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मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका
बहस
मध्य-पूर्व में अमरीकी हांका
दिलीप ख़ान
देशों के बीच नए गठजोड़ बनने लगे हैं और हम इस वक्त इतिहास के बेहतरीन और अद्भुत
दौर में हैं. खाड़ी का संकट एक तरह से हमें आपस में ऐतिहासिक सहयोग की ओर ले जा रहा
है. इस कठिन घड़ी से एक नई विश्व व्यवस्था झांक रही है: एक ऐसी दुनिया, जो आतंक से
मुक्त है, ज़्यादा न्यायपूर्ण है और शांति के लिए ज़्यादा प्रयासरत है. एक ऐसा समय
जहां उत्तर-दक्षिण-पूरब-पश्चिम चारों दिशाओं के देश खुशहाली और भाईचारे से एक साथ
रह रहे हैं.
-प्रथम खाड़ी युद्ध के बाद की स्थिति पर जॉर्ज बुश सीनियर.
ये बयान बुश उस दौर में दे रहे थे, जब सोवियत रूस के विघटन और शीत युद्ध के औपचारिक
खात्मे के बाद अमरीका के सामने कोई मज़बूत चुनौती नहीं रह गई थी और अमरीका ने दुनिया
को ‘दुरूस्त’ करने का सारा जिम्मा अपने माथे ले लिया था. बीते दो दशक को भू-राजनैतिक
तौर पर देखें तो ‘शांति बहाली’ के लिए सबसे ज़्यादा प्रयास जिन इलाकों में हुआ है,
वो ठीक वही इलाके हैं, जहां से उत्पन्न संकट के दरवाज़े से जॉर्ज बुश सीनियर बेहतर
विश्व का अक्स देख रहे थे. नई विश्व व्यवस्था के देखे गए सपने के एक दशक बाद उनके
बेटे जॉर्ज बुश (जू) ने ‘शांति बहाली’ की नई तालीम की शुरुआत भी इसी इलाके में की.
‘वार ऑन टेरर’ के ‘मानवतावादी’ नारे के साथ.
पश्चिमी एशिया की इस पूरी पट्टी में उसके बाद बम की आवाज़ के बिना कोई शाम नहीं
गुज़री है. क्या बीते दो दशक में मध्य-पूर्व वैश्विक राजनीति का सबसे बड़ा अड्डा बन
गया है? क्या सोवियत संघ के तौर पर अपने चिह्नित दुश्मन के टूट जाने के बाद अमरीका
मध्य-पूर्व के इलाके को आजमाईश के लिए तैयार कर रहा है? क्या एक-ध्रुवीय शक्ति
समीकरण के बाद अमरीकी हुक्म को पूरा करना आज के वैश्विक राजनीति का अंतर्निहित अर्थ
है? क्या अमरीका स्वभावत: एक आतंकी राज्य है? ऐसे कई सवाल हैं, जो अरब दुनिया के
मौजूदा हालात को देखते हुए दुनिया के सामने उपस्थित होते हैं.
मध्य-पूर्व की राजनीति को यदि 9/11 के बाद परखा जाए तो उस इलाके के लिए बीते कई दशकों
का ये सबसे खतरनाक दौर साबित हुआ है. 9/11 एक तरह से अमरीका और उनके सहयोगियों के
लिए हमला करने का बहाना साबित हुआ है. असल में एक हमले के बाद उसकी क्षतिपूर्ति के
लिए जवाबी हमला करना अमरीकी रणनीति का पुराना हिस्सा रहा है.
1898 में हवाना हार्बर पर हमले के बाद अमरीकी-स्पेनिश युद्ध शुरू हुआ, लुसिटानिया
की घटना को लेकर पहले विश्वयुद्ध में अमरीका शामिल हुआ. पर्ल हार्बर हमले के बाद
अमरीका ने जापान पर नाभिकीय बम बरसाए. हालांकि कई शोधकर्ता ये मानते हैं कि पर्ल
हार्बर के बारे में पेंटागन को पहले से जानकारी थी और अमरीका ने जान-बूझकर इसे
नज़रअंदाज किया. 1964 में टांकिन खाड़ी की घटना के बाद वियतनाम को अमरीका ने
तहस-नहस करने की कोशिश की और फिर 9/11 आया, जिस पर ‘कार्रवाई’ फिलवक्त जारी है.
