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थप्पड़ के नाम पर

मुद्दा

 

थप्पड़ के नाम पर

अन्ना हजारे


पिछले 30 साल से मैं भ्रष्टाचारियों के खिलाफ़ लड़ रहा हूं, न मैंने किसी को थप्पड़ मारा है, न ही किसी को मारने के लिए कहा, फिर भी थप्पड़ को मेरे साथ जोड़ा जा रहा है. थप्पड़ के बारे में मेरे बयान को बगैर सोचे, न समझते हुए इस देश के बहुत बड़े अपराधी के रूप में मेरा चित्र रंगाया जा रहा है, जो कि दुर्भाग्यपूर्ण है.

अन्ना हजारे


मैं तो पहले भी बता चुका हूं कि गांधीजी के पैरों के पास बैठने की भी मेरी पात्रता नहीं है, गांधीजी के साथ मुझे जोड़ना ठीक नहीं. गांधीजी ने तो किसी के लिए कठोर शब्द प्रयोग करने का भी शुमार हिंसा में किया है. लेकिन मैंने कई बार देश और समाज के साथ गद्दारी करने वालों का विरोध कर कठोर शब्दों का प्रयोग किया है, जो कि मैं मानता हूं कि देश और समाज की भलाई के ही लिए किया है, हालाँकि गांधीजी के विचारों में वह भी हिंसा ही है.

एक दुर्भाग्यपूर्ण साजिश के तहत थप्पड़ के बारे में गलतफहमियाँ फैला कर मेरी बदनामी करने के प्रयास किये जा रहे हैं. यह पहली घटना नहीं है. मेरी बदनामी की कोशिशें कई बार हो चुकी हैं. लेकिन सत्य हमेशा सत्य ही होता है. इतिहास गवाह है कि सत्य को कोई झूठ नहीं साबित कर पाया. फिर भी सत्य के मार्ग पर चलने वालों को काफी तकलीफें सहनी पड़ी हैं. उनकी हमेशा निन्दा होती रही है, बुराई के साथ उन्हें संघर्ष भी करना पड़ा है, फिर हम पाते हैं कि मानव जाति के इतिहास में सत्य कभी भी पराजित नहीं हुआ. सत्य हमेशा सत्य ही रहा है. इस बात का मैंने अपने जीवन में खुद अनुभव किया है.

पिछले 25 सालों से मेरी बदनामी के प्रयास होते रहे हैं. लेकिन मन्दिर में रहने वाले अण्णा पर उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि अण्णा अपने निजी स्वार्थ के लिए कुछ भी तो नहीं कर रहा है. निन्दा करने वालों को मैं बताना चाहता हूं कि थप्पड़ का सच क्या है. ‘अण्णा कहते हैं भ्रष्टाचारियों को थप्पड़ मारो.’ इसी बात को लेकर इस थप्पड़ को गांधीजी की समाधि के साथ तक जोड़ा गया…’गांधी के चोले में थप्पड़’, ‘क्यों पड़ी अण्णा को थप्पड़ की जरूरत’, वगैरह-वगैरह. इन बातों को कह कर मेरी बदनामी का चित्र रंगाया गया जो कि मैं समझता हूं कि एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना है.

16 अगस्त को रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार के विरोध में हुए आन्दोलन में करोड़ों की संख्या में देश की जनता रास्ते पर उतर आई थी. मैंने बार-बार जनता से अपील की कि सभी भाई-बहनों ने, युवकों ने शान्ति के मार्ग ही से आन्दोलन करना है. कहीं पर भी हिंसा नहीं करनी है. अहिंसा में बहुत शक्ति है. अगर कहीं छुटपुट भी हिंसा हुई तो सरकार इस आन्दोलन को तोड़ देगी, कुचल देगी. इतना विशाल आन्दोलन हुआ मगर पूरा का पूरा शान्तिपूर्ण हुआ. न सिर्फ देश में बल्कि पूरी दुनिया में इस बात की चर्चा जरूर हुई कि भारत में करोड़ों लोग रास्ते पर उतर आए, पर देश भर में कहीं भी एक पत्थर भी किसी ने नहीं उठाया. इसके पीछे क्या रहस्य छिपा है?

