भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल
मुद्दा
भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल
कुमार कृष्णन
पटना से
बिहार की नीतीश कुमार की सरकार ने अपनी दूसरी पारी भूमि सुधार पर केन्द्रित की है. इसके तहत सरकार ने
सौ साल बाद फिर से ज़मीनों का सर्वे-चकवंदी कराने का न सिर्फ फैसला लिया है, बल्कि
इसके लिये विधानमंडल के चालू सत्र में विधेयक भी पारित कर दिया है. सरकार की मंशा
है कि भूमि विवादों की संख्या घटे. भूमि विवादों की पृष्ठभूमि में बिहार में खूनी
संघर्षों का इतिहास रहा है.
सरकारी घोषणा के अनुरूप तीन साल में अत्याधुनिक तरीके से सर्वे होगा. सेटेलाइट से
ज़मीन की तस्वीर ली जाएगी. इसका कंप्यूटर के जरिये नक्शे से मिलान होगा, फिर ज़मीन
चिन्हित करके अंचलों में मौजूद खानापुरी की टीम ज़मीन के टुकड़ों पर नंबर अंकित
करेगी.
कानूनगो स्तर के अधिकारी की अनुमति के बाद मुखिया, सरपंच के प्रतिनिधियों के साथ
अंचलाधिकारी ज़मीन मालिक को उसकी ज़मीन बताएंगे. ड्राफ्ट प्रकाशन का काम
अंचलाधिकारी करेंगे. गड़बडी की शिकायत भूमि सुधार उप समाहर्ता से की जा सकेगी.
ड्राफ्ट के अंतिम प्रकाशन का काम भूमि उप समाहर्ता स्तर से ही होगा. सर्वे के काम
में नौ करोड़ रुपये खर्च होंगे. तीन साल में सर्वे का काम पूरा होने के बाद चकबंदी
का काम पांच वर्षों में पूरा कराने का लक्ष्य है.
दरअसल सर्वे का काम 1902 में शुरू हुआ था, जो 1912 से 1914 में पूरा हो सका था.
1962 में जिला स्तर पर सर्वे हुआ लेकिन संपूर्ण सर्वे नहीं हो सका. नये सर्वे से
ज़मीन के वास्तविक मालिकों के नाम सामने आएंगे. साथ ही सरकारी दस्तावेज अद्यतन किये
जा सकेंगे. गैरमजरूआ, आम, खास, और खास महल की ज़मीनों का बास्तविक अंदाजा मिल
सकेगा. इस कार्य को अंजाम देने के लिये 742 पद सृजित कर बहाली भी की जायेगी.
बेशक ये दोनों चीजें राज्य के लिये बेहद जरूरी हैं. लेकिन जो कुछ बताया जा रहा है,
क्या उसकी हकीकत भी वैसी ही है ? सरकारी दावे की परत दर परत बटाने पर पता चलता है
कि यह महज नीतीश कुमार का सब्जबाग ही है.
यह बात पूरी तरह से साबित हो चुकी है कि भूमि-सुधार के मोर्चो पर नीतीश कुमार की
सरकार बहुत कमजोर रही है. राज्य में सत्ता की बागडोर संभालने के बाद नीतीश कुमार ने
भूमिसुधार आयोग का गठन देवव्रत बंदोपाध्याय की अध्यक्षता में किया था. बाद में
सरकार ने आयोग की सिफारिशों की ओर से अपनी आंखें बंद कर ली.
सरकार ने गरीबों को एक एकड़ और भूमिहीनों को 10 डिसमल ज़मीन देने की सिफारिश को
दरकिनार करते हुए सिर्फ तीन डिसमल ज़मीन देने की बात कही और फिर इस वायदे से भी
सरकार मुकर गयी.
बंदोपाध्याय ने बिहार में नया बटाईदार कानून लाने, वर्तमान कानून में संशोधन करने,
गैरमजरूआ ज़मीन का उचित इस्तेमाल करने, भूहदबंदी को सही तरीके से लागू करने तथा
भूदान से मिली ज़मीन को विवादों के निपटारे का सुझाव दिया था. लेकिन बिहार जैसे
सामंती प्रदेश में नीतीश कुमार को मुंह की खानी पड़ी. नया भूमि सर्वे तथा चकबंदी के
बारे में भी यही प्रचारित किया जा रहा है कि यह बंटाईदारी कानून का ही दूसरा रूप
है. ऐसे में पुराने अनुभव के आधार पर यह मानने का कोई कारण नज़र नहीं आता कि सरकार
को इसमें सफलता मिलेगी.
असल में समस्या का जुबानी समाधान या वाहवाही वाले मुद्दे की तलाश किसी को सीखनी हो
तो वह नीतीश कुमार से सीखे. बंटाईदारी कानून के मोर्चे पर पूरी तरह विफल रहने के
बाद राज्य सरकार ने सर्वे तथा चकबंदी का सहारा लिया. भूमि के मामलो में ऐसे
उदाहरणों की कमी नहीं है, जो यह साबित कर सकें कि राजग सरकार के छह साल के शासन के
दौरान कुछ भी नहीं हुआ है.
दरअसल राजग का वोट बैंक वही है, जो वाकई ज़मीन का मालिकाना हक रखते हैं. स्थिति तो
यह है कि सरकार कह कर भी महादलितों को मकान बनाने के लिये ज़मीन नहीं दे सकती है.
हां, भूमिसुधार के नाम पर ऐलान दर ऐलान जरूर हो रहे हैं.
