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तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

मुद्दा

 

तब तो मतलब है चुनाव आयोग का

संदीप पांडेय


उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों का प्रचार अभियान जोरों पर है. सभी दल व उम्मीदवार मतदाताओं को प्रभावित करने में जी-जान से जुटे हैं. दूसरी तरफ चुनाव आयोग भी निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहा है.

चुनाव


चुनाव आयोग की सख्ती का फर्क भी पड़ा है. फिजूलखर्ची और अनैतिक तरीकों से मतदाताओं को प्रभावित करने पर अंकुश जरूर लगा है. किंतु चुनाव आयोग के तमाम प्रयासों के बावजूद कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जो निष्पक्ष व स्वतंत्र चुनाव में बाधा बने हुए हैं.

विधानसभा चुनाव में प्रत्येक उम्मीदवार के प्रचार पर खर्च की सीमा 16 लाख रुपये तय की गई है, किंतु राजनीतिक दलों के लिए प्रचार की कोई सीमा नहीं है. राजनीतिक दलों के मद से अखबारों में प्रकाशित होने वाले विज्ञापनों और प्रचार के दौरान हेलीकॉप्टरों या चार्टर्ड हवाई जहाजों के इस्तेमाल पर कोई अंकुश नहीं है. यानी साधन संपन्न और मजबूत स्थिति वाले बड़े राजनीतिक दलों के खर्च पर तो कोई रोक है ही नहीं. खर्च की सीमा सिर्फ छोटे दलों या निर्दलीय उम्मीदवारों के लिए है.

कायदे से बड़े दलों का खर्च उसके उम्मीदवारों के खर्च में बराबर-बराबर जुड़ना चाहिए या फिर उन उम्मीदवारों के खर्च में जुड़ना चाहिए, जिन्होंने दल की किसी खास सेवा का उपयोग किया. जैसे यदि किसी उम्मीदवार का प्रचार करने दल का कोई बड़ा नेता हेलीकॉप्टर से आया है तो उस यात्रा का खर्च उस उम्मीदवार के चुनाव खर्च में जुड़ना चाहिए.

गैर मान्यता प्राप्त दलों के उम्मीदवारों या फिर निर्दलीय उम्मीदवारों को अपना चुनाव चिह्न मतदान से करीब 15 दिन पहले मिलता है, जबकि मान्यता प्राप्त दलों को पहले से ही अपना चुनाव चिह्न मालूम होता है. यानी बड़े दलों को यहां भी लाभ है. वे अपना प्रचार कई महीनों से कर रहे होते हैं जबकि छोटे दलों के या फिर आजाद उम्मीदवार सिर्फ 15 दिन पहले ही अपना चुनाव चिह्न जानकर प्रचार कार्य शुरू करते हैं.

चूंकि स्थापित दलों के उम्मीदवार की तुलना में छोटे दलों के उम्मीदवार के पास संसाधनों का टोटा होता है, इसलिए वह विधानसभा क्षेत्र की विशालता को देखते हुए किसी भी सूरत में अपने चुनाव चिह्न से सभी मतदाताओं को अवगत नहीं करा पाता.

होना तो यह चाहिए कि सभी उम्मीदवारों को प्रचार के लिए समान अवधि मिलनी चाहिए अन्यथा उन्हें चुनाव के लिए एक नया चिह्न उसी दिन मिलना चाहिए, जिस दिन बाकी उम्मीदवारों को मिलता है. इस पर विचार किया जाना जरूरी है कि हरेक चुनाव के लिए प्रत्येक दल को नया चिह्न क्यों नहीं दिया जा सकता? इससे स्थायी चिह्नों को मूर्तियों में तब्दील करने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगेगी.

चुनाव आयोग ने उत्तर प्रदेश में ठीक ही वर्तमान सरकार के कार्यकाल में बनी मायावती की मूर्तियों व बहुजन समाज पार्टी के चुनाव चिह्न हाथी की मूर्तियों को चुनाव अवधि में ढकने का निर्देश दिया. किंतु मूर्तियां ढकने का खर्च उस राजनीतिक दल से वसूलना चाहिए था, जिसे इन मूर्तियों का लाभ मिलने वाला है न कि प्रशासन से. यह तो जनता के साथ सरासर अन्याय है. पहले तो मूर्तियां व पार्क बनाने का बोझ, उसके ऊपर और अब मूर्तियों को ढकने का खर्च भी वही वहन करे. क्या आगे से चुनाव में मूर्तियां ढकने का भी ठेका दिया जाएगा?

इस बार उत्तर प्रदेश चुनावों में निर्वाचन आयोग ने तय किया है कि उम्मीदवार के खर्च पर वह एक छाया रजिस्टर भी बनाएगा. यानी उम्मीदवार द्वारा अपना चुनाव खर्च दिए जाने के अलावा आयोग की तरफ से भी उसके खर्च का अनुमानित हिसाब रखा जाएगा. लेकिन इसका तभी मतलब है, जब उम्मीदवार और आयोग दोनों के हिसाब-किताब की जानकारी जनता तक पहुंचे.

यदि जनता को यह जानकारी मिलेगी तो वह उम्मीदवार द्वारा दिए जा रहे हिसाब की जांच कर सकती है और यदि उसमें कोई गड़बड़ी पाई जाती है तो उसकी शिकायत भी कर सकती है. दूसरी तरफ यदि आयोग के अनुमान को भी सार्वजनिक किया जाता है तो पहला काम तो यही होगा कि उम्मीदवार द्वारा जमा किए गए खर्च से उसका मिलान किया जाए और यदि कोई बड़ी गड़बड़ी मिलती है तो सार्वजनिक की जाए.

यदि आयोग जानकारी के अभाव में किन्हीं खर्चे को नहीं जोड़ता है तो जनता उस खर्च के बारे में आयोग को जानकारी दे सकती है. अत: आयोग की ओर से हिसाब-किताब की पारदर्शी व्यवस्था बनाने से चुनाव खर्च को सीमा के अंदर रखे जाने में जनता की सीधे सहभागिता सुनिश्चित होगी.

उम्मीदवार अब काफी ईमानदारी के साथ अपनी संपत्ति व आय का ब्यौरा सार्वजनिक करने लगे हैं लेकिन एक चुनाव व अगले चुनाव के बीच की अवधि में उनकी आय में जो वृद्धि हुई है, इस पर सवाल उठाने की प्रक्रिया अभी तय नहीं हुई है.

यदि उम्मीदवार की संपत्ति या आय में ऐसी वृद्धि हुई है, जो उसके ज्ञात आय स्त्रोतों से जायज नहीं ठहराई जा सकती तो इसकी जांच की प्रक्रिया स्वत: चालू हो जानी चाहिए अथवा आयकर विभाग को तुरंत सक्रिय हो जाना चाहिए. इसके बिना सिर्फ संपत्ति या आय की जानकारी को सार्वजनिक करने का क्या अर्थ है?

जनप्रतिनिधि बनने के बाद भ्रष्टाचार के पैसे से संपत्ति जुटाने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना जरूरी है. इसके लिए इस बात की नियमित जांच होती रहनी चाहिए कि किसी भी जन प्रतिनिधि या सरकारी कर्मचारी-अधिकारी की संपत्ति उसकी आय के ज्ञात स्त्रोतों से अधिक न हो.

25.01.2012, 01.11 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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