जीडीपी, जीएनपी और किसान
मुद्दा
जीडीपी, जीएनपी और किसान
देविंदर शर्मा
कुछ
दिन पहले मैं एक टीवी शो में शरीक हुआ था, जहां एक कार निर्माता का इंटरव्यू लिया
जा रहा था. उनसे सवाल था कि क्या ग्रामीण भारत में ब्रिकी बढ़ा कर कार बाजार में बनी
मंदी टाली जा सकेगी?
मैंने सोचा कि यह कैसा बेवकूफी का सवाल है. आखिर मीडिया अर्थव्यवस्था को उपभोक्ता
वस्तुओं की बिक्री से अलग हटकर कब देखना शुरू करेगा? कब हम अर्थव्यवस्था को एक
मानवीय वस्तु के रूप में समझेंगे? राजनीतिज्ञों, अर्थशास्त्रियों और पत्रकारों को
देखकर मेरी चिंता और गहरी हो जाती है, जो देश की आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट को
रोकने के लिए नए देवदूत को तलाशने की कोशिश कर रहे हैं.
दिसम्बर में औद्योगिक उत्पादन दर के खिसक कर 5.1 प्रतिशत तक आ जाने, खनन के साथ
निर्माण क्षेत्र के नकारात्मक रुझान के बाद पूंजीगत वस्तुओं का क्षेत्र भी 25
प्रतिशत सिकुड़ गया है क्योंकि कम्पनियों ने आगे निवेश करने से अपने को रोका हुआ
है. हरेक हफ्ते सेंसेक्स लुढ़क रहा है और रुपया सबसे निचले स्तर पर है.
यह गिरावट खेती क्षेत्र को किस प्रकार प्रभावित करेगी? क्या यह किसानों को अतिशय
तनावग्रस्त नहीं कर देगी? क्या इन सबका परिणाम निम्न उत्पादन दर में नहीं दिखेगा?
और इनका असर कृषिगत उत्पादों के बढ़े दामों पर नहीं पड़ेगा? वह सवाल उठना लाजिमी है
कि ऐसे परेशान करने वाली आर्थिक परिस्थितियों में मैंने खुदरा क्षेत्र में
प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई का क्यों विरोध किया था, जबकि बड़े कारपोरेट
घरानों की भारी-भरकम पूंजी हमारी डगमगाती अर्थव्यवस्था का सहारा बन सकती थी?
जो खुदरा क्षेत्र में सौ फीसद एफडीआई के सरकार के फैसले पर विलाप कर रहे हैं या करने
वाले हैं, अधिक से अधिक विदेशी निवेश को आर्थिक वृद्धि के समतुल्य मान रहे हैं और
‘कल्याणकारी’ मान सकते हैं; उन्हें नोबेल विजेता पॉल क्रूगमैन के ब्लॉग को पढ़ना
चाहिए, जिसमें उन्होंने जीडीपी और जीएनपी में अंतर दिखाया है.
इन मामलों में आयरिश बड़ा सटीक उदाहरण है, जहां प्रत्यक्ष विदेशी निवेश समर्थित
आर्थिक संवृद्धि आम आयरिश यानी जीएनपी के अभ्युत्थान में रूपांतरित नहीं हुई. पॉल
क्रूगमैन के ब्लॉग पर ध्यान दें और आप इसे बेहद सुलभ पाएंगे.
इसमें उन्होंने मुस्कुराते फिजर के नीचे कैप्शन लिखा है: आयरलैंड जैसा कि आप देखते
हैं, ऐसा देश है, जहां सबसे ज्यादा विदेशी पूंजी लगी हुई है; इसका मतलब होता है कि
इससे होने वाले लाभ में सकल राष्ट्रीय उत्पाद यानी जीएनपी तथा आयरिश वासियों की आय
सकल घरेलू उत्पाद जीडीपी से बहुत ही कम है.
