भुला दिए जाने के खिलाफ संघर्ष
गुजरात दंगों के 10 साल
भुला दिए जाने के खिलाफ संघर्ष
सुभाष गाताडे
मैंने खुद अपनी आंखों से देखा कि 6 साल के इमरान को जबरदस्ती पेट्रोल पिलाया गया.
फिर किसी ने उसके मुंह के अन्दर जलती माचिस फेंक दी. एक धमाके के साथ इमरान के चिथड़े
चिथड़े उड़े.
- नासिर खान रहीम खान पठान
(पेज 17, ट्रबल्ड टाईम्स, कम्युनल फासिज्म अराइवज्, भूमिका, बंगलौर)
जुनेद अपनी दादाजी की गोद में चुपचाप पड़ा रहा, जब उसके दादाजी ने हमसे बात की:‘‘
जुनेद के पिता सलीम और मां अफसाना का बीमारी के कारण इन्तकाल हो चुका था. जुनेद हम
लोगों के साथ ही रहता था. उसका एक चाचा, मेरा बेटा, इन्हीं हमलों में मारा गया.
उन्होंने जुनेद की काकी मकसूदा पर भी वार किये, उन्होंने उसकी गर्दन पर तलवार चलायी
और उसे पत्थर मारे और उसके चार साल तथा दो साल के बच्चों को भी मार दिया. इसके बाद
उन्होंने उन सबको कुएं में फेंका...
उन्होंने अपनी बात जारी रखी ,‘‘ तीन दिन बाद मकसूदा को कुएं से निकाला गया ... वह
जिन्दा थी .. मगर उसके बच्चे मर गये थे. जुनेद ने इन सब घटनाओं को हम लोगों के साथ,
मेरे तथा उसकी दादी के साथ, अपनी आंखों से देखा. पहले उसका दिमाग ऐसा नहीं था... अब
वह पूछता है, ‘‘ क्या यही हमारा घर है ?’’ अब उसका दिमाग चकरा गया है, पहले वह ठीक
था . अब वह नींद से जग जाता है और चिल्लाते हुए भागने लगता है, ‘‘ भागो ! भागो !’’
-गोधरा शहर के सतपुल शिविर में 6-7 मई 2002
(सन्दर्भ: कविता पंजाबी तथा अन्य की रिपोर्ट)
कहना बहुत आसान है मगर अमल करना बहुत कठिन और वह भी तब जबकि दस साल का अंतराल बीतने
को है और कल हलाकुओं के भेष में नंगी तलवारों के साथ सड़कों पर फिर रहे लोग अचानक
मुस्कराते दिख रहे हैं, गोया कल कुछ हुआ ही न हो.
यूं तो साफ सुथराकरण/सैनिटाइजेशन का यह सिलसिला तभी से जारी है जबकि गुजरात घटित हो
रहा था- फिर वह संसद के पटल पर दिए आडवाणी के बयान के रूप में उन दिनों सामने आया
हो- जिसमें उन्होंने तीन दिन में दंगों पर काबू करने के लिए मोदी के कसीदे पढ़े थे-
या फिर तत्कालीन वज़ीरे आज़म वाजपेयी का कथन रहा हो, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया था
कि ‘..लेकिन आग किसने लगायी?’ या कहा था कि ‘..वे लोग जहां-जहां रहते हैं, हमेशा
समस्याएं खड़ी करते हैं.’
मीडिया ने भी इसमें कम भूमिका नहीं अदा की है. और कार्पोरेट जगत के सम्राटों का इस
मामले में कोई जवाब ही नहीं है. उनके लिए संविधान प्रदत्त तमाम कर्तव्यों से विमुख
होना, सूबे की जनता के एक हिस्से की देखरेख एवं सुरक्षा का काम सम्हालने में असफल
रहना बिल्कुल मायने नहीं रखता. अगर मुल्क का वजीरे आजम बनाने का मामला उन्हीं की
राय से तय होना होता तो जनाब मोदी कबके इस गद्दी पर पहुंच चुके होते.
वैसे विगत कुछ माह से अपने आप को नए रंगरूप में पेश करने के लिए खुद नरेन्द्र मोदी
भी जुटे हैं. दरअसल वे समझ चुके हैं कि अगर राष्ट्रीय स्तर की महत्वाकांक्षाओं को
पंख देने हों तो गुजरात 2002 के ‘धब्बों’ से मुक्त होना जरूरी है. इसलिए गुजरात
2002 के चुनिन्दा मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जब यह आदेश दिया कि उन्हें लोअर
कोर्ट में ले जाया जाए, उसे ही अपने आप को ‘क्लीन चिट’ मानते हुए उन्होंने सरकारी
खर्चे से जगह-जगह सद्भावना उपवास का सिलसिला शुरू किया. फरवरी माह के दूसरे सप्ताह
में अम्बाजी के मन्दिर में इसका उन्होंने समापन भी किया है.
