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भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ
मुद्दा
भाषा वसुधाः बोलियों का कुंभ
आशीष कुमार अंशु
‘क्या हुआ अगर एक भाषा खत्म हो गई
वह अपने झूठ और सच के साथ दफन हो गई,
शब्द नहीं रहे, दुनिया बढ़ती रही
बोआ की दुनिया की खातिर,
कहीं कोई नहीं रोया.’
बाबुई और अर्जुन जाना की यह कविता उस 85 वर्षीय अंदमानी महिला बोआ को समर्पित है,
जो अंदमान में बोली जाने वाली दस भाषाओं में से एक बो भाषा की अन्तिम जानकार थीं.
बीती जनवरी की 26 तारीख को दो साल पूरे हो गए, बोआ की मृत्यु को. बोआ का जाना सिर्फ
एक महिला का जाना नहीं था, उनके साथ-साथ मानव सभ्यता की 65000 साल पुरानी संस्कृति
का ज्ञान भी चला गया.
भाषा वैज्ञानिकों के पास इस भाषा से जुड़े तमाम अनुसंधान तो हैं लेकिन उसे संवाद के
स्तर पर लाने वाली अन्तिम माध्यम अब हमारे बीच नहीं रही.
यहां बोआ और बो को याद करने की खास वजह, इसी महीने के पहले सप्ताह में बड़ोदरा में
आयोजित भाषा शोध एवं प्रकाशन संस्थान का दो दिनों का आयोजन ‘भाषा वसुधाः वैश्विक
भाषा मिलन’ है. वास्तव में भाषा का आयोजन नौ सौ भाषा बोलियों के दुनिया भर के लगभग
आठ सौ प्रतिनिधियों का कुंभ जैसा था. इनमें बड़ी संख्या में हो और इस जैसी बोलियां
और भाषाएं थीं, जो अपने होने के लिए संघर्ष कर रहीं हैं.
भले ही बड़ोदरा में मौजूद लोग अलग-अलग भाषा, बोली, प्रांत, देश, संस्कृति और संस्कार
के लोग थे. लेकिन सबकी चिन्ता एक थी- भाषा. सारे वक्तव्यों का सार यही था कि भाषा
और बोलियों को बचाने का काम कैसे हो सकता है?
किसी की नजर में बहुभाषिकता के माध्यम से भाषा-बोलियां बच सकती थीं और किसी की नजर
में अपने जल, जंगल, जमीन को बचाकर. कोई बोली और भाषा को बोलने वालों को सशक्त बनाने
की बात कर रहा था और तो कोई संस्कृति को बचाने की बात कर रहा था.
भाषा वसुधा एक खास मौका था, भारतीय भाषा सर्वेक्षण को प्रस्तुत किए जाने का. इस तरह
का भाषा सर्वेक्षण ब्रिटिश भाषाविद ग्रियर्सन के अस्सी साल के बाद हुआ है.
भारतीय भाषा सर्वेक्षण पर बात करते हुए भाषा शोध एवं प्रकाशन केन्द्र के संस्थापक
सदस्य डा जीएन देवी कहते हैं, ‘‘अभी भाषा सर्वेक्षण का काम पूरा नहीं हुआ है. पहले
खंड में तमिलनाडू, कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल
प्रदेश, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल, झारखंड, ओडीशा, छतीसगढ़ और मध्य प्रदेश का भाषा
सर्वेक्षण जारी हुआ है.’’
भाषा सर्वेक्षण के पहले खंड में बीस फीसदी भारतीय भाषाओं के बोलने वालों की जानकारी
उपलब्ध नहीं हो पाई. इसके पीछे की वजह पलायन भी हो सकता है, अपने गांव से, शहर से
या फिर अपनी भाषा-बोली से. कारण जो भी हो, यह बात चिन्ता की है.
एक अनुमान के अनुसार देश के 96 प्रतिशत लोग सिर्फ 04 प्रतिशत भाषाओं का इस्तेमाल
करते हैं. बाकि के 96 प्रतिशत भाषाओं की आवाज दिल्ली तक पहुंच भी नहीं पाती.
वरिष्ठ भाषाविद डीपी पटनायक के अनुसार, हिन्दी की तैंतीस विधाए हैं, जिनमें हिन्दी
चली और अन्य धीरे धीरे खात्मे की तरफ बढ़ रहीं हैं. पंडितों की भाषा मैथिली की वजह
से अंगिका और बज्जीका का नुक्सान हुआ है.
