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अकाल से बेअसर सरकार

अकाल में बेअसर सरकार

राजेन्द्र बंधु

देवास, मध्यप्रदेश से

बीजाखेड़ा गांव के दलित परेशान हैं. अब अगर पानी का आखरी स्रोत भी खत्म हो जाएगा तो इस हाड़ पिघला देने वाली गरमी में वे कहां जाएंगे ? लेकिन मामला अकेले बीजाखेड़ा का नहीं है. पन्ना, टीकमगढ़ और छतरपुर के अधिकांश इलाकों में भूख और पानी का सवाल गहराता चला जा रहा है. इन इलाकों में पिछले दो सालों से पड़े सूखे ने लोगों का सुख-चैन छिन लिया है. ये और बात है कि राज्य सरकार इस सूखे से बेअसर है. राजधानी भोपाल से लेकर राज्य के गांवों तक सरकारी योजनाओं की एक लंबी फेहरिस्त है, आश्वासन हैं, दावे हैं नहीं है तो केवल इस सूखे से लड़ने का कोई इंतजाम.

बुंदेलखंड के इन तीनों जिलों के गांवों में एक अजीब-सा सन्नाटा पसरा हुआ है.

खाली हो रहे हैं गांव

बुन्देलखंड के कई गांवों की बड़ी आबादी पलायन कर गई है और गांवों में केवल महिलाएं और बुजुर्ग रह गए हैं.

अधिकांश घरों में सूखे का सवाल लोगों के चेहरे पर जैसे चिपक गया है. बड़ी संख्या तो ऐसे लोगों की है, जिन्हें लगा कि अब वे इस सवाल का सामना नहीं कर सकते तो उन्होंने जाने किन-किन शहरों की ओर रुख कर लिया.

सच तो ये है कि दो वर्षों से सूखे की मार झेल रहे इस इलाके में इन दिनों अकाल की स्थिति निर्मित हो गई है. दूरदराज के गांवों में रोजगार, पानी और खाद्यान्न का संकट इतना भयावह रूप ले चुका है कि लोग भारी तादाद में पलायन को मजबूर है. प्रशासनिक लापरवाही के चलते सरकारी विकास योजनाएं भी अकाल की शिकार हो गई.

ज्यादातर क्षेत्रों में राशन दुकानें महीने में सिर्फ दो दिन खुलती है. कई स्कूलों में मध्यान्ह भोजन बंद है और दलित-आदिवासी समुदाय के बच्चे आंगनबाड़ी तक नहीं पहुंच पा रहे हैं. पलायन से मुक्ति के उपाय के रूप में देखी जा रही राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का आलम यह है कि वर्ष 2007-08 में लोगों को 100 दिन के बजाय औसतन 50 दिन का ही रोजगार हासिल हो पाया है.

खाली गांव
मध्यप्रदेश में शामिल बुन्देलखंड के पांच जिलों- पन्ना, टीकमगढ़, छतरपुर, दमोह और सागर में पिछले दो सालों से औसत से बहुत कम वर्षा हुई. इसमें पन्ना, टीकमगढ़ और छतरपुर में हालात ज्यादा गंभीर है. यहां अकाल की भयावह स्थिति को देखते हुए सरकारी विकास व राहत योजनाओं का ठीक से क्रियान्वयन नहीं किया गया तो कुछ ही दिनों में गांव खाली हो जाएंगे. आज भी कई गांवों की आधी से ज्यादा आबादी दिल्ली, सूरत, मुम्बई जैसे शहरों में रोजगार की तलाश में जा चुकी है.

पन्ना जिले के शाहनगर ब्लाक के ग्राम महगवां में रोजगार गारंटी योजना का काम समय पर शुरू नहीं होने से 100 से ज्यादा लोग शहरों की ओर पलायन कर गए. हाल ही में यहां इस योजना का काम तो शुरू कर दिया गया है, किन्तु समय पर मजदूरी न मिलने से ग्रामवासी परेशान हैं. कहा जाता है कि इंजीनियर द्वारा समय पर काम का मूल्यांकन नहीं करने से मजदूरी का भुगतान नहीं हो पा रहा है.

इसी ब्लाक के नूनागर गांव के साधुराम, सोनेलाल, शिवकुमार दिल्ली में 75 रूपए रोज की मजदूरी पर बैलदारी का काम कर रहे हैं. दिल्ली जैसे महानगर में इतने कम मेहनताने से उनका भरण-पोषण मुश्किल हो गया है, साथ ही उन्हें स्वास्थ्य की समस्याओं से गुजरना पड़ रहा है और उनके बच्चों का स्कूल छूट गया है. दस एकड़ जमीन का मालिक होने के बावजूद इस गांव का किशोरसिंह सूरत में कपड़ा व्यापारी के यहां 100 रूपए दैनिक मजदूरी पर हमाली करने को विवश है. इन 100 रूपयों को हासिल करने के लिए उसे एक दिन में पूरे 12 घंटे काम करना पड़ता है.

पहली बार चावल की खरीदी
शाहनगर ब्लाक के ग्राम देवरी के केशव चौधरी बताते हैं कि इस गांव में 50 से ज्यादा लोग काम की तलाश में दमोह, सागर, कटनी जैसे आसपास के शहरों में चले गए. गांव में जो लोग शेष बचे हैं, उनके पास भी अनाज खत्म होने लगा है. इस गांव में हर साल 2000 क्विंटल धान का उत्पादन होता था, वहीं इस साल 25 क्विंटल धान भी पैदा नहीं हुआ. लोगों को बाजार से 14 से 16 रूपए प्रति किलों के भाव से चावल खरीदना पड़ रहा है. क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता राजेन्द्र मौर्य बताते हैं कि शाहनगर के साप्ताहिक हाट में पहले कभी एक किलोग्राम चावल भी नहीं बिकता था, वहीं अब हर सप्ताह 3 ट्रक चावल बिकता है. इससे जाहिर है कि लोग खाद्यान्न के मामले में पूरी तरह बाजार पर निर्भर हो चुके है.

अकाल की दशा में उचित मूल्य की सरकारी राशन दुकान भी लोगों के लिए परेशानी का सबब बनी हुई है. नियमों के अनुसार जहां राशन दुकान एक महीने में कम से कम 26 दिन खुलनी चाहिए, वहीं ग्राम नूनागर, महगवां, देवरी और बीजाखेड़ा की राशन दुकानें एक महीने में सिर्फ दो या तीन दिन ही खुलती है. दुकान खुलकर कब बंद हो जाती है, यह लोगों को पता ही नहीं चलता, जिससे अधिकांश लोग सस्ती दर पर राशन नहीं खरीद पाते.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

suresh kumar ramteke

 
 ye to hamara hi kiya hua hai aur esko hamen hi bhugatna hai. 
   
 

Shruti Sharma

 
 अच्छी रिपोर्ट है. आंख भर गई कि दुनिया में पानी की इतनी कमी है और हम पानी का कैसा दुरुपयोग करते हैं. 
   
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