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जेनेरिक बनाम लूट का ब्रांडेड बाज़ार

दवा का दावा

 

जेनेरिक बनाम लूट का ब्रांडेड बाज़ार

जे के कर


बुखार की दवा पैरासिटामॉल यदि पैरासिटामॉल के नाम से बाजार में उपलब्ध हो तो उसे जेनेरिक दवा कहा जाता है और यदि वह क्रोसीन या कैलपाल के नाम से उपलब्ध हो तो उसे ब्रांडेड दवा कहते हैं. फर्क दोनों की गुणवत्ता में नहीं वरन मूल्य में होता है. वैसे जब दवाओं का आविष्कार जेनेरिक नाम से ही होता है लेकिन दवा कंपनियां उसे अपने ब्रांड नाम से ही बाजार में पेश करती हैं. इस ’पेश’ करने की पूरी प्रक्रिया में ही दवाओं का मूल्य कई गुना बढ़ जाता है, जिसका फायदा दवा कंपनियों के मालिकान को होता है और नुकसान आम मरीज का.

जेनेरिक दवा


कमीशन आफ मेक्रो इकानामिक्स एण्ड हेल्थ की गणना के अनुसार भारत के सभी बाह्य रोगियों को यदि मुफ्त में उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं दी जाए तो उसका खर्च केवल 9000 करोड़ रुपए प्रतिवर्ष होगा. जबकि भारत में ब्रांडेड दवाओं का घरेलु दवा बाजार 62000 करोड़ रुपए का है. आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2011-12 के अनुसार हमारे देश का सकल घरेलु उत्पादन वर्तमान मूल्य पर करीब 8900000 करोड़ रुपयों का है. जिसका एक प्रतिशत होता है 89000 करोड़ रुपया. यह 9000 करोड़ रुपया हमारे सकल घरेलु उत्पादन के एक प्रतिशत का करीब दसवां हिस्सा ही है.

2012-13 के आम बजट में स्वास्थ्य पर 34448 करोड़ रुपया खर्च करने का प्रस्ताव है. इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यदि सरकार को आम मरीज या आम जनता की रत्ती भर भी परवाह है तो सारे देश के बाह्य रोगियों को मुफ्त में दवाएं दी जा सकती है तथा इससे बजट पर भी भार नहीं पड़ेगा. आवश्यकता है अपनी प्राथमिकताएं तय करने की.

सन 2008 में तत्कालीन रसायन तथा उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान द्वारा जन औषधालयों की शुरुआत की गई थी, जिसमें उच्च गुणवत्ता वाली जेनेरिक दवाएं कम मूल्य में उपलब्ध हैं. उदाहरण के तौर पर सिप्रोफ्लाक्सासिन नामक एंटीबॉयोटिक 500 एमजी के खुराक की 10 गोलियां जन औषधालयों में केवल 21.50 रुपए में मिलती है, जबकि इसी दवा का ब्रांड 97.00 रुपए में मिलता है. उसी प्रकार दर्द निवारक डाइक्लोफेनिक के 100 एमजी की दस गोली 3.50 रुपए में उपलब्ध है, जिसकी ब्रांडेड दवा का मूल्य 36.70 रुपए है. सरकारी जन औषधालयों में एलर्जी की दवा सेट्राजीन 2.75 रुपए में मिलती है. इसे यदि आप बाजार से खरीदेंगे तो दस गोलियों के लिये आपको 20 रुपये चुकाना पड़ेगा. आवश्यकता है कि इन जन औषधालयों को हरेक शहर एवं गांवों में आबादी की जरुरत के मुताबिक खोला जाए ताकि आम जन सस्ती दवाएं खरीद सके.

सन 1975 में जयसुखलाल हाथी के नेतृत्व में बने हाथी कमीशन ने तो अपनी अनुशंसाओं में इसका जिक्र भी किया था कि भारत में दवाएं जेनेरिक नाम से ही बाजार में उपलब्ध हों. लेकिन आज 2012 में भी जाने किस दबाव और प्रलोभन में हमारी सरकारों ने हाथी कमीशन की अनुशंसा को लागू करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.

सरकारी दस्तावेजों की मानें तो नवंबर 2008 से सरकार ने जन औषधि मेडिकल स्टोर खोलने का अभियान चला रखा है लेकिन हालत ये है कि पिछले तीन सालों में सरकार देश भर में कुल 113 स्टोर ही खोल सकी है. जाहिर है, अकूत मुनाफा और रिश्वतखोरी से भरे इस बेशर्म समय में राज्य और केंद्र सरकार मेडिकल स्टोर खोलने के मामले में एक-दूसरे पर दोषारोपण करके पल्ला झाड़ लेती हैं. यह जानना भी दिलचस्प है कि उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार, तमिलनाडु, केरल और छत्तीसगढ़ में जेनेरिक दवाओं के लिये मेडिकल स्टोर खोलने की न तो केंद्र सरकार ने कोई पहल की और ना ही इन राज्य की सरकारों ने अपनी ओर से केंद्र को एक चिट्ठी ही लिखने की जहमत उठाई.

