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इस अंक में

 

के बनी राष्ट्रपति ?

सुनो शाहरुख खान

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

ममता बनर्जी के नाम एक खुला पत्र

अमन की असली दुआ

बाबा बनाते चैनल

राज्य का कन्या ‘दान’

लहू का सुराग़

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

कम से कम एक दरवाज़ा

माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

बौद्धिक बेहूदगी और बेहद बौद्धिक अंबेडकर

चिकनी चमेली से डरता कौन है ?

सबको खारिज करने का अधिकार

ये कहां आ गये हम

यह सबके लिये चेतावनी है

 
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भुला दिए जाने के खिलाफ संघर्ष

गुजरात दंगों के 10 साल

 

भुला दिए जाने के खिलाफ संघर्ष

सुभाष गाताडे

नरेंद्र मोदी


मैंने खुद अपनी आंखों से देखा कि 6 साल के इमरान को जबरदस्ती पेट्रोल पिलाया गया. फिर किसी ने उसके मुंह के अन्दर जलती माचिस फेंक दी. एक धमाके के साथ इमरान के चिथड़े चिथड़े उड़े.
- नासिर खान रहीम खान पठान (पेज 17, ट्रबल्ड टाईम्स, कम्युनल फासिज्म अराइवज्, भूमिका, बंगलौर)

जुनेद अपनी दादाजी की गोद में चुपचाप पड़ा रहा, जब उसके दादाजी ने हमसे बात की:‘‘ जुनेद के पिता सलीम और मां अफसाना का बीमारी के कारण इन्तकाल हो चुका था. जुनेद हम लोगों के साथ ही रहता था. उसका एक चाचा, मेरा बेटा, इन्हीं हमलों में मारा गया. उन्होंने जुनेद की काकी मकसूदा पर भी वार किये, उन्होंने उसकी गर्दन पर तलवार चलायी और उसे पत्थर मारे और उसके चार साल तथा दो साल के बच्चों को भी मार दिया. इसके बाद उन्होंने उन सबको कुएं में फेंका...

उन्होंने अपनी बात जारी रखी ,‘‘ तीन दिन बाद मकसूदा को कुएं से निकाला गया ... वह जिन्दा थी .. मगर उसके बच्चे मर गये थे. जुनेद ने इन सब घटनाओं को हम लोगों के साथ, मेरे तथा उसकी दादी के साथ, अपनी आंखों से देखा. पहले उसका दिमाग ऐसा नहीं था... अब वह पूछता है, ‘‘ क्या यही हमारा घर है ?’’ अब उसका दिमाग चकरा गया है, पहले वह ठीक था . अब वह नींद से जग जाता है और चिल्लाते हुए भागने लगता है, ‘‘ भागो ! भागो !’’

-गोधरा शहर के सतपुल शिविर में 6-7 मई 2002 (सन्दर्भ: कविता पंजाबी तथा अन्य की रिपोर्ट)

कहना बहुत आसान है मगर अमल करना बहुत कठिन और वह भी तब जबकि दस साल का अंतराल बीतने को है और कल हलाकुओं के भेष में नंगी तलवारों के साथ सड़कों पर फिर रहे लोग अचानक मुस्कराते दिख रहे हैं, गोया कल कुछ हुआ ही न हो.

यूं तो साफ सुथराकरण/सैनिटाइजेशन का यह सिलसिला तभी से जारी है जबकि गुजरात घटित हो रहा था- फिर वह संसद के पटल पर दिए आडवाणी के बयान के रूप में उन दिनों सामने आया हो- जिसमें उन्होंने तीन दिन में दंगों पर काबू करने के लिए मोदी के कसीदे पढ़े थे- या फिर तत्कालीन वज़ीरे आज़म वाजपेयी का कथन रहा हो, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया था कि ‘..लेकिन आग किसने लगायी?’ या कहा था कि ‘..वे लोग जहां-जहां रहते हैं, हमेशा समस्याएं खड़ी करते हैं.’

मीडिया ने भी इसमें कम भूमिका नहीं अदा की है. और कार्पोरेट जगत के सम्राटों का इस मामले में कोई जवाब ही नहीं है. उनके लिए संविधान प्रदत्त तमाम कर्तव्यों से विमुख होना, सूबे की जनता के एक हिस्से की देखरेख एवं सुरक्षा का काम सम्हालने में असफल रहना बिल्कुल मायने नहीं रखता. अगर मुल्क का वजीरे आजम बनाने का मामला उन्हीं की राय से तय होना होता तो जनाब मोदी कबके इस गद्दी पर पहुंच चुके होते.

