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दरबारी संस्कृति में बुरी खबर

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दरबारी संस्कृति में बुरी खबर

एम जे अकबर

गिलानी और मखदूम शहाबुद्दीन


एक प्रधानमंत्री को गंवाना बदकिस्मती कहा जा सकता है. लेकिन एक ही हफ्ते में दो-दो प्रधानमंत्रियों को गंवाना लापरवाही ही है. पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के ड्राइंग रूम में एक दूसरे की वाहवाही और पीठ थपथपाने की होड़ में किसी ने भी प्रधानमंत्री का नाम आगे भेजते हुए उसके बायोडाटा पर निगाह डालने की जरा सी भी जहमत नहीं उठायी.

उपमहाद्वीप की दरबारी संस्कृति में बुरी खबर एक आपदा की तरह है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि यह दरबार पाकिस्तान में है या भारत में.

राजनीति में एक साल काफी बड़ा होता है. लेकिन, निश्चित तौर पर पाकिस्तान के लोकतंत्र में यह सबसे लंबा हफ्ता कहा जा सकता है. मंगलवार को प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी क्योंकि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर अमल करने से इनकार कर दिया था, जिसके तहत उन्हें राष्ट्रपति जरदारी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कराने को कहा गया था.

गुरुवार को मखदूम शहाबुद्दीन ने इस पद के लिए अपना पर्चा दाखिल किया. एंटी नारकोटिक्स फोर्स के रीजनल डायरेक्टर ब्रिगेडियर फहीम खान कुछ हैरत में थे. उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया किसी से जाहिर नहीं होने दी. कुछ ही घंटों में वे सैन्य अधिकारी अदालत पहुंचे और उन्होंने सात अरब रुपये के अवैध ड्रग घोटाले में शहाबुद्दीन के खिलाफ गैर जमानती वारंट हासिल कर लिया.

अब बात राजा परवेज अशरफ की. उन पर नजर जाते ही शायद हर कोई अपने कंधे उचका रहा था. उन्हें रेंटल राजा कहा जाता है. उन पर रेंटल पावर प्रोजेक्ट में घूस लेने के आरोप हैं. यह मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है. उन पर विदेश में जमीन जायदाद खरीदने का आरोप है.
इसमें धन के स्त्रोटत का किसी को पता नहीं है. लेकिन अब जरदारी के दौर में इसे बताना आसान है. आखिर, फ्रांस में मौजूद जरदारी के एस्टेट को भी पैतृक संपत्ति कहा जाता है. मुझे नहीं मालूम कि रेंटल राजा कितने दिन तक कुर्सी पर बने रहेंगे, लेकिन शुक्रवार को वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बन गये हैं.

हाजिरजवाबी या मसखरापन तभी कारगर होता है, जब वह सच को हास्य की तरफ मोड़ देता है. अगर उसका कोई आधार नहीं होता, तो वह शेखी बघारने तक सिमट कर रह जाता है. जरदारी को लेकर यह चुटकला सुनाई पड़ रहा है कि वे बेचारे मजबूर हैं क्योंकि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी में वे प्रधानमंत्री पद का ऐसा कोई उम्मीदवार ही नहीं खोज सके, जिस पर भ्रष्टाचार के आरोप नहीं हों. लेकिन, यह चुटकुला इसीलिए चल निकला, क्योंकि इसकी जड़ में कड़वी सच्चाई छिपी है.

शहाबुद्दीन नारकोटिक्स मामले में पूर्व प्रधानमंत्री गिलानी के बेटे अली मूसा गिलानी सह-आरोपी हैं. यहां भ्रष्टाचार पर चुटकले गढ़ते हुए आप बेचारगी की स्थिति तक पहुंच जाते हैं. जब आपको मालूम हो कि सबूत बेहद मजबूत और व्यापक है, तो कोई कर भी क्या सकता है? ऐसे में आंसू भी बेमानी दिखने लगते हैं.

फिर उस वक्त जब पाकिस्तान पर आंसू बहाने के लिए ढेरों और वजहें भी मौजूद हैं- विचारधारा के नाम पर हिंसा, जातीयता, आपसी फूट, बेरोजगारी की दलदल में फंसी नाउम्मीद अर्थव्यवस्था. आप कहकहों, हंसी-मजाक को बंधुत्व से जोड़ कर मत देखिए. इसके नीचे गहरे एक गुस्सा उबाल ले रहा है. यह गुस्सा चुनाव के दिन जाहिर होगा. राजनेता वकीलों के जरिये अपनी जवाबदेही को टाल सकते हैं, लेकिन चुनावी प्रक्रिया को नहीं.

चुनाव का दिन फैसले का दिन होता है. भ्रष्टाचार का रोग सिर्फ राजनेताओं तक ही नहीं सिमटा है. जज और पत्रकारों का सौभाग्य है कि उन्हें चुनावों का सामना नहीं करना पड़ता. भ्रष्टाचारियों को घेरते मुख्य न्यायाधीश इफ्तिखार मुहम्मद चौधरी कल तक हीरो थे. आज उनका बेटा ही एक व्यापारी से मदद लेने का आरोपी है.

भारत और पाकिस्तान की राजनीतिक जमात सैकड़ों बिंदुओं पर अलग-अलग है, लेकिन भ्रष्टाचार के मामले में एक जैसी है. कोई भी नैतिक तौर पर अगुवाई करना नहीं चाहता. भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोलने वाले अन्ना हजारे का दावा है कि 15 कैबिनेट मंत्री भ्रष्टाचार में लिप्त हैं.
भारतीय उनकी बात पर भरोसा करते हैं, न कि मंत्रियों पर.

एक अहम बात यहां यह है कि संघीय लोकतंत्र के परिवर्तनशील चरित्र ने भारतीय राजनेताओं की बेरोक-टोक सत्ता में बने रहने की ताकत को भोथरा कर दिया है. उत्तर प्रदेश में मिली हार और आंध्र के अनुभव के बाद कांग्रेस एक हताश पार्टी है.

पाकिस्तान में प्रधानमंत्री गंवाने का असली दुर्भाग्य यह है कि चुनी हुई सरकार, न्यायपालिका और मीडिया ने एक दूसरे को बर्बाद कर दिया है. सिर्फ एक ही संस्थान बचा है- सेना. जनरल अयूब खान हों, जिया उल हक हों या मुशर्रफ, इन सभी ने उसी वक्त सत्ता को हाथ में लिया, जब राजनेताओं ने अपनी ही कमजोरियों और गलतियों के चलते यह मौका मुहैया कराया. पाकिस्तान के राजनेता बेहद गैर-जिम्मेदार कहे जायेंगे, अगर उन्होंने इतिहास को फिर दोहराने का मौका दिया.

*लेखक ‘द संडे गार्जियन’ दिल्ली व 'इंडिया ऑन संडे' लंदन के संपादक और इंडिया टुडे, हेडलाइंस टुडे के एडिटोरियल डायरेक्टर हैं.
24.06.2012, 00.39 (GMT+05:30) पर प्रकाशित


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