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जनता अब भी संतुलन ही चाहती है
बात पते की
जनता अब भी संतुलन ही चाहती है
अभिषेक श्रीवास्तव
अवध और पूर्वांचल से लौटकर
इस लोकतंत्र को आप-हम जितना समझते हैं, शायद कम समझते हैं. इसी सोच को लेकर मैं और
मेरे साथी इतिहास के अध्येता रोहित प्रकाश अचानक साथ निकल पड़े उत्तर प्रदेश का
चुनाव देखने.
चुनाव संसदीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व होता है और बात यदि उत्तर प्रदेश की हो,
तो वज़न केंद्र के बराबर ही बैठता है. ज़ाहिर है, उत्तर प्रदेश का चुनाव देखना अगले
दो साल की संसदीय राजनीतिक तस्वीर की थाह ले लेने जैसा है. बड़ी उम्मीद थी कि जेब
से पैसा लगा कर जा रहे हैं तो कुछ ज्ञान बढ़ेगा ही, लेकिन पहले कदम पर ही निराशा
हाथ लगी. बनारस की ट्रेन काशी विश्वनाथ में एस1 से एस13 तक मैं टहल आया, कम से कम
दस में से सात लोग अपने मोबाइल फोन से जूझते दिखे. यह बदलता भारत था. नब्बे के दशक
के फ्लॉप गीतों को मैक्सिमम वॉल्युम पर सुनता हिंदुस्तान.
अचानक सीन बदलता है. मुरादाबाद में एक दारोगा साहब चढ़ते हैं. बताते हैं कि इलेक्शन
ड्यूटी पर जा रहे हैं. पता नहीं कैसे सामने वाली सीट पर बैठे सज्जन को उन्होंने
पहचान लिया कि वे भी पुलिस महकमे से हैं. सादे कपड़े के कारण हम नहीं पहचान सके थे.
पहले तो विभागीय बातें शुरू हुईं दोनों के बीच, इसके बाद सरकार पर बात आई. दोनों ने
इस बात पर आश्चर्य जताया कि कैसे मीडिया में यह बात सामने लाई जा रही है कि यूपी का
पुलिस महकमा मायावती के खिलाफ है. दारोगा जी बोले, ''बहनजी ने 40,000 भर्तियां
करवाई हैं पुलिस में. मुलायम सिंह या भाजपा की सरकार में कोई भर्ती नहीं हुई थी.''
सादी वर्दी वाले दारोगा ने प्रतिवाद किया, ''वो तो ठीक है, लेकिन पैसा नहीं बढ़ा
न.''
जवाब आया, ''कौन सा बीजेपी ही पैसा बढ़ाती थी. दो-तीन परसेंट में क्या होता है.
मुलायम सिंह ने भले एक बार लंबा इंक्रीमेंट किया था, लेकिन सोचिए कि इतने लोगों को
बसपा ने कम से कम रोजगार तो दिया ही है.''
''हां, ये बात तो है. वैसे ढाई लाख शिक्षकों की भर्ती भी हुई है. मायावती चाहे
कितनी भ्रष्ट हो, लेकिन काम तो किया है उसने.''
मेरे ठीक सामने बैठे सज्जन की ऊपरी जेब से एक लाल कार्ड झांक रहा था जिस पर
एनआरएमयू लिखा था. वे अनामंत्रित बीच में कूदे, ''देखिए, मायावती ने कुछ किया हो या
नहीं, लेकिन लोग चैन से हैं. सोचिए सपा के ज़माने में कितनी गुंडई थी. आदमी का घर
से निकलना मुश्किल था. बाकी भ्रष्ट तो कौन नहीं है. कांग्रेस नहीं भ्रष्ट है
क्या.''
दारोगा जी बोले, ''हम्म, लेकिन बताइए बेचारे अन्नाजी को सालों ने ज़हर दे दिया.
कितना बढि़या आदमी है, भ्रष्टाचार के खिलाफ अकेले बोल रहा है.''
