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ये कहां आ गये हम
बहस
ये कहां आ गये हम
रमेशचंद्र शाह
आज से कोई एक सौ सात बरस पहले पत्रकार-निबंधकार बालमुकुन्द
गुप्त ने बीसवीं सदी की दहलीज पर कदम रखते हुए भारत के वर्तमान और भविष्य में
झांकने की कोशिश की थी. आज वैसा ही उपक्रम आज का पत्रकार, निबंधकार करे, तो उसे
क्या दिखेगा?
उन्नीसवीं और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध तक भी एक के बाद एक सुधारकों, कर्मज्ञ
नेताओं और महापुरुषों की फसल लहलहाती रही. आज अगर वह फसल एकदम ही सूख गई लगती है तो
इसका मतलब यही हो सकता है कि अब महापुरुषों से काम नहीं चलेगा. औसत भारतीयता के
उत्कर्ष से ही बात बनेगी. महापुरुष तो केवल यही साबित करने आते हैं कि हमारी सभ्यता
की जीवनशक्ति अभी भी चुकी नहीं है. हम न केवल आधुनिक ज्ञान-विज्ञान उपलब्धियों का
स्वागत करने में सक्षम हैं, बल्कि स्वावलम्बी और आत्मविश्वासी नीतियों पर चलकर अपना
कायाकल्प करने में भी.
निश्चय ही हमारी परम्परा में अन्याय को सहने की नहीं, उसका सक्रिय प्रतिरोध करने की
भी प्रवृत्ति रही होगी. नहीं तो महात्मा गांधी नाम की घटना कैसे संभव हुई?
सत्याग्रह का दर्शन कैसे अपने आप खड़ा हो गया? धर्मपाल सरीखे खोजी विद्वानों ने जिस
तरह गिरी पड़ी हालत में भी भारतीय समाज की स्वावलम्बी शक्ति के अनेक प्रमाण खोज
निकाले हैं, उसी तरह अन्याय का विरोध करने की हमारी समार्थ्य और प्रवृत्ति के भी
अनेक प्रमाण और उदाहरण उन्होंने उघाड़े हैं.
निश्चय ही एक राष्ट्र-राज्य के रूप में भारत की पिछले चौंसठ वर्षों की भौतिक
उपलब्धियां कम नहीं आंकी जा सकतीं. औद्योगिकीकरण की दिशा में तो प्रगति हुई ही,
कृषि में भी हरित क्रांति संभव हुई. प्रतिरक्षा में भी- एक प्रारंभिक झटका चीन की
ओर से झेलने के बाद हम काफी कुछ संभल गए. शिक्षा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की दीक्षा
का भी जहां तक प्रश्न है, हमारे पढ़े-लिखे लोग सारी दुनिया में फैले हुए हैं.
सूचना क्रांति के युग में तो यहां तक दावा किया जाने लगा है कि हम प्रतिभाओं का
सबसे बड़ा निर्यात करने की स्थिति में हैं. आणविक शक्ति हम बन ही गए, अंतरिक्ष
विज्ञान में भी उल्लेखनीय काम हमारे यहां हो रहा है. तब फिर क्या कारण है कि अधिकतर
देशवासी आज भी गरीबी रेखा के नीचे जीते चले जाने को अभिशप्त हैं? क्या कारण है कि
शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक ह्रास आया है? क्या कारण है कि सर्वत्र एक नैतिक
खोखलापन उजागर हो रहा है, भ्रष्टाचार की कहीं कोई सीमा नजर नहीं आती?
राष्ट्रीय भावना
हमने माना कि बिना राज्य सत्ता के नेतृत्व और सहयोग के न तो सामाजिक विषमताएं मिटाई
जा सकती हैं, न योजनापूर्वक आर्थिक विकास संभव है, न सर्वशिक्षा अभियान सफल हो सकता
है. किन्तु सिर्फ कानून बनाकर आप समाज को रूपांतरित नहीं कर सकते. पूरे जन समुदाय
को अनुप्राणित करने वाली ज्वलन्त राष्ट्रीय भावना के अभाव में कोई लक्ष्य-दूरगामी
और स्थायी परिणाम उपजाने वाले लक्ष्य-सिद्ध नहीं हो सकते.
