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बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल
समाज
बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल
प्रभात रंजन
वार्ड नंबर 16- अब नगर निगम के कागजात में यही उसका पता है.
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लाल रत्नाकर |
न जाने कितनी संस्कृतियाँ, कितनी परम्पराएँ इसी तरह छोटे-छोटे पाटों में तब्दील हो
गईं.
कौन मानेगा- चतुर्भुज स्थान के शुक्ला रोड की सात गलियों में कभी संगीत के सात सुरों
की रौनक थी. ठुमरी थी, दादरा था, साजिन्दे थे, रात-रात भर चलने वाली महफ़िल थी. अब
तो बस धूल-धूल.... पिछले 20 सालों में जब-जब उधर से गुज़रा धूल पहले से भी ज्यादा
मिली. सड़कों की धूल छज्जों-चौबारों पर चढती जा रही है. यह कोठेवालियों का नहीं,
कोठीवालियों का इलाका था. बेनजीर बाई की वह हवेली, जिसे देखकर यहां की शानो-शौकत का
अंदाजा लगता था, सब धूल-धूल. “कोई नहीं रहता. लेकिन रात को अब भी अंदर से आवाजें आने
लगती हैं- सारंगी की. ऐसे, जैसे कोई रियाज़ कर रहा हो. कहते हैं अच्छन मियां की आत्मा
भटकती है यहां. 20 साल तक इसी हवेली में सारंगी पर संगत की थी. अचानक एक दिन बेनजीर
चली गई, हवेली में ताला लगाकर. सात समंदर पार. मियां कहां जाते, वहीं भटकते रहते
थे. कब अपने घर जाते, कब क्या खाते, कुछ होश नहीं. बजाना तो दूर, साज़ को हाथ लगाना
भी छोड़ दिया. माघ की ठंड पड़ रही थी. एक दिन सुबह उसी हवेली के बाहर अकड़े हुए मिले
थे. कहते हैं, तभी से उनकी आत्मा भटक रही है. न जाने कितनी आत्माएं भटक रही हैं. यहां
कुछ नहीं, इतिहास की धूल उड़ रही है, सब कुछ उसके नीचे ढकता जा रहा है...”
राजा चौधरी हर बात को किस्सागो के अंदाज़ में सुनाते- शुक्ला चौक पर जहाँ चौराहा है,
सामने चतुर्भुज स्थान का मंदिर, दाएं-बाएं सड़क के किनारे उनकी बसावट जिनके दरवाज़ों
पर हाथी-घोड़े, अलग-अलग मॉडल की मोटरगाड़ियों की आमद से धूल उड़ा करती थी. उसी चौराहे
पर सबसे कोने वाले घर में राजा चौधरी रहते हैं. जब भी उनसे मिलना हुआ, वहां की सौ
साल से भी पुरानी तहजीब-परंपरा के किसी अलग ही रूप-रंग से परिचय हुआ. जिनका कोई
इतिहास नहीं होता, उनका इतिहास ऐसे लोगों के सीने में ही होता है- किस्से-कहानियों
की तरह, जो कभी-कभी फूट पड़ता है.
एक कहानी पन्ना बाई की बची है, जो कभी हकीकत थी, यहां की रौनक थी. सबसे हाई रेट था.
उसकी महफ़िल करवाना शान की बात थी. मुगन्निया थी. नहीं समझे, सिर्फ गाना गाने वाली.
देखिये भाई, जिसे तवायफ कहते हैं न, चार काट की होती थीं- तवायफ, जो मुजरा करती
थीं, मुगन्निया यानी गाने वाली, लेकिन मुगन्निया सबके लिए नहीं गाती थी-
राजे-महाराजे तो बचे नहीं तो ज़मींदारों-रईसों के लिए गाने वाली, कद्रदानों के लिए
गाने वाली, रंडी वह होती थी जो कुछ नीचे के दर्जे वाले मर्दों के सामने नाचती-गातीं,
पेशा करतीं, सबसे निचले तबके की औरतें कसबी कहलाती थीं, जो मेलों-तमाशों में
घूम-घूम कर नाचती-गाती, शादी-ब्याह, जनेऊ में. पन्ना बाई मुगन्निया थीं. कहते हैं,
बनारस में विद्याधारी बाई से ठुमरी-दादरा सीखा, लखनऊ के रईसों से दाद पाई.
