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बीपीएल मजदूरों के नाम करोड़ों की जमीन

मुद्दा

 

बीपीएल मजदूरों के नाम करोड़ों की जमीन

सुनील शर्मा बिलासपुर, छत्तीसगढ़ से

बीपीएल मजदूर


रोजगार गारंटी योजना में 122 रुपये की मज़दूरी पाने वाला कोई आदिवासी अगर बिना लॉटरी निकले सवा करोड़ रुपये की ज़मीन खरीद ले तो यह बात चौंकाने वाली लग सकती है. लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगे अभनपुर के परसदा गांव में अब ऐसी बात पर कोई नहीं चौंकता. अब जैसे व्यासनारायण को ही लें. नाम है- व्यासनारायण राम. बीपीएल कार्ड नंबर-1600. रोजगार गारंटी कार्ड नंबर- CH-16-008-082-001/260/07-04-2007. लेकिन व्यासनारायण का यह परिचय अधूरा है, अगर इसमें यह बात न जोड़ी जाये कि कुछ दिन पहले ही व्यासनारायण ने रायगढ़ जिले की पुसौर तहसील के अमलीभौना गांव में 1 करोड़ 54 लाख, 18 हजार, 638 रुपये का भुगतान करके 20 आदिवासियों की जमीन खरीदी है.

हालांकि व्यासनारायण अकेले नहीं हैं, जिन्होंने ऐसा किया है. उनके गांव में ऐसे कई लोग हैं, जो हैं तो बीपीएल कार्ड धारक और रोजगार गारंटी योजना के मजदूर पर इन्होंने आदिवासियों से करोड़ों की जमीन खरीदी है.

रायपुर जिले के अभनपुर तहसील के ग्राम परसदा में रहते हैं व्यासनारायण. जाति गोड़ और उम्र होगी लगभग पचास साल.पिछले साल इन्हें रोजगार गारंटी में कुछ दिन काम मिला था. पर ज्यादातर दिन मजदूरी को सपरिवार तरसते रहे.

गांव के ही दाऊ जी यानी पुराने जमींदार के बेटे ने इन्हें रायगढ़ जिले में काम दिलाने का भरोसा दिलाया. फिर पता चला कि एक पावर प्लांट के लिये कुछ आदिवासियों की जमीन खरीदनी है. आदिवासी की ज़मीन को किसी आदिवासी के नाम से खरीदा जा सकता है. इसलिये व्यासनारायण को थोड़े-बहुत पैसे का लालच दे कर रायगढ़ ले जाया गया. उनके साथ गांव के दूसरे आदिवासी ईगुल, रामसिंग, सालिकराम, डेरहाराम, बड़कूराम, भवरसिंग और बुधारु राम भी गये और इन आदिवासियों से कागजों पर दस्तखत कराये गये, अंगूठा लगवाया गया. खाना-पीना खिलाया गया और फिर सारे आदिवासी अपने गांव परसदा लौट आये. दस्तावेज बताते हैं कि इन 8 आदिवासियों के नाम पर 100 से अधिक आदिवासियों की ज़मीनें खरीदी गईं. इसके लिये कागजों में दिखाया गया कि इन मजदूर आदिवासियों ने ज़मीनों के बदले 10 करोड़ 26 लाख 66 हजार 427 रुपये का भुगतान भी किया.

लेकिन आज कुछ महीनों बाद हालत ये है कि कितनी ज़मीन, कितना पैसा, किसके नाम और किससे लिया, किसको दिया, इनमें से एक भी सवाल का जवाब इन आदिवासियों के पास नहीं है. सब के सब उन बातों को भूल चुके हैं. यहां तक कि उस गांव का भी नाम, जहां कथित रुप से उन्होंने करोड़ों की जमीन खरीदी है.

असली कहानी
दरअसल रायगढ़ जिले के पुसौर तहसील के ग्राम बड़े भंडार,छोटे भंडार, सरवानी और अमलीभौना में कोरबा वेस्ट पावर कंपनी लिमिटेड द्वारा 1200 मेगावाट विद्युत क्षमता का थर्मल पावर प्लांट स्थापित किया जा रहा है. 885.12 एकड़ में प्रस्तावित इस कोयला आधारित पावर प्लांट की लागत 5826 करोड़ रुपए है. दो चरणों में निर्माणाधीन इस पावर प्लांट को जब ज़मीन की जरुरत हुई तो कंपनी के लोगों ने ढ़ाई सौ किलोमीटर दूर रायपुर जिले के अभनपुर तहसील के ग्राम परसदा के आठ आदिवासियों के नाम पर सैकड़ों आदिवासियों की जमीनें खरीदीं और फिर इन आदिवासियों को सप्ताह भर की मजदूरी के पैसे दे कर इन्हें चलता कर दिया.

चौंकाने वाले सरकारी नकल के दस्तावेज बताते हैं कि राम सिंह पिता पंचराम ने 6.81 हेक्टेयर जमीन के लिये 1,47,53880 रुपये, बुधारूराम पिता रमईराम ने 5.422 हेक्टेयर जमीन के लिये 1,2736115 रुपये, भंवर सिंह पिता रामरतन ने 7.309 हेक्टेयर जमीन के लिये 1,71,68,621 रुपये, ब्यास राम पिता रमईराम ने 6.564 हेक्टेयर जमीन के लिये 1,54,18,6638 रुपये, ईगुल सिंह पिता घसिया राम ने 6.071 हेक्टेयर जमीन के लिये 1,42,60,596 रुपये, डेरहा राम पिता झुमुकराम ने 4.989 हेक्टेयर जमीन के लिये 1,17,19,011 रुपये, बड़कू राम पिता जेठूराम ने 3.887 हेक्टेयर जमीन के लिये 91,30,446 रुपये और सालिक राम पिता रमई राम ने 3.184 हेक्टेयर जमीन के लिये 74,79,120 रुपये विक्रेताओं को चेक के माध्यम से प्रदान किये.

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के अधिवक्ता जीतेंद्र पाली का कहना है कि राज्य में भू-राजस्व संहिता की धारा 170 ख के तहत किसी आदिवासी की ज़मीन कोई गैर आदिवासी नहीं खरीद सकता. इसके लिये ढ़ेर सारी कानूनी पेचिदगियां हैं. ऐसी ही पेचिदगियों से बचने के लिये औद्योगिक घराने और कंपनियां दूसरे आदिवासियों को सामने खड़ा करके अपना काम निकाल रही हैं.

मुआवजे का खेल
मज़दूर नेता और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े नंद कश्यप का कहना है कि राज्य में बड़ी संख्या में कंपनियां इसी तरीके से काम कर रही हैं. कश्यप कोरबा वेस्ट पावर कंपनी लिमिटेड का उदाहरण देते हुये बताते हैं कि कंपनी को नियमानुसार ज़मीन के विक्रेता को मुआवजा और नौकरी देना पड़ता, इसके अलावा उन्हें दूसरी सुविधाएं भी देनी पड़तीं. लेकिन दूसरे जिले के आदिवासियों के नाम से ज़मीन खरीदने के कारण कंपनी अपने सारे उत्तरदायित्वों से मुक्त हो गई. जिनके नाम से ज़मीन ख़रीदी गई, वे आदिवासी अपने-अपने गांव लौट गये और अब उनकी जमीनों पर कंपनी का कब्जा है.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

D. H. Dhruw [ccfng@rediffmail.com] Raipur C.G. - 2012-03-31 12:06:56

 
  अज्ञानता, अशिक्षा, गरीबी और लाचारी का नाजाज़ फायदा उठाया जा रहा है. ऐसी स्थिति क्यों पैदा होती है? ये काम तो कुछ शिक्षित और सरकार में बैठे अफसर कर रहे हैं. क्या ऐसे लोगों पर कारवाई होगी?  
   
 

प्रभु नारायण वर्मा [pnvermabob@gmail] अम्बिकापुर - 2012-03-19 13:31:11

 
  इन मामलों का लगातार फालों अप ज़रूरी है । और फिर लोगों को संगठित करना । या हमारी कोई ऐसी संस्था हो जो सुप्रीम कोर्ट तक इनके पीछे पड़ी रहे । पहले ज़मीन के नामांतरण वगैरह पर ही स्टे लगवा दे। संबन्धित हर आदमी पर अलग अलग केस कर दे । बहरहाल रेपोर्टिंग बहुत अहम है। इसे जितने ज़्यादा हो सके उतने लोगों को पढ़वाना चाहिए।  
   
 

kuldipsod [sood.kuldip8@gmail.com] Baijnath himachal - 2012-03-15 05:17:56

 
  Is not Anna right. It is happening over the country. 
   
 

डॉ. परिवेश मिश्रा [] सारंगढ़ - 2012-03-14 18:21:45

 
  मेहनत कर लिखा हुआ महत्त्वपूर्ण समाचार है. धन्यवाद् और बधाई.  
   
 

vipin bihari shandilya [vicharmimansa27@gmail.com] balaghat.m.p. - 2012-03-12 16:24:31

 
  यहां हर शाख पर उल्लू बैठा है अंजामे.... क्या होगा. लूट का लाइसेंस ऐसे ही लोगों के पास है. 
   
 

YOGESH THAWAIT [] JASHPUR - 2012-03-09 10:49:26

 
  सब के सब इसमें लिप्त है .....जांच के बाद भी नील/सन्नाटा ही होगा  
   
 

Mahi Pal Singh [mahipalsinghrh@gmail.com] Delhi - 2012-03-08 01:38:17

 
  Such incidents show how the greedy industrialists and multi-national corporations succeed in depriving and exploiting the poor tribal people. Will the authorities wake up and hold them accountable? 
   
 

शिवनारायण राव [snrao.gp@gmail.com] सिरिमिरी - 2012-03-06 17:43:07

 
  छत्तीसगढ़ के भोली भली आदिवासियों को प्रदेश के पेसे वालो द्वारा शोषण किया जा रहा है जिसके लिए न तो शासन है और न ही दिल्ली में धरने पर बैठने वालो बड़े बड़े नजियो के ठेकेदार और न ही प्रदेश के सहयोगी नजियो के मालिको के कानो में ही आवाज जा रही है.  
   
 

देवेश तिवारी [deveshtiwaricg@gmail.com] रायपुर - 2012-03-05 18:25:10

 
  सरकारी अमले की इज़ाज़त के बगैर ऐसा नहीं हो सकता . जाँच भी हुई तो दोषी कौन होगा, दोषी मिल भी गया तो क्या वहाँ प्लांट नहीं बनेगा? इस मामले में अंजाम की बात सोंचनी होगी ...... 
   
 

dilip kumar [dilipk1980@gmail.com] raipur - 2012-03-05 10:29:30

 
  यही हमारे लोकतंत्र का कड़वा सच है. लूट के सारे हथकंडे पैसे वालों के पास है. 
   
 

deepak singh [deepak.singhbgh@gmail.com] jashpur - 2012-03-05 04:21:16

 
  आदिवासियों के नाम पर ऐसी बेनामी खरीदी के कई मामले हैं. ऐसे मामलों में जागरुकता लाने की जरुरत है. 
   
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