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साहित्य का ओपेरा संस्करण

मुद्दा

 

साहित्य का ओपेरा संस्करण

आशीष कुमार अंशु

ओप्रा विन्फ्रे


इसे संयोग ही कहा जाएगा कि 22 जनवरी को जयपुर में पंडित झाबरमल्ल शर्मा स्मृति व्याख्यान में प्रेस परिषद के अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काटजू जब बोल रहे थे कि “देश और लोगों की असली समस्याओं से भटकाने के लिए जनता को धर्म, फिल्म, क्रिकेट और गैर जिम्मेदार मीडिया की अफीम का नशा दिया जा रहा है.”, उसी दौरान जयपुर में ही एशिया के सबसे बड़े साहित्यिक उत्सव जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन स्थल डिग्गी पैलेस प्रसिद्ध टीवी एंकर ओप्रा विन्फ्रे के प्रशंसकों से घिरा हुआ था. हजारों की संख्या में लोग ‘नो इंट्री’ के बाद भी डिग्गी पैलेस के अंदर दाखिल हो लेना चाहते थे.

आयोजकों के अनुसार अंदर पैर रखने की जगह नहीं थी. बाहर खड़े लोग आयोजकों की इस दलील को अनसुना करके, किसी भी कीमत पर अंदर जाने की जल्दी में थे. भला हो जयपुर पुलिस का, जो अंदर और बाहर के बीच दीवार बनके खड़ी थी और बिना आयोजकों की इजाजत के उन्होंने किसी को अंदर नहीं जाने दिया.

जयपुर में हो रहा एशिया का सबसे बड़ा साहित्यिक उत्सव अन्ना का आंदोलन नहीं था, जो कोई भी आमो-खास सिर उठाकर चला आए. ना ही यह दिल्ली के प्रगति मैदान में लगने वाला पुस्तकों का मेला था कि दस रुपए का टिकट लीजिए और हक से अंदर जाइए. साहित्य उत्सव में तो पास लेकर भी लोग सड़कों पर मारे-मारे फिर रहे थे. जिनकी जेब में पास नहीं था, ऐसे सैकड़ों लोगों का हाल क्या बताएं?

एशिया का सबसे बड़ा साहित्य का यह रेला, माफ कीजिएगा मेला भारत की सरकार के ‘अतुल्य भारत’ के विज्ञापन जैसा ही दिख रहा था. डिग्गी पैलेस साइनिंग से फिल गुड का भी वहां एहसास था. वास्तव में यह आयोजन देश की तरक्की का प्रतीक है. बढ़ते हुए सेंसेक्स और बढ़ती हुई जीडीपी का आइना है. पूरे आयोजन में अन्ना का आम आदमी नदारद था. लोकपाल और भ्रष्टाचार, कुपोषण और भूख जैसे विषय किसी साहित्यकार, लेखक और फिल्मकार के एजेंडे में शामिल नहीं थे. वास्तविकता यह है कि शशी थरूर का कैटल क्लास, पुस्तक मेलों में जाकर ही खुश है. साहित्य की रैली में उसका क्या काम?

पूरे आयोजन में दो ही वर्ग के लोग थे, एक खास लोगों के क्लास से ताल्लुक रखने वाले और दूसरे अति विशिष्ट क्लास से ताल्लुक रखने वाले. आयोजन में जो लोग खास नहीं थे, वे सभी अति विशिष्ट थे. यह आयोजन खाये-पीये और अघाये लोगों के लिये था, जिनके अवकाश के क्षणों में यह सब कुछ घट रहा था और भूख, प्यास, गरीबी व जीवन के द्वंद्व पर बात करने से उनके प्रमाद में खलल पड़ती थी.

