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माओवादी सिनी सय की कहानी

विचार

 

माओवादी सिनी सय की कहानी

सारदा लहांगीर


सात मई को मेरे एक पत्रकार मित्र ने सूचना दी कि जाजपुर पुलिस ने एक बुजुर्ग महिला माओवादी को अस्पताल से गिरफ्तार किया है. नाम है उसका सिनी सय. नाम सुनकर मैं चौंकी. मैंने झटपट अपना कैमरा निकाला ओर जाजपुर की ओर निकल पड़ी. पिछले कई सालों से सिनी सय को मैं ढूढ रही थी पर उसका कोई अता-पता नहीं था.

सिनी सय


रास्ते भर मैं सिनी सय के बारे में सोचती रही. पचपन साल की सिनी सय 1997 में जाजपुर जिले के गोबरघाटी गांव की सरपंच के तौर पर जानी जाती थी. इस तेज-तर्रार आदिवासी महिला सरपंच को लोग उसके व्यवहार कुशलता के कारण जानते थे. लेकिन यह सिनी सय का अधूरा परिचय है.

2006 में कलिंगनगर में टाटा कंपनी के खिलाफ जब आदिवासियों का आंदोलन शुरु हुआ तो इस विस्थापन विरोधी आंदोलन में सिनी सय ने अपनी सक्रिय भूमिका निभाई थी लेकिन इस सक्रियता की कीमत सिनी सय ने जिस रुप में चुकाई वह दहला देने वाला है. टाटा कंपनी की सुरक्षा और आदिवासियों को बेदखल करने की कोशिश ने पुलिस ने जिन चौदह आदिवासियों को गोलियों से भून दिया, उनमें सिनी सय का 25 साल का जवान बेटा भगवान सय भी शामिल था. जिस जवान बेटे को लेकर सिनी सय इस आंदोलन में गई थी, वहां से उनके बेटे की हाथ कटी हुई लाश घर लौटी.

सिनी सय के बारे में सोचते-सोचते मैं करीब साढे पांच बजे जाजपुर अस्पताल पहुंची. जाहिर है, वहां पुलिस का कड़ा पहरा था. आने-जाने वालों पर प्रतिबंध था. खासकर मीडिया पर. किसी तरह पुलिस वालों को मैंने राजी किया और दो मिनट के निर्देश के साथ मैं सिनी सय के कमरे में जा पहुंची.

अस्पताल के बिस्तर पर एक साधारण-सी सूती साड़ी में सिनी सय लेटी हुई थी. मुझे पहचान नहीं पाई. मैंने याद दिलाया तो सबसे पहले मेरा हाल-चाल पूछा. फिर बहुत सुस्त और धीमी आवाज में उसने कहा-‘‘मेरी तबियत आजकल ठीक नहीं रहती, मलेरिया हुआ है, जिसके ईलाज के लिए मैं यहां भर्ती हुई थी और तभी से पुलिस मेरे पीछे पड़ी हुई है.’’

सिनी सय बहुत कमजोर दिख रही थी लेकिन उसकी बातचीत से ऐसा लग रहा था, जैसे मैं उसी पुरानी सिनी सय से मिल रही हूं. उसका बोलना जारी था-’’मुझे जेल जाने का कोई दुख नहीं है. और ना ही मैं इस बात की परवाह करती हूं कि मेरे बारे में कोई क्या सोचता है. मैंने अपने लिए जो रास्ता चुना है, उसमें मुझे इस बात की संतुष्टि है कि अपने मरे हुए बेटे को मैं इंसाफ दिलाने की कोशिश कर रही हूं.’’

मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि उससे इस हालत में क्या सवाल करुं. मेरी चुप्पी को देखकर उसने फिर से कहना शुरु किया- “आप जानती है कि जमीन की लड़ाई, अपने हक की लड़ाई लड़ते हुए मेरे बेटे ने अपने सीने पर पुलिस की गोली खाई. मेरे सामने उसे न सिर्फ बेरहमी से मारा गया बल्कि बाद में उसकी लाश के भी टुकड़े कर दिए गए. एक मां यह कैसे बर्दाश्त करती कि जिस बेटे को मैंने नौ महीने अपनी कोख में रखकर जन्म दिया, उसी बेटे को पुलिस वाले बेरहमी से एक लाश में बदल दें.’’