अफ़गानिस्तान और इराक पर ‘फ़तह’ पाने के बाद अमरीका सहित तमाम पश्चिमी साम्राज्यवादी
देशों का मध्य-पूर्व में कौन सा देश निशाने पर है, ये बेहद अहम सवाल है. जैविक
हथियार के बहाने, जो बाद में झूठे साबित हुए, अमरीका लगभग एक दशक से इराक को कब्जाया
हुआ है. वहां इराकी सेना की बराबर संख्या में अमरीकी सैन्य अड्डे बने हुए हैं. सबसे
बड़े दुश्मन के तौर पर प्रचारित सद्दाम हुसैन को फांसी दी जा चुकी है लेकिन अमरीकी
सेना को वहां पर और ज़्यादा ‘शांति’ की दरकार है. इसलिए वो अभी वहां अपने पैर
भविष्य में भी जमाए रखना चाहता है.
अफ़गानिस्तान में भी ‘आतंकियों’ को पूरी तरह निर्मूल करने के बाद ही अमरीका वहां से
हटेगा, चाहे इसमें शताब्दियां लग जाए. 2012 तक नाटो फ़ौज की वापसी के बारे में जो
बयान पहले जारी हो रहे थे, उस पर संशोधन शुरू हो गया है. बताया जाने लगा है कि काबुल
की स्थिति अभी ‘स्वतंत्र’ रहने की नहीं है. और अब ईरान को लेकर दुनिया भर में माहौल
बनाया जा रहा है.
एनबीसी न्यूज़ के साथ बात करते हुए बराक ओबामा ने फ़रवरी की शुरुआत में कहा था कि
ईरान पर इजरायल के साथ गठजोड़ कर हमला करने की सारी तैयारी लगभग पूरी कर ली गई है.
इसके बाद ईरान को लेकर इजरायल ने जिस तरह का वैश्विक (कु)प्रचार अभियान की शुरुआत
की, उसका सिरा भारत में इज़रायली दूतावास के सामने कार में हुए धमाके से लेकर उसके
ठीक अगले दिन बैंकॉक में हुए तीन सिलसिलेवार धमाकों से जाकर मिलता है. दिल्ली पुलिस
की खोजबीन से पहले ही तेल अवीव ने ब्रिटिश समाचार एजेंसी रॉयटर्स के जरिए ये घोषित
कर दिया कि दोनों धमाकों के पीछे ईरानी हाथ है.
ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम की वजह से पश्चिमी देशों के निशाने पर है. पश्चिमी देशों
ने कभी भी परमाणु मुक्त दुनिया का सवाल नहीं उठाया है बल्कि उनका ज़ोर हमेशा इस दिशा
में रहा है कि उनकी इजाजत के साथ दुनिया के देश परमाणु कार्यक्रम में आगे बढ़ें.
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परमाणु कार्यक्रम को रोकने के लिए इज़रायल-अमरीका सबसे ज़्यादा ज़ोर लगा रहा है, उसे
अब तक आईएईए ने ग़लत करार नहीं दिया है. लेकिन अमरीका और इज़रायल सहित यूरोपीय संघ
ईरान पर लगातार दबाव बनाने की कोशिश में हैं.
यूरोपीय संघ ने ईरान की मौजूदा हालात के मद्देनज़र 23 जनवरी को विदेश मंत्री स्तरीय
बैठक की और उसमें ये तय किया कि ईरान से तेल का आयात वो जुलाई से बंद कर देंगे.
यूरोपीय संघ को ये भरोसा था कि आयात रुकने से ईरानी अर्थव्यवस्था की हालत बिगड़ेगी
और आर्थिक नाकेबंदी के जरिए अंतत: ईरान को पश्चिमी फांस में दबोच लिया जाएगा. लेकिन
इस बैठक के तुरंत बाद ईरान ने घोषणा की कि वो ब्रिटेन और फ्रांस को तेल आयात करना
बंद कर रहा है. ईरान ने जुलाई का इंतज़ार किए बगैर खुद ही पांच देशों के आयात पर 16
फरवरी से पाबंदी लगा दी.