सूचना अधिकार कानून के तहत मांगी गयी जानकारी के अन्तर्गत इसके लिए जनता के करों से
एकत्रित 250 करोड़ रूपए उन्होंने खर्च किए थे. यह जानकारी तब प्राप्त हुई थी जब अभी
उपवासों का सिलसिला खतम नहीं हुआ था. (निश्चित ही वास्तविक खर्चे इससे कई गुना अधिक
होंगे.) इन आयोजनों में मुसलमानों की प्रायोजित भीड़ की उपस्थिति को भी सुनिश्चित
किया जाता रहा था, जिनके नुमाइन्दे मंच पर मोदी से मुलाकात करते रहे हैं. यह 2002
की ‘दानवी’ इमेज से मेकओवर करने की एक फूहड़-सी कोशिश थी.
यह भी दिखता है कि दस साल का यह अन्तराल एक तरह से ‘दोषारोपण’ और ‘क्लीन चिट’ की
चकरघिन्नी में भी उलझा है. निश्चित ही इसकी कई वजहें हैं: इसे आप कानूनी प्रक्रिया
की अपनी खामी कह सकते हैं या प्रशासन एवं नागरिक समाज के बड़े हिस्से के
साम्प्रदायिकीकरण से उभरी जटिलाएं कह सकते हैं, जिनके चलते कई बार आम पीड़ितों के
सामने ‘मुद्दई भी वहीं, मुंसिफ भी वहीं, किसे वकील करें, किससे मुंसिफी चाहे’ वाली
नौबत आती रही है. कभी किसी रिपोर्ट ने ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ मोदी की कारगुजारियों
पर मरहम लगाया तो किसी अदालत ने सत्ताधारी हुकूमत की तुलना रोम के उस उन्मादी शासक
नीरो से की, जो फिड्ल बजा रहा था जब रोम जल रहा था.
जैसे अभी गुजरात हाईकोर्ट द्वारा 2002 के दंगे में बरती अकर्मण्यता को लेकर मोदी
सरकार को लगायी गयी लताड का मामला सुर्खियों में ही था कि यह बात सुनने में आ रही
है कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर 2002 दंगों के चुनिन्दा मामलों की जांच के लिए
बनी स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम ने नरेन्द्र मोदी एवं 62 सियासतदानों एवं पुलिसकर्मियों
को ‘क्लीन चिट’ दे दी है.
अन्तिम रिपोर्ट के टीम के निष्कर्षों के कोलाहल में यहां हमें यह भी नहीं भूलना
चाहिए कि एसआईटी ने अपनी प्रारम्भिक रिपोर्ट में क्या कहा था ? उसने गुजरात के
मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को दंगे को लेकर ‘महत्वपूर्ण रेकार्ड को नष्ट करने,’
‘सांप्रदायिक मानसिकता’ को उजागर करने, ‘भडकाउ भाषण देने, अदालतों में पब्लिक
प्रॉसिक्यूटर के तौर पर संघ कार्यकर्ताओं को तैनात करने, पुलिस कन्ट्रोल रूम में
अपने करीबी मंत्रियों को जनसंहार के दिनों में तैनात करने, ‘तटस्थ अधिकारियों को
दण्डित करना.’ आदि तमाम कामों के लिए जिम्मेदार माना था. (तहलका, 12 फरवरी 2011)
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मोदी के बारे में रिपोर्ट में यह भी लिखा गया था कि ‘‘इस तथ्य के बावजूद कि गुलबर्ग
सोसायटी एवं अन्य स्थानों पर अल्पसंख्यकों पर जबरदस्त हमले हुए हैं, मोदी की यही
कोशिश थी कि वह स्थिति की गंभीरता को कम करें और ऐसे हमलों को यह कहते हुए औचित्य
प्रदान करें कि हर क्रिया की समान एवं विपरीत प्रतिक्रिया होती है. (पेज 69)
रिपोर्ट इस बात को भी बताती है कि एक बेहद विवादास्पद कदम के तौर पर गुजरात सरकार
ने दो मंत्रियों-अशोक भट्ट और आई के जाडेजा को- दंगे के शुरूआती चरण में अहमदाबाद
शहर पुलिस कन्ट्रोल रूम और राज्य के पुलिस कन्ट्रोल रूम में तैनात किया था. टीम के
चेअरमैन की प्रतिक्रिया के मुताबिक (पेज 12) ‘इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि मोदी
खुद गृहमंत्री थे’ जिससे इस धारणा को बल मिलता है कि ‘उन्हें पुलिस के कामकाज को
बाधित करने के लिए वहां रखा गया था.’
