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यादों में मेहदी हसन

स्मरण

 

यादों में मेहदी हसन

रूह को इत्मीनान और आसूदगी बख्शने वाली आवाज

संजय पटेल


साल रहा होगा 1987-88. मुकाम इन्दौर.म.प्र.सरकार के प्रतिष्ठा प्रसंग लता अलंकरण समारोह के अंतर्गत आयोजित सुगम समारोह में प्रस्तुति देने तशरीफ लाए हैं गजल के शहंशाह मेहदी हसन साहब. तब का इन्दौर न तो चमकीली और महंगी गाड़ियों से लकदक था और न ही मॉल कल्चर इसकी फिजाओं में दम मार रहा था.

मेहदी हसन


मेहदी हसन का आना एक बड़ी खबर जरूर थी लेकिन आज सितारा कलाकारों को लेकर जिस तरह की बेसब्री होती है या अखबारों के चिकने पन्ने सजे होते हैं; ऐसा कुछ था नहीं. बालों में सुफैदी की आमद हो चुकी थी और खाँ साहब उसे ढँकने के लिये मेहदी रंगे हुए थे.

मालवा में ठंड ने पैर पसारने शुरु कर दिये थे, सो मेहदी साहब काली अचकन,चूड़ीदार पजामा और लखनवी कुर्ता पहने हुए थे. उंगलियों में हर वक्त एक सिगरेट का पैकेट. साथ में कामरान आया था, जो उनका बेटा है और बेहतरीन की-बोर्ड बजाता है. दो दिन की मेहमाननवाजी थी हमारे जिम्मे और लग रहा था कि बाज मौकों पर लटके-झटके दिखाने वाले कलाकारों की तरह ही होगा इस कलाकार का बर्ताव. एयरपोर्ट से लेकर होटल और फिर प्रोग्राम के लिये आयोजन स्थल तक जब भी उनके साथ रहने का मौका आया, लगा ही नहीं कि हम किसी अंतर-राष्ट्रीय कलाकार से रुबरू हैं.

हर लम्हा मुस्कुराते और बेतकल्लुफी से बतियाते मेहदी हसन को जानना इस बात से बाखबर होना भी था कि किसी कलाकार के महान होने के लिये रियाज, घराना, विरासत, उस्ताद के बड़े-बड़े नाम से भी बड़ी बात होती है उसकी विनम्रता, इंसानी पहलू और बोल-व्यवहार. बमुश्किल आधे घंटे में वे हमसे बेतकल्लुफ हो गये थे. जब मालूम हुआ कि वे मालवा में आए हैं और जब मैंने उन्हें बताया कि राजस्थानी और मालवी संस्कृति में बोली, पहनावे, खानपान और रिवाजों का आत्मीय राब्ता है तो वे बेधड़क राजस्थानी में शुरू हो गये और दोनों दिन मीठी राजस्थानी में बतियाते रहे.

दिन में उन्होंने फरमाइश कर दी थी कि उनके लिये पान का इंतजाम करना होगा. मैंने उनके लिये बनारसी पान जुगाड़ लिये जो होल्कर रियासत के पनवाड़ी सरकारी तम्बोली की दुकान से लिये गये थे. मेहदी हसन साहब पान खाकर ऐसे चहक उट्ठे जैसे मैं उनके लिये आसमान से तारे तोड़ लाया हूँ.कहने लगे जियो! पूछने लगे- शाम को प्रोग्राम में भी खिलाओगे न ? उत्तर दिया गया-खाँ साहब आप हुक्म कीजिये, पान हाजिर हो जाएंगे. मैंने कहा-अब आप आराम कीजिये तो बोले आराम के लिये जिन्दगी पड़ी है बरखुरदार. आपके शहर में पहली बार गा रहे हैं और वह भी उस्ताद अमीर खाँ साहब और लता बाई का शहर. दोपहर में तकरीबन दो घंटे मेहदी हसन साहब ने रियाज किया. जब मैं उनसे विदा लेने लगा तो पूछने लगे- शाम को प्रोग्राम का टाइम क्या है. मैंने कहा शाम सात बजे; कितने बजे लेने आऊँ आपको. बोले हम छह बजे हॉल पर पहुँच जाना चाहते हैं.