ईरानी समाचार एजेंसी एफएनए के मुताबिक़ यूरोपीय संघ के जवाब में ईरान ने ये फैसला
लिया है. इस फैसले की हिम्मत ईरान ने एशियाई बाज़ार के प्रति जाहिर भरोसे से पाई
है. चीन और भारत जैसे देश इस मौके का सबसे ज्यादा फ़ायदा उठाने की स्थिति में है ..और
शायद यही वजह है कि दिल्ली धमाके के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने इज़रायल की घोषणा
के तुरंत बाद कोई उत्साही बयान नहीं दिया.
अमरीका सहित यूरोपीय संघ के देशों ने बेतुके तर्क के साथ ईरानी केंद्रीय बैंक को
सील करने का फैसला लेकर अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक व्यवस्था से उसे बिल्कुल अलग-थलग करने
का भरपूर प्रयास किया है. ईरान की मुद्रा की कीमत 35 फ़ीसदी से ज़्यादा कम हो गई.
आज के हिसाब से ‘आर्थिक युद्ध’ एक तरह से पूरे देश को पंगु बनाने का कारगर हथियार
है. अमरीका-इजरायल-यूरोपीय संघ ने अपने इस अभियान में दुनिया भर के देशों को जोड़ने
की कोशिश की.
मिसाल के तौर पर ईरान ने जब पश्चिमी देशों को तेल आयात करना बंद किया और पश्चिमी
देशों ने ईरान पर आर्थिक पाबंदियां लगाई तो अमरीका ने भारत पर बेतरह दबाव बनाया कि
भारत भी ईरानी तेल का आयात कम करे और ईरान पर आर्थिक पाबंदी लगाए, लेकिन बीते साल
वैश्विक आर्थिक संकट से बचने वाला भारत जानता है कि विश्व बाज़ार की बिगड़ती हालात
का भारत पर यदि कम असर हुआ तो उसकी बड़ी वजह यही एशियाई देश थे.
जब सारी कूटनीतिक और रणनीतिक दांव ही अर्थव्यवस्था के इर्द-गिर्द खेले जा रहे हों
तो ऐसी स्थिति में ईरान के साथ खड़ा रहने में ही भारत का फ़ायदा है. असल में ये
भारत की मजबूरी है. और ईरान के लिए भारतीय और चीनी बाज़ार विदेशी मुद्रा का बड़ा
स्रोत! इस तरह ईरान के साथ भारत और चीन का संबंध पारस्परिक हितों में बंधा है. कुछ
महीने पहले ही बराक ओबामा ने कहा था कि वैश्विक बाज़ार में अमरीका का सबसे बड़ा
प्रतिद्वंद्वी चीन है. और तथ्य ये है कि चीन इस समय ईरान का लगभग 20 फीसदी तेल आयात
कर उस इलाके में अपना वर्चस्व पुख्ता कर रहा है. चीनी वर्चस्व को ध्वस्त करने के
लिए ईरान में पैर फैलाना अमरीका के लिए बेहद ज़रूरी हो गया है.
30 जनवरी को राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जॉर्जिया के राष्ट्रपति से लंबी बात की.
जॉर्जिया ईरान का पड़ोसी मुल्क है और आकार और आबादी में छोटा होने के बावजूद वह
अमरीका से वित्तीय सहायता पाने वाला तीसरा सबसे बड़ा देश है. इस बैठक को लेकर कई
पश्चिमी विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के साथ किसी भी संभावित युद्ध के दौरान
जॉर्जिया की ज़मीन इस्तेमाल करने को लेकर ओबामा ने बात की. हालांकि ईरान को लेकर
अमरीका से ज़्यादा तत्परता इज़रायल दिखा रहा है और इज़रायली सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट
जनरल बेनी गांट्ज ने तो यहां तक कह दिया कि अगर बाकी देश ईरान को लेकर सख्ती नहीं
दिखाते तो वो अकेले ही ईरान पर हमला करने को तैयार हैं.
इज़रायल अपनी इस धमकी को ज़मीन पर उतारने में हिचकिचाएगा और ईरान पर हमला करने के
लिए वह निश्चित तौर पर अमरीका और नाटो देशों का सहयोग चाहेगा, क्योंकि इज़रायल ने
जब 2006 में लेबनान पर हमला किया था तो हिजबुल्लाह जैसे गुट ने इज़रायल की हालत
ख़राब कर दी थी. इसलिए पूरे ईरान के ख़िलाफ़ अकेले लड़ने की हिम्मत इज़रायल अकेले
नहीं करेगा.