मुजफ्फरपुर तो बाद में आई. जिले के बाबुओं-सेठों-रईसों को भी उसकी आवाज़ की शोखी
पकड़ने में देर नहीं लगी. उन्हीं दिनों बाबू उमाशंकर सिंह ने उसकी गायकी पर रीझ कर
एक जुमला कहा था. ‘मै का न भाये तिहारी बतियाँ...’ दादरा के बोल थे. उमाशंकर बाबू
ने कहा था- हीरा है हीरा, बस नाम की पन्ना है’, बाद में यह जुमला लोग मुहावरे की
तरह दुहराने लगे.
देखते-देखते पन्नाबाई की धूम मच गई. कहा जाता है, उन दिनों किस बाबू की कितनी
शानो-शौकत बची है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जाने लगा था कि उसके यहां किसी शादी
में, किसी बच्चे के जनेऊ में पन्ना की महफ़िल सजी है या नहीं. बड़ी धाक थी उसकी. जब
बाज़ारों में निकलती, लोग उसकी धज देखते, छब तो थी ही खैर... सुतवां नाक में हीरे की
कनी पहनती थी. आँखें ऐसी गहरी कि जिसकी ओर ताक दे, उसकी आवाज़ हलक में अटक जाती थी.
बड़े घर की औरतों जैसा रुआब था पन्ना का. रुआब क्या था शहर में, गाँव में जहाँ जाती,
बड़ी घर की औरतें चोरी-छुपे उसके पहनने के अंदाज़, सज-धज को देखा करती और उसके जैसा
मॉडर्न बनने की कोशिश किया करती. बस गाना सुनाती थी. मजाल है, जो कोई कुछ ऊँच-नीच
बोल भी दे. आसपास के कई जिलों के रईस उसकी महफ़िल में आते. उसके एक इशारे पर सब कुछ
न्यौछावर करने को तैयार रहते. लेकिन पन्ना सबको अपनी हद में रखती थी.
कई किस्से हैं. एक बार नेपाल साइड के एक बाबू उसका नाम सुनकर गाना सुनने आये. महफ़िल
में बैठ गए और एकटक उसे देखने लगे. पन्ना गा रही थी. गाते-गाते अचानक बीच में रूककर
बोली, “बाबू साहब, गाना सुनने की चीज़ होती है देखने की नहीं. महफ़िल में आये हैं तो
कुछ तौर-तरीके भी सीख आते.” सन्नाटा छा गया.
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सस्ती का ज़माना था, फिर भी उनके घर के दरवाज़े पर यहां जाने से पहले अच्छे-अच्छे
मालदार असामियों को भी अपनी अंटी का वज़न तौलकर देख लेना पड़ता था. महफ़िलों में भी
खूब गईं, लेकिन केवल पैसे के लिए ही नहीं. कहते हैं, पन्ना उन्हीं घरों की महफ़िलों
में गई जहाँ अदब था, तहजीब थी. चाहे जितना भी पैसा किसी ने देना चाहा, मन नहीं हुआ
तो गाने नहीं गई.
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लाल रत्नाकर |
ज़मींदारी के बिखरने के दौर में कई-कई रसूखदारों की बर्बादी के साथ पन्ना की महफ़िलों
को जोड़कर देखा गया. बखरी मठ के महंत ने अपनी बेटी की शादी में बारातियों के लिए तीन
रात की महफ़िल सजाई थी, जिसमें नज्जू खान भी आये थे, लेकिन मुंहमांगी रकम लेकर उस
महफ़िल की शोभा जिसने बढ़ाई, वह पन्ना ही थी. कहते हैं, उस शादी की शानो-शौकत में
महंत ने 40 बीघे खेत कुर्बान कर दिए थे. शादी का सबसे बड़ा खर्चा लेकिन पन्ना ही थी.