सादी वर्दी वाले दारोगा ने ज्ञान दिया, ''ये तो कांग्रेस पहले से करती आई है. जेपी
को भी तो ज़हर दे दिया था.''
दारोगा ने कहा, ''लेकिन फिर भी बेचारा राहुल गांधी कितनी मेहनत कर रहा है. सोचो
हमारे यहां तक पैदल आया था.''
''कहां?''
''अरे टप्पल में... जहां किसानों ने आंदोलन किया था... इस बार तो जाट वोट मायावती
को नहीं जाएगा. सब कांग्रेस को जाएगा.''
यात्रा का पहला सबक मिल चुका था. अभी जब मैं ये संस्मरण लिख रहा हूं, तो कांग्रेस
का एक आंतरिक विश्लेषण मेरे पास आ चुका है पश्चिमी यूपी के उम्मीदवारों का. चौधरी
अजीत सिंह के साथ मिल कर कांग्रेस इस क्षेत्र की सबसे बड़ी पार्टी रहने वाली है,
ऐसा उसमें कहा गया है.
यह ट्रेन का इकलौता चुनाव संवाद था. इसके बाद फिर सन्नाटा.
आगे पढ़ें चुनाव आयोग की सख्ती ने चुनाव से रंग गायब कर दिए हैं. लेकिन लखनऊ के लोग खुश हैं.
कहते हैं कि हल्ला-गुल्ला तो कम से कम नहीं हो रहा. हम अमीनाबाद में टुंडे के यहां
कबाब-पराठा खाकर जैसे ही बाहर निकलते हैं, दूसरी ओर से लाउडस्पीकर की कर्कश आवाज़
आती है. बगल में इकबाल पान वाले के यहां खड़ा लड़का मुंह बिचका कर कहता है,
''साइकिल वाले होंगे बहन के... अरे पूरा अमीनाबाद ही उठा कर ले जाओ.''
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भुवनेश्वर द्विवेदी 'बाबा' के अपने आकलन हैं |
क्या मुसलमानों को इस बार सपा से दिक्कत है? इसका जवाब खोजने के लिए हम पहुंचते हैं
अपने पुराने साथी अश्विनी के पास, जो दिल्ली में दस साल पत्रकारिता करने के बाद
वापस अपने गृह जिले लखनऊ लौट आए हैं और पत्रकारिता से मोहभंग या कहें भ्रमभंग के
बाद रियल एस्टेट का कारोबार खड़ा करने में लग गए हैं. अश्विनी बताते हैं कि इस बार
निचले तबके के मुसलमानों में ग़ज़ब का शिफ्ट देखने में आ रहा है. वह बताते हैं कि
कैसे पीस पार्टी के मुखिया मो. अय्यूब ने बड़े रणनीतिक तरीके से पसमांदा मुसलमानों
को टारगेट कर के मुस्लिम वोटों को बांट दिया है.
''इस बार भले पीस पार्टी सीटों में अपने वोट को तब्दील ना कर पाएं, लेकिन इतना समझ
लीजिए कि जिस तरह मुसलमानों का प्रमुख सेकुलर पार्टियों से मोहभंग हुआ है, आने वाले
दस साल में यह राष्ट्रीय राजनीति की तस्वीर बदल सकता है'', अश्विनी पूरे
आत्मविश्वास से यह बात कहते हैं.
ये बात एक हद तक ठीक जान पड़ती है. बनारस के मुस्लिम बहुल इलाकों में हमने जब कुछ
लोगों से बात की, तो पता चला कि इस बार बुनकर वोट देने के मूड में नहीं हैं. बुनकर
बनारस की रीढ़ हैं, लेकिन आज तक इनके कल्याण के लिए किसी पार्टी ने गंभीर कदम नहीं
उठाया. किसी ने नहीं सोचा था कि बनारस का बुनकर खुदकुशी भी कर सकता है.
