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बाबा बनाते चैनल

मुद्दा

 

बाबा बनाते चैनल

आशीष कुमार अंशु


जब अन्ना बाबा टेलीविजन के सेट पर उभर रहे थे अपने आंदोलन के साथ, जब रामदेव बाबा अपनी भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा में व्यस्त थे, जब श्रीश्री रविशंकर जीवन जीने की कला के विस्तार में व्यस्त थे, श्री मोरारी और श्री आशाराम बापू द्वय टीवी पर अपने प्रवचन में व्यस्त थे, उसी दौरान एक व्यक्ति जूनियर आर्टिस्ट्स के साथ खुद के लांच करने का पहला चरण पूरा कर चुका था.

निर्मल बाबा


अन्ना के आंदोलन को लेकर यह बहस लंबी चली कि इस आंदोलन को मीडिया ने खड़ा किया है अथवा यह कोई जन आंदोलन है. लेकिन बाबा निर्मल को लेकर कोई बहस नहीं है कि वे मीडिया द्वारा खड़े किए गए जीन्न हैं या वास्तविक आध्यात्मिक सन्यासी ? यह आध्यात्मिक गुरू किसी को भी पैसे लिए बिना अपना दर्शन नहीं देता.

आशाराम बापू ने एक बार इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए ‘कुता’ शब्द का इस्तेमाल किया था, जिसके सामने बोटी फेंककर कुछ भी करवाया जा सकता है. उन दिनों आशाराम के आश्रम से मीडिया में उन्हें अच्छी ना लगने वाली कुछ खबरें आ रही थीं. उस समय आम आदमी यही समझ रहा था कि मीडिया अपना कर्तव्य निभा रहा है. लेकिन पेड न्यूज खबर छपने और ना छपने से अब एक कदम आगे बढ़ गया है. अब खबर के फालोअप ना करने के भी पैसे वसूले जा रहे हैं. पत्रकारिता और धंधा के बीच खींची हुई स्पष्ट लकीर को पहले महीन किया गया और ना जाने यह लकीर कब मिट गई.

अनुमान है कि महीने के दस करोड़ के खर्च पर देश के तीस चैनल बाबा की उपस्थिति का उत्सव मना रहे हैं. इन चैनलों और पैसों की अकूत ताकत ने बाबा को पवित्र गाय बना रखा है. यदि बाबा में आध्यात्मिक शक्ति होती तो कानूनी नोटिस की जगह आध्यात्मिक शक्ति का उपयोग करते. खुद पर उठ रहे एक-एक जुबान को बंद करने की कोशिश की जगह कोई ऐसा चमत्कार करते कि सबकी जुबान खुद बंद हो जाती.

पीपरिया मध्य प्रदेश की एक दूकान पर देवी पार्वती, ईश्वर शिव और बाबा साईं से भी अधिक पोस्टर बाबा निर्मल का दिखा. पोस्टरों के दिखने से भी अधिक दिलचस्प दूकान वाले का जवाब था- जो बिकेगा वही तो रखेंगे.

इस जवाब में कुछ नयापन नहीं है लेकिन इस जवाब में कुछ तो बात है, जिसका हवाला पटरी बैठा एक पोस्टर वाला भी दे रहा है और दिल्ली की एक बहुमंजिली इमारत में बैठे एक चैनल का सीईओ भी दे रहा है. बेचने का फार्मूला दोनों का एक ही है.

वास्तविकता यही है कि निर्मल बाबा की वजह से दस करोड़ महीने का जब आम मिल रहा है और टीआरपी के तौर पर गुठलियों का दाम भी वसूल हो रहा है, ऐसे में आप किसी टीवी चैनल वाले से पत्रकारिता के मूल्यों पर बात करेंगे तो आपको मुख्य धारा का कोई भी गंभीर पत्रकार गंभीरता से लेने को तैयार नहीं होगा. क्योंकि अब पत्रकारिता बदल गई है. प्रतिस्पर्धा पहले से बढ़ गई है. यह बिरला का नहीं, अंबानी का मीडिया युग है. तय है, बदलते युग में मूल्य भी बदलेंगे और नए मूल्य वही तय करेगा, जो इस दौड़ में सबसे आगे होगा.