अब जा कर जन औषधि अभियान की संशोधित कारोबार योजना के पहले चरण में सरकार का उन 11 राज्यों में जन औषधि स्टोर खोलने का प्रस्ताव बना है, जहां योजना को कुछ सफलता मिली है. ये राज्य हैं-पंजाब, हरियाणा, उत्तराखंड, ओडि़शा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, जम्मू कश्मीर, केंद्र शासित प्रदेश चंडीगढ़ और दिल्ली. इन 11 राज्यों में कुल 204 जिले हैं और प्रत्येक जिले में कम से कम तीन जन औषधि स्टोर खोलने का प्रस्ताव है. सरकार का दावा है कि दो वर्ष के अंदर पहले चरण में कुल 612 जन औषधि स्टोर खोले जाएंगे. इसके बाद इस योजना का विस्तार किया जाएगा और कर्नाटक तथा केंद्र शासित प्रदेशों सहित सभी राज्यों के हर जिले, सब-डिविजन में कम से कम पांच स्टोर खोलने का प्रस्ताव है. इससे देश भर में जन औषधि स्टो‍रों की संख्या 3150 हो जाएगी.

आज की तारीख में भारत में दो प्रकार की जेनेरिक दवाएं बिकती हैं. पहला जेनेरिक, जिनका हमने ऊपर उल्लेख किया और दूसरा है ब्रांडेड जेनेरिक. जाहिर है, इसमें बहुत गोलमाल है. ब्रांडेड जेनेरिक में दवा में दो नाम लिखे जाते हैं. उपर जेनेरिक नाम बड़े अक्षरों में और नीचे ब्रांड का नाम छोटे अक्षरों में. इसका मार्जिन 100 गुना से लेकर 500 गुना तक होता है तथा फायदा व्यापारी को मिलता है, मरीज को नहीं. यह जानना भी दिलचस्प है कि दवा कंपनियों की झोली भरने वाली यह ब्रांडेड जेनेरिक दवाएं केवल भारत में ही मिलती हैं. ऐसे में ब्रांडेड जेनेरिक दवाओं को बंद कर के आम जनता को काफी राहत दी जा सकती है.

विकसित देशों में इलाज का खर्च या तो सरकार उठाती है या फिर बीमा कंपनियां. ऐसी स्थिति में वे एक सुदृढ़ स्थान पर बैठकर दवा कंपनियों से मोलभाव कर लेती हैं लेकिन भारत जैसे देश में जहां 80 फीसदी जनता जेब से पैसे देकर दवा खरीदती है, वहां सरकार को नीतिगत फैसले लेकर जेनेरिक दवाओं का प्रचलन बढ़ाना चाहिए ताकि आम जन को दवाएं कम मूल्य पर मिल सकें.

19.06.2012, 11.56 (GMT+05:30) पर प्रकाशित

 

इस समाचार / लेख पर पाठकों की प्रतिक्रियाएँ

 
 

Milind [mmpadki@gmail.com] - 2012-06-27 03:27:12

 
  दवा के गोली की असली \"क्वालिटी\" सिर्फ इस चीज पर निर्भर नहीं होती की उसमे लिखी हुई हैं उतनी दवा (१००%) मौजूद है के नहीं. गोली पेट में जाने के बाद उसकी कितनी दवा खूनमें उतरती हैं ये भी बड़ी महत्वपूर्ण कसौटी हैं, जिसमें बहुत सारी \"जेनेरिक\" दवाइयां \"पास\" नहीं हो पाती (उनमेकी बहुत सारी दवा दूसरे दिन टॉयलेट में फेक दी जाती हैं.) इसका नतीजा ये होता हैं की बीमार के शरीर को पूरी दवा नहीं मिल पाती, याने की पूरा इलाज नहीं हो पाता. अगर मरीज का असली कल्याण हम चाहते हैं, तो हरेक जेनेरिक गोली बनानेवाले को ये कसौटी (bioavailability/bioequivalence) पास करनेका भी कानून बनाना जरूरी हैं. 
   
 

NARESH JOSHI [mrjoshi.naresh@gmail.com] BARWAHA [M.P.] - 2012-06-23 15:17:23

 
  जिस लूट में सरकार खुद शामिल हो उसे भला कौन रोक सकता है. हमारे देश की सरकारें या तो व्यापारिक रिमोट या दबंगाई रिमोट से संचालित होती हैं. ऐसी स्थिति में जाँच कमीटियां या जनहित की योजनाएं बनती हैं पर चलेगी या लागू तब होगी जब दबंगो या व्यापारियों हो, वरना बन कर रह जाती है. 
   
 

GOPAL PRASAD [gopal.eshakti@gmail.com] DELHI - 2012-06-21 13:26:50

 
  We should think over this matter.  
   
 

shashikant chaturvedi [shashi2026@gmail.com] gaya - 2012-06-20 06:49:21

 
  मान्यवर आपके लेख में जो तथ्य है वो इसी बात की ओर इशारा करते हैं कि सरकार किसके हित में काम कर रही है. गरीबों की जेब पर यह बोझ कम नहीं बल्कि सरकार डाल रहा है क्योंकि अप्रत्यक्ष रूप से इस लूट में शेयर तो गणमान्यों का भी है. 
   
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