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अथः बस्तर वध कथा

मुद्दा

 

अथः बस्तर वध कथा

आलोक प्रकाश पुतुल

 

माओवादी शिविर



 

 

 

 

 

 

 

एक

हम दंतेवाड़ा के गोलापल्ली में थे. कोंटा से आंध्रप्रदेश के लक्ष्मीपुरम से होकर मेहता और फिर उसके बाद सिंगारम और फिर वहां से कोई 15 किलोमीटर का सफर तय करके गोलापल्ली. गोलापल्ली यानी देश के सर्वाधिक नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा से कोई 230 किलोमीटर दूर बसा एक गांव. नहीं, अब इसे गांव कहना ठीक नहीं है.

तीन साल पहले तक गोलापल्ली में चार सौ से अधिक लोग रहा करते थे. खेती और वनोपज के सहारे उनकी जिंदगी चल रही थी. जून 2005 में जब सलवा जुड़ूम शुरु हुआ तो कुछ महीनों बाद इन गांव वालों पर भी दबाव बनाया गया कि वे अपना गांव छोड़ कर सरकार द्वारा बनाये गये शिविरों में रहें. पहले तो गांव वालों ने मना किया. लेकिन सलवा जुड़ूम वालों का दबाव बढ़ता गया. एक-डेढ़ साल बाद जब बात तोड़-फोड़ और हिंसा तक आ गई तो गांव वालों को 18 किलोमीटर दूर मरईगुड़ा सरकारी शिविर की ओर रुख करना पड़ा.

अब गोलापल्ली में केवल विरानी है. कोई दर्जन भर ऐसे लोग ही गांव में बच गये हैं, जो अपनी उम्र के कारण कहीं नहीं जा सकते.

गोलापल्ली में अपनी पूरी जिंदगी गुजार देने वाले हिड़मा एक मकान की ओर इशारा करते हुए बताते हैं “ यह इस गांव का डाकघर था.” लेकिन अब यहां कोई चिट्ठी नहीं आती. बाहर एक पत्र पेटी लगी हुई है, किसी चिट्ठी का इंतजार करती हुई. सामने के खेत खाली पड़े हुए हैं. पिछले तीन सालों से इन खेतों में कुछ भी नहीं बोया गया है. लेकिन खेतों को देखकर लगता है जैसे पिछले 60 सालों से ये खेत ऐसे ही पड़े हुए हैं, बंजर और परती.

गांव की वीरान सड़कों से गुजरते हुए पता चलता है कि सामने सर्व शिक्षा अभियान केंद्र खोला गया था. दोपहर की तेज हवा में फड़फड़ाते खिड़की दरवाजों से झांकने पर अंदर बिखरी हुई किताबें नजर आती हैं. किताबों में दीमक लगी हुई है. साथी पत्रकार हंसते हुए कहते हैं- “ पूरी व्यवस्था में दीमक लग गई.”

गांव वाले मरईगुड़ा सरकारी शिविर में गये और फिर गांव में तमाम सरकारी सुविधायें बंद कर दी गयीं. आंगनबाड़ी, स्वास्थ्य केंद्र, राशन दुकान, स्कूल.....सब कुछ. आसपास में लगने वाले स्थानीय बाज़ार पर रोक लगा दी गई. यानी आप चाहें तो भी इम गांवों में नहीं रह सकते.

ट्राइबल वेलफेयर सोसायटी के प्रवीण पटेल कहते हैं-“ सलवा जुड़ूम शुरु करने के बाद सरकार ने बस्तर में कम से कम 800 गांवों में बुनियादी सुविधायें बंद कर दीं. बाज़ार बंद कराये जाने के बाद लोगों को नमक तक के लिए सौ-सौ किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ती है. आसपास के इलाके में कल तक 2 रुपये किलो बिकने वाला नमक 40 रुपये किलो तक बिकता है.”

फरवरी 2007 तक गोलापल्ली की अधिकांश आबादी को आखिरकार मरईगुड़ा शिविर में जाना पड़ा, जहां पहले से ही आसपास के ढ़ाई हजार लोग रह रहे थे. हालांकि आज इस कैंप में बमुश्किल आधे लोग बचे हैं. शेष लोग कहां गये ? मरईगुड़ा सरकारी राहत शिविर में रहने वाली आइते सामने की ओर इशारा करती हुई बताती हैं- “ उधर.”

उधर का मतलब है आंध्र प्रदेश.

