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सुनो शाहरुख खान

बाईलाइन

 

सुनो शाहरुख खान

एम जे अकबर


पैसा अनोखी कामोत्तेजना पैदा करता है. यह जिद को मजबूत और दिमाग को कोमल बना देता है. जबकि, हकीकत यह है कि इसका उलटा अधिक फायदेमंद है. इस पैसे में प्रसिद्धि को जोड़ देने से जो कॉकटेल बनता है, वह इतना मादक हो जाता है कि यह क्षणभर में चेहरे पर दिखने लगता है.

शाहरुख खान

 
पहचान हर सेलिब्रिटी की चाहत होती है और यह व्यक्तिपूजक प्रशंसकों द्वारा आसानी से मुहैया करा दी जाती है. ऐसे में चिड़चिड़ापन बस कदम भर की दूरी पर होता है, क्योंकि सेलिब्रिटी किसी किस्म के अपराध को स्वीकार करना अपने स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह समझते हैं. हालांकि, सभी सुपरस्टार इस सिंड्रोम से ग्रस्त नहीं होते, लेकिन बहुत कम ही ऐसे होते हैं जो कभी-कभार पड़ने वाले सनक के इस दौरे से बच निकलें.

मैं शाहरुख खान से दो बार मिल चुका हूं. एक मुलाकात हाल ही में हुई और संभवत: तीसरी बार चलते-चलते. यह नजदीकी का कोई सबूत नहीं है. परिचित होने की बात तो दूर है. लेकिन उनके बारे में जो थोड़ा मैं जानता हूं, उसे पहली मुलाकात ने पुख्ता कर दिया था. वे बेहद हंसमुख और प्रतिभावान व्यक्ति हैं. उनका सबसे बड़ा गुण एक बेहतरीन सेंस ऑफ ह्यूमर है जिसे वे अपनी मारक टिप्पणियों से और धारदार बना देते हैं.

वे संबंधों को नुकसान पहुंचाए बिना दुनिया पर हंस सकते हैं, क्योंकि वे खुद उस दुनिया में शामिल हैं. उनमें आसमान के सितारे जैसा न कोई अभिजात्य है, न ही बातचीत का वैसा तरीका. वे भले आसमान में हों, अपने पैर जमीन पर टिकाये रखते हैं.

वानखेड़े स्टेडियम में उनके आपा खोने की कई तरह से व्याख्या की जायेगी. इसका एक महत्वपूर्ण कारण तनाव हो सकता है. वे अब युवा नहीं हैं. परदे पर उन्होंने पहला गाना 25 साल पहले गाया होगा. ऐसे अभिनेता के लिए जिसने अपने पूजने वालों से चिर युवा होने का वादा किया हो, बढ़ती उम्र सबसे भयानक सच्चई के समान होती है. अपनी उम्र पर मुलम्मा चढ़ाने का काम अपने आप को सजा देने के समान है. यह सिर्फ इस कारण कम कष्टकारक नहीं हो जाता कि इसका चयन खुद हमने ही किया है. शरीर को प्राकृतिक झुर्रियों से बचाने के लिए आप इसके साथ कठोरता बरतते हैं.

मुझे नहीं लगता कि किसी भी मध्यवर्गीय लड़के के लिए, जिसने शाहरुख जितना पैसा कमाया है, पैसे की अहमियत बहुत ज्यादा हो. ऐसे में उनका इस तरह उत्तेजित होना केवल अहं और हमेशा शीर्ष पर बने रहने की पागलपन भरी चाहत से जुड़ा है. यह चाहत सिर्फ सबसे आगे बने रहने की नहीं है, बल्कि ऐसी चोटी पर बने रहने की है, जहां पहुंचना बाकियों के लिए नामुमकिन हो.

महत्वाकांक्षा एक जायज गुण है. इसके बिना आप उन्नति नहीं कर सकते. लेकिन, जब आप स्व-निर्मित हों और आपकी कीमत ऐसी छवि पर टिकी हो, जिसे दरकने से नहीं बचाया जा सकता, तो अपनी सीमाओं को पहचानने में ही बुद्धिमानी है. ऐसा लिखना आसान है, करना मुश्किल.

एक भ्रम की दुनिया का हीरो प्रशंसाओं में बहता रहता है. इसी बीच वह भीतर की बुराइयों को दबाता रहता है. लेकिन, ये बुराइयां उन मौकों पर ही राक्षसी शक्ल ले लेती हैं, जब व्यक्ति के लिए अपने दायरे में रहना सबसे जरूरी होता है. अपराध के कई आयाम होते है. जो दूसरे की सराहना पर जीते हैं, उनके लिए यह दिखाना भी जरूरी होता है कि वे दूसरों से कितना स्नेह रखते हैं.

आप और आपके बच्चे एक साथ बड़े होते हैं. कुछ समय बाद दोनों के रास्ते अलग जरूर हो जाते हैं. आपके बच्चे की आंख में संशय भरा सवाल विश्व की उपलब्धियों को क्षण भर में कम कर देता है और शायद यही वजह है कि अपने बच्चे के सामने ताकत का इजहार करने की चाहत प्रबल हो जाती है.

शाहरुख खान के महान पूर्ववर्तियों ने इस राक्षस से बचने के लिए दूसरे तरीकों की खोज की थी. कभी-कभार रात सदमे में बीत जाती है और दिन खुद को धोखे में रखकर. प्रतिभावान कलाकार राजकपूर ने वहीदा रहमान के साथ ‘सुनो जी सुनो, हमारी भी सुनो’ गीत पर जबरदस्त डांस किया, लेकिन गाल की झुर्रियों ने उस चेहरे को बदल दिया था, जिसने श्री 420 में नादिरा और पूरे देश को अचंभित कर दिया था.

दिलीप कुमार ने पीढ़ियों पर राज किया, लेकिन मुगले-आजम और गंगा जमुना में दमदार अभिनय के बावजूद लंबे समय तक शीर्ष पर बने रहने की चाहत से खुद को बचा नहीं पाये. देवानंद ने भी सोचा कि वे अपने कॉलर को ऊपर करके उम्र को मात दे सकते हैं. जबकि, सच्चई यह है कि उन्हें 80 के दशक में ही फिल्मों को अलविदा कह देना चाहिए था.

सदाबहार जैसा कुछ नहीं होता. जीवन का मकसद आधा जीवन व्यतीत करने के बाद अवश्य बदल जाना चाहिए. शाहरुख खान को हमारी यादों में खुशी के प्रतीक के तौर पर जीवित रहना चाहिए न कि एक गुस्सैल के रूप में. मैं इस बात को नहीं मान सकता कि वे धन के दबाव में घमंडी हो गये हैं. मानव कभी सभी क्षेत्र का मास्टर नहीं हो सकता है, लेकिन उसे यह समझने की बुद्धि दी गयी है कि उसे कब रुकना है. हमें बेहिसाब खुशियां देने वाले शाहरुख के लिए वक्त आ गया है कि वे नये सिरे से खुद को परिभाषित करें.


*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
20.05.2012, 00.14 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

vikram Singh [vikiyadav81@indiatimes.com] rewari haryana - 2012-05-21 08:43:21

 
  Sharukh uncle M J Akbar, heading not described matter 
   
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