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इस अंक में

 

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लेकिन असली नायक कहां हैं?

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2012 में खत्म हो जाएगी दुनिया?

बाईलाइन

 

2012 में खत्म हो जाएगी दुनिया?

एम जे अकबर


अंकों के खेल में धुरंधर माया सभ्यता के किसी शख्स ने 5,125 वर्ष पहले एक कैलेंडर की शुरुआत की. इस कैलेंडर की आखिरी तारीख 21 दिसंबर 2012 रखी गयी. ऐसा क्यों किया गया, इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया. आज के किसी भी खगोलविद् की तुलना में इस कैलेंडर को बनाने वाला बेहतर स्थिति में कहा जायेगा. वह हमारे आसपास नहीं है कि उससे यह सवाल पूछा जा सके कि क्या वह सही था? तो क्या सचमुच दुनिया 12 महीनों से भी कम समय में खत्म हो जायेगी. मेरी खुद की भविष्यवाणी है कि हां.

राहुल गांधी


यह दुनिया उन ज़्यादातर लोगों के लिए समाप्त हो जायेगी, जो आज दुनिया का नेतृत्व कर रहे हैं. आज के सुपरस्टार किसी ब्लैकहोल में गुम हो जायेंगे. मैं यह नहीं कहना चाह रहा कि दुनिया वाकई 2012 में रहने के लिए बेहतर जगह में तब्दील हो जायेगी, लेकिन यह जरूर आज की तुलना में बदली हुर्ह होगी. इस साल दुनिया में लोकतांत्रिक तरीके से बदलाव की बड़ी इबारत लिखी जा सकती है.

यह साल कैसा होगा, इसकी झलक ताइवान में 14 जनवरी को होने वाले राष्ट्रपति चुनावों से मिलने लगेगी और फरवरी में भारत में भी वोटिंग मशीन देश के मिजाज का हाल बता रहे होंगे. मैं यह मानता हूं कि उत्तर प्रदेश अपने आप में देश नहीं है, लेकिन इसकी जनसंख्या पाकिस्तान के बराबर है. इसलिए यह भले ही एक प्रांत हो, लेकिन इसका असर सिर्फ़ प्रांतीय नहीं होगा.

4 मार्च को ब्लादिमीर पुतिन को यह पता चलेगा कि खुद को अनंत काल तक रूस की सत्ता पर काबिज रखने की चालाक योजना सड़कों पर उनके खिलाफ़ हो रहे प्रदर्शनों के कारण खटाई में तो नहीं पड़ गयी. इंशाअल्लाह, इन सबके बीच अरब जगत के कुछ जुल्मी तानाशाह अपने देशों को छोड़ कर या तो स्विटजरलैंड में शरण लेंगे या अपने देशों में जेल की सलाखों के पीछे होंगे.

मेरे लिए इन सभी चुनावों में सबसे रोचक और ध्यान देने वाला उत्तर प्रदेश चुनाव होगा. राहुल गांधी को सिर्फ़ इस कारण से कम मत आंकिये कि वह अपनी आस्तीन को किसी कच्चे खिलाड़ी की तरह अपनी बांहों तक च़ढ़ा लेते हैं, या जनता से अपनी पार्टी को 10 साल के लिए चुनने के लिए कहते हैं, जबकि कानूनी रूप से किसी सरकार का कार्यकाल पांच साल से ज़्यादा नहीं होता है.

राहुल को इस कारण जरूरत से ज़्यादा भी मत आंकिये कि उनकी पॉकेट की खनखनाहट उस चांदी के चम्मच की है, जिसे लेकर वे पैदा हुए थे. उत्तर-प्रदेश चुनाव करिश्मा की हदों की परख तो करेंगे ही, उन परंपरागत राजनीतिक गणित की भी परीक्षा लेंगे, जिसके आधार पर आज तक यहां पर मतदान होता रहा है.

अभी तक का सबसे बड़ा आश्चर्य तो यही है कि राहुल गांधी, जो एक आइकॉन बनने की चाहत लिए निकले थे; वही घिसी-पिटी पटकथा को पढ़े जा रहे हैं. देवबंद के दौरे के लिए दाढ़ी बढ़ाने की सलाह हेमवती नंदन बहुगुणा, शायद उन्हें 1974 में ही दे सकते थे. जितनी आक्रामकता के साथ वे और उनकी मां उत्तर-प्रदेश चुनावों को तवज्जो दे रहे हैं, उससे यही पता चलता है कि लखनऊ का महत्व उनके लिए कम ही है. उनका ध्यान तो दिल्ली पर है. लोक-लुभावन कदम अकसर सनक में लिपटे हुए आते हैं. नौकरियों में मुसलमानों को छोटे से आरक्षण की अंतिम समय में की गयी घोषणा को एक राजनीतिक दांव के तौर पर ही देखा जा सकता है, न कि गंभीर सामाजिक-आर्थिक निर्णय के तौर पर.

कांग्रेस को यह पता है कि उत्तर-प्रदेश में उसके शासन काल में मुसलिमों की स्थिति खराब ही हुई है और वे अब एक झटके में समुदाय के समर्थन को पाना चाह रही है. लेकिन खाद्य सुरक्षा को आगे बढ़ाने में उनके प्रयासों की गंभीरता को पहचाना जा सकता है. लोकलुभावनवाद तब तक काम आता है, जब तक यह लोगों को लुभा पाता है. एक बार जब ये दरकने लगते हैं, जैसा कि मनरेगा के साथ हो रहा है, ये नुकसान ही पहुंचाते हैं.

मनरेगा को बेहतरीन समय पर लाया गया था. ठीक 2009 चुनावों से पहले. इससे मिले लाभ भी सबको नजर आये थे. इसी तरह खाद्य सुरक्षा का फ़ायदा अधिक से अधिक अगले मानसून तक उठाया जा सकता है. उसके बाद इसके आंतरिक अंतर्विरोध एक तरह से कांग्रेस के लिए बोझ बन जा सकते हैं. फ़ौरी तौर पर उत्तर-प्रदेश चुनावों में इसका फ़ायदा होगा. लेकिन यह राष्ट्रीय निवेश है, न कि प्रांतीय.

उत्तर-प्रदेश चुनाव में ठीक-ठाक प्रदर्शन जून में राष्ट्रपति पद के चुनावों के बाद प्रधानमंत्री पद के लिए राहुल गांधी की दावेदारी को बल देंगे. इसमें किसी तरह की दिक्कत भी नहीं होनी चाहिए. मनमोहन सिंह तब तक 80 साल के हो चुके होंगे और वे आसानी से उम्र का अपनी सेवानिवृत्ति के बहाने के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं.

कांग्रेस इस बदलाव का खुशी-खुशी स्वागत करेगी. घटक दलों के पास इस निर्णय को स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं होगा. इसके बाद मीडिया के बनाये माहौल पर सवारी करते हुए राहुल गांधी अपनी कुर्सी को वैधता देने के लिए जनता का समर्थन हासिल करने की बात कर सकते हैं और नवंबर में चुनावों की घोषणा कर सकते हैं. 2012 का स्वागत कीजिए, जो माया की दुनिया साबित हो सकती है.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
25.12.2011, 00.18 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

lav kumar [kanhaphoto@gmail.com] mathura - 2011-12-25 13:30:45

 
  मेरे हिसाब से कांग्रेस से आरएलडी का समझौता भी गलत है. कांग्रेस की हालत पहले ही खराब है, उसने हम गरीबों को केवल धोखा दिया है और हाथ में कटोरा पकड़ाया है. 
   
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