वैसे विगत कुछ माह से अपने आप को नए रंगरूप में पेश करने के लिए खुद नरेन्द्र मोदी भी जुटे हैं. दरअसल वे समझ चुके हैं कि अगर राष्ट्रीय स्तर की महत्वाकांक्षाओं को पंख देने हों तो गुजरात 2002 के ‘धब्बों’ से मुक्त होना जरूरी है. इसलिए गुजरात 2002 के चुनिन्दा मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जब यह आदेश दिया कि उन्हें लोअर कोर्ट में ले जाया जाए, उसे ही अपने आप को ‘क्लीन चिट’ मानते हुए उन्होंने सरकारी खर्चे से जगह-जगह सद्भावना उपवास का सिलसिला शुरू किया. फरवरी माह के दूसरे सप्ताह में अम्बाजी के मन्दिर में इसका उन्होंने समापन भी किया है.

सूचना अधिकार कानून के तहत मांगी गयी जानकारी के अन्तर्गत इसके लिए जनता के करों से एकत्रित 250 करोड़ रूपए उन्होंने खर्च किए थे. यह जानकारी तब प्राप्त हुई थी जब अभी उपवासों का सिलसिला खतम नहीं हुआ था. (निश्चित ही वास्तविक खर्चे इससे कई गुना अधिक होंगे.) इन आयोजनों में मुसलमानों की प्रायोजित भीड़ की उपस्थिति को भी सुनिश्चित किया जाता रहा था, जिनके नुमाइन्दे मंच पर मोदी से मुलाकात करते रहे हैं. यह 2002 की ‘दानवी’ इमेज से मेकओवर करने की एक फूहड़-सी कोशिश थी.

यह भी दिखता है कि दस साल का यह अन्तराल एक तरह से ‘दोषारोपण’ और ‘क्लीन चिट’ की चकरघिन्नी में भी उलझा है. निश्चित ही इसकी कई वजहें हैं: इसे आप कानूनी प्रक्रिया की अपनी खामी कह सकते हैं या प्रशासन एवं नागरिक समाज के बड़े हिस्से के साम्प्रदायिकीकरण से उभरी जटिलाएं कह सकते हैं, जिनके चलते कई बार आम पीड़ितों के सामने ‘मुद्दई भी वहीं, मुंसिफ भी वहीं, किसे वकील करें, किससे मुंसिफी चाहे’ वाली नौबत आती रही है. कभी किसी रिपोर्ट ने ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ मोदी की कारगुजारियों पर मरहम लगाया तो किसी अदालत ने सत्ताधारी हुकूमत की तुलना रोम के उस उन्मादी शासक नीरो से की, जो फिड्ल बजा रहा था जब रोम जल रहा था.

जैसे अभी गुजरात हाईकोर्ट द्वारा 2002 के दंगे में बरती अकर्मण्यता को लेकर मोदी सरकार को लगायी गयी लताड का मामला सुर्खियों में ही था कि यह बात सुनने में आ रही है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2002 दंगों के चुनिन्दा मामलों की जांच के लिए बनी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने नरेन्द्र मोदी एवं 62 सियासतदानों एवं पुलिसकर्मियों को ‘क्लीन चिट’ दे दी है.

अन्तिम रिपोर्ट के टीम के निष्कर्षों के कोलाहल में यहां हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि एसआईटी ने अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट में क्या कहा था ? उसने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दंगे को लेकर ‘महत्वपूर्ण रेकार्ड को नष्ट करने,’ ‘सांप्रदायिक मानसिकता’ को उजागर करने, ‘भडकाउ भाषण देने, अदालतों में पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के तौर पर संघ कार्यकर्ताओं को तैनात करने, पुलिस कन्ट्रोल रूम में अपने करीबी मंत्रियों को जनसंहार के दिनों में तैनात करने, ‘तटस्थ अधिकारियों को दण्डित करना.’ आदि तमाम कामों के लिए जिम्मेदार माना था. (तहलका, 12 फरवरी 2011)
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