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इस अंक में

 

जनता अब भी संतुलन ही चाहती है

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

कॉरपोरेट राजनीति तैयार है

नर्मदा में ज़मीन हक का हल्ला बोल

भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ

मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार

यह सबके लिये चेतावनी है

थप्पड़ के नाम पर

ये कहां आ गये हम

मनमोहन सिंह को अब आई शर्म ?

बुरी नज़र वाले तेरा डैम फूल

भूमि-सुधार के अनसुलझे सवाल

कॉरपोरेट राजनीति तैयार है

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

जनता अब भी संतुलन ही चाहती है

आरटीआई के बारे में नहीं जानते हम

मैं आदमखोर नहीं था

रामकथा पर रार क्यों ?

आत्महत्या की फसल

 
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ये कहां आ गये हम

बहस

 

ये कहां आ गये हम

रमेशचंद्र शाह


आज से कोई एक सौ सात बरस पहले पत्रकार-निबंधकार बालमुकुन्द गुप्त ने बीसवीं सदी की दहलीज पर कदम रखते हुए भारत के वर्तमान और भविष्य में झांकने की कोशिश की थी. आज वैसा ही उपक्रम आज का पत्रकार, निबंधकार करे, तो उसे क्या दिखेगा?

गणतंत्र दिवस

 
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक भी एक के बाद एक सुधारकों, कर्मज्ञ नेताओं और महापुरुषों की फसल लहलहाती रही. आज अगर वह फसल एकदम ही सूख गई लगती है तो इसका मतलब यही हो सकता है कि अब महापुरुषों से काम नहीं चलेगा. औसत भारतीयता के उत्कर्ष से ही बात बनेगी. महापुरुष तो केवल यही साबित करने आते हैं कि हमारी सभ्यता की जीवनशक्ति अभी भी चुकी नहीं है. हम न केवल आधुनिक ज्ञान-विज्ञान उपलब्धियों का स्वागत करने में सक्षम हैं, बल्कि स्वावलम्बी और आत्मविश्वासी नीतियों पर चलकर अपना कायाकल्प करने में भी.

निश्चय ही हमारी परम्परा में अन्याय को सहने की नहीं, उसका सक्रिय प्रतिरोध करने की भी प्रवृत्ति रही होगी. नहीं तो महात्मा गांधी नाम की घटना कैसे संभव हुई? सत्याग्रह का दर्शन कैसे अपने आप खड़ा हो गया? धर्मपाल सरीखे खोजी विद्वानों ने जिस तरह गिरी पड़ी हालत में भी भारतीय समाज की स्वावलम्बी शक्ति के अनेक प्रमाण खोज निकाले हैं, उसी तरह अन्याय का विरोध करने की हमारी समार्थ्य और प्रवृत्ति के भी अनेक प्रमाण और उदाहरण उन्होंने उघाड़े हैं.

निश्चय ही एक राष्ट्र-राज्य के रूप में भारत की पिछले चौंसठ वर्षों की भौतिक उपलब्धियां कम नहीं आंकी जा सकतीं. औद्योगिकीकरण की दिशा में तो प्रगति हुई ही, कृषि में भी हरित क्रांति संभव हुई. प्रतिरक्षा में भी- एक प्रारंभिक झटका चीन की ओर से झेलने के बाद हम काफी कुछ संभल गए. शिक्षा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की दीक्षा का भी जहां तक प्रश्न है, हमारे पढ़े-लिखे लोग सारी दुनिया में फैले हुए हैं.

सूचना क्रांति के युग में तो यहां तक दावा किया जाने लगा है कि हम प्रतिभाओं का सबसे बड़ा निर्यात करने की स्थिति में हैं. आणविक शक्ति हम बन ही गए, अंतरिक्ष विज्ञान में भी उल्लेखनीय काम हमारे यहां हो रहा है. तब फिर क्या कारण है कि अधिकतर देशवासी आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीते चले जाने को अभिशप्त हैं? क्या कारण है कि शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक ह्रास आया है? क्या कारण है कि सर्वत्र एक नैतिक खोखलापन उजागर हो रहा है, भ्रष्टाचार की कहीं कोई सीमा नजर नहीं आती?

राष्ट्रीय भावना
हमने माना कि बिना राज्य सत्ता के नेतृत्व और सहयोग के न तो सामाजिक विषमताएं मिटाई जा सकती हैं, न योजनापूर्वक आर्थिक विकास संभव है, न सर्वशिक्षा अभियान सफल हो सकता है. किन्तु सिर्फ कानून बनाकर आप समाज को रूपांतरित नहीं कर सकते. पूरे जन समुदाय को अनुप्राणित करने वाली ज्वलन्त राष्ट्रीय भावना के अभाव में कोई लक्ष्य-दूरगामी और स्थायी परिणाम उपजाने वाले लक्ष्य-सिद्ध नहीं हो सकते.