निर्मल दरबार के नेहरू प्लेस वाले दफ्तर कम बीपीओ में गया था. बाबा के मीडिया सेल के बारे में पता करने. वहां बताया गया कि बाबा जब सारी मीडिया में आ रहे हैं, फिर उन्हें मीडिया सेल की क्या जरूरत है? यदि बाबा के नेहरू प्लेस वाले दरबार में सीसी टीवी लगा हो तो कोई भी छह अप्रैल दोपहर दो और तीन के बीच में यह फूटेज देख सकता है, जिसमें बाबा की प्रतिनिधि महिला कहती है कि बाबा के भक्त बड़े बड़े नेता मंत्री हैं, केरल के मुख्यमंत्री भी बाबा के सामने सिर झुकाते हैं. बाबा प्रतिनिधि यह बताने में असफल रही कि वह किस मुख्यमंत्री की बात कर रही हैं? दोनों हाथों से बाबा के ग्राहकों द्वारा पैसा बटोरने जैसे महत्वपूर्ण काम को करते हुए, बाबा प्रतिनिधि ने मुझसे बात की, इसके लिए उन्हें साधुवाद कहकर निकल गया.
“सिख धर्म के ग्रंथों में साफ-साफ कहा गया है कि करामात कहर का नाम है. इसका मतलब है जो भी करामात कर अपनी शक्तियां दिखलाने की कोशिश करता है, वो धर्म के खिलाफ काम कर रहा है. निर्मल को कई दफा यह बात मैंने समझाने की कोशिश भी की, लेकिन उसका लक्ष्य कुछ और है, उसको मैं क्या कह सकता हूं.”

यह बात झारखंड के एक वरिष्ठ राजनेता इंदर सिंह नामधारी ने एक वेबसाइट से बात करते हुए बताया. निर्मल बाबा ने अपने जीवन के बहुत बरस झारखंड के पलामू में गुजारे हैं. इंदर सिंह नामधारी की पहचान झारखंड के कद्दावर और समझदार नेताओं की रही है. निर्मल बाबा इन्हीं नेताजी के साले हैं. माने इंदर सिंह नामधारी की पत्नी मनविन्दर कौर के सगे भाई हैं.

नामधारी ने स्वीकार किया कि निर्मलजीत सिंह नरूला का कॅरियर बनाने में उन्होंने प्रारंभ में काफी मदद की है. निर्मलजीत सिंह नरूला के पिता और नामधारी के ससुर दिलीप सिंह बग्गा बहुत पहले गुजर गए. बेसहारा हुए निर्मलजीत सिंह नरूला को नामधारी अपने साथ ले आए. उसकी मदद तरह-तरह से की, लेकिन कोई धंधा जब सफल नहीं हुआ तो एक दिन निर्मलजीत सिंह नरूला, निर्मल बाबा बन गये.

इस पूरी कहानी में इस पक्ष को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता, कि अन्ना के आंदोलन के बाद समाज में साधु संन्यासियों की प्रतिष्ठा एक बार फिर बढ़ गई थी, क्योंकि इस आंदोलन में जनभावना को समझते हुए जन आंदोलनकारी की भूमिका में संन्यासी आए थे. अब साधु-संन्यासियों की समाज में बढ़ रही प्रतिष्ठा राजनीति में सक्रिय लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन गई थी. ऐसे समय में एक ऐसे संन्यासी की जरूरत राजनीति को भी थी, जो सिर्फ पैसे की भाषा जानता हो. जो पैसे लिए बिना दर्शन भी ना देता हो और अच्छी रकम दो तो अकेले में भी मिलने को तैयार हो जाता हो.

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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

GOPAL PRASAD [gopal.eshakti@gmail.com] DELHI - 2012-06-05 14:48:07

 
  पत्रकारिता और धंधा के बीच खींची हुई स्पष्ट लकीर को पहले महीन किया गया और ना जाने यह लकीर कब मिट गई. - उपरोक्त पंक्ति में काफी दम है. 
   
 

narendra kashyap [kashyapnasrendra786@gmail.com] chhatisgrh - 2012-05-30 12:13:57

 
  मेरे ख्याल से ऐसे बाबाओं से दूर रहना चाहिए और खुद पर आत्मविश्वास बनाए रखना चाहिए क्योंकि हमें, आपको और ऐसे सभी बाबाओं को भगवान ने बनाया है. इसलिए हमें बाबा से ज्यादा भगवान पर और अपने कर्म पर विश्वास रखना चाहिए ना कि बाबा पर. 
   
