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कम से कम एक दरवाज़ा

बहस

 

कम से कम एक दरवाज़ा

सुधा अरोड़ा


समाज में जो बदलाव हमें दिखाई दे रहे हैं, वे बहुत ऊपरी हैं. कहीं आज भी हम स्त्रियों को उनका अपेक्षित सम्मान नहीं दिला पा रहे हैं और न ही उनके लिये परिवार और समाज की ओर से वह सपोर्ट सिस्टम तैयार कर पा रहे हैं, जो उन्हें जीवन की विसंगतियों से, असुविधाओं और कठिन परिस्थितियों से जूझने के रास्ते मुहैया करवा सके. शिक्षित करके हमने उन्हें अर्थ उपार्जन का रास्ता तो दिखा दिया, आत्मनिर्भर बनाकर उन्हें अपने पैरों पर खड़ा भी कर दिया, पर हम उन्हें जीवन जीने की कला, विपरीत परिस्थितियों से जूझने का तरीका, अपने लिये एक दरवाजा खुला रखने का ढब नहीं सिखा पाये.

आत्महत्या


आज से करीब डेढ़ सौ साल पहले की भारतीय स्त्रियों को अपनी सामाजिक स्थिति और अपनी यातना की पहचान ही नहीं थी. अपने घर की चहार दीवारी की परेशानियों से बिला शिकायत जूझना उनकी मजबूरी थी और उन्हें यथासंभव संवार कर चलना उनका स्वभाव. घर से बाहर उनकी गति नहीं थी इसलिये जहां, जितना, जैसा मिला,सब शिरोधार्य था. सहनशीलता और त्याग उनके आभूषण थे. अगर सम्मान मिला तो अहोभाग्य, दुत्कार मिली तो नियति- क्योंकि अपने जीवन से एक स्त्री की अपेक्षाएं कुछ थीं ही नहीं.

एक मध्यवर्ग की स्त्री अगर प्रतिभावान और रचनात्मक हुई तो वह रसोई और बच्चों की देखभाल के बाद दोपहर के बचे हुए समय में, घर के फेंके जाने वाले सामान से चित्रकला या क्रोशिए से बॉर्डर या कवर बिनतीं, साड़ियां, चादरें और तकिया गिलाफ़ काढ़तीं - इस तरह अपना पूरा समय वे घर की चहारदीवारी के भीतर की स्पेस को सजाने-संवारने-निखारने में बिता देतीं.

अपने अधिकारों के प्रति अज्ञानता, अपने घरेलू श्रम को कम करके आंकना, बचपन में विवाह, विधवा हो जाने पर सामान्य जीवन जीने पर अंकुश आदि ऐसी कुरीतियां थीं, जिसके चलते उन्हें शिक्षित करना उस कालखंड की अनिवार्यता बन गई. स्त्रियां शिक्षित हुईं. शिक्षा से स्त्रियों का जागरुक होना स्वाभाविक था. लेकिन बाहरी स्पेस में उनका काम स्कूल में अध्यापन करने तक ही सीमित रहा. शिक्षा के बाद की दूसरी सीढ़ी आई, उन्हें आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया गया और शिक्षण से आगे, बैंकों में, सरकारी दफ्तरों में, कॉरपोरेट जगत में और अन्य सभी क्षेत्रों में स्त्रियों ने दखल देना शुरु किया. आर्थिक रूप से हर समय अपना भिक्षापात्र पति के आगे फैलाने वाली स्त्री ने घर को चलाने में अपना आर्थिक योगदान भी दिया. पर इससे उसके घरेलू श्रम में कोई कटौती नहीं हुई. इस दोहरी जिम्मेदारी को भी उसने बखूबी निभाया.

माना कि भारतीय समाज में वैवाहिक सम्बन्धों में बेहतरी के लिये समीकरण बदले हैं, पर वह स्त्रियों के एक बहुत छोटे से वर्ग के लिये ही है- जहां पुरुषों में कुछ सकारात्मक बदलाव आये हैं. मध्यवर्गीय स्त्री के एक बड़े वर्ग के लिये आज स्थितियां पहले से भी बहुत ज़्यादा जटिल होती जा रही हैं.

