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अमन की असली दुआ

बहस

 

अमन की असली दुआ

समर


पाकिस्तान के राष्ट्रपति का भारत आगमन कभी भी बड़ी खबर होती है, पर अगर वह उपमहाद्वीप में सूफी इस्लाम की सबसे पाक जगहों में से एक पर आयें तो बेशक खबर और बड़ी हो जाती है. आखिर को अमन, भाईचारे और हकीकी मुहब्बत की नींव पर खड़ा सूफी इस्लाम ही है, जो इस्लामिक चरमपंथियों और उनके जेहाद के रास्ते में सबसे बड़ा रोड़ा है.

आसिफ अली जरदारी


इसीलिये, आसिफ अली जरदारी साहब का अजमेर शरीफ आकर जियारत करना न केवल अमन की राह में उठा एक कदम है बल्कि वहाबी-तबलीगी कट्टरपंथियों की पाकिस्तान को अपने रंग में रंगने की साजिशों को सीधी चुनौती भी है.

अफ़सोस मगर इस बात का है कि इस खबर के महत्व के चलते एक दूसरी बड़ी खबर दब-सी गयी, वह खबर जिसमे दुनिया के सबसे ऊंचे और मानवरहित युद्धक्षेत्र में 100 से ज्यादा पाकिस्तानी सिपाहियों के बर्फबारी में फंसकर मारे जाने का जिक्र था. यह कोई पहली बार नहीं हुआ है, न मरने वाले हमेशा पाकिस्तानी ही होते हैं. अभी पिछले साल भारतीय सेना के बीसियों जवान भीषण बर्फबारी में फंसकर मारे गए थे. सियाचिन के ग्लेशियरों की भौगोलिक और जलवायुगत दुश्वारियों के चलते इन मारे गए जवानों में से बहुतेरों के मृत शरीर भी नहीं मिल पाते, और यह अभागे सैनिक अपने अपने धर्मों के मुताबिक़ जरूरी अंतिम संस्कार से भी महरूम रह जाते हैं.

तथ्यों की निगाह में देखें तो मोटे तौर पर 1980 तक सियाचिन पर दोनों देशों के दावे के बावजूद कब्ज़ा किसी का नहीं था, न ही कभी दोनों ने मानव जिजीविषा और सामर्थ्य को चुनौती देने वाले इन ग्लेशियरों पर सैन्य चौकियां स्थापित करने की कोशिश की थी. फिर 1980 के दशक की शुरुआत में पाकिस्तान द्वारा सियाचीन में सैन्य चौकियां स्थापित करने की कोशिशों की जानकारी के बाद भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन मेघदूत’ के तहत सियाचिन के ज्यादातर हिस्से पर कब्जा कर लिया. आज की स्थिति यह है कि सियाचिन के लगभग दो तिहाई हिस्से पर भारत काबिज है जबकि इसका एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान के पास है.

स्थिति कि भयावहता का अनुमान लगाने के लिए सिर्फ इतना जान लेना काफी होगा कि 1984 से लेकर 2012 के बीच बिना किसी आपसी झड़प या गोलीबारी के भारत और पाकिस्तान के 8000 से ज्यादा जवान सियाचिन में बर्फबारी से लेकर अन्य प्राकृतिक आपदाओं का शिकार हो चुके हैं. इसको ऐसे भी समझा जा सकता है कि यहाँ हर तीसरे दिन एक पाकिस्तानी सिपाही और हर दूसरे दिन एक भारतीय सिपाही की मौत होती है.

इसमें अगर घायल होने वाले सैनिकों से लेकर स्थायी अपंगता तक का शिकार हो जाने वाले सैनिकों की संख्या जोड़ दें तो 20000 फीट से ऊपर लड़ी जा रही इस लड़ाई की आर्थिक और मानवीय लागत अविश्वसनीय लगने लगती है. यह स्थिति तब है जब आंकड़ों के मुताबिक़ भारत सरकार सियाचिन पर हर दिन 5 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च करती है और बेशक पाकिस्तान का खर्च भी कुछ ऐसा ही होता होगा.

सियाचिन में बेवजह मारे जा रहे ये सिपाही अपने-अपने देश के झंडों के रंग से अलग गरीब परिवारों की रोटी का इकलौता सहारा भी हैं. फिर इनके मरने की, इनके कष्टों की खबर हम तक क्यों नहीं पंहुचती? सवाल यह भी है कि उन हालात में जब सीमा के दोनों तरफ लोग भूख से मर रहे हों तब एक निर्जन और मानव निवास की सम्भावनाओं से रहित एक क्षेत्र पर कब्जे की झूठी लड़ाई में दोनों मुल्क अपने जवानों और धन दोनों को ऐसे बलि चढा सकते हैं?

सीधे-सीधे कहें तो यह राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा करने में जा रही जाने नहीं हैं, सियाचिन से होकर भारत में घुसपैठ करने की आज तक कोई कोशिश कभी नहीं की गयी है. भौगोलिक परिस्थितियों के चलते की भी नहीं जा सकती. इसके उलट, सियाचिन पर कब्जा बनाए रखकर भारत को भी कुछ खास मिलने वाला नहीं है क्योंकि सियाचिन ग्लेशियर पर आधारित नदियाँ मूल रूप में पाकिस्तानी क्षेत्रों में बहती हैं और उनका पंजाब की पांचों नदी-व्यवस्थाओं से कोई विशेष रिश्ता नहीं है. फिर एक ऐसे दुर्गम इलाके पर कब्ज़ा जमाए रखने के लिए दोनों तरफ के सैनिकों की बलि चढाना सिर्फ निर्मम नहीं लगभग आपराधिक भी है.

आसिफ अली ज़रदारी साहब ने ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर दोनों मुल्कों में अमन की दुआ माँगी है. इस अमन की शुरुआत सियाचिन के असैन्यीकरण से की जा सकती है. सियाचिन में 1980 के पहले की स्थिति बहाल की जानी चाहिए जब यहाँ किसी पक्ष की कोई सैन्य उपस्थिति नहीं थी. यही ठीक भी होगा क्योंकि वैसे भी यहाँ से दोनो मुल्कों को अपने जियालों की लाशों से अलग कुछ हासिल नहीं होता. फिर किसी भी क्षेत्र के असैन्यीकरण से इन दोनों पड़ोसी देशों में परस्पर विश्वास बहाल करने में मदद भी मिलेगी और दोनों ही तरफ बैठे उन्मादियों के खिलाफ यह एक बड़ी जीत भी होगी. फिर, यह एक बेवजह और बेमानी लड़ाई में कुदरत के हाथों मारे गए सैनिकों को हमारी श्रद्धांजलि भी होगी.


14.04.2012, 08.46 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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