उस तरह की सामुदायिक भावना, जो हमारी सभ्यता और संस्कृति के सुपरिचित आदर्शों में
जगाई जा सके- यूरोपियन राष्ट्रवाद से अलग और अपने सांस्कृतिक अनुभवों से प्रेरित
राष्ट्रीयता को जनमानस में सुदृढ़ कर सके- बिना समुचित शिक्षा-दीक्षा के कैसे संभव
है? स्वाधीनता का युग आदर्शवादी युग का स्वत:, स्वभावत: हो इसलिए, कि राष्ट्रीयता
और देशप्रेम की भावना सहज ही पूरे देश में व्याप्त थीं. एक लक्ष्य था उस संग्राम
का- विदेशी शासन से मुक्ति. राष्ट्र की कल्पना ही मानो साध्य थी. अब यह कल्पना एक
साध्य की नहीं, मात्र साधन की है. जो भी जबर्दस्त प्रेरक तत्व उस वक्त सक्रिय थे-
चाहे भारत माता की कल्पना हो, चाहे देशभक्ति का प्रचण्ड आवेग हो, चाहे जातीय
आत्मगौरव और उससे जुड़ा सांस्कृतिक आत्मविश्वास हो, वे सब आज धूमिल हो गए हैं. इतना
ही नहीं, वे अनावश्यक या अप्रासंगिक मान लिए गए हैं, किन्तु सच्चाई तो यही है कि
संस्कृति के संरक्षण और पुनर्नवीकरण के लिए अपेक्षित ऊर्जा को उन्मुक्त करने के लिए
ने अनिवार्य हैं.
आज हमारे यहां राजनीति का संबंध ही मानो उलट गया है. शिक्षा भी देशवासियों में
सांस्कृतिक आत्मविश्वास उपजाने में सर्वथा अक्षम है. स्वयं स्वाधीनता संग्राम के
दौर में जो समझौते किए गए, वे भी उल्टे ही परिणाम उपजा रहे हैं. एकता के बदले
अराजकता-बिखराव उपजा रहे हैं. मसलन विभाजन से साम्प्रदायिकता की समस्या का कोई
राष्ट्रीय समाधान नहीं हुआ. न भाषावार प्रांत बना देने से राष्ट्रीय एकता को कोई बल
मिला. उल्टे, केन्द्राप्सारी प्रवृत्तियां ही पनपीं, प्रांतीयता यानी उपराष्ट्रीयता
की भावनाएं मजबूत हुईं.
ऐसी हालत में भौतिक प्रगति के सारे सरकारी आंकड़ों के बावजूद हम कैसे आश्वस्त हों,
कि हमारे राष्ट्र निर्माता की कोटि के महापुरुषों का सपना साकार होने जा रहा है.
तथाकथित ‘स्टैण्डर्ड ऑफ लाइफ’ की बढ़ोतरी को हम अपने सामुदायिक अभ्युदय का प्रमाण या
गारंटी कैसे मान सकते हैं? ऐसी गरीबी, जिसमें मनुष्य स्वस्थ जीवन और उच्चतर मूल्यों
का अहसास ही न कर पाएं, निश्चय ही अनर्थ है, जिसका निराकरण आदर्श जीवन की पूर्व
शर्त है. किन्तु यदि मूल्यों की बात को ही ‘स्टैण्डर्ड ऑफ लाइफ’ में ‘रिड्यूज’ कर
दिया जाए, भौतिक समृद्धि को ही मूल्यों का दर्जा दे दिया जाए, तो इससे अनिवार्यतया
होड़ और संघर्ष और असंतोष की ही वृद्धि होती जानी है.
बदहवासी का दौर
जब आप नेशनल इंटीग्रेशन कमेटी बनाते हैं तो इसका मतलब यही निकलता है कि आपने मान
लिया कि इस देश में सांस्कृतिक एकता का पहले से ही कोई पुष्ट सांस्कृतिक आधार नहीं
है. राष्ट्रीय एकता तो आपके इस तरह के सरकारी आयोजनों से आगे भविष्य में बन सकने
वाली बात है. यह बदहवासी का लक्षण नहीं है तो और क्या है?
ऐसी और भी हमारी बदहवास चेष्टाएं यही दर्शाती हैं कि हम राज्य और राष्ट्र की दो
अलग-अलग अवधारणाओं को आपस में गडमड करने के आदी हो गए हैं. अनर्थ का कम से कम एक
बीज तो यही है. राज्य एक कानूनी सत्ता है, जबकि राष्ट्र एक सामुदायिक चेतना.
