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मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

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माओवादी सिनी सय की कहानी

लेकिन असली नायक कहां हैं?

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मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

बहस

 

मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका

दिलीप ख़ान


देशों के बीच नए गठजोड़ बनने लगे हैं और हम इस वक्त इतिहास के बेहतरीन और अद्भुत दौर में हैं. खाड़ी का संकट एक तरह से हमें आपस में ऐतिहासिक सहयोग की ओर ले जा रहा है. इस कठिन घड़ी से एक नई विश्व व्यवस्था झांक रही है: एक ऐसी दुनिया, जो आतंक से मुक्त है, ज़्यादा न्यायपूर्ण है और शांति के लिए ज़्यादा प्रयासरत है. एक ऐसा समय जहां उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम चारों दिशाओं के देश खुशहाली और भाईचारे से एक साथ रह रहे हैं.
-प्रथम खाड़ी युद्ध के बाद की स्थिति पर जॉर्ज बुश सीनियर.

बराक ओबामा


ये बयान बुश उस दौर में दे रहे थे, जब सोवियत रूस के विघटन और शीत युद्ध के औपचारिक खात्मे के बाद अमरीका के सामने कोई मज़बूत चुनौती नहीं रह गई थी और अमरीका ने दुनिया को ‘दुरूस्त’ करने का सारा जिम्मा अपने माथे ले लिया था. बीते दो दशक को भू-राजनैतिक तौर पर देखें तो ‘शांति बहाली’ के लिए सबसे ज़्यादा प्रयास जिन इलाकों में हुआ है, वो ठीक वही इलाके हैं, जहां से उत्पन्न संकट के दरवाज़े से जॉर्ज बुश सीनियर बेहतर विश्व का अक्स देख रहे थे. नई विश्व व्यवस्था के देखे गए सपने के एक दशक बाद उनके बेटे जॉर्ज बुश (जू) ने ‘शांति बहाली’ की नई तालीम की शुरुआत भी इसी इलाके में की. ‘वार ऑन टेरर’ के ‘मानवतावादी’ नारे के साथ.

पश्चिमी एशिया की इस पूरी पट्टी में उसके बाद बम की आवाज़ के बिना कोई शाम नहीं गुज़री है. क्या बीते दो दशक में मध्य-पूर्व वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा अड्डा बन गया है? क्या सोवियत संघ के तौर पर अपने चिह्नित दुश्मन के टूट जाने के बाद अमरीका मध्य-पूर्व के इलाके को आजमाईश के लिए तैयार कर रहा है? क्या एक-ध्रुवीय शक्ति समीकरण के बाद अमरीकी हुक्म को पूरा करना आज के वैश्विक राजनीति का अंतर्निहित अर्थ है? क्या अमरीका स्वभावत: एक आतंकी राज्य है? ऐसे कई सवाल हैं, जो अरब दुनिया के मौजूदा हालात को देखते हुए दुनिया के सामने उपस्थित होते हैं.

मध्य-पूर्व की राजनीति को यदि 9/11 के बाद परखा जाए तो उस इलाके के लिए बीते कई दशकों का ये सबसे खतरनाक दौर साबित हुआ है. 9/11 एक तरह से अमरीका और उनके सहयोगियों के लिए हमला करने का बहाना साबित हुआ है. असल में एक हमले के बाद उसकी क्षतिपूर्ति के लिए जवाबी हमला करना अमरीकी रणनीति का पुराना हिस्सा रहा है.

1898 में हवाना हार्बर पर हमले के बाद अमरीकी-स्पेनिश युद्ध शुरू हुआ, लुसिटानिया की घटना को लेकर पहले विश्वयुद्ध में अमरीका शामिल हुआ. पर्ल हार्बर हमले के बाद अमरीका ने जापान पर नाभिकीय बम बरसाए. हालांकि कई शोधकर्ता ये मानते हैं कि पर्ल हार्बर के बारे में पेंटागन को पहले से जानकारी थी और अमरीका ने जान-बूझकर इसे नज़रअंदाज किया. 1964 में टांकिन खाड़ी की घटना के बाद वियतनाम को अमरीका ने तहस-नहस करने की कोशिश की और फिर 9/11 आया, जिस पर ‘कार्रवाई’ फिलवक्त जारी है.