 

Radha [radhavin2006@gmail.com] Delhi - 2012-04-28 05:33:01

 
  सब बाबा वगैरह ढोंगी हैं पैसों के लिए आम लोगों को मूर्ख बनाते हैं और हद है उन लोगों की भी जो इनके जान में फंस जाते हैं और इनकी गोल-मोल बातों में फंसकर इन पर पैसे और समय बर्बाद करते हैं.  
   
 

parmita [parmita 1972 @gmail.com] varanasi - 2012-04-22 11:14:48

 
  पूजीवादी ढाचे की यही कहानी है. यहाँ हर माल बिकता है .....अगर आपको बेचना आता है .......बाजार युग है बाबु ...धर्म और मोक्ष गायब है . बस काम ,अर्थ की महिमा है ....बनिया बनने नहीं आता तो ......जीना मुश्किल है ...  
   
 

manthan [mrmanthan6@gmail.com] balaghat - 2012-04-21 17:16:39

 
  इलेक्ट्रानिक मीडिया जिसके सामने बोटी फेंककर कुछ भी करवाया जा सकता है.  
   
 

shashank [] lucknow - 2012-04-19 15:40:57

 
  निर्मल बाबा कभी गलत नहीं है. जब लोगों की दुकान नहीं चलती तो वे दूसरे लोगों को आगे नहीं निकलने देते. निर्मल बाबा की वजह से ही मैं आज इतना आगे हूं. जय हो निर्मल बाबा आपकी.  
   
 

कपिल [] गाजियाबाद - 2012-04-18 07:51:51

 
  निसंदेह काबिले तारीफ आलेख। अच्‍छा लिखा है। 
   
 

ajay kumar [ajayaryan1@gmail.com] patna - 2012-04-18 04:44:00

 
  अंशु जी, बेहतरीन लेख के लिए धन्यवाद. निर्मल एपिसोड में एक बात खास गौर करने वाली है कि जितने लोग समागम या दरबार में जाते हैं, सभी बगैर मेहनत किए या शार्टकट तरीके से पैसा कमाना चाहते हैं. कही न कहीं दोष ऐसे लोगों का भी है जो अपने कर्म में नहीं किसी बाबा की Third-Fourth Eye में विश्वास कर ठगे जाते हैं. इस पहलू पर भी ज़रा गौर करनें कि क्यों कुकुरमुत्ते की तरह ऐसे बाबा हमारे देश में उठ खड़े हुए हैं? क्यों लोग सैकड़ों की संख्या में इन ढोंगियों पर विश्वास करते हैं? 
   
 

sanjay [] mumbai - 2012-04-17 18:04:57

 
  There is not a single baba like this. There are so many baba\'s who charge so much for all these kind of fraud activity. I think almost all baba today r charging so much and make crores n croses of rupees. 
   
 

biswajit [] raipur - 2012-04-17 07:19:47

 
  शीर्षक बहुत अच्छा लगा \"बाबा बनाते चैनल\", इन चैनलों के कारण ही बाबाओ का ज्यादा प्रचार होता है। 
   
 

basant [] - 2012-04-16 05:40:31

 
  निर्मल बाबा ने किसी से जबरदस्ती उगाही नहीं की. निर्मल बाबा के दरबार में तो पढ़े लिखे लोग आते थे. अब वो ही मीनमेख निकाल रहे हैं. गरीब तो वहां गया नहीं. अब सरकार को कोस रहे हैं. ऐसे तो वोट भी ऐसे ही देते हैं फिर रोते हैं. 
   
