हर एक द्वंद्व ज़रुरी होता है
बात पते की
हर एक द्वंद्व ज़रुरी होता है
प्रीतीश नंदी
चाहें तो इसे द्वंद्व कह लें, या टकराव, या फिर इसे विकास की द्वंद्वात्मकता कहकर
पुकारें. चाहे आप इसे कोई भी नाम दें, दुनिया संघर्षों और टकरावों के सहारे ही आगे
बढ़ती है. हम शांति और स्थायित्व के बारे में अंतहीन बातें कर सकते हैं लेकिन इसे
बरकरार रखना बेहद मुश्किल है. लेकिन जो भी चीज बदलाव लाती है और नए विचारों, नए
बाजारों, नए अवसरों का पथ प्रशस्त करती है, वह हमेशा संघर्षपरक और द्वंद्वात्मक ही
होती है. इसी से यथास्थिति भंग होती है और परिवर्तन की लय विकसित होती है. इसी
प्रक्रिया में दुनिया परिवर्तित होती जाती है.
हर बार जब कोई व्यक्ति, कोई ब्रांड या कोई संस्थान चुनौतियों का सामना करता हो तो
दुनिया बदलती है. यह हमें कुछ नया सोचने के लिये बाध्य करती है. इसका एक ऐतिहासिक
उदाहरण है, पेप्सी द्वारा कोक को चुनौती देना, जिसके बाद हमने पहली बार एक झागदार
शीतल पेय पदार्थ की मांग के अद्भुत लचीलेपन को पहचाना था. या जब पेंटहाउस ने
प्लेबॉय को चुनौती दी तो एक हाशिये का व्यवसाय, दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में
शुमार हो गया.
हाल ही का एक उदाहरण लें, जब मुकेश और अनिल अंबानी के बीच मनमुटाव हुआ तो ऐसा लगा
कि यह एक आत्महंता कदम है और विशालकाय अंबानी साम्राज्य के पतन के बारे में शोककथन
लिखे जाने लगे, लेकिन दो साल बाद ही हमने पाया कि हुआ इससे ठीक विपरीत.
इस विवाद के कारण उनकी कुल संपदा बढ़कर चौगुनी हो गई. इसी तरह, अगर कोई एक चीज
हमारी मरणासन्न राजनीति को पुनर्जीवित कर सकती है तो वह अन्ना हजारे का आक्रामक
आंदोलन ही है, जिसने एक आलसी और भ्रष्ट सरकार को अपने उत्तरदायित्वों के प्रति सचेत
कर दिया है. साथ ही उसने इतने ही काहिल और भ्रष्ट विपक्ष को भी जगा दिया है.
यदि द्वंद्व ही बदलावों के उत्प्रेरक हैं तो हम बार-बार सामंजस्य, समझौते, संघर्षो
से मुक्ति के महत्व पर जोर क्यों देते हैं? हर आध्यात्मिक गुरु इसी बारे में बात
करता है. राजनेता भी यही भाषा बोलते हैं. यहां तक कि कारोबारी भी कहते हैं कि
दुनिया के विकास और समृद्धि के लिए स्थायित्व ही एकमात्र रास्ता है. यदि स्थायित्व
चला गया तो बाजार ध्वस्त हो जाएगा और बाजार के साथ ही संसार भी समाप्त हो जाएगा.
वास्तव में सच इससे उलट है. संघर्ष और टकराव चाहे कितने ही रक्तरंजित और अनुचित जान
पड़ें, लेकिन वे व्यवसाय, राजनीति और अक्सर मानवाधिकारों के लिए भी अच्छे होते हैं.
यथास्थिति कमोबेश शोषण, भ्रष्टाचार और अनुचित की निरंतरता का प्रतिनिधित्व करती है.
वह स्वतंत्र विचार के अभाव का भी प्रतिनिधित्व करती है. यदि दुनिया में पर्याप्त
द्वंद्व नहीं होते, तो वह अभी तक सड़ चुकी होती.