आमतौर पर हम जीडीपी पर फोकस करते हैं क्योंकि इससे वृद्धि दर को मापने में आसानी
होती है लेकिन जैसा कि आयरलैंड के मामले में दिखता है, यह गुमराह करने वाली भी हो
सकती है क्योंकि जीडीपी और जीएनपी के बीच अंतर चौड़ा होता जा रहा है.
मोटी पूंजी हमेशा कल्याणकारी नहीं होती है. इसका मतलब यह हुआ कि मोटी विदेशी पूंजी
के निवेश का देश के लोगों के कल्याण में रूपांतरण नहीं हो सकता, जैसा कि जीएनपी
मामले में हुआ है.
दूसरे शब्दों में प्रधानमंत्री के मुख्य आर्थिक सलाहकार कौशिक बसु, योजना आयोग के
उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह आहलुवालिया और नव उदारवादी अर्थशास्त्रियों के समूह जो
बहुब्रांडीय खुदरा क्षेत्र में एफडीआई के समर्थन में ऐसे राग अलाप रहे हैं; मानों
यह सभी आर्थिक बीमारियों के लिए रामबाण है, निश्चित ही सच नहीं है.
पॉल क्रूगमैन एक डायग्राम के जरिये हमें बताते हैं कि किस तरह आयरिश जीडीपी 2011
में सतत ऊपर की ओर बढ़ रही थी किंतु उसके अनुपात में जीएनपी में कोई बढ़त नहीं देखी
गई. वह बताते हैं- “मंदी गहराती जा रही है और इसकी तुलना में आमदनी में कमी बनी हुई
है, जब जीएनपी को देखते हैं, जो कि आयरिश मामले में ज्यादा जीडीपी की तुलना में
ज्यादा मायनेखेज है. यहां क्या होने जा रहा है? जहां तक मैं इसे समझ पा रहा हूं,
आयरिश निर्यात में मौजूदा उठान, खास कर दवा उत्पादन क्षेत्र में, बहुराष्ट्रीय
कम्पनियों की मोटी पूंजी को जाता है, जो उसके उत्पादन में उछाल बनाए हुए है. यह
जीडीपी के लिए तो अच्छी बात है लेकिन आयरिशवासियों की आमदनी में बहुत थोड़ी ही बढ़ा
पाता है. इसका मतलब कि जीएनपी को फायदा नहीं हुआ..
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“आयरलैंड को यह भूल समझ में आ गई है लेकिन बहुत देर से. यहां के नेता अपने भाषण दर
भाषणों में देश के प्रमुख खेती क्षेत्र में होने वाले उत्पादन का गुणगान करते नहीं
अघाते. खाने-पीने की चीजों के निर्यात ने भुगतान में अतिरिक्त संतुलन ला दिया है,
जिसने हालिया महीनों में आशावाद का एक उफान पैदा किया है कि यूरोपीय देशों की कर्ज
में डूबी अर्थव्यवस्थाओं को इससे निजात दिलाने के लिए आयरलैंड सबसे उपयुक्त देश हो
सकता है…
“दुर्भाग्य से, भारत ने वही गलत राह पकड़ ली है, जिस पर आयरलैंड उससे पहले चल चुका
है. अब इसमें जो हमें समझने की जरूरत है कि वह यह कि आयरलैंड में स्थापित
फार्मास्युटिक्ल और उच्च तकनीकी क्षमता सम्पन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियां टैक्स में
छूट का लाभ उठाती हैं और अपने लाभ के बहुलांश को स्वदेश के कारपोरेट के मुख्यालयों
को सौंप देती है, जबकि खेती-खाद्य क्षेत्र में मूल रूप से आयरिश कम्पनियां लगी हुई
हैं और इसी वजह से उनका मुनाफा देश में ही रह जाता है. आयरिश कृषि मंत्री सिमोन
कोवने का कहना है- देश के खेती क्षेत्र का सकल मुनाफा 24 बिलियन यूरो का है लेकिन
इसमें से 22 बिलियन आयरिश अर्थव्यवस्था में योगदान करता है. यह असाधारण आंकड़ा है.”