 

durwesh [vichar2000@gmail.com] bhopal - 2012-04-16 04:27:46

 
  बाबा ही क्यों!....इन दिनों टीवी पर निर्मल बाबा छाये हुये है. पहले मीडिया ने उन्हे आध्यात्मिक गुरू बनाया और अब उन्हे जालसाज, धोखेबाज, धंधेबाज, और ना जाने किस किस विभूतियों से नवाजा जा रहा है. मैंने भी इनकी बातें टीवी पर बहुत बार सुनी है. अपने भक्तों को जिस तरह की राय मशविरा देते थे उससे मेरा मनोरंजन होता था. मै यह जानने की भरपूर कोशिश करता कि इस व्यक्ति मे ऐसा क्या है कि हजारों लोग दो से पांच हजार रूपये देकर उसके समागम मे जाना चाहते है.
कभी मुझे उस आम दुखी आदमी पर तरस आता जो उनके दरबार में हाथ जोडे खडा है और कभी मुझे मीडिया पर गुस्सा आता की क्या अब उसके पास दिखाने को एसे लोग ही बचे है. पर जब से मीडिया अब बाबा की खबर लेने पर तुली है तो मुझे बाबा पर तरस आ रहा है. और मिडिया पर गुस्सा क्योंकि इतना सब कुछ हो जाने जाने के बाद मीडिया पर किसी ने उंगली नही उठाइ यह वही मीडिया है जिस ने इस बाबा को हीरो बनाया अब वही उसकी बुराई कर रहा है.
बाबा जो कुछ् भी करता था ताल ठोककर सब के सामने करता था और जो करता था उसका टेली कास्ट करता था. ऐसा उसने एक दिन नही दो दिन नही ......मुझे नही मालुम कितने दिन से यह सब चल रहा था...अब ऐसा क्या हो गया कि बाबा रातोंरात मीडिया का विलेन बन गया....मुझे तो लगता है कि कोइ है जो मीडिया और बाबा के उपर है...शायद उसकी बाबा से खटपट हो गई और् उसके इशारे से अब बाबा का बेंड बजा रहा है. ऐसे हजारो हैं जो इस देश में धर्म और कर्म कांडो के नाम पर उल्लू सीधा कर रहे हैं. जो लोग आज निर्मल बाबा के पीछे लगे हैं क्या उन्हें वो हजारो नजर नही आ रहे...या फिर ये सब भी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं. जहां तक निर्मल बाबा का सवाल है, उसे मैं ऐसे दूध वाले की तरह देख रहा हू जो दूध में पानी मिलाता है, उनका क्या जो दूध के नाम पर जहर बेच रहे हैं...और आये दिन धर्म और कर्म के नाम पर हजारों का खून बहाने से भी नही चूकते.
जहां तक निर्मल बाबा का सवाल है, उसके समागम में जाने के लिये लोगों ने पैसा दिया था....मुझे अब तक एक भी ऐसा नही मिला, जिसने कहा हो कि उससे जबरजस्ती पैसा ले लिया है. या फिर पैसा लेकर उसे समागम मे शामिल नही होने दिया. पैसा समागम में जाने की फीस थी .....अपना दुख जाहिर करने की फीस थी....वही फीस जो एक डाक्टर वसूल करता है. और जिस फीस के ना मिलने पर इस देश में नर्सिंग होम बीमार को मरने के लिये छोड देते है.
जितने भी प्रोग्राम देखे, उसमें बाबा ने दुख सुनकर उन्हें दिलासा दी और उम्मीद की एक किरण दिखाई और उनके द्वारा बताया उपाय....अगर एक मनोवैज्ञानिक की दृष्टि से देखोगे तो उसके उपाय मे आपको अर्थ दिखाई देगा...वही अर्थ जो मंदिर मे दिया जलाने का होता है...या फिर अगरबत्ती या फिर घंटा बजाने का.. सवाल यह है कि फिर सिर्फ निर्मल बाबा ही क्यों?.....मुझे तो लगता है कि पूरा मामला मुनाफे की हिदस्सेदारी का है.
पिछले एक हफ्ते से न्यूज चैनलों पर एक्सपर्ट बहस पर नजर है. उनमें अधिकतर का कहना है कि अगर बाबा ने ट्र्स्ट बनाया होता और दिखाता की इस पैसे से वो अस्पताल बनवा रहा है या फिर स्कूल कालेज चला रहा है तो उसका किया हुआ सब जायज हो जाता...पर बिचारे से एक गलती हो गई उसने पैसे को अपने या अपनों के नाम से धंधे मे लगा दिया... बाबा अगर एक ट्रस्ट बनाकर यह सब कर देता तो तो सब जायज हो जाता...पर क्या है कि विपरीत काले .... वरना इस देश में तथाकथित मदिंरो और आश्रम में करोडों अरबों की नाजायज संपत्ति कहां कैसे इस्तेमाल हो रही है, उस पर इनकी कभी नजर नही गई.
मुझे मीडिया के लिये बाबा ख्डग सिंह की कहानी याद आ रही है....हे मीडिया आप कुछ भी करो पर ऐसा कुछ ना करो कि आम जनता का भरोसा आप पर से टूट जाये...क्योंकि जो लोग बाबा के उपायों पर बहस कर रहे हैं..उन्हें मीडिया पर दिन रात चलने वाले उन विज्ञापनों पर भी नजर डालनी होगी ...जो लोगो को जिंदगी को रातों रात बदलने का दावा कर, अपना माल बेच रहे है और आम जनाता को हर रोज लाखों करोडों का चूना लगा रहे है. मजेदार बात तो यह रही कि मीडिया पर बाबा का कोर्ट मार्शल हो रहा है और उस पर भी मीडिया को करोडो के विज्ञापन मिल रहे है...और यही तथाकथित मीडिया बिना यह देखे या जाने की इन विज्ञापनों में आम जनता को क्या परोसा जा रहा है, बेधडक दिखाया जा रहा है...और अगर ऐसा है तो बाबा ही क्यों!<
 
