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खेत के साथ जीवन भी सूखा

खेत के साथ जीवन भी सूखा

सचिन कुमार जैन

टीकमगढ़, मध्यप्रदेश से

चालीस बीघा उपजाऊ और सिंचित जमीन के मालिक रामपाल सिंह के बारे में आम तौर पर यही सोचा जायेगा कि वे एक संपन्न किसान होंगे. लेकिन ऐसा है नहीं. रामपाल का गांव टीला, टीकमगढ़, निवाड़ी ब्लाक पूरे प्रदेश में बैंगन और लौकी पैदा करने के लिए मशहूर है. लेकिन जिस गांव में सालों भर हरियाली का साम्राज्य छाया होता था, वहां अब दूर-दूर तक धूसर और वीरान खेत नजर आते हैं. इस इलाके में पिछले तीन साल से जारी सूखे ने एक-एक कर गांव के खेतों से हरियाली छीन ली और सूखे ने देखते ही देखते संपन्न माने जाने वाले किसानों को बदहाली के कगार पर खड़ा कर दिया.

टीला पंचायत के 387 परिवारों में से 302 सब्जी ही उगाते हैं. तीन साल पहले तक अकेले इस गांव से हर रोज 17-18 ट्रक सब्जियां निकला करती थीं. ट्रक गांव से ही जबलपुर, इंदौर, भोपाल, झांसी, आगरा के लिए रवाना होते थे.

नहीं बचा ताल में पानी

इलाके में ताल-तालाब मिलाकर 1500 से ज्यादा थे. अभी भी 421 तालाब बचे हैं. लेकिन इस इलाके में केवल 10 तालों-तालाबों में ही पानी बचा है.


आज दो दिन में एक ट्रक रवाना हो रहा है. लौकी, आलू, शिमला मिर्च और बैंगन की पैदावार में 80 फीसदी तक की गिरावट आयी है. लिहाजा 80 फीसदी किसानों ने सब्जी उगाना बंद कर दिया है.

कृषि मजदूर तथा सीमांत और लघु किसान आम तौर पर गांव से बाहर हो गये हैं. जो रामपाल सिंह 40 बीघा जमीन के मालिक हैं, उन्होंने क्रेडिट कार्ड पर कर्ज लिया था. लेकिन सूखे ने ऐसी कमर तोड़ी है कि उस कर्ज की एक भी किस्त नहीं चुकायी जा सकी है.

गरीब और छोटे किसानों पर तो सूखे की मार बहुत भारी पड़ी है. हरीशचंद्र येंदोरिया अपनी दो एकड़ की खेती में साल भर के खाने के लायक अनाज तो पैदा कर ही लेते थे, सब्जियां उगाकर थोड़ी नकदी भी बना लेते थे. सूखे ने हालात बदल दिये हैं. अब वे मजदूरी करने दिल्ली चले गये हैं. उनकी पत्नी उर्मिला तीन बच्चों के साथ गांव में है. उसके पास कोई काम-काज नहीं है. पानी ही नहीं है, तो खेती भी नहीं. दूसरे किसी और के भी खेत में काम नहीं.

बिजली की मार
हालत ये है कि सब्जियों का भंडार कहे जाने वाले इस इलाके में भी लौकी 16 रुपये किलो, टमाटर 10 रुपये और आलू 8 रुपये किलो बिक रहा है.

बिजली भी इलाके में केवल एक घंटे मिल रही है. इसलिए जिन्होंने पंप भी लगवा रहे हैं, उनके मोटर का घर्रा पीने का पानी निकालते-निकालते ही बंद हो जा रहा है.

केनगांव के रतिराम के पास कुल ढाई एकड़ जमीन है. पिछले तीन साल से गांव में बिजली नहीं है. छह महीने पहले तार भी निकाल दिये गये. पर उनके पास बिजली का बिल 42142 रुपये का आया है. इसी गांव के कैलाश के घर एक बत्ती कनेक्शन है. पर उनके बिजली बिल की राशि है 15254 रुपये. बिजली बिलों को माफ करने के जो वायदे हुए हैं, उसके तहत भी बिल नहीं चुकाये गये हैं, इसलिए भी बकाया राशि बढ़ती चली गयी है. गांव पर बिजली विभाग का कुल बकाया है-41.51 लाख रुपये.

पानी गिरता जाए
भोजन का अधिकार अभियान और मध्यप्रदेश आपदा निवारक मंच द्वारा टीकमगढ़ के कई इलाकों में किया गया सर्वे भारी आपदा को उजागर करता है.

टीला से लौटीं रोली शिवहरे बताती हैं- “ टीकमगढ़ में आम तौर पर बिना सूखे के ही जलस्तर नीचे जा रहा था. 35.32 फीसदी कुओं का पानी दो मीटर और 8.86 फीसदी कुओं का पानी 4 मीटर पिछले एक दशक में यों ही नीचे उतर गया था. सूखे ने जलस्तर और नीचे गिराया है. टीला के 280 कुओं में से किसी भी कुएं में पानी नहीं है. गांव के दोनों तालाब पूरी तरह सूख गये हैं.”

परसराम घोष ने पिछले साल मोटरपंप के लिए एक लाख साठ हजार का कर्ज लिया था. बोरिंग तीन बार फेल हुई. पंप नहीं लग सका. पर कर्ज दर्ज पड़ा है. टीला में संस्थागत और गैरसंस्थागत कर्ज 85 लाख रुपयों से ज्यादा का हो गया है.

पहले यहां इस तरह के कर्ज की किसी को जरूरत नहीं थी. ब्राह्मण हों या अहिरवार-सभी सब्जियों की खेती में थे और संपन्न थे. लेकिन अब ऐसा नहीं है. अब बड़ी संख्या में इन खेतों में काम करने वाले रोजगार गारंटी योजना में अपने लिए काम तलाश रहे हैं.

दुखद है पर सच है
जो थोड़े बड़े किसान हैं, या बड़ी जातियों के हैं, उनमें से कई तो बेहद परेशान हैं. उनकी परेशानी का कारण भी कम उलझन भरा नहीं है. रोजगार गारंटी योजना का काम कर पाना उनके लिए संभव नहीं. मजदूरी करके सामाजिक बेइज्जती कैसे झेलें ?

जैसे कोई व्यापारी दीवालिया होने पर अपनी गद्दी पर दिया जला देता है, उसी तरह किसी औसत किसान के लिए मजदूरी करना किसानी पर दिया जला देना ही है. कभी संपन्न रहे किसान उहापोह में हैं.
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