आज से पांच साल पहले 2007 तक कम से कम 50 खुदकुशी की खबरें बुनकर समुदाय के बीच से,
अकेले पूर्वी उत्तर प्रदेश से आ चुकी थीं. निचले मुस्लिमों को वोट बैंक बनाकर जिस
तरीके से सिर्फ अभिजात्य मुस्लिमों का कल्याण आज तक होता आया है, ये बात अब लोग समझ
रहे हैं. यह धर्म के भीतर वर्गीय विभाजन का एक ऐसा संकेत है, जो कई इलाकों में कई
बड़ी पार्टियों का दाना-पानी बंद करा सकता है.
यही बात अपने तरीके से बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता भुवनेश्वर
द्विवेदी 'बाबा' कहते हैं, ''मुसलमान भयंकर कन्नफ्यूज़ है. उसे समझ नहीं आ रहा कि
कहां जाए. हालांकि ये कोई नई बात नहीं है. लेकिन इस बार मामला ज़रा अलग है क्योंकि
मैदान में पीस पार्टी और मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल जैसी छोटी पार्टियां भी
हैं. उनका असर तो पड़ेगा ही.''
कुछ लोगों का आम तौर पर यह कहना रहता है कि मुसलमान हमेशा जीतती हुई पार्टी के साथ
जाता है, लेकिन यह बात वर्गीय लिहाज़ से ही सही है. यह चलन ऊंचे मुसलमानों में है,
पसमांदा और निचली जातियां ऐसा नहीं करतीं. चूंकि उत्तर प्रदेश के संदर्भ में यह वोट
बैंक पारंपरिक रूप से सपा का रहा है, इसलिए इस बार उसे इधर से महरूम रहना पड़ सकता
है, लेकिन तराजू किधर झुकेगा, यह किसी को नहीं पता.
एक बड़ी बात जो 'बाबा' कहते हैं उस पर ध्यान दिया जाना ज़रूरी है, ''इस बार का
चुनाव 35 फीसदी प्रत्याशियों का चुनाव है, आप मानें या ना मानें. पार्टी की राजनीति
से ऊपर उठ कर कई इलाकों में प्रत्याशियों की विश्वसनीयता और ईमानदारी को मध्यवर्ग
का वोट जाएगा.”
'बाबा' कहते हैं, ''यह एक रणनीति भी हो सकती है. देखिए किस तरह बसपा ने करीब 80 नए
प्रत्याशियों को टिकट दिए हैं, जिनका कोई चुनावी इतिहास नहीं. हो सकता है कि यह
नुकसान से बचने की भी कोई तरकीब हो, लेकिन पांसा उलटा भी पड़ सकता है.''
आगे पढ़ें हो सकता है कि यह एम्बियंस का मामला भी हो, जो हमने बिटवीन दि लाइंस पढ़ा, लेकिन एक
और मारक बात निकल कर सामने आई. दरअसल, बनारस हिंदू युनिवर्सिटी के बाहर टंडन जी की
चाय की दुकान, समाजवादियों का अड्डा रही है, हालांकि हम जिनके साथ बैठे थे, वे सारे
कांग्रेस समर्थक लोग थे.
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शशिमोहन दुबे
ने कई चुनाव देखे हैं |
अचानक खबर आई कि सामने घाट पर मोहन प्रकाश आ रहे हैं और लोगों ने वहां जाने की
तैयारी कर ली. हमने हलके में ही कहा कि मोहन प्रकाश तो कोई बड़े नेता नहीं, वहां
जाकर क्या करेंगे. जवाब मिला, ''हलके में मत लीजिए. कांग्रेस के भीतर इधर बीच बहुत
तेजी से समाजवादी खेमे के नेताओं को उभारा जा रहा है. जिनका समाजवादी अतीत रहा है,
वे अब सेंटरस्टेदज पर आ रहे हैं. खबर वहीं है.''
यह नया सबक था हमारे लिए, लेकिन इसके राजनीतिक निहितार्थ निकालने की कोशिश हम अब भी
कर रहे हैं.