इज़रायल के इस मनोभाव को ईरान अच्छी तरह जानता है, इसलिए अपनी सैन्य मज़बूती
दिखाने के लिए वो सीरिया, लेबनान और जॉर्डन को सैन्य मदद पहुंचा रहा है. लेकिन इसके
बावजूद अगर भविष्य में ईरान पर अमरीका, इजरायल और नाटो देश हमला करते हैं तो उसके
लिए वो इस तरह के बहाने दुनिया के सामने रखेंगे-
• ईरान नाभिकीय हथियार बना रहा है और ये दुनिया के लिए ख़तरनाक है.
• ईरान जिद्दी देश है और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की वो बात नहीं सुनता है.
• ईरान के भीतर तानाशाही पसर रही है और जनता की आवाज़ को कुचला जा रहा है.
• ईरान दुनिया भर में इजरालयी लोगों और प्रतीकों पर बम बरसा रहा है.
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इसलिए नाटो को ‘बचाव की जिम्मेदारी’ के तहत ईरान में सैन्य हस्तक्षेप करना चाहिए.
परमाणु कार्यक्रम को लेकर अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने की अमरीका जो मांग कर
रहा है, उसकी फ़ेहरिश्त अंतहीन है. कई देशों के साथ कई दौर की बातचीत के बाद अमरीका
ने आईएईए के मानकों को सबसे अहम बताया, जिसके दायरे में ईरान को नाभिकीय कार्यक्रम
चलाना था.
29-31 जनवरी को आईएईए के अधिकारियों ने ईरान का दौरा किया और उसकी रिपोर्ट अब तक
सार्वजनिक नहीं की गई है लेकिन उस दौरे के ठीक बाद पश्चिमी मीडिया ने तेहरान पर
ग़ैरज़िम्मेदार होने और इस तरह की जांच-पड़ताल के जरिए समय ख़राब करने का आरोप
लगाना शुरू कर दिया. जाहिर है, ईरान पर अगला कदम बढ़ाने को लेकर इजरायल और अमरीका बेहद उतावले
हैं.
यह महज संयोग नहीं है कि आईएईए ने 5 मार्च को ईरान पर बैठक बुलाई है और इज़रायली
प्रधानमंत्री बेंजामिन न्टान्याहू उसी दिन अमरीका में एआईपीएसी (अमेरिकन इजरायल
पब्लिक अफेयर्स कमेटी) की मीटिंग में अमरीका के साथ मध्य-पूर्व की रणनीति पर बात
करेंगे. दरअसल किसी भी संभावित मौके को देखते हुए हमला करने की तैयारी में अमरीका
काफ़ी पहले से मुश्तैद है. अमरीका ने हाल ही में अपने पूर्वी तट पर भारी-भरकम
युद्धाभ्यास किया. बोल्ड एलीगेटर 2012 नाम के इस अभ्यास को दक्षिणपंथी इज़रायली
प्रकाशन ‘डेबकैफिल’ ने पश्चिम का बीते एक दशक का सबसे जबर्दस्त दृश्य बताया.
सीरिया और लीबिया में अमरीकी मनसूबों को जिस तरह कामयाबी मिली है, ईरान को लेकर उसका
उत्साह उतना ही बढ़ गया है. लीबिया में गद्दाफी के ख़िलाफ़ ऑपरेशन में नाटो ने ये
हास्यास्पद दावा किया कि उनके बरसाए गए तकरीबन 2 लाख से ज़्यादा बमों की वजह से कोई
भी सिविलियन नहीं मारा गया. गद्दाफी को बागी सेना द्वारा मारने और फिर मांस बेचने
वाली फ्रिज में बंद कर खुला प्रदर्शन के जो दृश्य लाईव रिपोर्टिंग के जरिए पश्चिमी
मीडिया ने दुनिया भर में पहुंचाई, उसके साथ एक तरह से ये संदेश नत्थी था कि लीबिया
में अब पश्चिम की हितैषी सरकार बनेगी. ठीक उसी तरह जैसे सऊदी अरब, इराक, तुर्की या
फिर जॉर्जिया में हैं.
सत्ता परिवर्तन के लिए नाटो देश इस पूरी पट्टी में अपने सारे दांव खेल रहे हैं.