आज स्त्रियों को लेकर पूरा परिदृश्य बहुत ज़्यादा निराशाजनक है. रोज़ का अखबार स्त्री के साथ घटित नये हादसे लेकर हमारे सामने आता है पर समय जितना असंवेदनशील होता जा रहा है, ये हादसे घटित होने के पहले दिन जैसे अखबार के पहले पन्ने पर रहते हैं और अगले कुछ दिनों में तीसरे चौथे पन्नों पर स्थानांतरित होकर अखबार से गायब हो जाते हैं, वैसे ही हमारे दिमाग़ पर सिर्फ पहले दिन इनकी दस्तक हथौड़े सी पड़ती है पर धीरे धीरे ये हमारी आंखों से ओझल होते ही मन पर हल्की सी खरोंच छोड़कर हमारी सोच का हिस्सा बनने से पहले ही हमारी दहलीज़ छोड़ जाते हैं.

आत्महत्या के फैसले
पिछले वर्ष अन्तर्राट्रीय महिला दिवस के दिन 8 मार्च 2011 से 28 सितम्बर 2011 तक- छह महीनों के अंदर मुंबई के उपनगरों में बीस से बत्तीस की उम्र की चार लड़कियों की आत्महत्याएं नये सिरे से हमारे सामने ढेर सारे सवाल खड़े करती है. ये चार तो अखबारों के पहले पन्नों पर दर्ज किये गये मामले थे, प्रताड़ना के कई मामले बदनामी के डर से घर के सदस्यों द्वारा ही दबा दिये जाते हैं. पहले हम इन चारों आत्महत्याओं की स्थितियों पर एक नज़र डालें-

8 मार्च 2011 - अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के दिन, जब दिल्ली से राधिका तंवर की हत्या की खबर पहुंची, उसके साथ ही दिल दहला देने वाली खबर थी- निधि गुप्ता (जालान) की- जिसने मलाड के एक रिहायशी टावर के उन्नीसवें माले के रिफ्यूज एरिया में जाकर अपने छह साल के बेटे गौरव और तीन साल की बेटी मिहिका को छत से नीचे फेंकने के बाद खुद कूद कर तीन ज़िदगियों का अंत किया. निधि गुप्ता एक चार्टर्ड अकाउंटेंट होने के साथ, मलाड के सराफ कॉलेज की विज़िटिंग लेक्चरार थी और एम.बी.ए. की परीक्षा में बैठने की तैयार कर रही थी.

16 अप्रैल 2011- दहिसर पूर्व के एक टावर की सातवीं मंज़िल पर रहने वाली दीप्ति चौहान (परमार) ने वॉचमैन से छत की चाबियां लीं. वहां जाकर पहले अपने छह साल के बेटे सिद्धेश की आंखों पर पट्टी बांधकर उसे छत से नीचे फेंका और उसके बाद खुद कूदकर अपनी जान दे दी. दीप्ति अब एक गृहिणी थी और उसका पति नीलेश शेयर मार्केट का ब्रोकर.

26 जुलाई 2011- शिवानी साहू- एम.बी.ए. ने, मुलुंड पूर्व के अपने निवास पर, डेढ़ साल की अपनी बच्ची को छोड़कर पंखे से झूलकर आत्महत्या कर ली.

28 सितम्बर 2011- निधि सिंह 24 वर्ष - आय.आय.टी. कानपुर की स्नातक और एम.बी.ए.- फरवरी में समदर्शी सिंह से प्रेम विवाह किया और मुंबई के उपनगर अंधेरी पूर्व में पहली मंजिल के फ्लैट में चार महीने पहले ही शिफ्ट हुई थी, शादी के सात महीने बाद, पंखे से झूलकर आत्महत्या कर ली. यह कदम उठाने से पहले उसने अपने मोबाइल पर एक मिनट का अपना बयान रिकॉर्ड किया कि उसके इस निर्णय में किसी का हाथ नहीं है. वह अपने माता पिता और पति को अपनी कुंठाओं से परेशान नहीं करना चाहती, इसलिये अपने जीवन का अंत कर रही है.

