मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार
मुद्दा
मोटापा की चिंता में दुबलाती मप्र सरकार
अमिताभ पांडेय
महिला उत्पीड़न, अशिक्षा, कुपोषण, अवैध खनन के मामले में अव्वल मध्यप्रदेश की सरकार
को अब मोटे कर्मचारियों की चिन्ता हो गई है. जो सरकारी अधिकारी-कर्मचारी मोटे हैं,
वे अब अपनी चर्बी कम करवा सकते हैं. मोटे से दुबले होने की प्रक्रिया में जो खर्च
आयेगा, उसका भुगतान राज्य करेगी. इस आशय का फैसला पिछले दिनों मध्यप्रदेश सरकार ने
लिया है.
अनुमान है कि मोटे कर्मचारियों को अस्पताल में सर्जरी के माध्यम से दुबला करने की
प्रक्रिया पर प्रति कर्मचारी लगभग एक से डेढ़ लाख रूपये तक का खर्च आयेगा. यह खर्च
सरकार उठाने को तैयार है. बताया जाता है कि राज्य शासन ने मोटे कर्मचारियों की
सर्जरी के लिए कुछ निजी अस्पतालों से अनुबंध भी कर लिया है, जहां दुबला होने की मोटी
फीस सरकार भर देगी. मोटे कर्मचारियों को सरकारी खजाने से दुबला करने वाला यह आदेश
10 जनवरी 2012 से मध्यप्रदेश में प्रभावशील हो गया है.
जाहिर है, सरकार के इस निर्णय से कई सवाल खड़े हो गये हैं. मोटापा कम करने के लिये
मोटी फीस निजी अस्पतालों को ही क्यों दी जाये? यह काम सरकारी अस्पतालों में क्यों
नही किया जा सकता ? मोटे कर्मचारियों को सरकारी खर्च पर दुबला करने की जरूरत क्यों
पड़ी ? जब सरकार अपने कर्मचारियों, अधिकारियों को हर साल बढा हुआ वेतन, महंगाई भत्ते
सहित अन्य अनेक सुविधाएं देने के साथ ही बीमारी पर होने वाला खर्च भी पहले से
उपलब्ध करवा रहा है, तो मोटापा कम करने के लिए अलग से मोटी रकम क्यों खर्च की जा रही
है? देश के अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक 27 प्रतिशत वेट टेक्स आम जनता से
वसूलने वाली मध्यप्रदेश सरकार को वेट टेक्स कम करने के बजाय मोटे कर्मचारियों को
दुबला करने की इतनी ज्यादा चिन्ता क्यों है ? भूख और कुपोषण के कारण जिन पुरूषों,
महिलाओं और बच्चों के पेट अपनी पीठ से चिपक रहे हैं, उनकी फिक्र करना क्या राज्य
सरकार की जिम्मेदारी नहीं हैं ? ऐसे अनेक सवाल हैं, जिनका जवाब कोई नहीं देना चाहता.
अपने मोटे कर्मचारियों की फिक्र राज्य सरकार ने ऐसे समय में जताई है, जब मध्यप्रदेश
के दूरस्थ अंचलों में भूख से मौत, भूख के कारण पीठ से पेट चिपक जाने, कुपोषित बच्चों
का शरीर हड्डियों का ढ़ांचा बन जाने के समाचार लगातार आते रहे हैं. सरकारी महकमे का
हाल ये है कि कुपोषण से निपटने के लिये आंगनबाड़ियों में पिछले दो सालों तक आयरन और
कैल्शियम की गोलियां पहुंचाई ही नहीं गईं, जिन्हें कुपोषण दूर करने के लिये गर्भवती
महिलाओं को दिया जाना था.
हाल ही में भोपाल में ही आयोजित भोजन का अधिकार अभियान के राष्ट्रीय अधिवेश में दिशा
संवाद नामक संस्था ने चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश की थी. दिशा संवाद के अनुसार भूख,
गरीबी के कारण प्रतिवर्ष भारत में 15 लाख से ज्यादा बच्चे पांच वर्ष की आयु पूरी
करने से पहले ही मर जाते हैं. मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां ग्रामीण क्षेत्रों
में भूख, गरीबी, कुपोषण की मिली जुली तस्वीर 52 प्रतिशत से अधिक बच्चों में देखी जा
सकती है. मध्यप्रदेश में 3 वर्ष से कम आयु के 50.8 प्रतिशत बच्चे अपनी मां को
पर्याप्त और संतुलित भेाजन नहीं मिलने की सजा कुपोषित होकर भोग रहे हैं. राज्य के
सतना में 67 प्रतिशत बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. यही हाल उमरिया का है, जहां 66.6
प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं. बड़वानी, अलीराजपुर और डिंडौरी जैसे जिलों में भी
कुपोषण की सीमा 60 फीसदी से अधिक है
इसी तरह सहस्राब्दी विकास लक्ष्य के तहत भारत में 45.3 प्रतिशत लोग भूख,गरीबी के
साये में अपनी जिन्दगी जीने को मजबूर हैं, जबकि मध्यप्रदेश में भूख,गरीबी के बीच
गुजर बसर करने वालों की संख्या कुल आबादी का 48.6 प्रतिशत हो गई है. ये भूख और गरीबी
बड़ो ही नहीं, बच्चों को भी बेवक्त मौत के मुंह में धकेल रही है. ऐसे में मोटे लोगों
की चिंता में दुबलाती शिवराज सिंह चौहान की सरकार से पूछने का मन होता है कि आखिर
उनकी प्राथमिकता में भूख से जूझते लोगों के बजाये खाये-पीये-मोटाये लोग क्यों हैं ?
05.02.2012, 08.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशित