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राष्ट्रीय छुरा घोंप राजनीति में स्वागत है बहन

बाईलाइन

 

राष्ट्रीय छुरा घोंप राजनीति में स्वागत है बहन

एम जे अकबर


ममता बनर्जी आवरण के महत्व को समझती हैं. उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में कभी-कभार इसका प्रयोग किया है, जब अशांति ने उन्हें एक उतार-चढ़ाव वाले ठिकाने से दूसरी जगह जाने के लिए मजबूर किया है. लेकिन उन्होंने कभी अनुभवी जुगाड़ू द्वारा अपनी पीठ में छुरा घोंपने का दर्द महूसस नहीं किया होगा. छुरा ऐसा घोंपा गया कि घाव तो लगे, पर उसका निशान न हो. और वह घाव भरा भी न जा सके.

मुलायम सिंह यादव


छुरा अपना समय बारीकियों में बर्बाद नहीं करता है. इसे खून का स्वाद पसंद होता है. इसका संदेश तीखा होता है. आवरण कोलकाता की शिल्पकृति है और छुरा दिल्ली का हथियार. राष्ट्रीय राजनीति में स्वागत है, बहन ! किसी घटना के बाद बुद्धिमान होना आसान है. इससे भी आसान है, पीड़ित पर टिप्पणी करना.

जब कोई भालू जंजीरों में असहाय दिखता है तो दर्शकों के मन में क्रूरता स्वत: आ जाती है. खासकर तब, जब इन जंजीरों के लिए कोई दूसरा जिम्मेवार न हो, केवल आपकी गलतियां और गलत फैसले इसकी वजह हों.

दुनिया हंसी के बदले उपहास को प्राथमिकता देती है. लेकिन जब बात गंभीर फैसले की आती है तो जटिलता को अपराध नहीं माना जाता है. दूसरी ओर से मिला धोखा कुछ पल यातना में बिताने का माकूल कारण होता है.

दिल्ली के निराशावाद के उच्च मानकों के बावजूद, चाहे मुगल सल्तनत या ब्रिटिश राज का काल रहा हो या संख्या के खेल की चालाकी बरतने का यह आधुनिक दौर, मुलायम सिंह का फर्जी विद्रोह से परदे के पीछे समझौता कर पलटी मारना सनसनीखेज है.

आप ममता बनर्जी के चेहरे पर सदमे को कैमरे में कैद कर सकते थे, जब उन्हें पता चला कि मुलायम ने कांग्रेस के साथ अपनी कीमत तय करने के लिए उनका प्रयोग किया है. मुलायम इससे अविचलित थे और वे ऐसे बने रहेंगे. मौजूदा लोकसभा के कार्यकाल में वे पाला बदलने और अपने फायदे के लिए बांहें मरोड़ते रहे हैं.

राष्ट्रपति चुनाव के इर्द-गिर्द हुए कुछ घटनाक्रमों को भूलने के बावजूद मुलायम की इस पलटी मारने को लंबे समय तक याद रखा जायेगा. जैसा जनता सरकार को गिराने के लिए चौधरी चरण सिंह और कांग्रेस के बीच हुई डील राजनीतिक सीख का अंग बनी थी. इस घटनाक्रम की प्रासंगिकता हो सकती है या नहीं भी कि उत्तर प्रदेश के दूसरे समाजवादी राजनारायण इस डील के मुख्य शिल्पकार थे.

ममता के पास अफसोस जताने के लिए काफी वक्त है. लेकिन उन्हें सबसे अधिक अफसोस, अगर वे जाहिर नहीं करती हैं तो, यह होगा कि प्रणब कांग्रेस उम्मीदवार बन गये क्योंकि उन्होंने इसे रोकने की कोशिश की.

यह सभी जानते हैं कि राष्ट्रपति पद के लिए प्रणब कभी भी सोनिया के पसंदीदा विकल्प नहीं थे. अगर वे होते तो उनका नाम एक महीने पहले ही घोषित कर दिया गया होता और मौजूदा तमाशा भी देखने को नहीं मिलता. जब अंतिम समय आया तो सोनिया ने उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी को अपना उम्मीदवार बनाने की कोशिश की.

व्यक्तिगत तौर पर अंसारी ने अपने लंबे जीवन में ईमानदारी के आधार पर विश्वसनीयता हासिल की है. लेकिन इससे राजनीतिक परेशानी खड़ी हो सकती थी. सोनिया की समस्या यह थी कि मुखर्जी न केवल यह पद चाहते थे, बल्कि इसे सार्वजनिक तौर पर जाहिर भी कर चुके थे. उन्होंने यहां तक कह दिया था कि वे खारिज होने की स्थिति में रिटायर होना पसंद करेंगे.

सरकार में व्यापक पुनर्गठन के अलावा सभी संभावनाओं को ध्यान से परखा गया. जब ममता ने प्रणब के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया तो दूसरा रास्ता भी खुल गया. सोनिया गांधी को अपेक्षा थी कि ममता प्रणब का काम बिगाड़ देंगी, ताकि वे यह कह सकें कि अब एक मात्र विकल्प अंसारी बचे हुए है. जब ममता और मुलायम ने इस संकट को भड़काया तो सोनिया गांधी को समझ में आया कि केवल प्रणब में ही इतना दमखम है कि वे कांग्रेस को इस भ्रम से निकाल पायें.

राजनीति के बारे में अच्छी बात यह है कि उदासी भी अस्थायी होती है. ममता की समस्या है कि वे अकेले में गुस्सा कर रही हैं. इस अकेलेपन को तेजी से भरा जा सकता है, अगर विपक्ष पीए संगमा को अपना उम्मीवार स्वीकार कर ले. वे जीतें या हारें, लेकिन विपक्ष की महत्वपूर्ण जरूरत को पूरा कर देंगे. वे एनडीए के दायरे में तीन मुख्यमंत्रियों को लाकर उसे बड़ा बना देंगे.

नवीन पटनायक और जयललिता के घोषित उम्मीदवार संगमा हैं और संदेह नहीं कि ममता भी इस क्लब में शामिल हो जायें. उनकी तरह संगमा भी पूर्व कांग्रेसी हैं, इसलिए उन्हें स्वीकारने में दिक्कत नहीं होगी. इसका त्वरित असर लोकसभा में दिखायी पड़ेगा, जहां बिखरे विपक्षी दल केंद्रीय भूमिका में होंगे. मायावती ने प्रणब के नाम पर सहमति जता दी है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट कहा कि यह केवल मुद्दा आधारित समर्थन है.

छुरे का अपना दिन होता है. आवरण की जिंदगी लंबी होती है. केवल क्रूर ही छुरे का प्रयोग करते हैं. लोकतंत्र में थोड़ी सच्चाई की जरूरत होती है और लंबे समय के लिए आवरण उपयोगी होता है. वर्तमान में सभी राजनीतिक दलों के आलमारी में आवरण है.


*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
17.06.2012, 00.28 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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