कमरे की बाहर की ओर बैठी पुलिस की तरफ इशारा करते हुए उसने फिर कहा-’’इन्होंने बड़ी कंपनियों की खातिर हमें अपने घर, अपनी जमीन, यहां तक की हमारी रोजी-रोटी से भी बेदखल कर दिया. इनकी सहायता, इनका पैसा क्या मुझे मेरा बेटा वापस लौटा सकता है? शायद नहीं, हमारे सारे दर्द, सारी तकलीफें और घुटन भरी जिंदगी की जिम्मेवार सरकार है. और मैं उसे कभी माफ नहीं कर सकती. अपने लोगों के हक के लिए लड़ना मैं नहीं छोड़ूंगी.’’ यह सब कुछ कहते हुए उसकी आंखों में मुझे एक अजीब सा आत्मविश्वास दिखाई दिया.

मैं उससे कुछ और बात कर पाती कि एक पुलिस वाले ने मुझे बाहर जाने को कहा. बाहर आकर मैं फिर से एक बार उससे मिलने की उम्मीद में बैठी रही. पत्रकार हूं, मन में तरह-तरह के सवाल थे. पर पुलिस ने हमें मिलने की इजाजत नहीं दी. मैं अपने घर भुवनेश्वर के लिए निकल पड़ी.

सिनी सय से मेरी पहली मुलाकात दो जनवरी 2006 को हुई थी. दिन के दो बजे थे और हमें खबर मिली कि कलिंगनगर इलाके में पुलिस और आदिवासियों के बीच मुठभेड़ हो रही है. पुलिस की गोली से कुछ आदिवासियों के मरने की भी खबरें आ रही थी. मेरे साथ-साथ कुछ और पत्रकार साथी अपनी कैमरा टीम के साथ कलिंगनगर की ओर निकल पड़े. लगभग ढाई से तीन घंटे के बाद जब हम घटनास्थल पर पहुंचे तो हमने देखा कि सड़क के एक तरफ अपनी बंदूकें लिए पुलिस खड़ी थी और दूसरी तरफ अपना परंपरागत हथियार लिए आदिवासी. पुलिस वालों ने हमें सड़क पार करके दूसरी तरफ जाने से मना किया. लेकिन हम गांव की ओर बढ़ गए.

अंधेरा घिर चुका था और चारों तरफ अलग-अलग गुटों में सैकड़ों की संख्या में आदिवासी जगह-जगह खड़े थे. कुछ आदिवासियों ने हमें घेर लिया और वे हमें वहां से चले जाने को कहने लगे. वो इतने गुस्से में थे कि कुछ कहना-सुनना नहीं चाह रहे थे. आदिवासियों का एक दल गांव में पुलिस को घुसने से रोक रहा था तो कुछ और लोग इधर-उधर मरे पडे़ आदिवसियों की लाशों को इकट्ठा कर रहे थे.

कलिंगनगर में टाटा कंपनी अपनी परियोजना के लिए आदिवासियों की जमीन पर कब्जा चाहती थी, जिसका आदिवासी विरोध कर रहे थे. हजारों आदिवासी अपने विस्थापित होने के खिलाफ थे जिसे लेकर यह संघर्ष हुआ था. टाटा कंपनी के साथ एमओयू कर चुकी सरकार का कहना था कि कंपनी के आने से विकास होगा. लेकिन आदिवासी अपने जल, जंगल, जमीन को छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

SHIV SHANKAR SARTHI [sarthishivshankar8@gmail.com] RAIPUR - 2012-06-04 04:42:28

 
  क्या छत्तीसगढ़ में यही सब नहीं हो रहा है? 
   
 

अनुराधा [] - 2012-05-26 13:28:53

 
  इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती कि सिनी ने वही किया है जो कोई भी अपनी उत्तरजीविता के लिए सहज रूप से करता है। विस्थापन का दर्द मैं भी समझती हूं। अपने घर, जमीन, आजीविका, परिवार से दूर हटा दिया जाना, वह भी किन्हीं पूंजिपतियों के आर्थिक हित के लिए, हमेशा गलत कहा जाएगा। कथित \\\'जनहित\\\' के लिए गरीबों का जीवन उजाड़ दिया जाना किसी लोकतंत्र का हिस्सा नहीं हो सकता। 
   