सीरिया में लड़ रही फ्री सीरियन आर्मी को अमरीका और नाटो ने खड़ा किया है. बंदूक और
बम के अलावा टैंकों से सीरिया की गलियां पाट दी गई हैं. और नाटो का तर्क है कि वो ये
सब “सुरक्षा की ज़िम्मेदारी” के तहत कर रहा है. मध्य-पूर्व के नक्शे पर एक नज़र
दौड़ाने पर आप पाएंगे कि ईरान के चारों तरफ हर देश में बड़ी संख्या में अमरीकी सैन्य अड्डे
बने हुए हैं. सऊदी अरब, इराक, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान, तुर्की,
तुर्कमेनिस्तान, बहरीन और कुवैत. इसके अलावा ज़ॉर्जिया और इजरायल उसके निकट सहयोगी
देश हैं.
सीरिया में सत्ता परिवर्तन के बाद अपने मुताबिक माहौल ढालने की कोशिश में पूरी ताकत
के साथ वो लगा हुआ है. जाहिर है, इस पट्टी में ईरान ही एकमात्र बड़ा ऐसा देश है जो
अमरीकी रणनीति में फिट नहीं बैठ रहा है. इसके अतिरिक्त अन्य कई देशों के मुकाबले
समृद्ध तेल भंडार होने के बावजूद अमरीका न केवल इसका दोहन करने में नाकामयाब साबित
हो रहा है बल्कि ईरान ने अमरीकी सलाह को ताक पर रखते हुए परमाणु कार्यक्रम पर काम
लगातार जारी रखा है.
इसके एवज में ईरान ने बीते 2 साल में 5 बड़े वैज्ञानिकों की जान गंवाई है. ईरानी
विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मुस्तफ़ा अहमदी रोशन की हत्या इसकी आखिरी कड़ी है.
मुस्तफ़ा की हत्या के तरीके को हू-ब-हू दिल्ली में इजरायली दूतावास के पास कार बम
विस्फोट में उतारा गया. और इसके बाद ये स्थापित करने को कोशिश हुई कि मुस्तफ़ा के
बदले में ईरान ये कार्रवाई कर रहा है.
बार-बार ईरान ने ये स्पष्टीकरण दिया है कि वो शांतिपूर्ण उद्देश्य की खातिर नाभिकीय
कार्यक्रम चला रहा है लेकिन इज़रायल को ईरान के परमाणुयुक्त होने पर सबसे ज़्यादा
आक्रोश है. इज़रायल का कहना है कि ईंधन की ओट में ईरान नाभिकीय बम बना रहा है.
हालांकि मोटे अनुमान के मुताबिक़ 200 से ज़्यादा परमाणु बम रखने वाला इज़रायल किस
नैतिक आधार पर ईरान में परमाणु बम का विरोध कर रहा है, इसका उत्तर न तो अमरीका देगा
और न ही पश्चिमी मीडिया.
ईरान के पास वैश्विक प्राकृतिक गैस का लगभग 10 फीसदी भंडार है और इराक व सऊदी अरब
के बाद सबसे बड़ा तेल भंडार. अगर ईरान काबू में आता है तो अमरीकी अर्थव्यवस्था की
गाड़ी में इन तीनों देश के तेल भरे जा सकेंगे. अमरीका और पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की
ये मजबूरी है कि ईरान को वो इराक में तब्दील करें क्योंकि अमरीका के भीतर वैश्विक
तेल भंडार का महज 2 फीसदी हिस्सा ही है.
ईरान को लेकर अमरीका लंबे समय से अपनी रणनीति बना रहा है. इसके अलावा बीते दिनों
नाटो, तुर्की और सऊदी अरब के बीच भी इस पर महीनों बातचीत चली है कि सीरिया में उनके
हस्तक्षेप का स्वरूप क्या होगा? ब्रिटिश विदेश मंत्रालय ने ये साफ़ किया था कि
सीरिया को लेकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वो पहले ज़ोर लगाएंगे.
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पश्चिमी मीडिया ने ही ये रहस्योद्घाटन किए कि ब्रिटिश और फ्रांसीसी विशेष सैन्य बल
फ्री सीरियन आर्मी को तुर्की के सैन्य अड्डे में प्रशिक्षण दे रहे हैं. इस
प्रशिक्षण के क्या मायने हैं? क्या सीधा हमला करना ही हमला कहलाएगा, क्या सीरिया के
भीतर सैन्य प्रदर्शन करने वाले गुटों को प्रशिक्षण देना हमले का दूसरा रूप नहीं है?
