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मनमोहन सिंह की पवित्रता

बाईलाइन

 

मनमोहन सिंह की पवित्रता

एम जे अकबर

मनमोहन सिंह


संतों के नामों से भले मोटे रजिस्टर को भरा जा सकता हो, लेकिन ऐसे संत कम ही हैं, जो सामूहिक स्मृति पर छाप छोड़ पायें. संत अगस्तस (सन् 354 से सन् 430) अपनी एक ऐसी अमिट छाप छोड़ गये कि सूक्तियों का कोई भी कोष उनके वचनों के बिना पूरा नहीं होता. आनेवाली संततियों के लिए कन्फेशंस में एक ऐसा ही वचन दर्ज है.

संत अगस्तस प्रार्थना करते हैं : “हे ईश्वर मुझे पवित्रता और इंद्रियों पर नियंत्रण रखने की शक्ति दें. लेकिन अभी नहीं.”

दिल्ली की किसी भी सरकार का यह लक्ष्य हो सकता है. हर मंत्री ईमानदार और पवित्र होना चाहता है, लेकिन मंत्री पद छोड़ने के बाद. जब वे सत्ता में होते हैं तो जेब में जाने वाले पैसे को गिनने में ही लगे रहते हैं.

यूपीए-2, यूपीए-1 के लिए एक भयावह शत्रु बन गया है. इसमें घोटालों का जन्म तेज रफ्तार से होता है. इसमें शुरुआती सौदे काफी तेजी से हो जाते हैं. दोनों पक्षों को आपस में संवाद करने में ज्यादा वक्त नहीं लगता. यहां दलाली करने वाले बेहद सक्षम और योग्य हैं. यहां कोई देरी होती है तो बस तोल-मोल में. यह देरी हो भी क्यों नहीं. आखिर दावं पर होश उड़ाने वाला पैसा जो होता है.

लेकिन क्योंकि दोनों पक्षों को यह मालूम होता है कि सौदा तो किया ही जाना है, इसलिए यह सब कुछ एक निश्चित समय सीमा के भीतर निबटा लिया जाता है. समय लगता है इन घोटालों पर से परदा हटाने में. परियोजनाओं के जमीन पर उतरने में वक्त लगता है. फिर कोई शिकायत करता है, तब इस पर जांच शुरू होती है.

इसके बाद सीएजी जैसी संस्था को काफी सतर्कता के साथ ऐसी रिपोर्ट तैयार करनी होती है, जो कठघरे में खड़े किये जा रहे लोगों के पलटवार को झेल सकें. घूस देने और घूस लेने वाले कानूनी सलाह और पीआर मैनेजरों पर बड़ी रकम खर्च करते हैं, ताकि अपनी चमड़ी बचा सकें. घोटाले के सामने आने के बाद भी यह जरूरी नहीं कि इसकी लपट तुरंत महसूस की जा सके.
कोल ब्लॉक आवंटन में हुए बड़े घोटाले की खबर नयी नहीं रह गयी है. मंत्रियों के सगे-संबंधियों की इसमें मिलीभगत और पूर्ववर्तियों का भ्रष्टाचार भी किसी से छिपा नहीं है. लेकिन, मामले ने तब तूल पकड़ा, जब टीम अन्ना ने सीधे पीएम को निशाने पर ले लिया.

सत्ता प्रतिष्ठान ने यह धारणा प्रचारित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है कि प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत ईमानदारी सवालों से परे है. शायद ऐसा है भी. लेकिन यह अपने आप में कम महत्वपूर्ण नहीं है कि अब इस बाबत ‘शायद’ का इस्तेमाल हो रहा है. लेकिन, प्रधानमंत्री एक तथ्य से बच नहीं सकते.

शिबू सोरेन के इस्तीफे के बाद से कोयला मंत्रालय उनके ही पास है. अगर कोयला मंत्रालय में उनकी निगरानी में बड़ी लूट को अंजाम दिया गया, तो उन्हें इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी. अगर उन्होंने देश के संसाधनों की लूट की इजाजत दी, तो उन्हें जवाब देना होगा. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लूट का पैसा दूसरे लोग ले गये.

उनका एक ही जवाब हो सकता है और इसमें थोड़ी ईमानदारी की भी संभावना है कि उन्होंने दस्तखत करने से पहले फाइलों को नहीं पढ़ा. लेकिन, यह जवाब अपने आप में काफी नहीं है. इसे एक विडंबना ही कहा जा सकता है कि जो प्रधानमंत्री बार-बार यह कहते हैं कि उनकी जिंदगी एक खुली किताब है, एक ऐसी सरकार के मुखिया हैं, जो और कुछ नहीं बंद किताबों की एक कभी न खत्म होने वाली दास्तां बन गयी है.

1947 के बाद ऐसे सतत भ्रष्टाचार का रिकॉर्ड किसी सरकार ने नहीं बनाया. यह पाप ही है, जिसे गवर्नेंस की अनुपस्थिति ने और गहरा कर दिया है. 2009 के आम चुनाव में मनमोहन सिंह के पास एक ट्रैक रिकॉर्ड था, जिसे लेकर वे जनता के पास जा सकते थे, लेकिन 2012 तक उनका ट्रैक रिकॉर्ड इतना बदरंग हो गया है कि अब वे जनता के पास जाकर वोट भी नहीं मांग सकते. सोनिया गांधी यह समझती हैं.

कोर ग्रुप की बैठक में उनकी बॉडी लैंग्वेज में हताशा साफ दिख रही थी. उन्हें पता है कि सरकार को बदलने का वक्त आ गया है. अगर वे इसे नहीं बदलेंगी, तो जनता इसे बदल देगी. और ऐसा होगा तो इस सरकार का चिथड़ा भी नहीं दिखाई देगा. राजनीतिक कैलेंडर उन्हें इसका एक मौका दे रहा है.

राष्ट्रपति का चुनाव होने वाला है. कांग्रेस की चुप्पी ने सभी तरह के कयासों को जन्म दिया है. सोनिया गांधी मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति भवन के लिए प्रमोट करके अपनी पार्टी पर बड़ा उपकार कर सकती हैं. इसके बाद वे एक बिल्कुल क्रांतिकारी किस्म की नयी सरकार का गठन कर सकती हैं. सोनिया के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं. मनमोहन सिंह के उत्तराधिकारी के नाम पर सहयोगी दलों और उससे भी बढ़ कर देश की सहमति जरूरी है.

उनकी इच्छा राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की हो सकती है, लेकिन निकट भविष्य में इस विचार का कोई खरीदार नहीं है. यूपी की जीत राहुल को यह मौका दे सकती थी, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. मुखर्जी के हाथ में मध्य जून में बैटन थमाया जा सकता है. ऐसा नहीं भी हो सकता. अगर ऐसा होता है तो यह यूपीए-2 की विनाशकारी शुरुआत के अंत का ही संदेश लेकर आयेगा.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
03.06.2012, 00.29 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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