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भूदान का मसला भूमिसुधार के बारे में सरकार का चरित्र व समझ जाहिर करने के लिये
पर्याप्त है. राबड़ी सरकार ने संत विनोबा भावे द्वारा स्थापित भूदान यज्ञ कमेटी पर
कब्जा की कोशिश में इसे भंग कर दिया. सरकार इस कमेटी की ज़मीनों की दानी कहलाना
चाहती थी. नीतीश कुमार भी इसी लाइन पर चल रहे है.
हकीकत तो यह है कि बिहार में ज़मीनों का बंटवारा राजनीति का बड़ा जरिया रहा है.
सत्तारूढ़ दल राजग की समझ है कि इसकी बदौलत वोट बैंक की गोलबंदी मजबूत की जा सकती
है. यह और बात है कि 15 वर्षों के शासन के दौरान लालू- राबडी सरकार ने भूमि बंटवारे
के सवाल पर गरीबों को सिर्फ ठगने का काम किया है.
आंकड़ों के मुताबिक अभी भी प्रदेश में बीस लाख ऐसे लोग हैं, जिनके पास रहने के लिये
न तो अपना घर है और न ही खेती के लायक एक धुर ज़मीन. जबकि 600 भूस्वामियों के कब्जे
में 150 एकड़ से पांच हजार एकड़ तक ज़मीन है. अब तक की सभी सरकारों ने जमींदारों के
खिलाफ सिर्फ भाषण देकर अपने मतदाताओं का तुष्टिकरण करने का काम किया, जमींदारों को
सिर्फ मुद्दा भर बनाया गया, कार्रवाई महज प्रतीकात्मक तौर पर ही हो पायी.
हद तो यह है कि कई जमींदार राजग की टिकट पर चुनाव जीतकर मंत्री तक बनते रहे.
भूमिहीनों के बीच बांटी गयी ज़मीनों में से 8 लाख 10 हजार एकड़ पर आज तक
पर्चाधारियों को कब्जा नहीं मिल पाया है. यह सब तब हुआ है, जबकि बिहार की भूमि
समस्या कानून व्यवस्था का सबसे बड़ा कारण है. माना जाता है कि राज्य में नक्सलवाद के
फैलाव की पृष्ठभूमि में भूमि समस्या ही है.
हालात यह रहे हैं कि इस राज्य में बड़े जोतदारों और जमींदारों ने भू-दान आंदोलन के
प्रवर्तक संत विनोबा भावे तक को ठगने का काम किया. कईयों ने विनोबा जी को भूदान के
नाम नदी, पहाड़, नाले दान कर दिये और दानी का तमगा हासिल कर लिया. जाहिर है, उनका
बंटवारा तो नहीं हो सकता है. सरकार ने किसी भी स्तर पर भूदान कमेटी का सहयोग नहीं
किया. इसके पीछे सरकार की स्वयं के लिए श्रेय लेने की नीति रही है. सरकार नहीं
चाहते है कि भूमि वितरण के मामले में किसी दूसरी एजेंसी को वाहवाही मिले.
भूदान यज्ञ कमेटी का आरोप रहा है कि बिहार सरकार के रव्वैये के कारण दान में
प्राप्त तीन लाख 74 हजार एकड़ ज़मीन नहीं बांटी जा सकी है. सरकार ने इसके लिए अमीन
देने की बात कही थी लेकिन कमेटी को अमीन तक नहीं मिल पाया. इसका सीधा असर ज़मीन के
बंटवारे पर पड़ा. कमेटी की हालत खास्ता होती गयी.
भू-दान यज्ञ कमेटी के अनुसार बिहार में कुल 21 लाख भूमि अर्जित की गयी. इनमें पांच
लाख एकड़ के तो कागजात नहीं हैं. तथाकथित दानियों ने गैर मजरूआ और आम गैर मजरूआ
ज़मीन तक दान कर दिया. शेष 16 लाख ज़मीन में से करीब पांच लाख एकड़ ज़मीन पहाड़, नदी
और नाला थी. नतीजतन शेष 11 लाख ज़मीन में से 7 लाख 26 हजार एकड़ ज़मीन बांटी गयी. जो
ज़मीन बांटने के लिए बची है, उससे संबंधित मामले भूमि सुधार उप समाहर्ता के कोर्ट
में लंबित है.
राज्य सरकार के दस्तावेज के मुताबिक अभी भी 400 के करीब ऐसे लोग हैं, जिनके पास डेढ
सौ एकड़ से लेकर पांच सौ एकड़ तक ज़मीन है. 500 से 1500 एकड़ ज़मीन रखने वाले लोगों की
तादाद सौ के लगभग है. कई स्टेटों के पास आज भी 2000 से लेकर 5000 एकड़ तक ज़मीनें
हैं. एक तरह से सरकार ऐसे भूपतियों के खिलाफ कुछ कर पाने में विवश है. हजारों एकड़
ज़मीन के मामले मुकदमेबाजी में उलझे हैं.
सरकारें अपनी विफलता का ठीकरा भूदान यज्ञ कमेटी पर फोड़ती रही हैं. सरकारें उसे
फिजूल बताती रही हैं. हालांकि सरकारी आंकड़े बताते हैं कि कमेटी ने जून 1999 तक 5
लाख 78 हजार 899 आवेदकों के बीच 7 लाख 22 हजार 580 एकड़ ज़मीन वितरित की है.
अनुसूचित जाति जनजाति को 4 लाख 42 हजार 955 एकड़ और पिछड़ी जाति को 2 लाख 731 हजार 67
एकड़ ज़मीन वितरित की गयी है. इसके बाजवूद 20 लाख भूमिहीन हैं. इनको भूमि देने की
जिम्मेदारी सरकार की है. ये सारी बातें गौण है. जाहिर है, अब सबकी निगाहें सर्वे
तथा चकबंदी पर हैं.
05.01.2012, 13.09 (GMT+05:30) पर प्रकाशित