कभी-कभी मैं सोचता हूं कि हमारे अर्थशास्त्री और योजनाकार इतने अदूरदर्शी क्यों
हैं? हम आर्थिक संवृद्धि और विकास के कारपोरेट मॉडल्स के पार क्यों नहीं देख सकते?
दरअसल, इन सब बातों के लिए एक दूरदर्शिता पूर्ण रवैया अपेक्षित है, जो दुर्भाग्यवश
अपने देश के मौजूदा अर्थशास्त्रियों में सिरे से गायब है.
कई दशक पहले एक अर्धशिक्षित राजनीतिज्ञ पंजाब के मुख्यमंत्री हो गए थे. हम लोगों
में से शायद ही किसी को उनका नाम-लछन सिंह-याद हो. लछन सिंह मात्र छह महीने के लिए
मुख्यमंत्री बने थे. वह जानते थे कि इस पद पर वह लम्बे समय तक टिके नहीं रहेंगे
लेकिन पंजाब के इतिहास में अपना नाम चमकाने के लिए अधीर थे. शपथ लेने के तुरंत बाद
वह चंडीगढ़ के पास खारर कृषि विज्ञानी और प्रशासक डॉ एमएस रंधावा से मिलने चले गए,
जो वहां अपने फार्म में रहते थे.
रंधावा, जिनका दो दशक पहले देहांत हो गया; ने एक समय मुझे बताया था कि मुख्यमंत्री
लक्ष्मण सिंह उनसे यह पूछने आए थे कि वे ऐसा क्या करें कि पंजाब की आने वाली
पीढ़ियां उन्हें याद करें? डॉ रंधावा ने उन्हें सलाह दी कि पहला काम वह यह करें कि
राज्य के सभी गांवों को मंडियों से जोड़ दें. पंजाब के किसान हरित क्रांति के बाद
से खूब पैदावार करते हैं लेकिन उन्हें इसका बढ़िया और उचित दाम नहीं मिलता क्योंकि
गांवों में सड़कें ही नहीं हैं. रंधावा ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री यह काम कर दें तो
पंजाब में खेती से होने वाली समृद्धि स्थायी बनी रहेगी.
लछमन सिंह ने ऐसा ही किया. न केवल उन्होंने नक्शे बनाए बल्कि इसके लिए धन का भी
जुगाड़ किया. यह आज के पंजाब में ग्रामीण सशक्तीकरण है, जो अर्थव्यवस्था को टिकाए
हुए है. इसलिए खेती सातत्य आर्थिक वृद्धि की कुंजी है, जो द्रुत औद्योगीकरण पर जोर
दिए जाने से येन-केन-प्रकारेण मारी जा रही है.
खेती खाद्यान्न सुरक्षा से भी जुड़ी है, जो हमारा सबसे बड़ा सरोकार है क्योंकि
विश्व में सर्वाधिक आबादी 320 मिलियन भूखे लोग भारत में बसते हैं. लेकिन त्रासदी यह
है कि खेती से होने वाली आय अन्य क्षेत्रों में होने वाले मुनाफे से कम है. हमारे
आधे से ज्यादा खेत मुनाफे के लिए बाहर के संसाधनों पर निर्भर हैं. इसलिए तत्काल
तकाजा है कि हम बीमार खेती क्षेत्र को सीधी आय का समर्थन देकर उसके साथ होने वाले
आर्थिक भेदभाव को दूर करें. एक बार खेती का मुनाफा बढ़ गया तो भारतीय किसान पूरी
अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित कर सकते हैं और ध्वस्त होने को आसन्न अर्थव्यवस्था को
बचा सकते हैं.
31.12.2011, 02.37 (GMT+05:30) पर प्रकाशित