नज्जू खां ने मोईन हसन ज़ज्बी की गज़ल ‘दुनिया को समझ के बैठे हैं अब दुनिया-दुनिया
कौन करे’ से समां बाँधा था, तो पन्ना की गाई ठुमरियां तो बाद में उस महफ़िल के गवाह
बने हजारों लोग गुनगुनाने लगे थे. तब न तो गीतों को रेकॉर्ड करना इतना आसान होता
था, न लोगों के लिए संगीत सुन पाना इतना आम हुआ था. संगीत लोग या तो रेडियो पर सुनते
या बड़े-बड़े बाबुओं के यहां तवे पर. बाकी तो महफ़िलों में संगीत सुना जाता था और
गुनगुनाकर लोग उसकी याद संजोते. ‘दिल लेके मुझे बदनाम किया...’, ‘काहे जलावत मोरा
जिया’, ‘प्रीत करि है तो निभानी पड़ेगी, रसिया जीवन की डोर सुलझानी पड़ेगी’, ‘बाली
उमरिया में दाग कियो रे/ बीच नगर बदनाम कियो रे’ जैसे न जाने कितने गीत उनके जाने
के बरसों बाद भी सीतामढ़ी के बखरी के उस महफ़िल में आये बाबू लोग गुनगुनाते हुए अपने
आप में ही मुस्कुराने लगते थे. जिस महफ़िल में एक बार गा देती, उस महफ़िल की खुशनुमा
याद बनकर लोगों के दिलों में बस जाती. न जाने कितने लोगों की साध होती थी, एक बार
पन्ना का गाना सुनने को मिल जाए. ज़माना कुछ और था- राजा चौधरी आहें भरते, कौन मानेगा
मुजफ्फरपुर में तब लोग संगीत सुनते ही नहीं थे, उसे समझते भी थे.
कहावत थी कि इलाके में कोई अच्छा गवैया हो और उस पर दरभंगा महाराज की नज़र न पड़े, ऐसा
हो ही नहीं सकता था. आखिरी महाराजा कामेश्वर सिंह गीत-संगीत के बड़े पारखी थे,
कलाकारों को प्रोत्साहन देने में भी पीछे नहीं हटते थे. 50-60 के दशक में देश के
तीसरे सबसे धनी आदमी थे. उनकी महफ़िल में गाने का मौका मिल जाए, इसके लिए देश के
बड़े-बड़े गुणीजन आँख लगाए रहते थे. पन्ना को वहां भी मौका मिला खूब मिला. उस ज़माने
में महाराज ने 1500 महीने का वजीफा पन्ना को मुक़र्रर किया था. दरबार की महफ़िलों में
गाने के जो मिलते उसकी कोई गिनती नहीं थी. कहते हैं, महाराज उसके गाने पर इतने
मोहित थे कि उसकी महफ़िल सजाने के बहाने ढूंढते रहते. मौके-कुमौके उसने दरभंगा राज
की शान बढ़ाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी.
उन दिनों एक कहावत बड़े-बूढ़े सुनाया करते थे- मुग़ल नवरत्न के लिए जाने गए तो दरभंगा
राज रत्नों के लिए. दुनिया भर के नायाब रत्नों का संग्रह वहां के महाराजाओं ने कर
रखा था. कहते हैं, उन रत्नों में मुगलिया खानदान की पहचान एक तराशा हुआ पन्ना भी
था, जिसके जोड़ का दूसरा पन्ना दुनिया में नहीं था. उन्हीं दिनों वहां दरबार में यह
बात मशहूर हुई, महाराज के पास दो-दो पन्ना है, एक उनके गले में लटकी हुई बड़ी पन्ना,
दूसरी गले वाली यानी गाने वाली पन्ना.
कहते हैं पन्ना ग़ज़लें लिखा करती थी और अपनी कुछ ग़ज़लें उसने महाराजा के लिए खास तौर
पर गाई भी थीं. उनकी लिखी कुछ ग़ज़लें मुझे बाद में राजू तबलानावाज़ ने सुनाई थी.