शेक्सपियर को शेक्सपियर बनाने की बड़ी वजह उनकी भाषा का विस्तार भी था. छोटी-छोटी
भाषाओं में बड़-बड़े काम हुए हैं, लेकिन इसकी जानकारी कितने लोगों तक पहुंच पाई.
एक अनुमान के अनुसार पूर्वोतर भारत की भाषा या बोलियों में लगभग दो सौ ऐसी किताबें
लिखी गई हैं, जो ऐतिहासिक महत्व की हैं, लेकिन विश्व साहित्य पर अध्ययन करने वाले
दुनिया के दूसरे देशों के साहित्य पर घंटों बात कर सकते हैं लेकिन उनसे अपने देश की
अलग-अलग भाषाओं मसलन गुजराती, मराठी, उड़िया, बांग्ला या फिर असमिया, गारो में लिखी
गई महत्वपूर्ण किताबों की जानकारी मुश्किल से मिलेगी.
हमें दूसरे देशों में नया क्या रचा जा रहा है, कौन सी नई किताबें आई हैं, इसकी
जानकारी विस्तार से है लेकिन हमारे अपने देश की भाषा बोलियों में क्या हो रहा है,
इसकी जानकारी नहीं है.
धीरे-धीरे हम अपनी भाषा के शब्द भी भूलने लगे हैं. वरिष्ठ गांधीवादी नारायण भाई
देसाई कहते हैं, “वस्त्र से जुड़े सौ से अधिक शब्द इस्तेमाल ना होने की वजह से लुप्त
हो गए.”
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इसी तरह हम अंग्रेजी के जद में होकर अपने कई शब्दों को भूल रहे हैं, चूंकि हमारा
समाज रिश्तों को महत्व देने वाला समाज रहा है. रिश्तों को जीने वाला समाज रहा है.
यहां माता-पिता से संबंधित बीस से अधिक रिश्ते ऐसे हैं, जिनके लिए अंग्रेजी में कोई
उपयुक्त शब्द नहीं है. बो की तरह एक-एक करके हमारी भाषाएं खत्म हो रही हैं, बो की
तरह उन भाषाओं के खत्म होने की जानकारी भी हम तक नहीं आती.
1961 की जनगणना में 1652 मातृभाषाओं की सूची बनी थी. जो 1971 में घटकर 109 रह गई.
1971 की जनगणना में जिन भाषाओं को बोलने वाले दस हजार से कम लोग थे, सरकार ने
उन्हें गिनना भी मुनासिब नहीं समझा और ऐसी सभी भाषा या बोलियों को ‘अन्य’ की एक
श्रेणी में डाल दिया. फिर एक के बाद एक भाषा या बोलियां खत्म होती रहीं, लेकिन किसे
परवाह है?
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भाषा दो तरह की है. पहली पंडित
भाषा और दूसरी आम आदमी की भाषा. आम आदमी की भाषा का इतिहास है कि उसे
पंडित भाषा ने हमेशा से दबाया है. अंग्रेजी भारत सहित दुनिया की कई
भाषाओं में पंडित भाषा बनकर विराजमान है और वह कई-कई भाषा-बोलियों के
लिए खतरा बनी है.
डा. डीपी पटनायक
वरिष्ठ भाषाविद एवं सेन्ट्रल इन्स्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैन्गवेजेज के
संस्थापक निदेशक |
आज के बच्चों के लिए एक वाक्य
किसी एक भाषा में बोलना मुश्किल हो रहा है. वह गुजराती में अंग्रेजी
मिलाते हैं, मराठी में हिन्दी. यह मिलावट भाषा के लिहाज से शुभ संकेत
नहीं है.
डा. जीएन देवी
भाषा शोध एवं प्रकाशन केन्द्र के संस्थापक सदस्य |
जो समाज अपनी मिट्टी, जंगल, जमीन
नहीं बचा पाएगा, वह अपनी भाषा कभी नहीं बचा पाएगा. अब आप तय कीजिए कि
अपनी भाषा को बचाने के अभियान की शुरूआत कहां से करनी है?’
डा. शेखर पाठक सामाजिक कार्यकर्ता |
भाषा का महत्व एक व्यक्ति के जीवन में क्या होता है, इसकी एक मिशाल सोमानी कुरोसी
है, जो बुडापेस्ट के पास के एक गांव से अपनी भाषा, बोली, संस्कृति को ढूंढ़ता हुआ
अपने पूर्वजो के गांव भारत आया था. कोलकाता, तिब्बत की उसने खाक छानी और यात्रा के
दौरान ही उसकी मृत्यु दार्जिलिंग में हुई.
