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सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

स्मरण

 

सुनामी की लहरों में श्रीलंका की खेती

सुनील शर्मा कोलंबो से लौटकर


करीब 25 वर्षों तक बहुसंख्यक सिंहला और अल्पसंख्यक तमिलों के बीच चले जातीय संघर्ष और युद्ध में करीब 80 हजार लोगों की मौत के बाद पिछले 3 सालों में श्रीलंका में विकास सबसे बड़ा मुद्दा है यहां विकास की शुरुआत अब हो रही है. पर विकास किसका हो रहा है, यह एक बड़ा सवाल है. ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास से इतर शहर की सड़कें बनाई जा रही हैं. किसानों को अधिक से अधिक सुविधाएं मुहैया कराने की जगह सुरक्षा पर धन खर्च किए जा रहे हैं. किसान जलवायु परिवर्तन से जूझ रहे हैं और देश के लगभग अधिकांश इलाकों में चीन की बनाई चमचमाती सड़कों का जाल बिछ चुका है.

श्रीलंका में खेती

तमिल विद्रोह को कुचलने का दावा करने वाली श्रीलंकाई सरकार के जेहन में देश के विकास के लिए कौन-कौन-सी प्राथमिकताएं हैं, यह विचार करने योग्य है. सड़क, बिजली और पानी तो सभी के लिए आवश्यक हैं लेकिन जो किसान पूरे देश के लिए अन्न उगाता है, उसकी हालत सुधारना क्या सरकारी जिम्मेदारी नहीं है. देश के पश्चिमी और दक्षिणी इलाकों का दौरा करने और तमिलों की सांस्कृतिक राजधानी समझे जाने वाले जाफना और पूर्वी इलाके के कलमुनाई के पत्रकारों से बातचीत में कम से कम यही समझ में आता है.

अमरीकी संस्था इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट के बुलावे पर कोलंबो पहुंचने पर सबसे पहले पत्रकारों से ही आमना-सामना हुआ. सुलोचना, परमेश्वर और ईशान तीनों ही श्रीलंका के अलग—अलग इलाकों में रहते हैं. लेकिन सबके स्वर कमोबेश एक जैसे हैं. वे कहते हैं- “सुनामी का असर किसानों पर साफ तौर पर देखा जा सकता है लेकिन इससे बचाव के उपाय सरकार के पास नहीं हैं. खेतों में खड़ी फसल तबाह हो जाती है और सरकार किसानों को मुआवजा तक नहीं देती. खाने-पीने की चीजें दूसरे देशों से आयात होती हैं, ऐसे में उनकी कीमत बहुत है.”

हालांकि इस मामले में श्रीलंका सरकार की अपनी दलील है. सरकार ने अपनी कृषि वेबसाइट में खेती और किसानों के विकास को लेकर कई बड़े-बड़े दावे किये है, जिसमें धान की खेती को लेकर किये जा रहे प्रयास भी शामिल है. लेकिन जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित होने वाले किसानों को मुआवजा देने और इससे जुड़ी सहुलियतों की जानकारी वेबसाइट से नदारद है.

दक्षिणी श्रीलंका के किसानों को इस बात को लेकर गहरी शिकायत है कि सरकार के एजेंडे में खेती कहीं भी शामिल नहीं है. गाल जिले के हबरादुव से लगे हुये छोटे से गांव हरूमलगोडेन के किसानों की खेती के सामने सबसे बड़ी समस्या जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हुई है. गाल से यह गांव महज 13 किमी की दूरी पर स्थित है.

सुनामी का हमला
सुनामी इनके जीवन पर इतनी गहरी छाप छोड़ता है कि ये इसे भूल पाने में असमर्थ हैं. हिंद महासागर का पानी इनके खेतों की उर्वरता को नष्ट कर देता है और गरीबी व भूखमरी के कारण ये अपने परिवार को गांवों में छोड़कर शहरों में नौकरी करने के लिये मजबूर हो जाते हैं.

गांव के लोगों को दक्षिण एशिया के अलग-अलग इलाकों से आये हुये पत्रकारों के बारे में पहले से ही बताया जा चुका है. गांव के डेढ़ दर्जन किसान हमारा एक बौद्ध विहार में इंतजार कर रहे हैं और जब हम वहां पहुंचे तो उन्होंने अपनी संस्कृति के अनुसार हमारा स्वागत किया.

नमल परेरा और रंगा इंटरनेशनल सेंटर फॉर जर्नलिस्ट से जुड़े हैं और वे इस इलाके के किसानों के बीच आते-जाते रहते हैं. उन्होंने सबसे पहले किसानों और हमारा आपस में परिचय कराया. एक साथ इतने शहरी लोगों को देखकर किसानों को अपना परिचय देने में झिझक हो रही थी और नये देश और अलग भाषा के किसानों के मध्य शुरु में थोड़ी असहजता थी लेकिन जल्दी ही सब कुछ सामान्य हो गया. फिर शुरु हुआ हमारे दुभाषिये साथी रोहन के सहारे संवाद का सिलसिला

अपनी मातृभाषा सिंहली में रोहिता ने जो कुछ भी बताया उसका सार यहीं था कि वे खेती से परेशान है और सरकार से नाराज. क्योंकि सरकार उन्हें कोई सहायता नहीं देती. उनके बाप-दादा के पास पर्याप्त जमीन थी लेकिन गरीबी के कारण जमीन बेचनी पड़ी और अब वे भूमिहीन हैं. खेती के लिए वे अन्य किसानों की जमीन ठेके पर लेते हैं लेकिन असमय बारिश और सुनामी के कारण उन्हें हमेशा नुकसान ही होता है.पिछले महीने की 11 तारीख को आई सुनामी का अनुभव अभी ताजा ही है.

रोहिता एक के बाद सरकार की नीतियों की तार्किक तरीके से आलोचना करते हैं. वे कहते हैं- “बीज, उर्वरक और कीटनाशक बाजार से खरीदना पड़ता है. सरकारी दुकानों में इसका वितरण कम कीमत पर नहीं होता. इसलिए कोई सब्सिडी नहीं मिलती. सरकारी बैंकों से कर्ज लेने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि थोड़ा रूपया कर्ज लेने पर भी महीनों लग जाते हैं और उस पर भी बैंक में जमानत राशि जमा करनी पड़ती है. लिहाजा हमें सूद पर रूपया लेना पड़ता है. पंद्रह फीसदी में सूद पर रुपया कर्ज लेकर खेती करनी पड़ती है. चूंकि हम धान के साथ ही सब्जियों की खेती करते हैं, इसलिए कर्ज लेना जरूरी हो जाता है क्योंकि सब्जियां उगाने में लागत अधिक आती है. लेकिन अगर मौसम का मिजाज गड़बड़ाया तो हमारी सारी मेहनत बेकार चली जाती है.”

सुलेमान सिल्वा की उम्र सत्तर पार हैं. वहां आये हुए सभी किसानों में वे सबसे बुर्जुग और आदरणीय है. वे काफी खुशमिजाज और मिलनसार भी हैं. वे अपने अनुभव का निचोड़ बांटते हैं- ''बीस साल पहले यहां खेती करना आसान था,लेकिन जलवायु परिवर्तन का असर साफ तौर पर देखा जा सकता है. अभी इसी महीने आई सुनामी के कारण हमारे खेतों में पानी भर गया और सब्जियां खराब हो गईं. समुद्र का खारा पानी सब्जियों को कुछ ही घंटे में गला देता है.''
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