संयोग से उस्ताद वज़न खान साहब के यहां उनसे मुलाकात हुई थी. बाद में वे भी बनारस
में रहने लगे थे. मुजफ्फरपुर, अपने पुराने वतन आये थे तो उस्ताद का हाल-चाल लेने आ
गए थे. एक ग़ज़ल के चंद शेर आप भी मुलाहिज़ा फरमाएं-
आप क्या आये आशियाने में
हम भी रुसवा हुए ज़माने में
जो मिली थी मुराद की घड़ियाँ
कट गई वो भी आजमाने में
हम जिन्हें राज़दां समझते रहे
लग गए वो भी इश्तिहारों में
आप क्या आये आशियाने में
हम भी रुसवा हुए ज़माने में
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पन्ना दरबार की गायिका हो गई. उसके अंदाज़ बदल गए. कुछ तो पहले से ही उसकी सुतवां
नाक चढ़ी रहती थी, कुछ और चढ़ गई. पन्ना के नाज़-नखरे ने उसके बड़े दुश्मन बनाये. इतने
कि बाबू लोगों ने एक गायिका को बनारस से बुलाकर वहां बसाया और उसका नाम भी पन्ना
बाई रख दिया. तब पन्ना बाई को लोग बड़ी पन्ना बुलाने लगे. वही बड़ी बनी रही. छोटी
पन्ना बाई भी अच्छा गाती थी. लेकिन बड़ी पन्ना जैसी शोखी कहां? वह नाज़, वह अंदाज़.
इसीलिए वही बड़ी बनी रही. यह ज़रूर हुआ कि बड़ी पन्ना की महफ़िल खास-खास मौकों पर ही सजा
करती. वह दुर्लभ होती गई. उसकी आवाज़ को लोग तरस जाते.
चतुर्भुज स्थान में एक से एक गायिकाएं थीं उन दिनों पर सुनने वाले सबको पन्ना बाई
के पैमाने से ही देखते यानी उससे अच्छा गाती है या खराब. अच्छा होने का तो सवाल ही
नहीं उठता था, कितना उसके जैसा गाती है, इसी से रसिक समाज संतोष कर लिया करता. वह
चतुर्भुज स्थान की संगीत-महफ़िलों की संस्कृति का आखिरी दौर था. बदलने की शुरुआत हो
गई थी, लेकिन अच्छे-अच्छे गायक-गायिकाएं, उस्ताद तब थे, उनकी शान थी, यहां रौनक थी.
पन्ना थी- राजा चौधरी की सूई उस दिन पन्ना पर अटकी हुई थी.
सब दिन एक समान नहीं रहते. समय का पहिया आगे बढ़ता जाता है, पीछे छूटता जाता है-
कुछ-कुछ बहुत कुछ. एक नया दौर शुरु हो गया था. उन्हीं दिनों कलाकारों को यह बात समझ
में आने लगी थी कि अदब-तहजीब के सहारे पेशा नहीं चलाया जा सकता. जिसको मौका मिल रहा
था, वह घर बसाकर अपनी उस पहचान को अलविदा कह देते. गायिकाएं ही नहीं, साजिन्दे भी
या तो बनारस का रुख करने लगे थे या दिल्ली का. पन्ना ने न दर छोड़ा न शहर. यहीं रहती
रही. दिन के वक्त तो उसकी कोठी से रियाज़ की आवाजें तो आतीं लेकिन शाम के समय जब
चतुर्भुज स्थान तबलों की थापों, आलापों, घुँघरू की आवाजों से गुंजायमान हो जाता,
पन्ना के यहां अक्सर सन्नाटा पसरा रहता. रेडियो पर सुगम संगीत के कार्यक्रमों का
दौर नया-नया चला, संगीत-सभाओं का चलन बढ़ा.
पन्ना को आकाशवाणी पर प्रोग्राम मिलने लगे, बड़ी-बड़ी संगीत सभाओं में उसे बुलाया जाने
लगा. पन्ना बाई बड़ी पन्ना से अब पन्ना देवी बनने लगी. इसी नाम से आकाशवाणी से उसके
गाये गीत प्रसारित होते. तौर-तरीके तो उसके पहले ही ऊंचे घराने की औरतों जैसे थे,
उसका सम्मान भी बढ़ने लगा. इसके कई प्रमाण मिलते हैं. 70 के दशक में यूनेस्को ने
भारत के गायक-गायिकाओं एवं अलग-अलग साज़ बजाने वाले कलाकारों का दस्तावेज़ तैयार
करवाया था. उसमें देश के सभी नामी-गिरामी कलाकारों के नाम दर्ज हैं. चतुर्भुज स्थान
से केवल एक नाम दर्ज किया गया- पन्ना बाई यानी बड़ी पन्ना यानी पन्ना देवी का. पन्ना
ने खूब नाम कमाया और दाम भी. कहते हैं, दिल्ली-लखनऊ जैसे कई शहरों में पन्ना की
कोठियां थीं. कि पन्ना गर्मियों में शिमला-नैनीताल की वादियों में समय बिताती है.
