में रखा जाता है और कठोर सजा नहीं दी जाती. सजा या फिर यातना तो केवल इरोम शर्मीला जैसे लोगो को दी जाती है. 
   
 

raghwendra sahu [raghwendrasahu@gmail.com] durg - 2011-12-10 07:03:18

 
  वास्तव में हमारी सरकारें वोट बैंक की राजनीति तक ही सीमित हैं और इसके साथ ये भी सच्चाई है कि हमारी मीडिया टी आर पी की अंधी दौड़ में इस कदर मशगूल है कि वास्तविक और अच्छी खबरों को कभी कभार ही दिखाकर अपने कर्तव्यों कि इतिश्री कर लेती है......हमारी सरकार के बड़े बड़े मंत्री बाबा रामदेव को मनाने जा सकते हैं..... हमारी मीडिया अन्ना के अनशन को कई दिनों तक चौबीसों घंटे दिखा सकती है लेकिन इरोम शर्मीला के अनशन को दिखाने के लिए प्राइम टाइम तो छोड़ दीजिये दिन में किसी भी समय दिखाने के लिए समय नहीं है.....कुछ चैनलों ने जरुर इरोम से सम्बंधित खबरें दिखाई है लेकिन वो नाकाफी है....मानवाधिकारों को कुचलने कि कोशिश जिस तरह से हमारी सरकारें करती है वो किसी से छुपी नहीं है......हमारी सरकारों कि संवेदन्शीलता का परिचय इसी बात से मिल जाती है जब रमन सिंह जैसा तथाकथित संवेदनशील मुख्यमंत्री दिल्ली में अपने निवास के बाहर खड़े मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से मिलना भी गंवारा नहीं समझते और छत्तीसगढ़ आकर मीडिया में गैर जिम्मेदाराना बयान जारी करते हैं कि कैसा मानव और कैसा अधिकार.......ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं.... 
   
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