   
 

dilip das [dasbabudhanbad@rediffmail.com] dhanbad - 2012-04-15 17:49:37

 
  निर्मल बाबा एक बेहतर उदाहरण हैं देश की व्यवस्था को समझने के लिए। अधिक से अधिक पूंजी कमाना ही जब मीडिया समूहों का लक्ष्य होगा और मुंहमांगी कीमत देकर कुछ भी दिखाने की आजादी होगी तो आगे और भी बहुत कुछ हमें देखने-सुनने को मिलेगा। कारोबारी का धर्म मुनाफा कमाना होता है। इसलिए एक दुकानदार और चैनल के सीइओ की मानसिकता में फर्क कैसे संभव है। बाजार के इसी स्वभाव का लाभ निर्मल समेत अन्य फर्जी बाबाओं को मिल रहा है। बाजार बनने के कारण ही आज समाज को ठगने वाले सूचना माध्यमों का बेखौफ उपयोग कर मालामाल हो रहे हैं। आपकी चिंता पूरे समाज की चिंता बने यही अपेक्षा है।  
   
 

kamak [kamalkishor.cmdpl@gmail.com] dehradun - 2012-04-14 12:20:55

 
  निर्मल बाबा के बारे में आपकी राय मुझे बहुत अच्छी लगी. 
   
 

karambeer yadav [rohitkarma73@gmail.com] khagaria - 2012-04-14 01:51:20

 
  सारे लोग गलत हैं जो सब पहले से जानते थे इनकी प्लानिंग के बारे में, सभी मिले हुए हैं, अब जब परदाफाश होने लगा तो ये सभी अपनी सफाई देने लगे, चाहे वो कोई बड़े पॉलिटिशियन कहे नहीं हो, अगर एक बार हमें मीडिया में बोलने का मौका मिले तो मैं, बताउंगा.  
   
 

naina [nainan1990@gmail.com] raipur - 2012-04-13 14:18:10

 
  जब कभी धर्म पर ब्राह्मणों की मोनोपोली को कोई तोड़ने की कोशिश करता है तो सारे ब्राह्मण बुद्धिजीवी एक साथ सारे साधनों के साथ मिलकर अपने वर्चस्व से बचने सभी तरीकों के साथ मैदान में दूसरे को गलत साबित करने में जुट जाते है. निर्मल बाबा मेरे ख्याल से दूसरे बाबाओं की तुलना में ठीक है लेकिन वो ब्राह्मण नहीं... ? इसीलिए इतनी बहस और रिसर्च है मीडिया में. कभी आस्था चैनल और दूसरे धार्मिक चैनल के बाबाओं में कहीं अंधविश्वास नही दिखता है, क्यों ? क्योंकि उसने मानने वाले बड़े पूंजीपति होते हैं? क्या तर्क है. कैसे, किसी भी गैर ब्राह्मण को अंधविश्वासी साबित करने का. जरा इसके बारे में भी सोचिए.  
   
 

deepak [saiastro@yahoo.com] - 2012-04-12 17:22:16

 
  सच कहा मैं भी टीवी एस्ट्रोलॉजर हूं, मैं भी जानता हूं.  
   
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