असद सरकार से असहमत बड़ी आबादी सीरिया में चल रहे प्रदर्शन से नाराज हैं और उन्हें
लगता है कि इस तरह सीरिया के भीतर पश्चिमी दख़लअंदाजी बढ़ जाएगी. सीरिया में सत्ता
परिवर्तन को जिस तरह अमरीका और इजरायल अपने मुताबिक मोड़ना चाहते हैं, वो ईरान के
लिए भी बराबर चिंता का विषय है, क्योंकि उस इलाके में सीरिया, जॉर्डन और लेबनान ही
दो ऐसे देश हैं, जिनके साथ ईरान के दोस्ताना संबंध हैं और जो मध्य-पूर्व की राजनीति
में पश्चिमी देशों के ख़िलाफ़ साझी रणनीति रखते हैं.
सीरिया में अमरीकी राजदूत को फिर से बहाल किया जाना और इसके लिए रॉबर्ट एस फोर्ड को
चुना जाना, अमरीकी मंसूबे को उनके बीच बेहद स्पष्ट कर देता है, जो फोर्ड की पृष्ठभूमि
जानते हैं. फोर्ड 2004 से 2005 के बीच इराकी जनसंहार के दौरान अमरीका की तरफ़ से
बग़दाद में नंबर दो की पोजीशन में थे. सीरिया में फोर्ड के अनुभव का अमरीका लाभ
उठाना चाहता है! बग़दाद के सारे ‘अनुभवियों’ को अमरीका आजकल महत्वपूर्ण जिम्मेदारी
दे रहा है. जनरल डेविड पेट्रॉस को ओबामा ने हाल ही में सीआईए का प्रमुख बनाया है.
पेट्रॉस का 2004 के बग़दाद दमन में प्रदर्शन बेहद ‘शानदार’ था.
सीआईए प्रमुख की जिम्मेवारी संभालने के बाद ही पेट्रॉस ने सीरिया और ईरान को सबसे
प्रमुख मुद्दा बताते हुए ये साफ कर दिया था कि अमरीका की प्राथमिकता में अभी कौन-सा
इलाका सबसे अहम है. द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीकी निशाने पर रहे साम्यवाद
समर्थक देशों के बजाए बीते दो दशक में इस्लामिक देश अमरीका के निशाने पर सबसे आगे
हैं.
सैम्युअल हटिंगटन जैसे सिद्धांतकारों ने अपने सिद्धांत के जरिए अमरीका की इस चाल को
अवश्यंभावी करार देते हुए वैश्विक शक्ति समीकरण के लिए ज़रूरी बताया था. लेकिन
सभ्यताओं का टकराव जैसे सिद्धांत के जरिए हटिंगटन ने आलोचनात्मक चिंतन को गलत दिशा
में मोड़ दिया. असल में मसला कभी भी इस्लाम बनाम ईसाईयत का नहीं रहा है. वास्तव में
मध्य-पूर्व के संदर्भ में भी लड़ाई साम्यवाद बनाम पूंजीवाद का ही है और चरमराती
पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की लगाम को मज़बूत करने के लिए ही अमरीका सहित तमाम पश्चिमी
पूंजीवादी देश मध्य-पूर्व के देशों के संसाधन का ओट ले रहे हैं. यदि मध्य-पूर्व के
संसाधन का दोहन करने में अमरीका नाकामयाब रहा तो पूंजीवाद की हालत ज़्यादा जर्जर हो
जाएगी और स्वाभाविक रूप से विकल्प के तौर पर लोग साम्यवाद की ओर मुंह करेंगे. इस
स्थिति को रोकने के लिए अमरीका मध्य-पूर्व में ज़ोर लगा रहा है और विरोध करने वाले
देशों पर बम बरसा रहा है.
ऐसे में विरोध करने वाला देश यदि अमरीका के सामने तनकर खड़ा होता है तो इसे इस्लाम
बनाम पश्चिमी देश के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. अगर मामला ऐसा होता तो अमरीका उन
गुटों को समर्थन ही नहीं देता, जो सत्ता परिवर्तन के लिए इन देशों में लड़ रहे हैं
और अपने पूरे मिजाज में इस्लामी कट्टरपंथी हैं.