एस आई टी की रिपोर्ट ने वर्ष 2002 में न्यायमूर्ति वी आर कृष्ण अय्यर, न्यायमूर्ति
पी बी सावंत, न्यायाधीश होसबेट सुरेश तथा कई अन्य गणमान्य व्यक्तियों की पहल पर
गुजरात दंगों की जांच के लिए गठित कन्सर्ड सिटिजन्स ट्रिब्युनल की रिपोर्ट का भी
उल्लेख किया था. दो हजार से अधिक मौखिक एवं लिखित साक्ष्यों, दंगों के तमाम पीड़ितों,
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों से बात करके प्रस्तुत ट्रिब्युनल द्वारा करीब
चार सौ पन्नों की और दो खण्डों की रिपोर्ट में साफ कहा गया था: ‘रिपोर्ट में
उल्लिखित तथ्यों से साफ साबित होता है कि मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी फरवरी 2007 के
बाद, गुजरात में जो कुछ हुआ, उसके मुख्य लेखक और शिल्पकार थे.’
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जनसंहार कन्वेन्शन
अगर हम 9 दिसम्बर 1948 को संयुक्त राष्ट्रसंघ की आमसभा द्वारा जनसंहार को लेकर
पारित प्रस्ताव का विवरण देखें और 12 जनवरी 1951 से लागू हुए ‘कन्वेन्शन आन द
प्रिवेन्शन एण्ड पनिशमेण्ट आफ द क्राइम आफ जेनोसाइड’ को पलटें तो पाएंगे कि इन
कन्वेन्शन के जरिये विश्व जनमत ने अपने इस संकल्प को ही रेखांकित किया कि अब कोई
जनसंहार न हो, जैसा कि नात्सी हुकूमत के दौरान यहुदियों के नस्लीय शुद्धिकरण के रूप
में सामने आया था. प्रस्तुत कन्वेन्शन में अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत जनसंहार
की जो परिभाषा है, जिसे कई देशों के राष्ट्रीय आपराधिक कानून में भी शामिल किया गया
और अन्तरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय को स्थापित करने की बुनियाद बने. अन्तरराष्ट्रीय
अपराध न्यायालय की रोम संहिता/स्टेच्यू द्वारा भी स्वीकारा गया है.
प्रस्तुत कन्वेन्शन की धारा दो जनसंहार को इस तरह परिभाषित करती है कि ऐसी कोई भी
कार्रवाई जो किसी राष्ट्रीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को समाप्त करने के इरादे से की
गयी हो जिसके अन्तर्गत समूह के सदस्यों को मारा जाता हो, इन सदस्यों को शारीरिक या
मानसिक चोट पहुंचायी जाती हो, ऐसे हालात पैदा किए जाते हों कि ऐसे समूहों की भौतिक
बरबादी को अंजाम दिया जा सके.
अब जहां तक जनसंहार को लेकर बने अन्तरराष्ट्रीय कन्वेन्शन का सवाल है, भारत सरकार
ने वर्ष 1959 में ही उस पर अपनी सहमति बताते हुए हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन अभी तक
उसने उसके मुताबिक अपने घरेलू कानूनों में परिवर्तन नहीं किए हैं. साफ है, यह भारत
सरकार के कर्णधारों का विरोधाभासी रूख है, जहां वह अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी
बेहतर छवि पेश करते हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसके अनुकूल आचरण नहीं करते हैं.
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दोनों न्यायाधीश- न्यायमूर्ति सावंत एवं न्यायमूर्ति सुरेश- एसआईटी के सामने भी आए
थे, जिन्होंने हरेन पांडया की उपस्थिति का जिक्र किया था, जिन्होंने ट्रिब्युनल को
बताया था कि 27 फरवरी 2002 की शाम को मोदी के आवास पर चुनिन्दा लोगों की बैठक हुई
थी, जिसमें मोदी ने यह स्पष्ट किया था कि अगले दिन हिन्दुओं की प्रतिक्रिया होगी और
पुलिस को बीच में नहीं आना चाहिए. (रिपोर्ट का पेज 18).
इस मामले में भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी संजीव भट्ट का सुप्रीम कोर्ट को भेजा
गया हलफनामा भी काबिले गौर है. हलफनामे के मुताबिक खुद मुख्यमंत्री ने 27 फरवरी
2002 को अपने आवास पर आयोजित बैठक में शामिल सूबे के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को
सांप्रदायिक तनाव की स्थिति में तटस्थ रहने के संकेत दिए थे. गौरतलब है कि अपनी
सरकार के खिलाफ बोलने की हिम्मत रखनेवालों में और उसके लिए जोखिम उठाने को तैयार
रहने वालों मे सूबा गुजरात में संजीव भट्ट अकेले नहीं कहे जा सकते हैं. ‘अहमदाबाद
मिरर’ की रिपोर्ट (http://www.ahmedabadmirror.com/
article/3/
2011042320110423041922678e8f404fd/
Cops-speak-babus-mum.html)
के मुताबिक अब तक आठ आईपीएस अधिकारियों ने सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ जुबां
खोली है.
एक तरह से कहें तो आर बी श्रीकुमार, भारत की पुलिस सेवा के पहले वरिष्ठ अधिकारी थे,
जिन्होंने गुजरात सरकार की मुखालफत की. अल्पसंख्यकों के जनसंहार को लेकर सरकार के
‘‘अवैध और असंवैधानिक’’ निर्देशों को मानने से इंकार करने के चलते उन्हें प्रताड़ित
किया गया. वर्ष 2002 में जब गुजरात में संघ परिवार द्वारा प्रायोजित दंगे शुरू हुए
तब राहुल शर्मा भावनगर में तैनात थे. कम पुलिसकर्मियों के साथ रहने के बावजूद अपने
इलाके के एक मदरसे पर हमला कर रही आततायियों की भीड़ को उन्होंने तितरबितर किया और
200 मुस्लिम बच्चों की जान बचायी. इस वजह से पुरस्कृत होने के बजाय वह दण्डित किए
गए और उन्हें एक निम्न पद पर तत्काल स्थानांतरित किया गया. अहमदाबाद में इस पद पर
रहते हुए उन्होंने दंगों के दौरान की नेताओं, वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की काल
डिटेल्स तैयार की एवं उसे सीडी में कॉपी कर उसे दंगे की जांच कर रही नानावटी आयोग
तथा दस विशिष्ट मामलों की जांच में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैनात स्पेशल
इन्वेस्टिगेशन टीम को भी सौंपा. इसी सीडी के चलते मोदी की खासमखास मंत्री माया
कोडनानी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता जयदीप पटेल को सलाखों के पीछे भेजा जा सका.
वैसे इन दंगों के सुनियोजित होने की हकीकत पर आधिकारिक मुहर उस चर्चित साक्षात्कार
में ही लग गयी थी जो विश्व हिन्दु परिषद की गुजरात शाखा के 96 साला अध्यक्ष
केकाशास्त्री ने रिडिफ डॉट कॉम से सम्बद्ध पत्रकार सुश्री शीला भट्ट को दिया था
जिसका महत्वपूर्ण अंश अंग्रेजी साप्ताहिक ‘मेनस्ट्रीम‘ के 16 मार्च 2002 के अंक में
भी साभार उद्धृत किया गया था..
गौरतलब है कि उपरोक्त साक्षात्कार में प्रोफेसर केशवराम काशीराम शास्त्री उर्फ
केकाशास्त्री ने इस बात का बिल्कुल रहस्योद्घाटन किया कि ‘28 फरवरी की सुबह ही
अहमदाबाद के मुसलमानों की फेहरिस्त उन लोगों ने तैयार की थी.’ वे संवाददाता के
सामने उन आरोपों का जवाब दे रहे थे जिसके तहत यह कहा गया था कि इतने अचूक हमलों के
लिए विश्व हिन्दु परिषद ने पहले से तैयारी की थी. टेप किये गये उपरोक्त साक्षात्कार
में प्रोफेसर शास्त्री ने कहा कि ‘28 की सुबह ही बैठ कर हमने उस सूची को तैयार
किया.’
मालूम हो कि इन्सानियत को शर्मसार करनेवाले इस समूचे प्रायोजित जनसंहार को लेकर-
धर्मनिरपेक्ष शासन के बुनियादी सिद्धान्तों के साथ इस किस्म का खिलवाड़ आज़ादी के बाद
शायद ही कभी मुमकिन हुआ था- देश के गणमान्य बुद्धिजीवियों और सामाजिक-सांस्कृतिक
कर्मियों ने राष्ट्रपति के नाम भेजे अपने ज्ञापन में यह मांग रखी थी भारत सरकार
संयुक्त राष्ट्रसंघ द्वारा प्रस्तावित जनसंहार कन्वेन्शन पर दस्तखत करे और जनसंहार
को अंजाम देने वाले अपराधियों पर ट्रिब्युनल बना कर मुकदमा चले.
23.02.2012, 20.22 (GMT+05:30) पर प्रकाशित