महान धर्मो का उदय द्वंद्व से हुआ है. हर संप्रदाय और उपसंप्रदाय को अपने उद्भव और
विकास के समय खूनी टकरावों का सामना करना पड़ा है. इसलिए भले ही धर्म हिंसा का
परित्याग करने की बात कहते हों, लेकिन सच्चाई यही है कि उनके साम्राज्य का विस्तार
हिंसा के आधार पर हुआ है. उदार नेता हमारे दिलों में राज तो करते हैं लेकिन वे
हमारे द्वारा निर्मित उस दुनिया में अब बिल्कुल प्रासंगिक नहीं रह गए हैं, जहां
केवल बैर और बखेड़े से ही आगे बढ़ा जा सकता है. यदि ओसामा का कोई अस्तित्व नहीं
होता, तो हमने एक ओसामा रच लिया होता या कहें कि शायद उसे हमने ही रचा था.
गोडसे ने गांधी की हत्या की और उन्हें अमर कर दिया. नहीं तो संभव है कि हम उन्हें
उनके जिंदा रहते ही भुला दिया होता. ठीक उसी तरह, जैसे दुनिया ने मिखाइल गोर्बाचेव
को भुला दिया है. हम इतिहास में उन क्षणों का सर्वाधिक उत्सव मनाते हैं, जो रक्त से
सने हुए होते हैं. जो हिंसा और आक्रोश से भरे पड़े होते हैं. हमारी राष्ट्रीय पहचान
युद्धों से ही तय होती है, क्योंकि दुनिया का नक्शा लगातार बदलता जा रहा है.
साम्राज्य सिकुड़ रहे हैं, नए देश जन्म ले रहे हैं.
द्वंद्व के नए-नए उपकरण ईजाद किये जा रहे हैं. ये उपकरण ही बदलाव के वाहक हैं.
इसीलिए जब कपिल सिब्बल सोशल नेटवर्किग साइट्स के विरुद्ध रुख अख्तियार करते हैं, तब
वे ठीक वही कर रहे होते हैं, जो हर सरकार करना चाहती है: यथास्थिति को बरकरार रखना.
क्योंकि यथास्थिति में ही उनके सत्ता में बने रहने की संभावनाएं जीवित हैं. इसीलिए
हर सत्तारूढ़ दल अपने दूसरे चुनाव अभियान का प्रारंभ स्थायित्व के वादे के साथ करता
है. यह इस मिथक का परिणाम है कि जो मौजूदा है, उपस्थित है, वही संपूर्ण है. उससे
श्रेष्ठ और कुछ नहीं. जो भविष्य के गर्भ में है, आने वाला कल है, वह खतरनाक साबित
हो सकता है.
लेकिन दुनिया का अस्तित्व इसीलिए है कि वह खतरों के साथ खेलती है. द्वंद्व ही बाजार
को पैदा करते हैं, द्वंद्व नए परिवर्तन लाते हैं. द्वंद्व से नये अवसर निर्मित होते
हैं, द्वंद्व ही सामाजिक ढांचे को पुनर्परिभाषित करते हैं, हाशिये पर पड़े लोगों के
लिये उम्मीद जगाते हैं. द्वंद्व हमें निरंतर होने वाले परिवर्तन का महत्व समझाते
हैं. हमारे समय के दार्शनिक सुनत्सू बताते हैं कि हमें द्वंद्व से दूर नहीं भागना
चाहिए, बल्कि कुशलतापूर्वक उन पर विजय प्राप्त करनी चाहिए और उनका उपयोग अपने जीवन
में बदलाव लाने के लिए करना चाहिए.
श्रीमद्भगवद्गीता भी हमें यही सिखाती है कि सभी द्वंद्व का सामना करना और उन पर
विजय प्राप्त करने का प्रयास करना ही हमारा नैतिक दायित्व है, हमारा कर्म है. इन
अर्थो में, गीता हमारे अतिरेकपूर्ण समय में निश्चित ही एक युगांतरकारी ग्रंथ है. वह
रक्तपात और हिंसा के युग में अपना अस्तित्व बचाए रखने की एक दुर्लभ और अद्वितीय
नियम पुस्तिका है. गीता पर प्रतिबंध लगाने की बात करना तो निश्चित ही मूर्खतापूर्ण
होगा, इससे कहीं बेहतर होगा उससे अपने लिए कुछ सीखने का प्रयास करना.
22.12.2011, 00.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित