सस्ती दवाएं और अमरीकी दादागीरी
मुद्दा
सस्ती दवाएं और अमरीकी दादागीरी
जे के कर
इस साल 12 मार्च की तारीख भारत के अलावा विकासशील और विकसित देशों के मरीजों के
लिये एक ऐतिहासिक तारीख थी. इस दिन भारतीय पेटेंट कार्यालय ने किडनी एवं लीवर कैंसर
की दवा सोराफेनिब टोसायलेट को बेचने का अधिकार हैदराबाद की भारतीय दवा कंपनी नेटको
को भी दे दिया. इससे पहले इस दवा की बिक्री पर जर्मन महाकाय दवा कंपनी बायर का
एकाधिकार था.
अब जरा मुद्दे की बात पर गौर करें. बायर कंपनी किडनी एवं लीवर कैंसर की इस दवा को
भारत में नेक्सावार के ब्रांड नेम से बेचती रही है. किसी मरीज के लिये इसके एक माह
की खुराक की कीमत थी- दो लाख अस्सी हजार चार सौ अट्ठाइस रुपये. अब इसे भारतीय कंपनी
नेटको 8800 रूपये में उपलब्ध करवायेगी. भारतीय पेटेंट कार्यालय ने बौद्धिक संपदा
कानून का विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से अंर्तराष्ट्रीयकरण होने के पश्चात पहली
बार अनिवार्य लायसेंसिंग अधिकार का उपयोग किया है. इससे पहले यह काम केवल थाईलैंड
ने ही किया था.
एक तरफ जहां भारत के इस कदम का विश्व भर में स्वागत किया जा रहा है, वहीं अमरीकी
सरकार ने अपने औमनिबस ट्रेड एंड काम्पीटीटेवनेस एक्ट 1988 की धारा के तहत भारत वर्ष
को स्पेशल 301 के प्राथमिक निगरानी की सूची में रख दिया है. वास्तव में अमरीका अपने
व्यापारिक हितों या यूं कहें कि व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिये इस कानून का
उपयोग करता है. इसका अर्थ यह हुआ कि अमरीका का देशीय कानून अन्य विकासशील देशों की
नीतियों को प्रभावित करता है. खुले रूप में ही अमरीका की बड़ी दवा कंपनियों का संगठन
फार्मास्युटिकल्स रिसर्च एंड मैनुफैक्चरर्स आफ अमरीका यानी पीएचआरएमए तथा बौद्धिक
संपदा के रक्षा के नाम पर एकाधिकार बनाये रखने वाले संगठन इंटरनेशलन इंटैलैक्चुएल
प्रापर्टी एलांयस यानी आईआईपीए के दिशा निर्देशो के अनुसार ही स्पेशल 301 की दोनों
सूचियां- पहला प्राथमिक निगरानी की सूची तथा दूसरा निगरानी की सूची तैयार की जाती
है.
गौरतलब है कि औमनिबस ट्रेड एंड काम्पीटीटीटेवनेस एक्ट 1988 के तहत अमरीका अपना
वाणिज्यक राजदूत नियुक्त करता है. जिसे यूएस ट्रेड रिप्रेजेन्टेटिव कहा जाता है. यह
वाणिज्यक राजदूत कैबिनेट का सदस्य होता है तथा इसे अपने मामलों में अमरीकी
राष्ट्रपति के समान अधिकार प्राप्त है. इसी की सलाह पर अमरीकी राष्ट्रपति तथा वहां
की कांग्रेस अन्य देशों के खिलाफ बंदिशे लगाता है. स्पेशल 301 की धारा घोषित रूप से
विदेशों में अमरीकी बौद्धिक संपदा को हुए आर्थिक नुकसान की देखभाल तथा रक्षा के लिए
बनायी गई है.
अप्रैल 2012 को जारी स्पेशल 301 की रपट के अनुसार भारत को प्राथमिक निगरानी की सूची
में रखा गया है. इस रपट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि अनिवार्य लाईसेंसिंग
के तहत भारत के पेटेंट कन्ट्रोलर जनरल ने देशी कंपनी को दवा बेचने का अधिकार दे
दिया है. दूसरा, भारत में डाटा एक्सक्लुसिविटी या आंकड़ों की विशिष्ठता का कानून नही
है. तीसरा राज्यों की यानी भारतीय प्रदेशों की इन कानूनों को लागू करवाने वाली
एजेंसियों के बीच तालमेल नही है. चौथा भारत में न्यायिक कमिया हैं.
कुल मिलाकर, अमरीका भारत के कानून, न्यायिक व्यवस्था तथा कानून को लागू करने वाली
एजेंसियों पर ही सवालिया निशान लगा रहा है तथा इनमें बदलाव के लिये दबाव डाल रहा
है. जाहिर है, यह एक सार्वभौमिक देश के अधिकारों पर खुला हस्तक्षेप है. लेकिन इस
मुद्दे पर सरकार की चुप्पी हैरान करने वाली है.
भारतीय पेटेंट कानून 1970 तथा उसमें 2005 में किये गये संशोधनों के अनुसार अनिवार्य
लाईसेंसिंग की धारा के तहत भारतीय पेंटेंट कार्यालय को यह अधिकार दिया गया है कि
यदि किसी देशी या विदेशी दवा कंपनियों द्वारा अपने पेटेंटेड दवा का भारत में
निर्माण नही किया जा रहा है तथा वह केवल एकाधिकार ले कर बैठ गया है या वह दवा
समुचित रूप से उपलब्ध नही है या उस दवा का मूल्य अधिक है तो उस दवा पर अनिवार्य
लाईसेंस दिया जा सकता है. इसके तहत किसी दूसरे कंपनी, संगठन या व्यक्ति को उसका
लाईसेंस दिया जा सकता है ताकि जनसामान्य को वह दवा उपलब्ध हो सकें.