 

raghwendra sahu [raghwendrasahu@gmail.com] durg - 2012-05-25 19:35:14

 
  अपने हक की लडाई के लिए सिनी ने बहुत बडी कीमत चुकाई है.....हमारे देश में पुलिस और प्रशासन जब तक कारपोरेट घरानों के लिए आदिवासियों को उनके जल, जंगल और जमीन से अलग करने की साजिश रचते रहेंगे तब तक लोग विद्रोह करेंगे ही..........सरकार तथा पुलिस के लिए बहुत आसान है कि ऐसे विद्रोहियों को नक्सली बताकर जेल में बंद कर दो.......ऐसे ढेरों उदाहरण हैं लेकिन पुलिस और सरकार दोनों को ही अपना रुख बदलना होगा...... नहीं तो ऐसे ही सिनी साय जैसी महिलाएं अपना विरोध दर्ज कराते रहेंगे और उनके तरीके को जायज ही ठहाराया जाएगा..... क्योंकि सराकार और पुलिस दोनों ने ही जो संविधान की दुहाई देते नहीं थकती सिनी साय के साथ ही उन आदिवासियों को उनके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करके भी सफेदपोश बने हुए हैं वहीं सिनी साय माओवादी ठहरा दिया .....कहां इंसाफ है ये...इसका जवाब कौन देगा..... 
   
 

DEEPAK SHARMA [] BARGARH [ORISSA] - 2012-05-25 12:41:45

 
  मां की ममता अनमोल है. सिनी साय ने जो किया, सही किया है. यह कहानी दिल दहलाने वाली है. 
   
 

Ritika Kanchan Lahangir [ritikakanchan19@gmail.com] Bargarh, Odisha - 2012-05-25 08:21:33

 
  When for the first time I came across the issue of Kalinganagar I never thought things to be that vicious. But after going through this article I realised how far away we are from the real troubles of people oppressed by our own system,living in town and metros.What Sini did and is doing, is thoroughly commendable.But I want to thank Mrs Sarada Lahangir who provide Sini with a substantial voice in her struggle. 
   
 

NIKH [] P - 2012-05-24 04:48:34

 
  The plight of Adivashis and other people left behind in the race of material is actually the result of apathy from people like us. We keep writing blogs and comments, but will never come out in support of these marginal people. On ground most of us who have something to boast will support the oppresors, because we feel close the the ruling class/corporates or we are afraid of them. In private everybody says ANNA is doing great job but in public we don\'t want to come out in support. 
   
 

Pramod Kumar [pramod.guruji@gmail.com] Baja California,Mexico - 2012-05-22 21:17:32

 
  यह निश्चय कर पाना तो बिल्कुल ही मुश्किल है कि सिनी जी सही हैं या गलत लेकिन अपने हक के लिये आवाज उठाना कभी गलत नहीं हो सकता.
इस सुंदर लेख के लिये बहुत धन्यबाद .
 
   
 

Abhishek [abhi_tkg@rediffmail.com] Tikamgarh (Madhya Pradesh) - 2012-05-22 06:35:32

 
  सिनी सय की कहानी पढ़ कर सचमुच दिल दहल गया. यदि लोकतंत्र में अपने हक की लड़ाई के लिये अपनों से बिछड़ना पड़े और अत्याचार सहना पड़े तो ऐसी लोकतांत्रिक व्यवस्था की समीक्षा ज़रुरी है. सिनी सय के संघर्ष को इस रिपोर्ट के माध्यम से दुनिया के सामने लाने के लिये आपका बहुत धन्यवाद. 
   
 

sajjan [] Cuttack - 2012-05-21 10:57:44

 
  The un limited greed of corporate & un necessary,unlimited Govt support give birth to un limited oppression. 
   
 

Banshi lal parmar [parmar_photoes@rediffmail.com] suwasra 458-888 - 2012-05-21 06:39:47

 
  सम्मानीय आपका पूरा लेख पढ़ा, बड़ी मार्मिक घटना है सिनी जी की. आदिवासी जिनका इस देश की जमीन पर पहला हक है, उनको पूंजीपतियों के हित के लिए जड़ों से उखाड़ा जा रहा है. आदिवासियों की अपनी ecology है. उससे विस्थापित करना कितना पीड़ादायक है. दुखद यह है कि आदिवासियों के प्रति दुष्प्रचार किया जाता है. आपके इस सदप्रयास के लिए आभार. 
   
