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ये ममता है, सब जानती है

बाईलाइन

 

ये ममता है, सब जानती है

एम जे अकबर


राजनेताओं के साथ ऑफ़ द रिकॉर्ड और ऑन द रिकॉर्ड बातचीत के बीच खास अंतर होता है. ऑफ़ द रिकॉर्ड बातचीत सच्चाई के नजदीक होती है. ऑफ़ द रिकॉर्ड का यह मतलब नहीं है कि यह तर्क से परे होता है. अगर आप कुछ नहीं बताना चाहते तो सबसे बेहतर विकल्प है, चुप रहना. जब कोई राजनेता बिना आरोप लगाये बात करता है, तो इसका मतलब सिर्फ़ यह है कि वह पहले से ही तय आरोपों को खारिज करने का संदेश देना चाहता है.

ममता बनर्जी


ऑफ़ द रिकॉर्ड का प्रयोग अपने गुस्से और कुंठा को सार्वजनिक करने के लिए किया जाता है. यह तरीका अधिकारिक तौर पर सावधानीपूर्वक चुने गये शब्दों के मुकाबले अधिक मजेदार होता है. 2012 के लिए एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता की एक अदभुत इच्छा है. वे सिर्फ़ एक कारण से चाहते है कि विपक्षी एनडीए नये साल में सत्ता में आये ताकि एनडीए को भी ममता बनर्जी की बदमिजाजी का सामना करना पड़े, जैसा कि मौजूदा गंठबंधन सरकार को ङोलना पड़ रहा है.

उनका मानना है कि इस संसद में कोई भी सरकार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के सहयोग के बिना नहीं बन सकती है. वे सोचते हैं कि ममता बनर्जी के सहयोग से सरकार चलाना सबसे बड़ी विपदा है.

लेकिन केवल 19 सांसदों के सहारे सरकार को चुनौती देने के लिए ममता बनर्जी का लोहा मानना चाहिए. ममता ने इस साल 206 सदस्यों वाली कांग्रेस पार्टी को चार बार हराया है और वह भी महत्वपूर्ण मौकों पर. तीस्ता जल बंटवारे पर प्रधानमंत्री के साथ बांग्लादेश जाने से इनकार कर उन्हें जोरदार ठोकर मारा, फिर देश में रिटेल क्षेत्र में एफ़डीआइ और पेंशन बिल पर फंदा कस दिया.

लोकपाल बिल के मसले पर सीधे सरकार को औंधे मुंह गिरा दिया. वे राजनीति के मूलभूत नियमों को बेहतर तरीके से समझती हैं. कांग्रेस को सबक सिखाने की सबसे बेहतर रणनीति उसी व्यवहार का अनुसरण करना, जो कांग्रेस सहयोगी दलों के साथ अपनाती है. कांग्रेस पार्टी गठबंधन को मिलकर काम करने वाले संगठन के तौर पर नहीं लेती है.

वह फ्रैंक सिनाट्रा के तरीके पर काम करती है ‘मेरा रास्ता ही महामार्ग है’ वाला. अचानक ममता बनर्जी अपने वरिष्ठ सहयोगी को यह जबाव दे रही हैं कि अगर उसे सत्ता में रहना है तो उनकी शर्तो को मानना होगा. वे कांग्रेसी संस्कृति को काफ़ी नजदीक से जानती हैं, क्योंकि वे उसमें रह चुकी हैं.

कभी-कभार ममता बनर्जी गलतियों की शिकार हो जाती हैं, लेकिन वे दुघर्टनाओं में भरोसा नहीं करती हैं. उनकी चाल सोची-समझी होती है. 2012 का उनका संदेश स्पष्ट है-विकल्प खुले हैं.

उनके पास डीएमके की तरह दब्बू होने के कारण भी नहीं हैं, क्योंकि किसी भी प्रकार के भ्रष्टाचार के मामले उन पर नहीं हैं. इसलिए उन्हें सीबीआइ से किसी घोटाले को छुपाने का डर नहीं हैं और इसलिए दिल्ली के ब्लैकमेल के बारे में उन्हें चिंता नहीं है. उन्हें पता नहीं है कि कैसे विनम्र होना चाहिए. यह जीन उनके डीएनए से छूट गया है.

कांग्रेस अपने पाले में मेमना रखने की आदी है, उस समय भी जब उसे लगता है कि कोई भेड़िया भेड़ की खाल में घूम रहा है. तब कांग्रेस को अचानक लगता है कि घर के चिराग से ही आग लग गयी है. यह आग धीरे-धीरे पूरे घर को जला देती है. इसलिए कांग्रेस की राजनीति नये साल के पहले चरण में सिर्फ़ एक बात पर केंद्रित होगी कि कैसे ममता के 19 सांसदों का विकल्प खोजा जाये.

कांग्रेस ममता को हटाना नहीं बल्कि केवल ममता के महत्व को निरर्थक कर देना चाहती है. वह बिना डंक के शहद पाना चाहती है. यहीं मुलायम सिंह यादव कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं.

यूपी चुनाव के बाद कांग्रेस के लिए आदर्श स्थिति यह होगी कि सपा सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरे, लेकिन सरकार बनाने के लिए कांग्रेस पर निर्भर रहना पड़े. सपा के सांसद दिल्ली में कांग्रेस के साथ हमेशा खड़े रहें और 2014 तक राहुल गांधी की सत्ता स्थिर रहे. यहीं ड्रामे के अंदर के ड्रामे को समझा जा सकता है. आखिर क्यों सोनिया गांधी और राहुल गांधी चुप थे, जब ममता ने प्रधानमंत्री की पहल को बिगाड़ दिया? क्योंकि ममता के कारण प्रधानमंत्री कमजोर हुए और माहौल राहुल गांधी के पक्ष में बना.

आज्ञाकारी और मजबूत प्रधानमंत्री को हटाना आसान नहीं होता, जैसा कि मनमोहन सिंह अपने पहले कार्यकाल में थे. लोकपाल पर राज्यसभा में तृणमूल के कारण विधेयक के भंवर में फंसने और पीएम की बेबसी पूरा देश देख रहा था. महान क्रिकेट खिलाडी विजय मर्चेंट ने कहा था कि लोगों को तब रिटायर होना चाहिए, जब लोग पूछें कि क्यों नहीं, बल्कि तब जब लोग पूछें कि कब? राजनीति में अफ़वाह बड़ी तेजी से शोर में तब्दील हो जाती है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता के ऑफ़ द रिकॉर्ड बात करने के पीछे कई कारण हैं. कांग्रेस ने बंगाल इकाई को ममता पर हमला करने की इजाजत दे दी है, लेकिन केवल दिल्ली का ऐसड ही दोनों के बीच रिश्तों को खटाई में डाल सकता है. यह संदेश दोनों ओर से आ रहा है, लेकिन अभी समय नहीं आया है कि ऑफ़ रिकॉर्ड से ऑन द रिकॉर्ड हुआ जा सके. इसके लिए अगले 12 से 16 हफ्ते इंतजार करना होगा.


*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
01.01.2012, 15.45 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

pramodkumar [] muzaffarpur - 2012-01-07 09:55:56

 
  चलिए अकबर साहब आपने साफ कर दिया कि लड़ाई मनमोहन बनाम राहुल गांधी है. पर मनमोहन सिंह नरसिम्हा राव नहीं हैं. राव साहब पर दाग थे मनमोहन सिंह बेदाग है.  
   
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