बायर की पेटेंटेड दवा नैक्सावार के मामले में भी यही हुआ है. बायर इस लीवर तथा
किडनी के कैंसर की दवा के एक माह की खुराक की कीमत 2,80,428 रूपया लेती है. इस रोग
के भारत में करीब 20,000 मरीज हैं तथा इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है. क्या सामान्य
भारतीय नागरिक जीवन भर के हर माह इतनी कीमत अदा कर सकता है? इसका जवाब ‘नहीं’ में
ही होगा.
अब भारतीय दवा कंपनी नेटको इसे 8,800 में उपलब्ध कराने जा रही है. अभी-अभी भारतीय
कपंनी सिपला ने घोषणा की है कि वह यही दवा 6,840 रूपये में उपलब्ध करवायेगी. जाहिर
है, नेटको या सिपला कंपनी भी अपने मुनाफे के साथ ही दवाएं बाजार में उतारेंगी.
यहां यह उल्लेख करना जरुरी है कि भारत को विश्व की दवा दुकान कहा जाता है. भारत से
करीब 165 देशों को कम कीमत पर दवाओं का निर्यात किया जाता है. यहां तक कि विकसित
देशों को भी भारत से दवाएं निर्यात की जाती हैं. यही कारण है कि भारतीय दवा उद्योग,
विकसित देशों की आखों की किरकिरी बना हुआ है.
स्पेशल 301 के माध्यम से भारत से कहा जा रहा है कि ड्रग कंट्रोलर कार्यालय द्वारा
आकड़ों की विशिष्ठता के नाम पर विदेशी दवा कंपनियों के द्वारा जमा किये गये आकड़ों को
गुप्त रखा जाये. ताकि कोई दूसरी कंपनी उस दवा को न बना सके. भारत के न्यायिक
प्रणाली में जो कमिया बतायी जा रही हैं तथा राज्यों में कानून को लागू करने वाली
एजेंसियों के जिस सुधार की मांग की जा रही जा रही है, वह सब कुल मिलाकर अमरीकी
बौद्धिक संपदा की सुरक्षा के लिए है. ऐसा करने से भारतीय दवा बाजार पर अमरीकी
कंपनियो का एकाधिकार कायम हो जायेगा.
स्पेशल 301 की रपट किस प्रकार अमरीकी व्यापारियों द्वारा निर्देशित तथा प्रभावित
रहती हैं, यह समझने के लिये दो उदाहरण ही काफी है. अमरीकी बौद्धिक संपदा की रक्षा
के लिये बने इंटरनेशनल इंटेलैक्चुएल प्रापर्टी एलायंस द्वारा 10 फरवरी 2012 को जारी
प्रेस विज्ञप्ति को देखें. इसमें उन्होंने मांग की है कि अर्जेन्टीना, कनाडा, चिली,
चीन, कोस्टा -रिका, भारत, इंडोनेशिया, रूस, थाईलैंड तथा उक्रेन को प्राथमिक निगरानी
को सूची में डाल दिया जाये. इसमें से कोस्टा-रिका तथा थाईलैंड को छोड़कर शेष 8 देशों
को प्राथमिक निगरानी सूची में रखा गया है. इसी विज्ञप्ति में 22 देशों को निगरानी
की सूची में रखने की मांग की है, जिनमें से 4 को छोड़कर बाकी 18 देशों को सूची में
ले लिया गया है. इसी के पश्चात ही अप्रैल 2012 में स्पेशल 301 की रपट जारी हुई है.
फार्मास्युटिकल्स रिसर्च एंड मैनुफैक्चरर्स ऑफ अमरीका द्वारा भी इस रपट के बनने के
पहले मांग की गई थी कि भारत तथा चीन को प्राथमिक निगरानी सूची में रखा जाये तथा
भारत में जारी अनिवार्य लाईसेंसिंग पर नजर रखी जाये.
इन मुदो को दो स्तरों पर समझना होगा. पहला यह कि भारतीय पेटेंट कानून पूरी तरह
विश्व व्यापार समझौते के अनुरूप है तथा जनस्वास्थ्य के लिये यह अधिकार भारत के पास
है कि वह दवाओं पर अनिवार्य लाइसेंस जारी रख सकता है.
अमरीका के तौर-तरीकों को देखते हुये यह जरुरी है कि भारत इस मुद्दे को विश्व
व्यापार संगठन में उठाये, जहां से अमरीका भाग रहा है तथा अपने देशीय कानून का हवाला
दे रहा है. इससे भारत के साथ-साथ विश्व भर के मरीजो को फायदा होगा. दूसरा, भारत को
अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर बौद्धिक संपदा के अंतर्राष्ट्रीयकरण के खिलाफ
आवाज उठानी चाहिये. हरेक देश को अपने सामाजिक आर्थिक राजनैतिक अवस्था के अनुरूप
पेटेंट या बौद्धिक संपदा का कानून बनाने का अधिकार है.
23.05.2012, 20.00 (GMT+05:30) पर प्रकाशित