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दंगे और इंसाफ की लाचारी

हा हा भारत दुर्दशा देखी न जाई!

उम्र का उन्माद

 
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गडकरी का लोकतंत्र

बात पते की

 

गडकरी का लोकतंत्र

कनक तिवारी


इसमें कहां शक है कि भारत में दुनिया का सबसे बड़ा सांख्यिकी लोकतंत्र है. इतिहास की दृष्टि से भी यह देश छोटे-छोटे गणतंत्रों का राष्ट्रकुल (कॉमनवेल्थ नहीं) रहा है. मौजूदा लोकतंत्र लेकिन भारतीय नहीं, पश्चिमी राजनीतिक मॉडल पर आधारित है. संसदीय लोकतंत्र का मुख्य हिस्सा ग्रेट ब्रिटेन से आयातित है.

नितिन गडकरी


बालिग मताधिकार पर आधारित लोकतंत्र की मुख्य संवाहिकाएं राजनीतिक पार्टियां हैं. उनके पंजीयन, संगठन और चुनाव लड़ने की पात्रता आदि के लिए संसदीय कानून हैं, जिनके अनुपालन के लिए चुनाव आयोग जैसा संवैधानिक निकाय बनाया गया है. धीरे धीरे लोकतंत्र का कार्य-विधान राजनीतिक पार्टियों की जकड़ में आता गया है. चाहे वे राष्ट्रीय पार्टियां हों या क्षेत्रीय दल. अधिकतर राजनीतिज्ञ पार्टी के संविधान और नेतृत्व को अहमियत देते हैं बनिस्बत मतदाताओं और संसदीय कानूनों के.

भारत में संविधान, संसद और अधिकतर कानूनों की रचना का मुख्य श्रेय भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को है. संविधान के तहत जनता को दिए गए मूल अधिकारों और संविधान न्यायालयों की परिकल्पनाओं के कारण भारतीय लोकतंत्र विश्वविख्यात है. जब व्यक्ति की गरिमा और उसके नैसर्गिक तथा कानूनी अधिकारों को लेकर राजनीतिक पार्टियों के संविधान और कर्म की जांच की जाती है तो भारतीय लोकतंत्र गहरी सांसें लेने लगता है.

भारत के राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषदों को नागरिक आज़ादी में कटौती का अधिकार नहीं है. भले ही वह उनमें इजाफा कर सके. राजनीतिक पार्टी के मुखिया को लेकिन अपने सदस्यों के राजनीतिक जीवन से खिलवाड़ करने का असीमित अधिकार है. इन पार्टियों के संविधान इस तरह बनाए जाते हैं कि पीड़ित व्यक्ति अदालतों तक भी नहीं जा सके.

जम्हूरियत के शुरुआती रहनुमाओं में जवाहरलाल नेहरू का कद सबसे ऊंचा है. नेहरू में लोकतंत्र अंतर्निहित था. रोमन बादशाहों जैसे नाकनक्श होने के बावजूद जवाहरलाल लोकतंत्र के सच्चे हिमायती थे. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनाने में उनकी झिझक मुखर थी लेकिन सरदार पटेल की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी के बहुमत के कारण नेहरू ने सिर झुका लिया. दोबारा भी वैसा ही हुआ. केरल की सरकार को गिराने के मामले में कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष इंदिरा गांधी के फैसले को नेहरू ने पिता के पत्र पुत्री के नाम जैसी ज्ञानवर्धक चिट्ठी लिखकर विरोध नहीं किया.

जवाहरलाल ज़िला कांग्रेस कमेटियों की सिफारिशों के आधार पर सांसदी और विधायकी के टिकट देने के पक्षधर थे. एक बड़े विदेशी मेहमान के नागरिक अभिनंदन समारोह में उन्होंने दिल्ली की मेयर अरुणा आसफअली को प्रधानमंत्री के पहले स्वागत भाषण देने का आग्रह किया. 1955 के पहले तक जवाहरलाल प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष दोनों साथ साथ रहे. वर्षों पहले उन्होंने ‘तानाशाह जवाहरलाल‘ शीर्षक वाला लेख खुद लिखा था, जिसका रहस्य बाद में खुला.

इंदिरा गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद को लोकतांत्रिक नहीं रहने दिया. पार्टी के संविधान में राष्ट्रीय अध्यक्ष को अधिकार है कि वह पार्टी के किसी भी निर्णय को बदल सके. उनके दृढ़ स्वभाव के कारण प्रधानमंत्री का पद कांग्रेस अध्यक्ष के सिर चढ़कर बोलता रहा. सहानुभूति के कारण बने कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी भी प्रधानमंत्री ज़्यादा रहे और कांग्रेस अध्यक्ष कम. पार्टी के शताब्दी अधिवेशन में उन्होंने मुंबई में ऐलाने आम किया था कि पार्टी को दलालों से बचाया जाए लेकिन वे दलाल रक्त बीज की तरह पार्टी में फलते फूलते रहे. अब तो वे स्वयं सत्ता पर काबिज हो गए हैं.

सोनिया गांधी प्रधानमंत्री नहीं हैं लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में पार्टी में कोई भी उनकी अनदेखी नहीं कर सकता. विधानसभा के ताजा चुनावों के वक्त हरीश रावत, दिग्विजय सिंह, बेनीप्रसाद वर्मा, श्रीप्रकाश जायसवाल और सलमान खुर्शीद वगैरह की हरकतों के चलते सोनिया गांधी के अनुशासन पर्व में कुछ ढिलाई ज़रूर दिखाई दी. जिस वक्त केन्द्र सरकार ने अन्ना हज़ारे और रामदेव के आंदोलनों का मुकाबला किया उस वक्त भी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष शांत और अनुपस्थित नज़र आती रहीं.

कम्युनिस्ट पार्टियों में पोलित ब्यूरो नाम का केन्द्रीय ढांचा होता है और व्यक्तिवादी नेतृत्व की गुंजाइश कम होती है. इसके बावजूद श्रीपाद अमृत डांगे, नंबूदिरिपाद, ज्योति बसु, हरकिशन सिंह सुरजीत और प्रकाश कराट वगैरह समय समय पर अपने पदाधिकारी-व्यक्तित्व को संगठन के ढांचे पर लादने में समर्थ हुए हैं. केरल में अलबत्ता तत्कालीन मुख्यमंत्री अच्युतानंदन और पार्टी के सचिव के बीच दिलचस्प रस्साकशी चलती रहती है.

क्षेत्रीय पार्टियों बीजू जनता दल, डी एम के और अन्ना डी एम के, जनता दल यूनाइटेड, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और अकाली दल वगैरह व्यक्ति-ध्रुवों के सहारे हैं. बसपा सुप्रीमो मायावती पाताल लोक की राजकुमारी ज्यादा लगती हैं बनिस्बत लोकतांत्रिक नेता होने के. उनके मंत्री और पार्टी के पदाधिकारी दो कदम पीछे चलते हैं. छह इंच नीची कुर्सी पर बैठते हैं और मायावती के सामने जबान नहीं खोलते. जितने लोगों ने मायावती के चरण छुए हैं, उतने लोगों ने तो चरणपादुकाप्रिय कमलापति त्रिपाठी के नहीं छुए होंगे.
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इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Aarti Singh [] delhi - 2012-06-06 06:53:16

 
  कनक जी की बातों/जुमलेबाजी में जातिवाद की स्पष्ट गंध मौजूद है. मासूमियत से बीजेपी का प्रचार हो रहा है.  
   
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