एक दूसरा उदाहरण ‘द इंडिजेनस लेप्चा ट्राइबल एसोसिएशन’ का है. जो लेप्चा भाषा की
सरकारी उपेक्षा के बाद, अपनी संस्कृति से कट रहे लेप्चा बच्चों को अपनी मातृभूमि और
मातृभाषा से जोड़ने के लिए बनी. आज यह संगठन आपसी मदद से 40 रात्रि स्कूल चला रहा
है. 18 महीने के पाठ्यक्रम में लेप्चा बच्चों को यहां अपनी भाषा, पारंपरिक नृत्य,
पारंपरिक वाद्य यंत्र, लोक कथाएं और लोकगीत से परिचय कराया जाता है. इसके लिए
प्रतिदिन दो घंटे का समय बच्चों को स्कूल से अलग देना होता है. ऐसोसिएशन के संयुक्त
सचिव एनटी लेप्चा के अनुसार- “कलिमपोंग, दार्जिलिंग, मिरिक, सोनाडा के अलावा दिल्ली
में भी उनके केन्द्र चल रहे हैं.”
इस बात को अनुभव और अध्ययन से समझा गया है कि उन क्षेत्रों में भाषायी विविधता अधिक
होगी, जहां जैविक विविधता होगी. जैसे नागालैन्ड में एक क्षेत्र के लोगों की भाषा
दूसरे क्षेत्र में रहने वाले मुश्किल से समझ पाते हैं. आदिवासी समाज और हमारे
गांवों में बड़ी संख्या में ऐसी भाषा या बोलियां हैं, जिन्हें वे बरतते हैं लेकिन
उनके पास ना उसकी लिपी है, ना उनके पास उस भाषा या बोली का नाम है.
प्राकृतिक विविधता से, सांस्कृतिक विविधता का और सांस्कृतिक विविधता से भाषायी
विविधता का गहरा रिश्ता है. यदि इस रिश्ते को आप समझते हैं तो यह समझना आपके लिए
आसान है कि भाषा और बोली का मामला सीधा-सीधा जल, जंगल, जमीन से जुड़ता है.
वैसे ही जैसे शेर बचाओ अभियान को जंगल बचाने के लिए भी काम करना होगा, क्योंकि जंगल
को खत्म करके हम शेर के जीवन की कल्पना नहीं कर सकते. ठीक वैसे ही भाषायी विविधता
को बनाए रखने के समर्थन में खड़े लोगों को जल, जंगल, जमीन की भी वकालत करनी होगी
क्योंकि हमने इस देश को यदि कांक्रीट का जंगल बना दिया तो भाषायी विविधता नहीं बच
पाएगी.
08.02.2012, 00.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
Pages:
| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Banshi lal parmar [parmar_photoes@rediffmail.com] Suwasra dis.Mandsour M.P. - 2012-03-12 12:26:23 | | | |
प्रिय आशीष जी आपका लेख बहुत अच्छा लगा. मैंने मालवी और सोंधवाड़ी बोली पर खूब लिखा. मेरे घर पर सभी यही बोलते थे. मैं मेरे नाती से इसी बोली में बतियाता था. बेटे बहू को ये अच्छा नहीं लगता. उनकी शिकायत है कि उसकी भाषा बिगड़ जाएगी.
अपने ही घर में मैं अपने पुरखों की बोली को मरते देखता हूं, क्या करूं समझ में नहीं आता. मालवी और सोधवाड़ी में मेरी कविताएं नई दुनिया (इंदौर) से प्रकाशित हुई हैं. आप का हार्दिक आभार, आज भाषा और बोली की चिंता किसे हैं, सब अर्थ के पीछे भाग रहे हैं. | | | | | | | | Sandeep [] Bharat - 2012-02-28 13:18:24 | | | |
Best Ever News Article i have read in my life.
Thanks for this. | | | | | | | | sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] kangra himachalpradesh - 2012-02-17 06:45:22 | | | |
भाषायी बहुलता की रक्षा करना सांस्कृतिक विविधता का बचाने का रास्ता है. हमारी बोलियों में हमारे जीवन की अभिव्यक्ति है. इनकी शब्द संपदा देश की विकसित भाषाओं को और भी समृद्ध बनाएंगीं. | | | | | | | | prashant dubey [dubey.prashant128@yahoo.com] raipur - 2012-02-10 06:55:48 | | | |
अंशु जी, बहुत अच्छी स्टोरी है. भाषा को लेकर आपने जो लिखा है वह सोचने पर मज़बूर करता है. बहुत अच्छे. | | | | | | |
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