इन चारों आत्महत्याओं में कुछ आश्चर्यजनक समानताएं हैं. मध्यवर्ग से आई ये चारों लड़कियां पढ़ी लिखी थीं. शादी से पहले नौकरी करती थीं. चारों ने अपनी मर्ज़ी से अपने जीवन साथी का चुनाव कर प्रेम विवाह किया. अपनी डिग्रियों और योग्यता के बल पर वे अपना एक स्वतंत्र मुकाम बना सकती थीं, फिर इन्होंने आत्महत्या का रास्ता क्यों चुना? शिक्षा, आर्थिक आज़ादी और आत्मनिर्भरता के बावजूद ऐसे हादसों पर रोक नहीं लग पाई तो क्यों ? आखिर चूक कहां हो गई? यह सवाल किसी भी सोचने समझने वाले व्यक्ति को, समाजिक कार्यकर्ताओं को, समाज विज्ञान के अध्येताओं को विचलित करेगा. इनमें से कुछ हादसों के तह तक पहुंचने की एक कोशिश की जानी चाहिये. अखबार सिर्फ सूचना देते हैं, हादसों का विश्लेषण करने में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं होती.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

sharad shukla [] bilaspur-cg - 2012-08-30 11:48:42

 
  सुधा जी, आपने बहुत अच्छी बातें लिखी है, कोई नारी किन परिस्थितियों में आत्महत्या करती है, उस वक्त उसके दिमाग में क्या था ये जानने की इच्छा हमेशा रहती है पर कभी पता नहीं चल पाता. अगर पता चल जाए तो समाज में उसके हिसाब से सुधार लाया जा सके. शानदार लेख के लिए बधाई. 
   
 

kusum [] new delhi - 2012-08-08 07:33:59

 
  आपके लेख में आज की आत्मनिर्भर महिलाओं का दर्द है. सच कभी-कभी लगता है कि समझदारी और आत्मनिर्भरता के साथ महिला होना गुनाह है. 
   
 

punita singh [singh.punita3@gmail.com] delhi - 2012-07-16 16:49:43

 
  सुधा जी एक बहुत अच्छे मुद्दे पर आपके विचार अच्छे लगे, धन्यवाद. 
   
 

radha [radhavin2006@gmail.com] delhi - 2012-03-21 11:45:43

 
  बहुत अच्छा लेख है.  
   
 

Dr. Kanhaiya Tripathi [hindswaraj2009@gmail.com] President House - 2012-03-15 04:47:13

 
  सुधा अरोरा जी,
सादर प्रणाम.
मैं आपका आलेख देखकर और इसकी गंभीरता को जानकार काफी प्रभावित हुआ. इसने एक नए विषय पर सोचने के लिए मजबूर किया वास्तव में हमारे देश में ही नहीं पूरी दुनिया ने पितृसत्ता के पाँव तले कुचली जा रही स्त्री आज चिंता की विषय है. विवाहित महिलाओं की आत्महत्या भी इसी क्रूरता का विस्तार है.
हमें इसे कई सन्दर्भों में देखना होगा. पूँजी और बाज़ार के बीच स्त्री अस्मिता और पित्रसत्तात्मक व्यवस्था पर विचार जरूरी मुझे लगता है. क्योंकि अर्बन इलाके में स्त्री आत्महत्या कहीं न कहीं इन्ही उलझनों में ज्यादा हुयी है. स्त्री के गरिमा की अवहेलना भी इसके लिए जिम्मेवार है. और इसके अलांवा मुझे लगता है कि हमारे यहाँ राज्य के पास अभी भी पितृसत्तात्मक व्यवस्था के ज़वाब और स्त्री उत्कर्ष के लिए कोई विकल्प नहीं मिला है.
यदि इसपर चर्चा होगी तो मुझे ख़ुशी होगी.
 
   
 

neela [] noida - 2012-03-14 10:34:10

 
  ठीक वही- वही बातें जो सुनना चाहती थी. चुप्पी के संस्कारों में बदलाव जरुरी है. साथ ही जरुरी है किसी भी हाल में हर लड़की के जीवन में एक ऐसे दरवाजे की उपस्थिति, जहां से वह त्रासदी के पलों में बाहर निकल सके.. शानदार लेख. बधाई. 
   
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