पन्ना जीते जी ही किस्से-कहानियों में तब्दील होने लगी थी.
बड़ी पन्ना के तीन बच्चे हुए. दो लड़कियां और एक लड़का. पन्ना ने उनको अपनी इस रवायत
से दूर ही रखा. उनको ऊंची से ऊंची तालीम दी. उनका बेटा लखनऊ के मशहूर क्रिश्चियन
कॉलेज में पढ़ा, बेटियां मसूरी के मशहूर बोर्डिंग स्कूल में पढ़ीं. कहते हैं उन बच्चों
के पिता बड़े रसूखदार थे. सारा इंतज़ाम उनकी वजह से ही हुआ. दरभंगा महाराज का देहांत
हो गया. राजे-रजवाड़े धूल में मिल कर आम हो रहे थे. बड़ी-बड़ी ज़मींदारियां घर में
सजाकर रखने वाले ज़मींदारी बौंड में बदल रही थीं. शहर में नव-दौलतिये छाते जा रहे
थे. महफ़िलों का रंग बदल रहा था. जो संगीत कभी दरबारों की महफ़िलों में कला का दर्ज़ा
रखती थी, वह आम लोगों के लिए मनोरंजन में बदलता जा रहा था. ज़माने की रूचि बदल रही
थी.
पन्ना ने शहर छोड़ दिया. बड़े कलाकारों में सबसे पहले उसी ने चतुर्भुज स्थान को अलविदा
कहा. कहते कि अपनी बेटियों स्वर्णलता और प्रेमलता के साथ वह इंग्लैण्ड चली गई थीं.
एक डॉक्टर थी, दूसरी केमिस्ट. पहले तो लोग यही समझते रहे कि शायद पन्ना शिमला गई
होगी या किसी संगीत सम्मलेन में. लेकिन नहीं... पन्ना चली गई थी. बड़ी पन्ना की कोठी
रह गई. कभी उसे देखने भी नहीं आई. कोई नहीं आया. न कोई खबर आई. फिर कभी किसी ने बड़ी
पन्ना को नहीं देखा, उनके बारे में नहीं सुना...
बड़ी पन्ना के टुकड़े-टुकड़े दास्तान के उस दिन राजा चौधरी ने कई टुकड़े सुनाये थे. शाम
हो रही थी. यह मेरी ‘शराफत’ का तकाजा था कि राजा चौधरी को अलविदा कहूँ अगली मुलाकात
के लिए, जो कई बार कई-कई साल बाद हुई. शाम के साथ चतुर्भुज स्थान में अँधेरा गहराने
लगता था, जहाँ कभी फन का उजाला फैला था. अब क्या है, बाकी बच गई समय की धूल. कवि
होता तो कहता- सभ्यता की धूल. मैं बढ़ने लगा. पानी टंकी की तरफ. आगे धूल उड़ाता एक
ट्रैक्टर जा रहा था. टेलर के पीछे लिखा था-
चलती है गाड़ी उड़ती है धूल
बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल...
(शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक ‘बदनाम बस्ती के किस्से’ का एक अंश)
20.12.2011, 14.54 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | pramodkumar [] muzaffarpur - 2012-01-07 17:00:14 | | | |
प्रमोद जी, मुजफ्फरपुर वासियों को आपकी पुस्तक का इंतजार है. | | | | | | | | S P Misra [nalandaarts.hk@gmail.com] hongkong - 2011-12-26 03:46:41 | | | |
प्रभात जी ऐसा लगा सचमुच आँखों के सामने सब कुछ देख रहा हूं. बधाई ऐसी पुस्तक के लिए... और शुभकामनाएं.. धन्यवाद. | | | | | | | | Aparna [aparnashrey@gmail.com] Ahmedabad - 2011-12-22 03:05:50 | | | |
बात करता सा रिपोर्ताज .. बधाई ! | | | | | | | | gurudas bharati [gurudas.bharti1@gmail.com] churu rajasthan - 2011-12-21 13:51:08 | | | |
प्रभात जी आपने तो इस तरह से सारा लिख दिया मानों आप उन महफिलों में मौजूद थे. शानदार लेखन के लिये मेरी बधाई. | | | | | | | | Sanjay Garg [sanjaykumargarg@gmail.com] Patna - 2011-12-21 10:49:17 | | | |
क्य़ा खूब लिखा है प्रभात जी आपने. खुदा कसम, जान ले ली. | | | | | | | | arun chandra roy [] - 2011-12-21 06:06:08 | | | |
किताब के लिए शुभकामनाएं!....शानदार प्रभातजी. बहुत सुंदर | | | | | | | | priya verma [priyaverma181@gmail.com ] gurgaon - 2011-12-21 04:55:10 | | | |
गुजरे वक्त को आपने बहुत ही शानदार तरीके से लिखा है, जबकि हमारी एक उपर की पीढ़ी भी उस वक्त की नहीं है, फिर भी पढ़ते हुये लगा कि यह सब मैं अपनी आंखों के सामने घटते हुये देख रही हूं. | | | | | | | | श्याम बिहारी श्यामल [shyambiharishyamal1965@hotmail.com] सी- 27 / 156, जगतगंज, वाराणसी (उप्र) - 2011-12-21 01:08:28 | | | |
वाह... मुजफ्फरपुर की मौलिक पहचानों में से एक गायकी और गुजरे वक्त की पन्ना जैसी अजीम शख्सीयत का अद्भुत चित्रण किया है प्रभात रंजन ने... प्रस्तावित किताब के नाम को ही थोड़ा अनुकूल कर लूं तो कहना चाहूंगा- बदनाम बस्ती के बेजोड़ किस्से। लेखक को उल्लेखनीय कामयाबी के लिए बधाई और बेहतरीन पोस्ट की प्रस्तुति के लिए रविवार का आभार... | | | | | | | | prathmesh [prathmeshmishra@indiatimes.com] bilaspur, chattisgarh - 2011-12-20 18:06:12 | | | |
पूरा दृश्य आंखों के सामने फिल्म सा दिखने लगा. वाह भाई वाह ! इन जगहों को उनकी कहानियों के साथ संजोने का काम होना चाहिये. | | | | | | | | Dr. A. K. Mishra [ajaimau@rediffmail.com] Maunath Bhanjan ditt. Mau(U.P.) - 2011-12-20 15:01:13 | | | |
प्रभात रंजन जी ने मुजफ्फरपुर की कला एवं संस्कृति की एक अनूठी मिसाल को कलमबद्ध कर पढ़ने का अवसर दिया, उसके लिये उन्हें बधाई. वास्तव में हमारे नैतिक गिरावट के पीछे देखा जाये तो एक ये भी कारण है कि हम अपनी सांस्कृतिक विरासत को भूल गये हैं या उसे समझना नहीं चाहते. मेरा व्यक्तिगत मत है कि जिस दिन हम अपने अतीत को समझ जाएंगे, उस दिन हमारे अंदर उत्पन्न हो रही कटुता और शत्रुता एक बड़ी सीमा तक समाप्त हो जाएगी. पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी. | | | | | | | | vibhawary ranjan [] Patna - 2011-12-20 14:51:17 | | | |
लाजवाब...बेहद सजीव-सा चित्रण... | | | | | | | | राकेश [rakeshjee@gmail.com] दिल्ली - 2011-12-20 14:40:39 | | | |
शानदार प्रभातजी. बहुत सुंदर. किताब के लिए शुभकामनाएं! | | | | | | | | याज्ञवल्क्य वशिष्ठ [yagnyawalky@gmail.com] ambikapur surguja - 2011-12-20 11:37:48 | | | |
गजब का चित्रण है ..इस किताब का इंतजार रहेगा | | | | | | |
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