25 सालों से आन्दोलन चल रहे हैं, कभी भी जीवन में हिंसा का विचार नहीं आया. १६ अगस्त २०११ के इतने बड़े आन्दोलन में कभी हिंसा का विचार मन में नहीं आया. वहीं आन्दोलन के सिर्फ चार महीने बाद हिंसा करने या करवाने के विचार कैसे आ सकते हैं? इन चार महीनों के दौरान कई स्थानों पर मेरी बड़ी-बड़ी सभाएं हुईं. न मैंने कहीं हिंसा की बात रखी, न ही जनता ने भी हिंसा की है. भारतीय सेना में सेवा के दौरान 1963 से लेकर 1976 तक 12 वर्ष मैं पाकिस्तान जैसे देश के दुश्मन के साथ लड़ता रहा. खुद के स्वार्थ के लिए नहीं पर देश व समाज के हित के लिए मैंने २६ साल की उम्र में लड़ाई में भी हिस्सा लिया है. आज भी देश में छिपे हुए भ्रष्टाचारियों के साथ जंग जारी है, पर हिंसात्मक नहीं, अहिंसा के मार्ग से जारी है.

1975 में पहले तो स्वामी विवेकानन्द जी और बाद में गांधीजी के विचारों का प्रभाव जीवन पर हुआ. उस कारण जीवन में कभी भी किसी के साथ हिंसात्मक लड़ाई नहीं की. 25 सालों से भ्रष्ट प्रवृत्ति के खिलाफ़ चल रही इस लड़ाई में राजनीति के कई खिलाड़ियों ने यदि मेरी हद से ज्यादा बदनामी की है, मुझे जेल में भी भिजवाया गया, तरह-तरह के दुर्व्यवहार किये गये, फिर भी मैंने कभी भी थप्पड़ मारने की भाषा नहीं की. इतने वर्षों में न मैंने किसी को थप्पड़ मारा, न ही किसी को मारने के लिए उकसाया. भ्रष्टाचारियों के खिलाफ़ कानूनी लड़ाई के फलस्वरूप 6 कैबिनेट मिनिस्टर तथा 400 से अधिक भ्रष्ट अधिकारियों को अपने घर जाना पड़ा. उस समय भी मेरे साथ उन लोगों ने भाँति-भाँति के दुर्व्यवहार किये, लेकिन उनके साथ भी थप्पड़ की भाषा मैंने कभी नहीं की. समाज और देश की भलाई के लिए कई बार मैंने आन्दोलन किये लेकिन उनमें हमेशा खुद आत्मक्लेश करना और उसकी संवेदना जनता को हो इसी प्रकार से आन्दोलन किये गये, कभी भी थप्पड़ की भाषा का प्रयोग नहीं हुआ.

आत्मक्लेश के तीन अनशन पिछले 10 महीनों में किये, नतीजा यह हुआ कि महीने भर से बीमार पड़ा हूं. फिर भी मेरा हौसला कम नहीं हुआ है. पूर्णतया स्वस्थ हो जाऊं तो फिर से भ्रष्टाचारी प्रवृत्ति के विरोध में मैं देश भर में जनता को सम्बोधित करने निकल पडूंगा. उसमें थप्पड़ की बात कभी भी नहीं होगी. कुछ लोगों ने जो यह थप्पड़ का माहौल खड़ा किया है उसके पीछे असलियत क्या है यह मैं जनता को बताना चाहता हूं. वैसे मैं कभी फिल्में देखता नहीं और बीमारी के कारण महीने भर से कमरे के बाहर भी नहीं गया.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

dinesh rai [dineshprai@yahoo.co.in] gorakhpur - 2012-03-07 13:36:52

 
  अन्ना जी आप सब कुछ कह कर फिर भोले बनते हो. अपनी बदनामी पर तकलीफ होती है परंतु आप की टीम के लोग अहंकार के साथ हर नेता और अधिकारी को चोर कहते हैं वह आप को नहीं सुनाई पड़ता है. आप और आप की टीम के एयर ट्रेवल / महंगे वाहनों से यात्रा का पैसा कहां से आता है? मेदांता और संचेती अस्पताल में दरा कराने के खर्च कौन वहन करता है? आप की मासिक आमदनी क्या है? 
   