आगे पढ़ें सन 1947
में भारत का विभाजन दो राष्ट्रों में नहीं, दो राज्यों में हुआ. विभाजन से पूर्व
जिस आधार पर राष्ट्र एक था, वह आधार क्या विभाजन के बाद नहीं रहा? क्या नेहरू, क्या
गांधी, क्या विवेकानंद, क्या श्री अरविन्द सब ने जो एक स्वर में उत्तर-दक्षिण,
पूर्व-पश्चिम समूचे भारत के जनमानस को एक देखा, अनुभव किया अपनी आंखों से साक्षात्,
वह क्या भ्रम या खुशफहमी थी? समस्त भारतीय वाङ्मय के भीतर से बोलने वाली एकता क्या
ऐतिहासिक विवरणों से पुष्ट नहीं होती? समूची ऐतिहासिक परम्परा में अभिव्यक्त यह
भावनात्मक एकता ही क्या भारत की राष्ट्रीय एकता नहीं?
यह सार्वजनिक दुर्भाग्य है कि हमारी रीढ़विहीन, परोपजीवी और विकलांग प्रशासनिक-
शैक्षिक व्यवस्थाएं इस अनुभूति को बल तो क्या पहुंचाएगी, उसे कमजोर ही करती रही
हैं. हम पश्चिम के पैमानों से अपने को आंकते हैं. किन्तु कड़वी हकीकत यही है कि जो
लोग राष्ट्रीयता को आधुनिक यूरोपीय राष्ट्रों के मॉडल के मुताबिक समझते-देखते हैं,
उन्हें सचमुच ही भारत की इस चिरंतन राष्ट्रीय एकता का सूत्र समझ में नहीं आ सकता.
पश्चिम की राष्ट्रीयता अपनी पहचान एक सीमित भाषायी क्षेत्र से बनती- पाती है.
किन्तु नीयत और हरकतें उसकी सदैव अपनी आर्थिक और सामरिक शक्ति के बूते पूरी दुनिया
को हड़पने की रहती है. यही उनका इतिहास है. वास्तव में वहां सामुदायिक चेतना का
एकमात्र और सर्वोच्च पुरुषार्थ ही यही है: आर्थिक राजनीतिक साम्राज्यवाद. यहां तक
कि मजहबी साम्राज्यवाद भी.
इससे ठीक उलट भारतीय परम्परा रही है, जहां राष्ट्रीय चेतना वस्तुत: एक महाद्वीपीय
सांस्कृतिक चेतना है. स्वाधीनता संग्राम के दौर में हमने इसी चिरंतन सांस्कृतिक
पहचान को नए सिरे से स्वायत्त किया था और उसी के साथ राजनीतिक स्वाधीनता और
लोकतंत्री राज्य की नई अवधारणाएं जोड़ ली थीं. सांस्कृतिक आदर्शों की पूर्ति हेतु
‘वन्देमातरम्’ की अवधारणा हुई थी. श्री अरविन्द की ‘भवानी भारती’ भी पृथ्वीसूक्त और
वैदिक राष्ट्र देवी के ही मेल में है.
यह एक शर्मनाक विडंबना ही है कि स्वातंत्रयोत्तर युग में आज हमने सहज रूप से समूचे
देश द्वारा स्वीकृत और अभिनदिंत इस राष्ट्र कल्पना को विवादास्पद बनाकर रख दिया है.
इससे बड़ा आत्मधिक्कारी पराक्रम क्या होगा? ‘सेल्फ-बिट्रेयल’ और होता क्या है? गांधी
में ‘हिन्द स्वराज’ की शुरुआत ही इस व्यंग्योक्ति से की थी: ‘राष्ट्र कौन ? वही जो
यूरोपीय सभ्यता के रंग में रंगे हुए हैं और स्वराज्य की बात कर रहे हैं.’ चालीस बरस
बाद भी उन्होंने इस कठोर हृदय बुद्धिजीवी वर्ग को अपने जीवन को सबसे लम्बा
दु:स्वप्न बताया था. उन्हीं ने महान भारतीय भाषाओं की अवहेलना का उल्लेख करते हुए
‘हिन्द स्वराज’ में यह भी घोषित किया था ‘हमने अपनी प्रजा को ठगने में कोई कसर नहीं
छोड़ी है और आने वाली पीढ़ियों का श्राप हमको लगेगा।’
कहना न होगा कि उनकी सारी आशंकाएं सही साबित हुई हैं. अंग्रेजी का उपयोग कम होने के
बजाय बढ़ता ही गया है और हिन्दी क्या शिक्षण संस्थाओं में, क्या राजकाज में, क्या
बौद्धिकों के संवाद में, सब जगह अवहेलित और अपमानित है.
