पहला पन्ना प्रतिक्रिया   Font Download   हमसे जुड़ें RSS Contact
larger
smaller
reset

इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
  पहला पन्ना >मुद्दा >समाज Print | Share This  

नर्मदा में ज़मीन हक का हल्ला बोल

मुद्दा

 

नर्मदा में ज़मीन हक का हल्ला बोल

पुष्पराज जोबट, अलीराजपुर, म.प्र. से

नर्मदा बांध


कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की कथा “पूस की रात” के असली नायक 80 साल बाद भी पूस की रात में फसल बचाने के लिये नहीं, फसल उगाने की ज़मीन के हक के लिये पिछले दो महीनों से “ज़मीन हक सत्याग्रह” चला रहे हैं. अगर आप "पूस की रात" का संग्राम जानना चाहते हैं तो मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिला के जोबट में शासकीय कृषि फार्म की 87 एकड़ ज़मीन को अपने कब्जे में लेकर हल जोत रहे आदिवासियों से मिलिये.

सरदार सरोवर की डूब से प्रभावित विस्थापित आदिवासियों ने 24 नवम्बर 2011 को इंदौर से 225 कि.मी. दूर स्थित जोबट में मजबूत कंटीले लौह बेड़ों के घेरे को तोड़कर शासकीय कृषि फार्म हाउस पर अपना कब्जा जमाया और खुले आकाश में “ज़मीन हक सत्याग्रह” शुरू कर दिया.

25 वर्षों से शांतिपूर्वक अहिंसक आंदोलन कर रहे नर्मदा बचाओ आंदोलन के सैकड़ों आदिवासियों ने फार्म हाउस पर कब्जा कर सरकारी कर्मचारियों को सरकारी खेती करने से रोक दिया और फार्म हाउस पर अपना “हक कब्जा’’ घोषित कर दिया. 25 नवम्बर को विस्थापितों ने जोबट शहर में अपने “हक कब्जा’’ के पक्ष में रैली निकाली और जोबट के तहसीलदार को नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से ज्ञापन दिया.

सत्याग्रह पर बैठे विस्थापितों की ओर से मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को फैक्स भेजकर जोबट में जारी “ज़मीन हक सत्याग्रह’’ की सूचना दी गई. चौंथे दिन प्रशासन की चुप्पी और वर्षों से दबाये गये गुस्से का आवेग नए रूप में प्रकट हुआ. फार्म हाउस की ज़मीन पर विस्थापितों ने अपने बैलों से हल जोतने शुरू किए. 30 नवम्बर को आंदोलनकारियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने अलीराजपुर के जिलाधिकारी से मिलकर फार्म हाउस की ज़मीन पर अधिकार जमाने और फसल बोने की लिखित सूचना दी.

पिछले कई दिनों से नर्मदा घाटी के विस्थापितों द्वारा जारी “ज़मीन हक सत्याग्रह’’ की सूचना नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से इंटरनेट द्वारा देश के प्रमुख बुद्धिजीवियों और मीडिया समूह के पास लगातार भेजी जा रही है. पिछले सप्ताह एक कामरेड पत्रकार ने सवाल किया- कम्युनिस्ट पार्टियां जिस तरह जमींदारों-भूपतियों की ज़मीन का ‘लेंड-ग्रेब’ कर भूमिहीनों के बीच ज़मीन बांटती रही हैं, क्या नर्मदा बचाओ आंदोलन ने 25 वर्षों के संघर्ष के बाद कम्युनिस्ट पार्टियों से सीख ली है?

नर्मदा बचाओ आंदोलन के एक प्रमुख कार्यकर्ता ने कहा- यह हमारा ‘लेंड-ग्रेब’ (ज़मीन कब्जा) नहीं ‘राइट ग्रेब’ (अधिकार कब्जा) है. हम चाहते हैं, आप जोबट में जारी संग्राम की कथा जानने से पहले उन सवालों से ज़रूर मुठभेड़ कर लें, जिनके आधार पर आप अपना पक्ष तय करते हैं.

क्या गांधीवादी मूल्यों और अहिंसात्मक रास्ते पर जारी 25 वर्षों के एक सशक्त जनांदोलन ने अपने धीरज की सीमा खो दी है? क्या नर्मदा बचाओ आंदोलन के सामने गांधीवाद की मेड़ तोड़कर आगे बढ़ने के अलावा अब कोई विकल्प नहीं बचा था? क्या नर्मदा बचाओ आंदोलन की मुख्य सूत्रधार मेधा पाटकर अपनी गांधीवादी छवि को बचाए रखने के जतन में इतने लंबे समय से जारी सत्याग्रह में शरीक नहीं हो सकीं? क्या विस्थापित आदिवासियों ने अपने मुख्य सूत्रधार से सहमति-मशविरे के बिना सरकारी ज़मीन पर ‘हल्ला बोल’ कर दिया? क्या विस्थापित आदिवासियों ने विकल्पहीनता की स्थिति में ‘आत्महत्या’ के बजाय ‘आत्म कब्जा’ ‘कब्जा बोल’ ज़रूरी समझा?

नर्मदा बचाओ आंदोलन के आलोचकों के लिये यह नयी ख़बर है, जो यह कहते नहीं थकते हैं कि “एन.बी.ए. के सारे निर्णय मेधा पाटकर खुद तय करती हैं और मेधा पाटकर के व्यक्तिवाद से आंदोलन का नुकसान हुआ है.’’ जाहिर है कि एक बड़े जनांदोलन को एक व्यक्ति प्रभावित ज़रूर करता है पर इंसान की मुट्ठियों में बंद होना आंदोलन का स्वभाव नहीं है तो जनांदोलन अपने रास्ते उसी तरह तय करते हैं, जैसे बदलते हुए मौसम के साथ उफान भरती नदियां.