 

Gautam Sarkar [gautamsarkarin@gmail.com] Bhagalpur-Bihar - 2012-05-21 05:52:16

 
  मुझे काफी आश्चर्य लगता है कि आखिर पॉलिसी मेकर औऱ कितने दिन इस तरह की घटनाओं पर चुप्पी साध कर बैठे रहेंगे ! इससे तो ब्रिटिश अच्छे थे, जो सीधे बात करते थे. अब सवाल ये है कि क्या आजाद भारत में कानून, प्रशासन,पुलिस और संविधान क्या टाटा जैसे घरानों और सत्ता के कुछ दलालों भर के लिये रह गया है? कौन सिनी सय की मदद करेगा ? 
   
 

AWADHESH KUMAR [awadhesh_1954@YAHOO.COM] MUZAFFARPUR - 2012-05-19 16:31:18

 
  सिनी सय एक बहादुर महिला है. कलिंगनगर जैसी लड़ाईयों का दमन किया जाता है. इसीलिए गरीब आदिवासी और दलित माओवादियों के पास जा रहे हैं. सरकार को भी नागरिक अधिकारों और कानून को कोई परवाह नहीं है. माओवादियों को जनता के बीच आकर लोकतांत्रिक तरीकों से लीडरशिप करना चाहिए. तभी माओवादियों को भी जनता की असली position का पता चल पाएगा. उन्हें भी ये बताना होगा कि जल, जंगल, जमीन के सवाल को कैसे हल करेंगे. छत्तीसगढ़ में तो सरकार और माओवादी कानून को हाथ में लिए हुए हैं. यहां नागरिक अधिकार संगठनों की जवाबदेही काफी बढ़ जाती है. देश के सभी जनांदोलनों को मिलकर किसानों अदिवासियों ओर असंगठित मजदूरों की समस्या के लिए लड़ना पड़ेगा. तभी गाँव-गाँवों में सिनी सय जैसी महिलाएं नेता बन पाएंगी. 
   
 

Samir Ranjan [ranjansamir4@gmail.com] Cuttack - 2012-05-19 14:05:52

 
  एक 60 साल की बुजुर्ग महिला जो अपनी जमीन के लिए टाटा कंपनी के खिलाफ लड़ रही थी वो कोई गुनाह नहीं है. अपनी मिट्टी के लिए, अपने अधिकार के लिए आवाज़ उठाना कोई बुरी बात नहीं है बल्कि संवैधानिक अधिकार है, कंपनी के स्वार्थ के लिए सिनी सय जी को बलि का बकरा बनाना ये कहां का न्याय है? उन्हें तुरंत जेल से मुक्त करें.  
   
 

Lenin Kumar [janabadi@rediffmail.com] bhubaneswar - 2012-05-19 10:06:31

 
  सिनी सही थी और रहेगी. जनांदोलन के इतिहास में एक प्रेरणा का नाम है सिनी सय.वैसे कुछ करीब से मैंने उन्हें देखा है, जाना है. उन पर जब पुलिस अत्याचार बढ़ रहा था तब इसके खिलाफ हमने भुवनेश्वर में एक प्रेस कांफ्रेस किया था. हालांकि वो कांफ्रेस में आ नहीं पाई थीं. हमने उनके साथ 20-30 दिन गुजारे हैं. उनके हाथ ही हमारी साहित्यिक पत्रिका निशान लोकार्पित हुआ था. उनके स्नेह, श्रद्धा को मैं भूल नहीं पाया हूं. लोग अगर उन्हें उग्रवादी कहते हैं तो कहें लेकिन आने वाला कल उन्हें सलान करेगा. उनके संघर्ष को सलाम. 
   
 

Biju Toppo [biju.toppo@gmail.com] New Delhi - 2012-05-18 19:31:26

 
  हमने जो समाज बनाया है, उसमें विरोध की जगह खत्म करते जा रहे हैं. ऐसे में अगर सिनी सय जैसी महिलायें बंदूक उठा रही हैं तो उसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिये. दुर्भाग्य ये है कि इस हिंसा को बढ़ाने के लिये कारपोरेट के साथ-साथ हमारी सरकार भी बराबर की जिम्मेवार है. एक दिल को छूने वाली रिपोर्ट के लिये सारदा जी को धन्यवाद और रविवार को भी साधुवाद. 
   
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