कैंप में तो सारी सुविधायें थीं, फिर अनजानी जगह पर जाने का फैसला क्यों ? वनवासी चेतना आश्रम के एक कार्यकर्ता कहते हैं- “ सरकारी कैंप तो आदिवासियों के लिए नरक हैं. न तो वहां खाने की सुविधायें हैं और न ही रोजगार की कोई व्यवस्था है. जैसे-तैसे करके लोग अपना जीवन गुजार रहे हैं. और गुजार क्या रहे हैं, मर रहे हैं. ”

ग्रामीणों की मानें तो जगरगुंडा राहत शिविर में तो 3-3 महीने के बाद राशन पहुंचता है. कई बार ऐसा हाल हुआ है कि लोगों को 3-3 दिन तक भूखा रहना पड़ रहा है. हालांकि राहत शिविर शुरु होने के बाद आदिवासियों को मुफ्त खाना दिया जाता था, लेकिन धीरे-धीरे खाना बंद कर दिया गया या कम कर दिया गया. जगरगुंडा में लोगों ने महीनों तक बिना नमक के खाना खाया है.

पानी की कमी से जुझ रहे इस कैंप में राज्यपाल के कहने के बाद 2 हैंडपंप लगाये जाते हैं. लेकिन इस कैंप में बीमारी पर काबू पाने की कोई भी सरकारी कोशिश नजर नहीं आती. डाक्टर के अभाव में अब तक कई बच्चे मलेरिया से मर गये हैं.

असल में इस कैंप में हमेशा सैकड़ों आदिवासियों के बीमार रहने के कारण यह व्यवस्था बनाई गई थी कि 15-15 दिनों के लिए डाक्टरों का दल वहां काम करेगा लेकिन पहले से तैनात डाक्टर अपना 15 दिन का टर्म पूरा करके जिला मुख्यालय लौट गये और हेलिकॉप्टर की अनुपल्बधता का बहाना बना कर डाक्टरों का कोई दल गया ही नहीं. मलेरिया, खुजली, उल्टी-दस्त से ग्रामीणों की मौत होती रहे तो अपनी बला से.

हफ्ते भर बीमार पड़े हुए सुंडाम विजय कहते हैं- “ हमें यहां मरने के लिए छोड़ दिया गया है.” करटम लक्खे, उईका संजु, कुंजामी हुंगी जैसे लोग महीने भर से बीमार हैं, लेकिन उन्हें देखने वाला कोई नहीं है.

दंतेवाड़ा के जिला कलेक्टर एसपी शौरी मानते हैं कि जगरगुंडा की हालत खराब है क्योंकि वहां जाने के लिए पुलिस को हेलिकाप्टर की सहायता लेनी पड़ती है क्योंकि नक्सलियों ने शिविर तक पहुंचने वाले सारे रास्तों को खोद दिया है.

हालांकि शौरी का दावा है कि दूसरे कैंपों में सारी बुनियादी सुविधाएं हैं. लेकिन हर रोज इलाकों से आने वाली कहानी शौरी के दावे को एक सिरे से खारिज कर देती हैं. बस्तर में सलवा जुड़ूम शुरु होने के बाद बनाये गये दोरनापाल राहत शिविर में शुरुवाती दौर में लगभग 17 हजार लोग थे लेकिन अव्यवस्था ने उनमें से अधिकांश को अपना कैप छोड़ने पर मजबूर कर दिया. हालांकि इस कैंप में रह रहे लोग अपने गांव नहीं लौटना चाहते. कुछ दिनों पहले ही कैंप से कुछ किलोमीटर दूर बसे टेटराई गांव पर हमला बोल कर माओवादियों ने लगभग 40 मकानों में आग लगा दी थी औऱ कई घरों को ब्लास्ट करके उड़ा दिया था.
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SHAHROZ (SHAHROZ_WR2YAHOO.COM) DELHI

 
 अंग्रेज़ी की एक लेखिका और इधर एक्टिविस्ट के नाते ज़्यादा चर्चित अरुंधती राय की एक पत्रिका में छपी रपट को पढने के बाद इस खोजी रपट को पढना सकते में डाल देता है.लेकिन आज स्थिति जितनी भयावह दिखती है कल इस से किसी भी मायने में कम नहीं थी खौफनाक!

लेकिन सवाल अब भी ज्यों का त्यों है कि आखिर इन मासूम आदिवासियों की गलती क्या है?
साहित्य में दखल रखने वाले जैसा वह खुद को मानते हैं विश्वरंजन का यह कहना कि सब झूठ है तो सच क्या है?

और सच यह नहीं कि बेक़सूर आदिवासियों को पूँजी के खेल में लाश और हथियार बनाया जा रहा है.
 
   

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