अमरीका और नाटो मध्य-पूर्व की राजनीति को पुरातन विचारधारा की आगोश में डालने की
पूरी कोशिश में हैं. मिस्र के जिस आंदोलन को अमरीका सहित तमाम पश्चिमी देशों का
समर्थन हासिल था, उसकी परिणति सैन्य और फिर इस्लामी राजनीतिक पार्टी मुस्लिम
ब्रदरहुड के उभार के रूप में हुई. लीबिया में तालिबान समर्थित संगठनों ने सत्ता
परिवर्तन की लड़ाई लड़ी और पूरे इलाके के एक मात्र बचा धर्मनिरपेक्ष राज्य सीरिया
के सत्ता परिवर्तन के लिए भी ऐसी ही शक्ति को अमरीका, इज़रायल और नाटो देश समर्थन
दे रहे हैं.
क्या अद्भुत संयोग है कि सीरिया के भीतर दुनिया में अल-कायदा को अपना सबसे बड़ा
दुश्मन मानने वाले अमरीका और अलकायदा दोनों का लक्ष्य एक ही है. बीते दिनों अलकायदा
नेता अयमान अल-जवाहरी ने एक वीडियो जारी कर सीरिया के पड़ोसी मुल्कों से ये आह्वान
किया था कि सीरिया की असद सरकार के ख़िलाफ़ वो संगठित हों. अगर सीरिया में भविष्य
में सत्ता (या व्यवस्था) परिवर्तन होता है तो उसका स्वरूप या तो इस्लामी गणतंत्र का
होगा या फिर अमरीकापरस्त लोकतंत्र का.
मध्य-पूर्व को अमरीका अपने सैन्य अड्डे के तौर पर इस रूप में विकसित करना चाहता है, जो रणनीतिक तौर पर अमरीकी हित में सबसे ज़्यादा मुफीद हो और अमरीकी अर्थव्यवस्था को
संवर्धित करने में मददगार हो. हमले के बाद इन देशों में कठपुतली सरकार बनाकर अमरीका
अपनी रणनीति में काफी हद तक कामयाब भी हो रहा है. जो देश हमला नहीं झेलना चाहते, वो
सीधे-सीधे अमरीकी दोस्ती को अमरीकी शर्त पर निभा रहे हैं.
हाल ही में सऊदी अरब द्वारा इतिहास में अब तक का सबसे ज़्यादा मूल्य यानि 50 अरब
डॉलर के हथियार खरीदने को इसी रूप में देखा जाना चाहिए. सीरिया में यदि सत्ता
परिवर्तन होता है तो यह ईरान को उस इलाके में बिल्कुल अलग-थलग कर देगा. और एक तरह
से ईरान के लिए यह बड़ी हार होगी. ईरान पर सीधे हमला करने से पहले अमरीका और इजरायल
की कोशिश यही होगी कि सीरिया को पहले अपने अनुकूल बना लिया जाए.
06.03.2012, 00.01 (GMT+05:30) पर प्रकाशित
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| | इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ | | | | Milind [] Pune - 2012-05-15 20:02:06 | | | |
लेख विद्वत्तापूर्ण जरूर हैं, लेकिन पूर्वग्रह-दूषित हैं. दुसरे महायुद्ध में जो ६० लाख यहुदियों की हत्या हिटलर ने की थी, वो हत्याएं \"हुई ही नहीं\", ऐसा आज की इरान की राजवट का कहना हैं. इरान के रस्ते में आज भी \\\\\\\"इस्लामिक गार्ड\\\\\\\" नाम के गुंडे महिलाओं की पिटाई करने में लगे हुए हैं. किसी महिला को पत्थर से कुचलकर मारने का शासन इस्लामिक कोर्ट हमेशा देते रहती हैं. इन सब चीजों को पुरोगामी या वामपंथी बिलकुल ही नहीं कहा जा सकता. असल में खोमेनी के राजपर आने के बाद इरान में सभी वामपंथियों को खत्म कर दिया गया था. केवल तेल के लिए आज भारत ऐसी राजवट के करीब जा रहा हैं, जिसका कोई भी मूल्य भारत के मूल्यों से जुड़ता नहीं हैं. और क्या कोई भरोसा दे सकता हैं कि हाथ में परमाणु बम आने के बाद यह ईरानी राजवट उसे इस्तेमाल नहीं करेगी? | | | | | | |
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