शाम को ठीक वक्त पर उस्तादजी तैयार थे. ग्रीन रूम में उन्हें ले जाकर इत्मीनान से बैठाया तो उन्होंने साजिन्दों को बैलेंसिग के लिये भेज दिया. मुझसे कहा एनाउंस आप करेंगे, मैंने कहा हाँ तो बोले बैठो यहाँ. कहने लगे कि इस कमरे का दरवाजा बंद कर लो और कोई दस्तक भी दे तो न खोलना.

मैंने सोचा कि शायद रियाज करेंगे. मेहदी हसन, ग्रीन रूम जिसमें एक तखत था और गाव-तकिया लगा हुआ था उस पर वज्रासन में बैठ गये. आँखें बंद हैं. और खामोशी से ध्यान मग्न हैं...तकरीबन दस मिनट बाद उनकी आँखों से आँसू झर रहे हैं. फिर बड़ी बड़ी भूरी आँखें खुलीं और खाँ साहब ने आसमान की ओर देखा.

मैंने पूछा खाँ साहब इबादत चल रही थी ? मेहदी साहब ने मुझे अपने उत्तर से एक लम्हा रोमांचित कर दिया और आज जब ये स्मृति चित्र लिख रहा हूँ तो मैं उसी ग्रीन रूम में पहुँच गया हूँ और मेरी मन:स्थिति ठीक वैसी ही है.

मेहदी हसन बोले- अरे नहीं भाई दर-असल मैं अपने उस्तादों को याद करने के बाद अपनी सारी गजलों के शायरों को शुक्रिया अदा कर रहा था कि उनके करिश्माई अल्फाजों की वजह से तो मुझे दाद मिलती है. सभी कम्पोजिशन को गाने के पहले एक बार रवाँ कर लेना अच्छा होता है न.

मैं सोच रहा था चालीस बरसों से गजल को पालने-पोसने वाला यह नामचीन गुलूकार कितना विनम्र है. फिर मैंने पूछा- खाँ साहब बताइये तो ध्यान करते-करते आँखों में आँसू क्यों कर आ गये. तो मेहदी हसन बोले- भाई अल्लाताला का शुक्रिया अदा कर रहा था कि उन्होंने मुझे मौसीकी की खिदमत का जिम्मा जो सौंप रखा है. उसकी रहमत को याद कर के थोड़ा जजबाती हो गया था.

मैंने पूछा आज कंसर्ट की इब्तेदा कैसे करेंगे. बोले- तुम बताओ क्या सुनोगे ? मैंने कहा- खाँ साहब आपका ताल्लुक राजस्थान से है और आप मालवा में हैं. क्यों न आप आज माँड गाकर आमद लें. खाँ साहब ने कहा- आज ऐसा ही सही. और मालवा की वह शाम मेहदी हसन के मादक स्वर का स्पर्श पाकर केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देस से गमक उठी.

मेहदी हसन की गायकी का खूँटा तकरीबन साठ बरसों तक जमा रहा. इसमें कोई शक नहीं कि उनके पहले बरकत अली खाँ, के.एल.सहगल, बेगम अख्तर, मास्टर मदन, तलत मेहमूद गजल की दुनिया में अपनी पहचान मुकम्मल कर चुके थे और गजल को मनचाही परवाज मिल भी रही थी लेकिन उसे अवाम की जद में लाने का काम तो मेहदी हसन ने ही किया. क्लासिकल मौसीकी के आधार लेकर ज्यादातर गजलें उन्होंने हारमोनियम, तबला और सारंगी की संगति लेकर गाई.

गालिब, फ़ैज, फराज, हफ़ीज जलंधरी से लेकर कतील शिफ़ाई तक के कलाम उनकी सुनहरी आवाज से झरे. पाकिस्तानी फिल्मों में भी उनकी सक्रियता बनी रही. लेकिन उनका खास इलाका तो गजल था. खुद बेजोड बाजा बजाते हुए उनका स्वर षडज लगाता तो शायरों के कलम का रुतबा बढ़ जाता. रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिये आ को उन्होंने खुसूसी अंदाज में यमन में बांधा और परिणाम यह हुआ कि यह एक ग्लोबल गजल बन गई.