उस तरह की सामुदायिक भावना, जो हमारी सभ्यता और संस्कृति के सुपरिचित आदर्शों में जगाई जा सके- यूरोपियन राष्ट्रवाद से अलग और अपने सांस्कृतिक अनुभवों से प्रेरित राष्ट्रीयता को जनमानस में सुदृढ़ कर सके- बिना समुचित शिक्षा-दीक्षा के कैसे संभव है? स्वाधीनता का युग आदर्शवादी युग का स्वत:, स्वभावत: हो इसलिए, कि राष्ट्रीयता और देशप्रेम की भावना सहज ही पूरे देश में व्याप्त थीं. एक लक्ष्य था उस संग्राम का- विदेशी शासन से मुक्ति. राष्ट्र की कल्पना ही मानो साध्य थी. अब यह कल्पना एक साध्य की नहीं, मात्र साधन की है. जो भी जबर्दस्त प्रेरक तत्व उस वक्त सक्रिय थे- चाहे भारत माता की कल्पना हो, चाहे देशभक्ति का प्रचण्ड आवेग हो, चाहे जातीय आत्मगौरव और उससे जुड़ा सांस्कृतिक आत्मविश्वास हो, वे सब आज धूमिल हो गए हैं. इतना ही नहीं, वे अनावश्यक या अप्रासंगिक मान लिए गए हैं, किन्तु सच्चाई तो यही है कि संस्कृति के संरक्षण और पुनर्नवीकरण के लिए अपेक्षित ऊर्जा को उन्मुक्त करने के लिए ने अनिवार्य हैं.

आज हमारे यहां राजनीति का संबंध ही मानो उलट गया है. शिक्षा भी देशवासियों में सांस्कृतिक आत्मविश्वास उपजाने में सर्वथा अक्षम है. स्वयं स्वाधीनता संग्राम के दौर में जो समझौते किए गए, वे भी उल्टे ही परिणाम उपजा रहे हैं. एकता के बदले अराजकता-बिखराव उपजा रहे हैं. मसलन विभाजन से साम्प्रदायिकता की समस्या का कोई राष्ट्रीय समाधान नहीं हुआ. न भाषावार प्रांत बना देने से राष्ट्रीय एकता को कोई बल मिला. उल्टे, केन्द्राप्सारी प्रवृत्तियां ही पनपीं, प्रांतीयता यानी उपराष्ट्रीयता की भावनाएं मजबूत हुईं.

ऐसी हालत में भौतिक प्रगति के सारे सरकारी आंकड़ों के बावजूद हम कैसे आश्वस्त हों, कि हमारे राष्ट्र निर्माता की कोटि के महापुरुषों का सपना साकार होने जा रहा है. तथाकथित ‘स्टैण्डर्ड ऑफ लाइफ’ की बढ़ोतरी को हम अपने सामुदायिक अभ्युदय का प्रमाण या गारंटी कैसे मान सकते हैं? ऐसी गरीबी, जिसमें मनुष्य स्वस्थ जीवन और उच्चतर मूल्यों का अहसास ही न कर पाएं, निश्चय ही अनर्थ है, जिसका निराकरण आदर्श जीवन की पूर्व शर्त है. किन्तु यदि मूल्यों की बात को ही ‘स्टैण्डर्ड ऑफ लाइफ’ में ‘रिड्यूज’ कर दिया जाए, भौतिक समृद्धि को ही मूल्यों का दर्जा दे दिया जाए, तो इससे अनिवार्यतया होड़ और संघर्ष और असंतोष की ही वृद्धि होती जानी है.

बदहवासी का दौर
जब आप नेशनल इंटीग्रेशन कमेटी बनाते हैं तो इसका मतलब यही निकलता है कि आपने मान लिया कि इस देश में सांस्कृतिक एकता का पहले से ही कोई पुष्ट सांस्कृतिक आधार नहीं है. राष्ट्रीय एकता तो आपके इस तरह के सरकारी आयोजनों से आगे भविष्य में बन सकने वाली बात है. यह बदहवासी का लक्षण नहीं है तो और क्या है?

ऐसी और भी हमारी बदहवास चेष्टाएं यही दर्शाती हैं कि हम राज्य और राष्ट्र की दो अलग-अलग अवधारणाओं को आपस में गडमड करने के आदी हो गए हैं. अनर्थ का कम से कम एक बीज तो यही है. राज्य एक कानूनी सत्ता है, जबकि राष्ट्र एक सामुदायिक चेतना.
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