 

देवेश तिवारी [deveshtiwaricg@gmail.com] रायपुर - 2012-02-14 19:28:55

 
  गाँधी जी भी कहते थे की समय के साथ आदमी के विचारों में परिवर्तन आना ही चाहिए. आपने थप्पड़ मारने की बात शायद इसलिए भी कही क्योकि फिल्म इतना प्रभाव छोड़ती है कि देखने के बाद दो चार घंटे हम फिल्म में ही लीन हो जाते हैं. निराश होने कि जरुरत नहीं जो ये कथित सफेदपोश नेता निंदा कर रहे हैं, इन्हें वही काम सुहाता है. अपना कम जारी रखें. पूरी सफलता मिले न मिले अब भ्रष्टाचारीयों को डर तो है. बीते दिनों बस में एक भाईसाहब से मिला वे तीन बार मुंबई से रायपुर पासपोर्ट बनवाने आ चुके हैं. इतने खर्चे में तो एजेन्ट घर तक छोड़ आता. उन्होंने मुझसे कहा चाहे जितना पैसा लगे गलत नहीं करूँगा, अन्ना स्टाइल से चल रहा हूँ. एक पैसा भ्रष्टाचारीयों को नहीं दूँगा. यही असल मायनों में आंदोलन की सफलता है. 
   
 

asmant sharma [aayaans481@gmail.com] mathura - 2012-01-31 06:16:51

 
  सच्चाई की हमेशा जीत होती है. देश की जनता आप के साथ है. स्वार्थी लोग कभी आप के साथ आएंगे नहीं उसकी आप चिंता न करें.  
   
 

Rakesh Prabhakar [rakesh1936@gmail.com] Agra - 2012-01-27 15:38:33

 
  काहे को फ़र्ज़ी सफाई दे रहे हो प्यारे अन्ना हज़ारे! गान्धी पंचायतों को सशक्त करना चाहते थे जो आज की तारीख़ में घोर संविधान विरोधी हैं,शायद इसीलिये खाप पंचायतों ने अन्ना आन्दोलन को समर्थन दिया था, जिसका आप जैसे गान्धीवादी(?) या जातिवादी ने कोई विरोध नहीं किया था,क्योंकि वैसी ही पंचायत रालेगण सिद्धी में भी चल रही है। और खाप पंचायतें तो कितनी अहिंसक और मासूम होती हैं। है ना! बिल्कुल आप जैसी! गान्धी बिरला जैसों के खैराती थे और आप का आन्दोलन अमेरिका-परस्त कॉर्पोरेटों के सहयोग से, जाति-परस्त व ब्राह्मणवादी मीडिया के प्रचार से, पैसा-बटोरू एनजीओ के प्रबन्धन से चल रहा है। यही वजह है कि इन तीनों को ही आपने अपने तथाकथित जनलोकपाल से बाहर रखा है। टीवी देखने वाला मध्य-वर्ग इसलिये अन्ना आन्दोलन के समर्थन में है क्योंकि वह अस्पृश्यता विरोधी संविधान को नहीं,वरन मनुस्मृति को अपना आदर्श मानता है। 
   
 

M A Ustad Gunjikar [maugnjbgm@gmail.com] Belgaum Karnataka - 2012-01-27 14:18:08

 
  Anna alone cannot eradicate corruption. Need of today is that every Indian should become Anna. Otherwise we will lose our freedom. 
   
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