22 दिसम्बर की देर रात जब हम धरना स्थल पर पहुंचे तो सब सो रहे थे. धरनास्थल पर अंधेरा कायम था और जलते हुए अंगारों से जो रोशनी कायम थी, उससे हमने यह देखा कि कुछ सौ लोग गहरी नींद में सो रहे थे. मुझे सुकून मिला कि इस तरह खर्राटों भरी नींद का मतलब है, यहां पुलिस शासन का आतंक नहीं है.

हमने ज़मीन पर अपने सोने की जगह ली और आंखें घुमायी तो सिर के ऊपर चांद-तारों से भरे सुंदर आकाश ने छत के आसरे का भरोसा दिलाया. पूस की शीतलहरी भरी सुबह सूरज उगने से काफी पहले तो नहीं होती है. रात ढलने से पहले ठंढ़ बढ़ने लगी तो धरती पर पड़े अपने हाथ-पांव सुन्न होने लगे. बाहर आग जल रही थी और हमने अपने मानव देह में तापनी यानी घूरे की ताप से गरमाहट महसूस की. पूस की ओस में देह के ऊपर के गर्म कपड़े जल्दी ही शीत हो जाते हैं.

सुबह होने से पहले जब ठंढ़ ज़्यादा बढ़ती है, उसी समय मुर्गे बोलने लगते हैं और मुर्गे की बांग के बाद बुजुर्ग आदिवासी सोए रहना अपना अहित मानते हैं. धीरे-धीरे कई तापनी जल गये. जीवनशाला के बच्चों की देह पर स्वेटर या चादर कुछ भी नही है. बच्चों के पांव में चप्पल भी नहीं हैं. कई जने कंबल के बजाय गुदरी लपेट कर ठिठुर रहे हैं.
आगे पढ़ें

Pages:
 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

shantanu [] cuttack - 2012-03-13 13:33:23

 
  मेरे विचार से नर्मदा घाटी के लोगों का अभी तक हिंसा के मार्ग पर न उतरना और पिछले २५ से ज्यादा सालों से अहिंसा के पथ पर आगे बढते हुए आपने अधिकारों के लिए लड़ना मानवीय जाती के इतिहास का एक अद्वितीय अध्याय है. Thomas Hobbes, सामाजिक सास्त्र के एक महान दार्शनिक, ने कहा था कि इंसान स्वाभाव से हमेशा एक दुसरे से लड़ने के बहाने तलाशता रहता है. नर्मदा के लोगों ने उसकी इस बात को पूरी तरह से गलत सिद्ध कर दिया है. मगर हमारे देश की लोकतान्त्रिक सरकारों ने उनके इस सहनशील स्वभाव का मजाक बनाया हुआ है. इसकी एक वजह हमारा पूंजीवादी समाज भी है, जो सिर्फ उसी की मांगों का आदर करता है जो उसके लिए किसी भी तरह से पूंजी का श्रोत बन सके. भारत सोने की चिड़ियाँ सिर्फ इसलिए नहीं थी कि यहाँ पर अर्थ का कोई अभाव नही था बल्कि इसलिए भी थी कि यहाँ के लोगों में इंसानियत थी, वो एक दूसरे की भावनाओं और उनके अधिकारों का आदर करते थे. मगर वो सोने की चिड़ियाँ अब अपनी आखिरी सांसें गिन रही है. भारत अब पूरी तरह से civilized India बन चुका है.  
   
 

subhash kumar gautam [samayantarsubhash@gmail.com] delhi - 2012-02-19 04:57:05

 
  नर्मदा में जमीन हक का हल्ला बोल धरती पर बढ़ते लुटेरों के ऊपर से पर्दा हटाने में एक महत्वपुंर्ण रपट हैं जिसे पुष्पराज दा ने किया है ये बहुत जोखिम भरा कम है जिसे लगातार युवा पत्रकार पुष्प दा कर रहें है। पुष्प दा एक येसे पत्रकार है जो पिछले एक दशक से हासिए के समाज, आदिवासियों, दलितों और मुसहरों के हक की लड़ाई मे शरीक है। इसी क्रम मे इनकी नंदी ग्राम डायरी जो जमीनी हक की लड़ाई को केंद्र मे रख कर लिखी गयी है। जो सरकार और कारपोरेट के चेहरे से नकाब हटती है । आने वाले समय मे पुष्प दा भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद की धरती और विचारो को बचाए रखने का कम करतेन रहे हम पाठकों की यही शुभकामना है। लाल सलाम साथी!  
   
 

sunder lohia [lohiasunder2@gmail.com] kangra himachal pradesh - 2012-02-17 07:14:39

 
  अन्नाजी इस सरकारी भ्रष्टाचार के खिलाफ क्यों नहीं लड़ते? 
   
सभी प्रतिक्रियाएँ पढ़ें

इस समाचार / लेख पर अपनी प्रतिक्रिया हमें प्रेषित करें

  ई-मेल ई-मेल अन्य विजिटर्स को दिखाई दे । ना दिखाई दे ।
  नाम       स्थान   
  प्रतिक्रिया
    Please type The Number in the Box
   


 
  ▪ हमारे बारे में   ▪ विज्ञापन   |  ▪ उपयोग की शर्तें
2009-10 Raviwar Media Pvt. Ltd., INDIA. feedback@raviwar.com  Powered by Medialab.co.in