चुनावी मसाले की सोंधी महक
बाईलाइन
चुनावी मसाले की सोंधी महक
एम जे अकबर
एक
एक्जिट पोल ऐसा है, जिस पर कोई भारतीय चुनाव आयुक्त पाबंदी नहीं लगा सकता है. वह है
एक मुंह से दूसरे मुंह तक प्रसारित होने वाले शब्द. अंतिम क्षण तक अपने फ़ैसले को
हर किसी से छिपा कर रखने वाला मतदाता वोटिंग के बाद इसके बारे में परिवार और समाज
के भीतर जोर-शोर से चर्चा करता है. यह चर्चा चौक-चौराहों, चाय की दुकानों या जाड़े
की शामों में आग के चारों ओर, कहीं भी हो सकती है.
नौसिखिया कच्चे खिलाड़ी या बाहरी लोग, जिसका मतलब है हम में से 90 प्रतिशत लोग;
परिणामों के औपचारिक तौर पर आने का इंतजार करते हैं. लेकिन, चुनाव से जुड़े पेशेवर
लोगों को मतदान के दिन शाम ढलते-ढलते पता चल चुका होता है कि ऊंट किस पाले में बैठा
है.
जाहिर है, संकेतों को अपने खिलाफ जाते देख कर भी प्रत्याशियों का रवैया आखिरी समय
तक इनकार की मुद्रा अख्तियार किये रखने वाला बना होता है. यह स्वाभाविक भी है, आखिर
चुनाव से उनकी भावना जुड़ी होती है. इसलिए जब तक सच्चाई उनके सपनों को चकनाचूर न कर
दे, वे अपनी आंखें मूंदे रखना चाहते हैं.
अगर एक्जिट पोल को प्रतिबंधित करने के पीछे यह तर्क है कि चुनाव रुझान अगले चरण की
वोटिंग को प्रभावित कर सकते हैं, तो साफ है कि यह मकसद पूरा नहीं होता. खास कर
उत्तर-प्रदेश जैसे बड़े और जटिल राज्य में, जहां मतदान महीने भर चलने वाले कई चरणों
में होते हैं.
इस बार उत्तर-प्रदेश में चुनावों की शुरुआत हिमालय के पास वाले उत्तरी हिस्से से
हुई है. ये पूर्वी और मध्य उत्तर-प्रदेश होते हुए पश्चिमी उत्तर-प्रदेश में समाप्त
होंगे. दूसरे चरण के चुनाव वाले मतदाताओं को, पहले चरण के मतदान के 48 घंटे के भीतर
रुझानों के बारे में पता चल चुका होगा. उन इलाकों से आने वाली बसों और ट्रेनों के
जरिए, जो जुबानी संदेशों की सवारी का काम करते हैं.
मुंह से प्रसारित होने वाला संदेश किस तरह से वोटिंग पैटर्न को प्रभावित करता है?
आगे चल रही पार्टी को इसका कुछ लाभ ज़रूर मिलता है. लेकिन, साथ ही पीछे चल रही
पार्टी को इससे थोड़ी और ताकत लगाने की ऊर्जा भी मिल सकती है. इससे आगे दिखाई दे
रही पार्टी समय से पहले ही खुशी मनाना शुरू कर सकती है, जिसका उसे नुकसान उठाना पड़
सकता है.
2004 में ऐसा ही हुआ था, जब तीसरे और चौथे चरण में यूपीए एनडीए से आगे निकल गयी.
अपने सौभाग्य का यूपीए ने पूरा फायदा उठाया और एनडीए अभी तक उस हार के सदमे से बाहर
नहीं निकल पायी है. अगर एक निर्वाचन क्षेत्र के स्तर पर देखा जाये तो, जब 2009
चुनाव में दोपहर के आसपास वाराणसी के मध्यवर्गीय मतदाताओं को यह अहसास हुआ कि मुरली
मनोहर जोशी एक माफ़िया डॉन से पीछे चल रहे हैं, तब वे अपने घरों से निकल कर पोलिंग
बूथ तक गये.
चुनाव की चाबी काफी आसान है, लेकिन अकसर इसे समझ पाने में लोग नाकाम साबित होते
हैं. कोई भी वोटर किसी पार्टी के लिए वोट नहीं करता. वह अपने लिए वोट करता है. वह
उस पार्टी को चुनता है, जो उसे उस समय अपनी आकांक्षाओं के सबसे करीब दिखती है.
मतदाताओं के पास अपना नजरिया होता है. लोकतंत्र उन्हें उसे बदलने का भी मौका देता
है. वोटर स्वभाव से सबसे पहले अपने बारे में सोचता है, न कि पार्टी के बारे में.
यही कारण है कि भारत में चुनावों में अकसर इतने आश्चर्यजनक परिणाम दिखाई देते हैं.
एक चुनाव परिणाम अपने आप में बाढ़ के समान होते हैं, जो एक समय में बारिश का एक
बूंद बनाते हैं.
मतदाता संदर्भ और समय के हिसाब से फ़ैसला लेता है. उत्तर-प्रदेश या पंजाब के वोटर
को यह मानने के लिए कि वर्तमान यूपीए सरकार सिर से पांव तक भ्रष्टाचार में डूबी है,
सुप्रीम कोर्ट या स्पेशल कोर्ट के किसी फ़ैसले की ज़रूरत नहीं है. लेकिन वह अभी
चंडीगढ़ और लखनऊ के लिए वोटिंग कर रहा है, न कि दिल्ली के लिए.
वह मौका आने पर दिल्ली के लिए भी फ़ैसला करेगा. जनवरी और फरवरी में वह प्रकाश सिंह
बादल और मायावती पर फ़ैसला करेगा. टीम अन्ना जैसे समूह अपने कदम में गलत होते हैं,
जब वे उन मुद्दों के लिए प्रचार करते हैं, जो महत्वपूर्ण तो होते हैं, लेकिन राज्य
के मतदाता की चिंताओं से सीधे जुड़े नहीं होते हैं.
आश्चर्यजनक है कि राजनेता भी ऐसी गलतियां करते हैं. उत्तर-प्रदेश में राहुल गांधी
के प्रदर्शन से राष्ट्रीय स्तर पर उनकी संभावना के बारे में कोई कयास नहीं लगाया जा
सकता है. इसलिए मीडिया में चलने वाली बहसों से बाहर अच्छे या खराब का प्रदर्शन का
उनकी भविष्य की राजनीति पर कोई बहुत असर नहीं पड़ेगा.
2004 के आम चुनावों में मिली शिकस्त से कुछ ही महीने पहले बीजेपी को राज्यों में
शानदार जीत मिली थी. मुझे संदेह है कि मनमोहन सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री के लिए
चुनाव जीत सकते थे, लेकिन उन्हें 2009 में जनादेश मिला था.
एक्जिट पोल चुनावों का छोटा हिस्सा हैं. जब ये समाचारों का भाग थे, तब भी सरकारें
रहती थीं या गिर जाती थीं. ये एक बड़े मेन्यू में मसाले की छौंक की तरह हैं. चुनाव
आयोग चुनावों के पुराने जायके को फिर से लौटा सकता है.
*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के
संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
05.02.2012, 08.25 (GMT+05:30) पर प्रकाशित