अफ़गानिस्तान और इराक पर ‘फ़तह’ पाने के बाद अमरीका सहित तमाम पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों का मध्य-पूर्व में कौन सा देश निशाने पर है, ये बेहद अहम सवाल है. जैविक हथियार के बहाने, जो बाद में झूठे साबित हुए, अमरीका लगभग एक दशक से इराक को कब्जाया हुआ है. वहां इराकी सेना की बराबर संख्या में अमरीकी सैन्य अड्डे बने हुए हैं. सबसे बड़े दुश्मन के तौर पर प्रचारित सद्दाम हुसैन को फांसी दी जा चुकी है लेकिन अमरीकी सेना को वहां पर और ज़्यादा ‘शांति’ की दरकार है. इसलिए वो अभी वहां अपने पैर भविष्य में भी जमाए रखना चाहता है.

अफ़गानिस्तान में भी ‘आतंकियों’ को पूरी तरह निर्मूल करने के बाद ही अमरीका वहां से हटेगा, चाहे इसमें शताब्दियां लग जाए. 2012 तक नाटो फ़ौज की वापसी के बारे में जो बयान पहले जारी हो रहे थे, उस पर संशोधन शुरू हो गया है. बताया जाने लगा है कि काबुल की स्थिति अभी ‘स्वतंत्र’ रहने की नहीं है. और अब ईरान को लेकर दुनिया भर में माहौल बनाया जा रहा है.

एनबीसी न्यूज़ के साथ बात करते हुए बराक ओबामा ने फ़रवरी की शुरुआत में कहा था कि ईरान पर इजरायल के साथ गठजोड़ कर हमला करने की सारी तैयारी लगभग पूरी कर ली गई है. इसके बाद ईरान को लेकर इजरायल ने जिस तरह का वैश्विक (कु)प्रचार अभियान की शुरुआत की, उसका सिरा भारत में इज़रायली दूतावास के सामने कार में हुए धमाके से लेकर उसके ठीक अगले दिन बैंकॉक में हुए तीन सिलसिलेवार धमाकों से जाकर मिलता है. दिल्ली पुलिस की खोजबीन से पहले ही तेल अवीव ने ब्रिटिश समाचार एजेंसी रॉयटर्स के जरिए ये घोषित कर दिया कि दोनों धमाकों के पीछे ईरानी हाथ है.

ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की वजह से पश्चिमी देशों के निशाने पर है. पश्चिमी देशों ने कभी भी परमाणु मुक्त दुनिया का सवाल नहीं उठाया है बल्कि उनका ज़ोर हमेशा इस दिशा में रहा है कि उनकी इजाजत के साथ दुनिया के देश परमाणु कार्यक्रम में आगे बढ़ें.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Milind [] Pune - 2012-05-15 20:02:06

 
  लेख विद्वत्तापूर्ण जरूर हैं, लेकिन पूर्वग्रह-दूषित हैं. दुसरे महायुद्ध में जो ६० लाख यहुदियों की हत्या हिटलर ने की थी, वो हत्याएं \"हुई ही नहीं\", ऐसा आज की इरान की राजवट का कहना हैं. इरान के रस्ते में आज भी \\\\\\\"इस्लामिक गार्ड\\\\\\\" नाम के गुंडे महिलाओं की पिटाई करने में लगे हुए हैं. किसी महिला को पत्थर से कुचलकर मारने का शासन इस्लामिक कोर्ट हमेशा देते रहती हैं. इन सब चीजों को पुरोगामी या वामपंथी बिलकुल ही नहीं कहा जा सकता. असल में खोमेनी के राजपर आने के बाद इरान में सभी वामपंथियों को खत्म कर दिया गया था. केवल तेल के लिए आज भारत ऐसी राजवट के करीब जा रहा हैं, जिसका कोई भी मूल्य भारत के मूल्यों से जुड़ता नहीं हैं. और क्या कोई भरोसा दे सकता हैं कि हाथ में परमाणु बम आने के बाद यह ईरानी राजवट उसे इस्तेमाल नहीं करेगी?  
   
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