यकीनन अहमद फराज की अपार लोकप्रियता का श्रेय काफी हद तक मेंहदी हसन को भी दिया जाना चाहिये. जिंदगी में तो सभी प्यार किया करते हैं, मोहब्बत करने वाले कम न होंगे, मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो, गुलों में रंग भरे बादे नौबहार चले, चरागे तूर जलाओ बड़ा अंधेरा है, अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिले, दिल की बात लबों तक लाकर, गुलशन गुलशन शोला ए गुल की, पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है, ऐसी गजलें हैं जो आम आदमी में इसलिये लोकप्रिय हुईं क्योंकि उसे मेहदी हसन जैसा अमृत-स्वर मिला.

इसमें कोई शक नहीं कि गजल मेहदी हसन के पहले भी थी और बाद में भी जारी रहेगी लेकिन उसे बरतने का जो सलीका इस फनकार ने दिया, वह उसी के साथ विदा हो गया है.

यूँ बीते दस-बारह वर्षों से मेहदी हसन बीमार थे लेकिन ये तकनीक का ही कमाल है कि वह हमारे घर-आँगन का लाड़ला स्वर बने रहे. नई आवाजों के लिये आज भी मेहदी हसन गजल का विद्यापीठ बने रहेंगे. पाकिस्तान में उनके चाहने वालों की कमी नहीं लेकिन बिला शक हिन्दुस्तान के संगीतप्रेमी उनकी महफिलों के लिये बेसब्र रहे. यह उनकी गायकी का जादू ही है कि सुकंठी लता मंगेशकर तनहाई में सिर्फ़ मेहदी हसन को सुनना पसंद करती हैं. इसे भी तो एक महान कलाकार का दूसरे के लिये आदरभाव ही माना जाना चाहिये. हम सब की जिन्दगी यथावत चलती रहेगी लेकिन मेहदी हसन के जाने से गजल की ड्योढ़ी तो सूनी हो गई है. समय बेरुखी से संगीत को बेसुरा बनाने पर आमादा है लेकिन जब कभी इंसान की रूह को सुरीलेपन की तलाश होगी, मेहदी हसन की आवाज ही उसे आसरा देगी.

14.06.2012, 01.36 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

neha markand [neha_2282113@yahoo.co.in] nagpur - 2012-08-04 20:27:19

 
  संजय पटेल जी, आप खुशनसीब हैं कि आप मेहदी हसन साहब के साथ दो दिन रहे. आपने बहुत ही सुंदर जानकारी दी है, आभारी हूं. आपने यह बात कमाल लिखी है कि उनकी आंखों से झरते आंसू पर भी आप केवल लेखक-पत्रकार बने रहे. बहुत बढ़िया. 
   
 

अनिल जनविजय [aniljanvijay@gmail.com] मास्को, रूस - 2012-07-29 14:26:10

 
  बड़ा ख़ूबसूरत लेख है। मेहदी हसन साहब के बारे में तो जानकारी मिली ही, लेकिन लेख की ख़ूबसूरत भाषा ने भी मन मोह लिया। रविवार का धन्यवाद इसलिए कि उसने इसे प्रस्तुत किया और मुझ जैसे पाठकों तक पहुँचाया।  
   
 

Nadeem Quamar [] Delhi - 2012-06-19 11:57:43

 
  गज़लों के बादशाह के बारे में लेख बेहद अच्छी तरह से गूंथा हुआ है. यूं तो मैंने भी बचपन से मेहदी साहब को सुना है मगर कभी उन्हें जानने का मौका नहीं मिला. मगर आपके इस लेख ने काफी कुछ बताया उनके बारे में. धन्यवाद. 
   
 

awdhesh vimal [awdhshvimal@gmail.com] bilaspur - 2012-06-14 16:22:27

 
  काफी अहम जानकारी मिली, धन्यवाद. हसन साब की आवाज़ एक सांसकृति विरासत है. आवश्यकता इस बात की है कि आज की युवा पीढ़ी इसे संजोए रखे. अश्रुपूरित श्रद्धांजलि. 
   
 

brajesh [bgouraha@gmail.com] - 2012-06-14 08:47:35

 
  मोहब्बत करने वाले कम ना होंगे तेरी महफिल में लेकिन हम न होंगे.. अलविदा शहंशाह-ए-गज़ल. 
   
 

arvind mishra [drarvind3@gmail.com] Varanasi - 2012-06-14 01:33:14

 
  मन को छू गया यह आत्मीय संस्मरण. 
   
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