बहरहाल, यही बात कुछ दूसरे तरीके से हमें इलाहाबाद में शशिमोहन दुबे से सुनने को
मिली. शशिमोहन जी इंडियन कॉफी हाउस के बाहर बरसों से पान का ठीया लगा रहे हैं.
साहित्यकारों-पत्रकारों की पीढि़यों को इन्होंने पान खिलाया है. उपेंद्रनाथ 'अश्क'
से लेकर नीलाभ 'अश्क.' तक पूरी परंपरा का इन-आउट जानते हैं, हालांकि इस पर यहां बात
करने की जगह नहीं. दुबे जी ने बड़ी साफ़गोई से कहा कि कांग्रेस से चिदंबरम, सिब्बल
जैसे चेहरे हट जाएं, फिर देखिए.
वे बोले, ''चिदंबरम और सिब्बल ने कांग्रेस को बड़ा नुकसान पहुंचाया है. ये ज्यादा
लंबा नहीं टिकने वाले. कांग्रेस की एक बार तो सफ़ाई ज़रूरी है सर.'' अच्छा लगा देख
कर कि दुबे जी की दुकान पर अखबारी कतरनें चिपकी हुई थीं, जिनमें चुनाव का विश्लेषण
था.
दिल्ली लौटते वक्त एक पुराने हरियाणवी पत्रकार मित्र ने बड़े दुख से फोन पर बताया,
'यार रामदेव और अन्ना ने तो कांग्रेस की डेट लगा दी. बस रामदेव और अन्ना वाला
प्रकरण नहीं हुआ होता तो गुरु बहुमत तय था इस बार.''
जितने मुंह उतनी बातें हैं, लेकिन चुनाव नतीजे अप्रत्याशित रहने को लेकर कोई संदेह
नहीं. हां एक बात जो ध्यान देने वाली है, वो है मायावती के राज में लॉ एंड ऑर्डर से
लोगों का संतोष. लोगों की स्मृति से मुलायम राज की गुंडई अब भी गई नहीं है.
हो सकता है कि लॉ एंड ऑर्डर का इकलौता फैक्टर बसपा के पक्ष में काम कर जाए. जिस
बढ़े हुए मतदान प्रतिशत को लेकर पहले और दूसरे चरण में मीडिया में जश्न मनाया गया
था, वो दरअसल युवाओं के अपने घरों से निकलने का नतीजा रहा है, जिसका सीधा फायदा
कांग्रेस को गया है.
और आखिरी बात यह है कि जिस तरीके से समूचे राज्य में “सोच-समझ कर वोट करने” का
चुनाव आयोग प्रचार कर रहा है, और लोग इस बार घरों से बूथ तक सुरक्षित जा पा रहे
हैं, यह कांग्रेस और बसपा की खिचड़ी पकने की गंध दे रहा है. ज़ाहिर है, यदि अब तक
केंद्र की सरकार को उत्तर प्रदेश तय करता रहा है तो आगे भी ऐसा ही होगा. इसके लिए
ज़रूरी है कि केंद्र और राज्य के बीच सत्ता का संतुलन बना रहे, और सत्ता संतुलन का
दूसरा नाम आज भ्रष्टाचार संतुलन है.
हफ्ते भर की थकान से हमने बस यही जाना कि जनता भले कुछ न चाहे, संतुलन जरूर चाहती
है. यह एक ऐसी बात है जो हिंदुस्तानियों के बारे में कभी नहीं बदली. यही यूपी चुनाव
का मूल मंत्र है और यही सामाजिक बदलाव को समझने का भी. कह सकते हैं कि ''अरब
स्प्रिंग'' की तुलना में हिंदुस्तान का ''स्प्रिंग'' जो है, यही है.
