पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
  पहला पन्ना >मुद्दा >बात पते की Print | Share This  

जीडीपी, जीएनपी और किसान

मुद्दा

 

जीडीपी, जीएनपी और किसान

देविंदर शर्मा


कुछ दिन पहले मैं एक टीवी शो में शरीक हुआ था, जहां एक कार निर्माता का इंटरव्यू लिया जा रहा था. उनसे सवाल था कि क्या ग्रामीण भारत में ब्रिकी बढ़ा कर कार बाजार में बनी मंदी टाली जा सकेगी?

भारत में खेती


मैंने सोचा कि यह कैसा बेवकूफी का सवाल है. आखिर मीडिया अर्थव्यवस्था को उपभोक्ता वस्तुओं की बिक्री से अलग हटकर कब देखना शुरू करेगा? कब हम अर्थव्यवस्था को एक मानवीय वस्तु के रूप में समझेंगे? राजनीतिज्ञों, अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों को देखकर मेरी चिंता और गहरी हो जाती है, जो देश की आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट को रोकने के लिए नए देवदूत को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं.

दिसम्बर में औद्योगिक उत्पादन दर के खिसक कर 5.1 प्रतिशत तक आ जाने, खनन के साथ निर्माण क्षेत्र के नकारात्मक रुझान के बाद पूंजीगत वस्तुओं का क्षेत्र भी 25 प्रतिशत सिकुड़ गया है क्योंकि कम्पनियों ने आगे निवेश करने से अपने को रोका हुआ है. हरेक हफ्ते सेंसेक्स लुढ़क रहा है और रुपया सबसे निचले स्तर पर है.

यह गिरावट खेती क्षेत्र को किस प्रकार प्रभावित करेगी? क्या यह किसानों को अतिशय तनावग्रस्त नहीं कर देगी? क्या इन सबका परिणाम निम्न उत्पादन दर में नहीं दिखेगा? और इनका असर कृषिगत उत्पादों के बढ़े दामों पर नहीं पड़ेगा? वह सवाल उठना लाजिमी है कि ऐसे परेशान करने वाली आर्थिक परिस्थितियों में मैंने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई का क्यों विरोध किया था, जबकि बड़े कारपोरेट घरानों की भारी-भरकम पूंजी हमारी डगमगाती अर्थव्यवस्था का सहारा बन सकती थी?

जो खुदरा क्षेत्र में सौ फीसद एफडीआई के सरकार के फैसले पर विलाप कर रहे हैं या करने वाले हैं, अधिक से अधिक विदेशी निवेश को आर्थिक वृद्धि के समतुल्य मान रहे हैं और ‘कल्याणकारी’ मान सकते हैं; उन्हें नोबेल विजेता पॉल क्रूगमैन के ब्लॉग को पढ़ना चाहिए, जिसमें उन्होंने जीडीपी और जीएनपी में अंतर दिखाया है.

इन मामलों में आयरिश बड़ा सटीक उदाहरण है, जहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश समर्थित आर्थिक संवृद्धि आम आयरिश यानी जीएनपी के अभ्युत्थान में रूपांतरित नहीं हुई. पॉल क्रूगमैन के ब्लॉग पर ध्यान दें और आप इसे बेहद सुलभ पाएंगे.

इसमें उन्होंने मुस्कुराते फिजर के नीचे कैप्शन लिखा है: आयरलैंड जैसा कि आप देखते हैं, ऐसा देश है, जहां सबसे ज्यादा विदेशी पूंजी लगी हुई है; इसका मतलब होता है कि इससे होने वाले लाभ में सकल राष्ट्रीय उत्पाद यानी जीएनपी तथा आयरिश वासियों की आय सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी से बहुत ही कम है.

आमतौर पर हम जीडीपी पर फोकस करते हैं क्योंकि इससे वृद्धि दर को मापने में आसानी होती है लेकिन जैसा कि आयरलैंड के मामले में दिखता है, यह गुमराह करने वाली भी हो सकती है क्योंकि जीडीपी और जीएनपी के बीच अंतर चौड़ा होता जा रहा है.

मोटी पूंजी हमेशा कल्याणकारी नहीं होती है. इसका मतलब यह हुआ कि मोटी विदेशी पूंजी के निवेश का देश के लोगों के कल्याण में रूपांतरण नहीं हो सकता, जैसा कि जीएनपी मामले में हुआ है.

दूसरे शब्दों में प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया और नव उदारवादी अर्थशास्त्रियों के समूह जो बहुब्रांडीय खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के समर्थन में ऐसे राग अलाप रहे हैं; मानों यह सभी आर्थिक बीमारियों के लिए रामबाण है, निश्चित ही सच नहीं है.

पॉल क्रूगमैन एक डायग्राम के जरिये हमें बताते हैं कि किस तरह आयरिश जीडीपी 2011 में सतत ऊपर की ओर बढ़ रही थी किंतु उसके अनुपात में जीएनपी में कोई बढ़त नहीं देखी गई. वह बताते हैं- “मंदी गहराती जा रही है और इसकी तुलना में आमदनी में कमी बनी हुई है, जब जीएनपी को देखते हैं, जो कि आयरिश मामले में ज्यादा जीडीपी की तुलना में ज्यादा मायनेखेज है. यहां क्या होने जा रहा है? जहां तक मैं इसे समझ पा रहा हूं, आयरिश निर्यात में मौजूदा उठान, खास कर दवा उत्पादन क्षेत्र में, बहुराष्ट्रीय कम्पनियों की मोटी पूंजी को जाता है, जो उसके उत्पादन में उछाल बनाए हुए है. यह जीडीपी के लिए तो अच्छी बात है लेकिन आयरिशवासियों की आमदनी में बहुत थोड़ी ही बढ़ा पाता है. इसका मतलब कि जीएनपी को फायदा नहीं हुआ..
आगे पढ़ें

Pages:

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in