डिग्गी पैलेस से यही कोई दस बारह किलोमीटर की दूरी पर चल रहे व्याख्यानमाला में काटजू का व्याख्यान जारी था, “ देश में 80 फीसदी लोग परेशान हैं, गरीब हैं, बेरोजगारी ऐसी है कि चपरासी के एक पद के लिए एक हजार आवेदन आते हैं. इसमें एमए पास भी होते हैं. महंगाई आसमान छू रही है. सरकारी अस्पताल की दशा बदत्तर है और शर्म की बात यह है कि ढाई लाख किसान आत्महत्या कर चुके हैं.”

काटजू बोल रहे थे और इधर डिग्गी पैलेस में कुछ युवक-युवतियां तमाम पुलिसिया रुकावट के बावजूद ओप्रा विन्फ्रे की एक झलक पाने के लिए दीवार लांघने की कोशिश करते पकड़े गए. आयोजकों द्वारा खास लोगों के लिए जारी किए गए सारे पास कुछ घंटों के लिए अमान्य घोषित कर दिए गए थे. अति विशिष्ट लोगों का बाहर जाना और अंदर आना निर्बाध गति से चल रहा था.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

धीरेश सैनी [dhireshsaini@gmail.com] अगरतला, मुज़फ़्फ़रनगर - 2012-01-28 12:37:18

 
  वाहियात आयोजन था. जनविरोधी जहां पंडालों के नामों का भी कॉर्पेटीकरण कर दिया गया था। पर अन्ना का आम आदमी जुमला समझ से परे है। अन्ना आंदोलन भी इसी तबके द्वारा आयोजित मेलोड्रामा है. 
   
 

Sunil K 'Suman' [drsunilsuman.jnu@gmail.com] Wardha - 2012-01-28 10:08:34

 
  बहुत अच्छा लिखा है आशीष ने, बधाई. कुछ लोगों की यह साजिश है कि साहित्य को भी मीडिया जैसा बना दिया जाए. 
   
 

Prem Janmejai [] New Delhi - 2012-01-25 12:40:32

 
  विचारोतेजक आलेख है, बाजारवाद इस प्रकार के आयोजनों को ही प्रायोजित करता है जो साहित्य को भी एक उत्पाद के रूप में प्रस्तुत कर सकें, यह साहित्य की मॉल संस्कृति का एक \"बेहतरीन\" प्रदर्शन था, आज का साहित्यकार प्रेमचंद की तरह विपन्न नहीं है, वह संपन्न है, अब यह तुम्हें तय करना है कि गरीब साहित्यकार बानना है या अमीर? यह टिप्पणी ही उचित है “दिस इज लाइक ए पंजाबी वेडिंग विद सम लिटरेचर थ्रोन इन विदआउट मेंहदी... म्यूजिक इज ऑलसो अवलेबल.” 
   
 

jitu [ji2pia@gmail.com] jaipur - 2012-01-25 09:30:25

 
  भाई, बहुत ही उम्दा रिपोर्ट है. उम्मीद है कि अगली बार किसी विशाल प्रांगण में ये आयोजन होगा और हर साहित्य प्रेमी को इस तरह के कार्यक्रम में जाने का सौभाग्य प्राप्त होगा. 
   
 

awesh tiwari [awesh29@gmail.com] - 2012-01-25 06:54:59

 
  सीधे-सीधे कहिये न ये अभिजनों का उत्सव था. दरअसल पश्चिम ने हिंदुस्तान में साहित्य को सीधे तौर पर अभिजन और गैरअभिजन साहित्य में बाँट दिया है. दिल्ली से लन्दन तक सिगरेट फूंकते और औरतबाजी करते ये साहित्यकार, हिंदुस्तान और यहाँ साहित्यप्रेमियों को एक बाजार की तरह देखते हैं और देखते रहेंगे. जयपुर में आप उसी बाजार की एक बड़ी झलक देख रहे थे. यकीं मानिए आम आदमी लिए ये किसी गली-मोहल्ले के पंसारी की दूकान की जगह किसी बड़े माल में जाकर कडुवा तेल खरीदने जैसा ही था. 
   
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