नौकरशाह यानी...
‘जहां चाह है-वहीं राह है’ इस कहावत को चीन, जापान, इजराइल सभी जगहों में बखूबी
चरितार्थ किया जा चुका है. एकमात्र भारत ही अकेला ऐसा स्वाधीन देश है, जहां विदेशी
भाषा की गुलामी बदस्तूर चली आ रही है और फलफूल भी रही है. हमारे एक बड़े हिन्दी
कवि-विचारक ने कभी लिखा था कि ‘शिक्षा के अभाव एक फीसदी लोग ही रचनात्मक कार्यों
में भागीदारी कर पाते हैं.’ यह कथन आज भी पुराना नहीं पड़ा.
अलावा इसके, कामचोरी या काहिली भी हमारा राष्ट्रीय रोग है. राष्ट्रीय ऊर्जा का
जितना अपव्यय इसके कारण होता है, उतना भ्रष्टाचार से भी न होता होगा. ‘नशे से,
तुम्हारा नाश हो तुम नौकरी के हित बनी.’ यह सौ बरस पहले हमारा राष्ट्र कवि कह गया
है. मगर नौकरी यहां मन लगाकर कौन करता है? हमारी ‘ब्यूरोक्रेसी’ भी चीन के उदाहरण
से प्रभावित अंग्रेजों की ईजाद थी. उससे ज्यादा बेमेल व्यवस्था और क्या हो सकती थी
स्वतंत्र भारत के लिए? मगर राष्ट्रीय शिक्षा की ही तरह राष्ट्रीय प्रशासन तंत्र खड़ा
करने की चुनौती भी हमने स्वीकार नहीं की. यूं, वैयक्तिक प्रतिभा और निष्ठा के
उदाहरण हर क्षेत्र में मिल जाएंगे. मगर कोई भी देश सामूहिक चरित्र और सामूहिक
निष्ठा के बल पर ही आगे बढ़ता है, वैयक्तिक उदाहरणों से नहीं.
इस देश की विडंबना यह है कि जो करोड़ों संस्कारवान लोग हैं, उन्हें तो साक्षरता के
लाले पड़े हैं, और जो पढ़े-लिखे हैं, उन्हें इसका तनिक भी बोध नहीं है कि उन्हें
शिक्षित-दीक्षित बनाना देश के गूंगे-बहरे करोड़ों लोगों को कितना महंगा पड़ता है? ऐसी
हालत में देश और समाज के प्रति ऋण शोध की भावना ही उनमें सिरे से नदारद है. ऐसा
लगता है, जैसे अचानक ही बिना अनुशासन और सामूहिक कर्तव्यपरायणता का कठोर सबक सीखे,
तमाम तरीके की लालचों की तमीज हममें आ गई. अधिकार चेतना भी कुछ इस तरह से जगी या
जगाई गई कि कर्तव्य-चेतना उसी अनुपात में सो गई.
अंत में सांस्कृतिक उत्कर्ष के एक बड़े साधन- भाषा और साहित्य का हाल देख लें. जिस
देश में कथा और काव्य से सारे काम लिए जाते रहे, जनमानस की शिक्षा-दीक्षा का सबसे
बड़ा उपकरण भी वही रहा- वहां आज साहित्य की वैसी भूमिका जनमानस के निर्माण और
संस्कार की है- ऐसा कोई नहीं कह सकता. क्या कारण है कि हमारे लोगों का अपने असली
सांस्कृतिक प्रतिनिधियों का वैसा सम्पर्क नहीं रहा? ‘भाव थे जो शक्ति साधन के
लिए-लुट गए किस आंदोलन के लिए...’ कवि शमशेर की कविता पूछती है तो यूं ही नहीं
पूछती- ‘आज हम बात कम काम ज्यादा करना चाहते हैं और बड़ी आकांक्षा से डरना चाहते
हैं, जिलाधीशों से नहीं...’ रघुवीर सहाय ने कभी लिखा था. मगर ऐसी दुष्कल्पना तो
उन्होंने भी नहीं की होगी कि ऐसा भी वक्त आएगा, जब तथाकथित विद्रोही तेवरों की
गतिविधियां भी ‘जिलाधीशों’ के बूते ही निपटाई जाने लगेंगी और ‘काम कम-बात ज्यादा’
की तर्ज पर यशोलिप्सुओं के आरक्षण की आकांक्षाएं ही साहित्य को डराने लगेगी.
26.01.2012, 19.10 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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