19.02.2012, 00.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Amar Deep Tiwari [a.deeptripathi@gmail.com] Noida - 2012-02-24 09:47:01 | | | |
बहुत ही अजीब लेख है। लिखा है अवध और पूर्वांचल से लौटकर लेकिन जिक्र है मुरादाबाद का। मुरादाबाद न तो अवध में है और न ही पूर्वांचल में। शायद उत्तर प्रदेश के भूगोल की जानकारी नहीं है। माफ कीजिएगा सिर्फ ट्रेन में दो पुलिसवालों की बातचीत के आधार पर रोजगार बढ़ने का आकलन भी समझ में नही आया। अब बात वोटर की करते हैं। बंधुवर, पूरे लेख में आपने फारवर्ड वोटर का जिक्र तक नहीं किया। यही वह फ्लोटिंग वोटर है जिसके भरोसे मायावती ने पूर्ण बहुमत हासिल किया था। २००७ में केवल ४७ फीसदी वोट पड़े थे। सपा और बसपा के बीच केवल दो फीसदी वोटों का फर्क था जबकि सीटों के मामले में यह १०० से ज्यादा का था। फारवर्ड वोटर निश्चित रूप से इस पर कांग्रेस को जा सकता था क्योंकि उसने सपा, बसपा और भाजपा को देख लिया था लेकिन रोजाना मुसलिम आरक्षण का राग कांग्रेस पर भारी पड़ रहा है। क्योंकि यह आरक्षण का नाम भी सुनना नहीं चाहता। इसलिए कांग्रेस के नेता अनाप शनाप बयान दे रहे हैं। युवा वर्ग राहुल गांधी से ज्यादा अखिलेश से प्रभवित है क्योंकि वे प्रदेश के नेता नजर आते हैं । युवा निकलकर वोट दे रहा है तो कांग्रेस को ही दे रहा है ऐसा कैसे कहा जा सकता है । यहां तो जाति में जाति का संगम है। एक वाकया बताता हूं। २००७ के चुनाव में बहराइच की एक सीट पर दो ठाकुर साहब सपा और बसपा से चुनाव लड़े। एक रैकवार थे तो दूसरे चौहान। चौहान ठाकुर को चौहानों ने वोट दिया और रैकवार को रैकवारों ने। समझ में आ गया होगा यह गणित। उत्तर प्रदेश में पीस पार्टी के बाद मुसलमान जिस दल को वोट दे सकते हैं वह मुखतार की कौमी एकता नहीं बल्कि उलेमा काउंसिल है। थोड़ा इस पर भी होमवर्क की जरूरत थी। उलेमा काउंसिल ने ही बटला का मुद्दा उठाया था। फिर भी लेख के लिए धन्यवाद। | | | | | | | | abhai [aabhai.06@gmail.com] ghaziabad - 2012-02-19 06:48:42 | | | |
बंधु संतुलन-वंतुलन तो ठीक है, लेकिन यूपी पर कोई भविष्यवाणी मुझे अतिशय लग रहा है। संयोग ही था कि मैं चुनाव के दिन वोट डालने गाजियाबाद से अपने गृहनगर गोंडा पहुंचा था। और वहां किसे वोट डालूं यही नहीं समझ आ रहा था, क्योंकि पार्टी से इतर चेहरों में सबसे सुधरे चेहरे के जीत की संभावना नहीं दिख रही थी। फिर भी वोट डाल आया। ये स्थिति बहुसंख्य के साथ थी। जिस सबसे सुधरे चेहरे के बारे में मैं बात कर रहा हूं कि कहा जा रहा है कि उसका उसकी पार्टी से टिकट विरोधी उम्मीदवार ने सुधरे चेहरे के बड़े नेता को पैसा खिला कर कटा दिया, लिहाजा उस सुधरे चेहरे को निर्दलीय खड़ा होना पड़ा। उत्तर प्रदेश में चाहे जो भी राजनीतिक समीकरण बने एक बात तो तय है कि यूपी अगले 25 साल में बदलता नहीं दीख पड़ रहा है। कृपया मुझे निराशावादी न कहें। | | | | | | |
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